रूस समेत ब्रिक्स के तीन देश आए साथ, अब क्या करेगा भारत

इमेज स्रोत, Getty Images
अमेरिका को चीन और रूस हर मोर्चे पर चुनौती दे रहे हैं. यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद चीन और रूस की जुगलबंदी और बढ़ी है.
चीन और रूस अमेरिका के दबदबे वाली विश्व व्यवस्था को ख़ारिज कर बहुध्रुवीय दुनिया की बात कर रहे हैं.
इसी के तहत चीन ने अब पूरी दुनिया में अमेरिकी मुद्रा डॉलर की बादशाहत को चुनौती दी है.
कहा जा रहा है कि अब मल्टीपोलर वर्ल्ड यानी बहुध्रुवीय दुनिया में मल्टीपोलर करेंसी भी होगी.
यानी अमेरिका का दबदबा ख़त्म होगा तो उसकी मुद्रा डॉलर के बदले दुनिया की दूसरी मुद्राएँ भी प्रचलन में आएँगी.
पिछले हफ़्ते चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग रूस गए थे तो रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा था, ''हम एशिया, अफ़्रीका के अलावा लातिन अमेरिकी देशों से व्यापार में भुगतान चीनी मुद्रा युआन में करने के पक्ष में हैं.''
चीन और रूस चाहते हैं कि डॉलर के दबदबे को ख़त्म किया जाए.
चीन के साथ व्यापार में रूस पहले से ही युआन का इस्तेमाल कर रहा है. यूक्रेन पर हमले के बाद रूस और चीन का द्विपक्षीय व्यापार भी बढ़ा है.
इसी वजह से रूस के केंद्रीय बैंक में भी यूआन का रिज़र्व बढ़ा है.
अमेरिकी न्यूज़ चैनल सीएनएन के चर्चित होस्ट फ़रीद ज़कारिया ने 27 मार्च को अपने प्रोग्राम में कहा, ''चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और रूस दुनिया का सबसे बड़ा ऊर्जा निर्यातक देश है. इन दोनों देशों ने अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था में डॉलर के दबदबे को कमज़ोर करने के लिए ठोस फ़ैसला लिया है. डॉलर अमेरिका की आख़िरी ज़िंदा ताक़त है.''
''डॉलर के दबदबे से अमेरिका का दबदबा जुड़ा है. इसी के दम पर अमेरिका किसी भी देश के ख़िलाफ़ एकतरफ़ा प्रतिबंध लगा देता है और उसकी आर्थिक गतिविधियों को रोक देता है. अमेरिका डॉलर के दम पर ही किसी भी देश को विश्व अर्थव्यवस्था से अलग-थलग कर देता है. डॉलर अमेरिका के लिए राजनीतिक और आर्थिक ताक़त है.''

इमेज स्रोत, Getty Images
ब्राज़ील भी तैयार
बात केवल चीन और अमेरिका की नहीं है. चीन और ब्राज़ील के बीच भी समझौता हुआ है कि दोनों देश युआन में भुगतान करेंगे.
ब्राज़ील और चीन के बीच बुधवार को समझौता हुआ है कि दोनों देश अपनी-अपनी मुद्रा में व्यापार करेंगे.
दोनों देश खाद्य और खनिज पदार्थ में सहयोग बढ़ाने पर भी विचार कर रहे हैं.
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह सुविधा ब्रिक्स देशों के बीच भी लागू होगी. ब्रिक्स देश डॉलर के बदले युआन और अपनी मुद्रा में व्यापार कर सकते हैं.
ब्रिक्स में ब्राज़ील, इंडिया, चाइना और साउथ अफ़्रीका हैं.
समाचार एजेंसी एएफ़पी के अनुसार, ब्राज़ील के ट्रेड एंड इन्वेस्टमेंट प्रमोशन एजेंसी ने कहा है, ''उम्मीद है कि इससे लागत कम होगी और द्विपक्षीय व्यापार के साथ निवेश को भी बढ़ावा मिलेगा.''
इससे पहले पीपल्स बैंक ऑफ़ चाइना ने घोषणा की थी कि इस तरह के प्रबंध से चीनी मुद्रा का प्रचलन चीन के बाहर बढ़ेगा.
चीन के उपवाणिज्य मंत्री गुओ तिंगतिंग ने कहा है, ''ब्राज़ील के साथ व्यापार में भुगतान युआन में करने के लिए समझौता हुआ है. यह हमारे द्विपक्षीय व्यापार के लिए काफ़ी अहम है. हम खनिज और खाद्य पदार्थ में सहयोग बढ़ाने की योजना पर काम कर रहे हैं. दोनों देश अब व्यापार अपनी-अपनी मुद्रा में करेंगे.''
पिछले एक दशक से ज़्यादा समय से चीन ब्राज़ील का सबसे बड़ा कारोबारी साझेदार है. पिछले साल दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 150 अरब डॉलर का था.
रशा टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, ब्राज़ील के वित्त मंत्रालय में अंतरराष्ट्रीय मामलों को देखने वाली तातिअना रोसिटो ने कहा है कि 25 देश युआन में पहले से ही भुगतान कर रहे हैं.
इसे भी पढ़ें:-रूस को लेकर भारत का जो डर था, क्या सही साबित हो रहा है?

इमेज स्रोत, Getty Images
एशिया के कई देश डॉलर के प्रभुत्व से परेशान
डॉलर को लेकर अविश्वास और आशंका चीन, ब्राज़ील और रूस से बाहर की दुनिया में भी बढ़ रहे हैं.
अमेरिका पर लंबे समय से आरोप लगता रहा है कि वह डॉलर को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है.
दुनिया के कई देशों को यह डर सताता रहता है कि अगर अमेरिका से अनबन हुआ तो वह रूस और ईरान की तरह अलग-थलग कर सकता है.
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, मंगलवार को सिंगापुर में एक कॉन्फ़्रेंस में पूर्व अधिकारियों ने डॉलर के बढ़ते प्रभुत्व और स्थानीय मुद्रा की कमज़ोर होती स्थिति को लेकर चिंता जताई.
इस कॉन्फ़्रेंस में सिंगापुर के पूर्व विदेश मंत्री जॉर्ज येओ ने कहा, ''अमेरिकी डॉलर हम सबके ऊपर बोझ की तरह है. अगर आप अंतरराष्ट्रीय वित्त व्यवस्था को हथियार के रूप में इस्तेमाल करेंगे, तो उसका विकल्प उभरकर सामने आएगा. इस स्थिति में अमेरिकी डॉलर को नुक़सान ही होगा.''
इस कॉन्फ़्रेंस का आयोजन आईएसईएएस-योसोफ़ इशाक इंस्टीट्यूट ने किया था.
इसी कॉन्फ़्रेंस में इंडोनेशिया के पूर्व वाणिज्य मंत्री थॉमस लेमबोंग ने इस बात की तारीफ़ करते हुए कहा कि दक्षिण-पूर्वी एशिया के केंद्रीय बैंकों ने पहले ही स्थानीय मुद्रा में सीधे डिज़िटल भुगतान की व्यवस्था कर ली है.
लेमबोंग ने कहा कि डॉलर के कम से कम इस्तेमाल की राह खोजनी चाहिए.
इंडोनेशिया के पूर्व वित्त मंत्री ने कहा, ''मैं लंबे समय से देख रहा हूँ कि केंद्रीय बैंकों में रिज़र्व मुद्रा में डॉलर के दबदबे को कम करना आसान नहीं रहा है. मलेशिया, इंडोनेशिया, सिंगापुर और थाईलैंड स्थानीय मुद्रा में लेन-देन कर रहे हैं. यह हमारे वित्तीय इन्फ़्रास्ट्रक्चर के लिए अच्छी बात है.''
इसे भी पढ़ें:- रूस ने फिर जीता भारत का भरोसा, अमेरिका को लेकर बढ़ा शक़

इमेज स्रोत, Getty Images
पुतिन की पसंद
क्या दुनिया भर से डॉलर का प्रभुत्व ख़त्म किया जा सकता है? पश्चिम के अर्थशास्त्रियों को लगता है कि यह अभी इतना आसान नहीं है.
ऐसा कहा जा रहा है कि चीनी कैपिटल अकाउंट बहुत खुला नहीं है, इसलिए डॉलर को मात देना बहुत आसान नहीं है.
पुतिन ने युआन में व्यापार करने की घोषणा तब की है, जब अमेरिका के बैंकिंग सेक्टर में भारी उठापटक है. महंगाई बढ़ रही है.
एक साल पहले जब रूस ने यूक्रेन पर हमला किया था, तो रूस को बैंकिंग सिस्टम से बाहर करने के लिए अमेरिका ने उसे स्विफ़्ट सिस्टम से हटा दिया था.
लेकिन अब अमेरिका के दो बैंक डूब गए हैं. सिलिकन वैली बैंक के डूबने की ख़बर अब भी ज़िंदा है. पुतिन ने ऐसे समय में डॉलर के बदले युआन में व्यापार करने का फ़ैसला किया है.
शी जिनपिंग के रूस जाने से पहले ही सऊदी अरब ने घोषणा की थी कि वह तेल आयात के कुछ हिस्से का भुगतान चीन से उसकी स्थानीय मुद्रा में लेगा.
इसके अलावा फ़्रांस ने भी पहली बार एलएनजी यानी लिक्विफ़ाइड नैचुरल गैस चीन से युआन लेकर बेचा है.
हालाँकि इन मिसालों को प्रतीक के तौर पर देखा जा रहा है और डॉलर का प्रभुत्व ख़त्म होने के रूप में नहीं देखा जा रहा है.
लेकिन दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों में रिज़र्व मुद्रा में डॉलर की हिस्सेदारी कम हुई है. 1999 तक वैश्विक रिज़र्व में डॉलर की हिस्सेदारी 72 फ़ीसदी थी जो अब 59 फ़ीसदी पर आ गई है.
दुनिया भर के केंद्रीय बैंक अपने रिज़र्व में डॉलर के प्रभुत्व को कम करने की कोशिश कर रहे हैं. इसके अलावा बैंक टू बैंक डिज़िटल करेंसी के ज़रिए भी लेन-देन बढ़ा है.
ग़ैर-अमेरिकी बैंकों के बीच इस तरह का लेन-देन बढ़ा है.
2020 में रूस और चीन के बीच सिर्फ़ 46 फ़ीसदी व्यापार में डॉलर में हुआ था. इसी दौरान दोनों देशों के बीच व्यापार में यूरो की हिस्सेदारी बढ़ कर अब तक की सबसे ज़्यादा 30 फ़ीसदी हो गई थी.
तब दोनों देशों की अपनी मुद्रा में 24 फ़ीसदी व्यापार हुआ था. इस 24 फ़ीसदी को और बढ़ाने की तैयारी है.
पिछले कई सालों से रूस और चीन ने द्विपक्षीय व्यापार में डॉलर के इस्तेमाल को ज़बरदस्त तरीक़े से कम कर दिया है.
साल 2015 तक दोनों देशों के बीच 90 फ़ीसदी व्यापार डॉलर में होता था. लेकिन अमरीका और चीन के बीच शुरू हुए ट्रेड वॉर के बाद और ख़ासकर डॉलर में व्यापार को कम करने की रूस और चीन की सोची समझी नीति के तहत साल 2019 आते-आते दोनों देशों के बीच सिर्फ़ 51 फ़ीसदी व्यापार डॉलर में रह गया.
रशियन एकेडमी ऑफ़ साइंसेज़ में इंस्टीट्यूट ऑफ़ फ़ार ईस्टर्न स्टडीज़ के निदेशक एलेक्सी मसलोव ने निकेई एशियन रिव्यू को बताया कि रूस और चीन की डॉलर में व्यापार को धीरे-धीरे ख़त्म करने की योजना ऐसी स्थिति में पहुँचने वाली है कि अब ये दोनों देशों के बीच संबंध को वास्तव में एक गठबंधन में बदल देगा.
इसे भी पढ़ें:-अमेरिका क्या भारत में रूस की जगह ले सकता है?

इमेज स्रोत, Getty Images
भारत क्या चाहता है?
भारत भी चाहता है कि डॉलर से अर्थव्यवस्था की निर्भरता कम हो और स्थानीय मुद्रा में व्यापार को बढ़ावा मिले.
नई दिल्ली में बुधवार को 'रशा-इंडिया बिज़नेस फ़ोरम: स्ट्रैटेजिक पार्टनर्शिप फ़ॉर डिवेलपमेंट एंड ग्रोथ' इवेंट की शुरुआत हुई है.
इस आयोजन का मक़सद भारत और रूस के बीच व्यापार को सालाना 50 अरब डॉलर तक ले जाने का है.
पिछले साल दोनों देशों के बीच व्यापार 31 अरब डॉलर का रहा था. इस आयोजन में आए दोनों देशों के लोगों ने वैश्विक व्यापार में डॉलर के प्रभुत्व को कम करने की वकालत की है.
पिछले साल दिसंबर में ख़बर आई थी कि भारत यूएई से चाहता है कि व्यापार में भुगतान स्थानीय मुद्रा दिरहम और रुपए में हो.
यूएई भारत का तीसरा सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर है. अमेरिका और चीन के बाद यूएई 2021-22 में भारत का तीसरा सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर रहा. अमेरिका के बाद भारत सबसे ज़्यादा निर्यात यूएई में करता है.
2021-22 में भारत का यूएई में निर्यात 28 अरब डॉलर था. वहीं 2021 में यूएई का इंडिया दूसरा सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर था और ग़ैर-तेल कारोबार 45 अरब डॉलर का था.
दोनों देशों में 18 फ़रवरी 2022 को कॉम्प्रिहेंसिव इकनॉमिक पार्टनर्शिप अग्रीमेंट हुआ था.
इस समझौते का लक्ष्य दोनों देशों के द्विपक्षीय व्यापार को 100 अरब डॉलर पहुँचाने का है.
(कॉपी: रजनीश कुमार)
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)















