ब्रिक्स में चीन के ताने के बाद जी-7 में पहुंच रहे पीएम मोदी पर कितना दबाव?

ब्रिक्स सम्मेलन में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

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    • Author, दिलनवाज़ पाशा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

गुरुवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ब्रिक्स के वर्चुअल सम्मेलन में हिस्सा लिया. इसमें चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भी मौजूद थे.

आज रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी-7 के सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए जर्मनी पहुँच चुके हैं. भारत जी-7 का हिस्सा नहीं है लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस सम्मलेन में विशेष रूप से आमंत्रित हैं.

अंतरराष्ट्रीय मंचों के ये सम्मेलन ऐसे माहौल में हो रहे हैं जब यूक्रेन में युद्ध चल रहा है और दुनिया राजनीतिक और कूटनीतिक आधार पर बंटी हुई नज़र आ रही है.

ब्रिक्स सम्मेलन में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने 'देशों के समूहों' पर निशाना साधा. उन्होंने सीधे नाम तो नहीं लिया लेकिन ये स्पष्ट है कि वो नेटो जैसे सैन्य गठबंधन और क्वॉड जैसे गठबंधनों की बात कर रहे थे.

भारत नेटो में तो शामिल नहीं है लेकिन क्वॉड का अहम सदस्य देश है.

शी जिनपिंग ने अपने सम्मेलन में पश्चिमी देशों और उनके समूहों पर जमकर निशाना साधा. लेकिन जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बोलने की बारी आई तो उन्होंने बहुत कुछ नहीं कहा. उन्होंने यूक्रेन युद्ध के बारे में कोई बात नहीं की. ब्रिक्स के साझा बयान में भी यूक्रेन युद्ध का ज़िक्र नहीं था.

ब्रिक्स सम्मेलन में नेटो और क्वॉड पर निशाना साधने के अलावा जिनपिंग एकतरफ़ा आर्थिक प्रतिबंधों का विरोध करके रूस के समर्थन में भी आवाज़ उठाई. वहीं, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने आर्थिक प्रतिबंधों का मसला उठाया.

ब्रिक्स सम्मेलन में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग

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ये माना जा रहा है कि चीन के राष्ट्रपति का निशाना भारत की तरफ़ था. अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी-7 सम्मेलन में जा रहे हैं और ये सवाल भी उठ रहा है कि उन्हें वहां पश्चिमी देशों की तरफ से कूटनीतिक दबाव का सामना करना पड़ सकता है.

भारत दुनिया में उथल-पुथल के इस दौर में अपनी विदेश नीति को स्पष्ट रखे हुए है. भारत एक तरफ़ चीन और रूस के साथ संगठनों में है तो वहीं पश्चिमी देशों, एशियाई देशों और मध्य-पूर्व के देशों के साथ भी उसके गठबंधन है.

भारत का सबसे नया गठबंधन क्वॉड है जो हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा सहयोग के लिए हैं.

भारत के लिए सभी विकल्प खुले रखने ज़रूरी

मनोहर पर्रिकर रक्षा अध्ययन एवं विश्लेषण संस्थान से जुड़ी विश्लेषक और अंतरराष्ट्रीय मामलों की जानकार स्वास्ति राव कहती हैं कि भारत के लिए सभी विकल्पों को खुला रखना ज़रूरी है.

स्वास्ति राव कहती हैं, "भारत जैसे मिडिल ऑर्डर पॉवर को अपने सभी विकल्पों को लगातार खुला रखना ज़रूरी है. भारत की कूटनीति और रणनीति स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी (रणनीतिक स्वतंत्रता) पर आधारित है. पहले इसे ही गुटनिरपेक्षता कहा जाता था. इसका सीधा मतलब ये है कि भारत किसी भी एक गुट में सीधे तौर पर शामिल नहीं होना चाहता. भारत को अपने राष्ट्रीय हितों को सबसे पहले रखते हुए अपनी स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी को बनाए रखना है."

गेटवे हाउस थिंकटैंक से जुड़े भारत के पूर्व राजदूत और कई देशों में काम कर चुके राजीव भाटिया भी मानते हैं कि भारत अपने हितों को सर्वोपरि रखने की नीति पर चल रहा है.

भाटिया कहते हैं, "पिछले तीन सालों के माहौल में भारत की विदेश नीति सक्रिय रही है. अब पश्चिमी देशों को ये पता चल चुका है कि भारत हमारा मित्र तो है लेकिन एक सीमा के बाद भारत को दबाया नहीं जा सकता है. दूसरी तरफ़ चीन को भी पूरी तरह से स्पष्ट हो गया है कि जब तक भारत और चीन के सीमा विवादों का हल नहीं होगा तब तक अन्य क्षेत्रों में संबंध मज़बूत नहीं हो पाएंगे. रूस के प्रति भी हम स्पष्ट रूप से कह सकते हैं कि भारत रूस के साथ मज़बूत संबंध बनाए रखना चाहता है मगर हर काम जो रूस करेगा, भारत उसका समर्थन करे, ऐसा नहीं है. तमाम आंतरिक और अंतरराष्ट्रीय समस्याओं के बावजूद आज भारत बहुत समझदारी से विदेश नीति को संभाले हुए है."

ब्रिक्स से बहुत फ़ायदा नहीं लेकिन फिर इसमें क्यों है भारत?

14वां ब्रिक्स सम्मेलन

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ब्रिक्स में होने की वजह से भारत को कोई ख़ास फ़ायदा नहीं है क्योंकि चीन के होने के बावजूद इसकी कोई बहुत बड़ी आर्थिक ताक़त नहीं है. इसका बहुत अधिक कूटनीतिक वज़न भी नहीं है. ऐसा समूह जिसमें रूस और चीन दोनों हो वहां लोकतांत्रिक या अमेरिका से रिश्ते रखने वाले देश वो हमेशा असंतुलन में रहते हैं. अब सवाल उठता है कि भारत ब्रिक्स में क्यों हैं?

इसका वजह समझाते हुए स्वास्ति राव कहती हैं, "पहला कारण ये है कि ब्रिक्स उभरती हुई और आगे बढ़ती हुई अर्थव्यवस्थाओं का समूह है. आगे चलकर ये और भी बड़ी हो सकती हैं, ऐसे में भारत कोई भी मौका नहीं छोड़ना चाहता है. ब्रिक्स के ज़रिए हम ग्लोबल साउथ (आर्थिक रूप से उभर रहे देश) में अपनी जगह बनाकर रखते हैं. इसमें लेटिन अमेरिका, अफ़्रीका और एशिया की अर्थव्यवस्थाएं हैं. यहां अपनी पहुंच बनाए रखने का ब्रिक्स अच्छा माध्यम है. दुनिया में डी-डॉलराइज़ेशन (वैश्विक लेनदेन में डॉलर का इस्तेमाल ख़त्म करना) हो रहा है, इसके लिए पैरेलल पेमेंट सिस्टम को बनाने के लिए भारत, चीन और रूस जैसे देश स्विफ्ट बैंकिंग के अलावा अपने बैंकिंग सिस्टम भी बना रहे हैं.

साथ ही ब्रिक्स एक ऐसा प्लेटफार्म है जहां रूस और चीन भी हैं, ऐसे में ये भारत को अपनी विदेश नीति में संतुलन बनाए रखने का मौका देता है."

राजीव भाटिया भी मानते हैं कि भारत के लिए ब्रिक्स का महत्व अब कम हो गया है. भाटिया कहते हैं, " भारत और चीन के संबंध अभी भी बहुत मुश्किल है, ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी ने भले ही ब्रिक्स में हिस्सा लिया लेकिन वहां बहुत ही संक्षिप्त भाषण दिया. इसका अर्थ यही है कि इस समय भारत की दिलचस्पी ब्रिक्स में पहले के मुक़ाबले कम हो गई है."

क्वॉड को क्यों महत्व दे रहा है भारत?

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन

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क्वाड अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जापान और भारत का समूह है. क्वाड की आर्थिक, राजनीतिक और सुरक्षा महत्व ज़्यादा है. क्योंकि इसमें भारत के साथ जो देश हैं उनकी आर्थिक ताक़त ज़्यादा है. जापान और अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में हैं. इसमें ऑस्ट्रेलिया है जो अपने आप में बड़ी शक्ति है और सीधे-सीधे चीन से मुक़ाबला कर रहा है.

स्वास्ति राव कहती हैं, "ब्रिक्स के साथ आकर भारत का बहुत फ़ायदा नहीं है लेकिन ना साथ आने पर नुक़सान अधिक होने की संभावना है. वहीं क्वाड भारत के लिए अधिक काम आने वाला समूह है. ऐेसे में भारत अभी क्वॉड को तरजीह दे रहा है."

विश्लेषक मानते हैं कि क्वॉड भारत के सुरक्षा और रणनीतिक उद्दश्यों के लिए अहम है. इस संगठन के ज़रिए भारत को अपनी समंद्री सुरक्षा मज़बूत होने की भी उम्मीद है. ये संगठन हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव का जवाब देने के लिए बनाया जा रहा है. ऐसे में ये संकेत भी मिल रहे हैं कि भारत पश्चिमी देशों की तरफ़ झुक रहा है.

क्वॉड की बैठक में मोदी

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राजीव भाटिया कहते हैं, "क्वाड में भी भारत की अहम भूमिका है. एक नया संगठन जो बन रहा है इंडो-पैसिफिक इकोनॉमिक फ्रेमवर्क उसमें भी भारत आगे है. तो इन सब चीज़ों से साफ़ ज़ाहिर है कि चीन और रूस के प्रति भारत के संबंध आजकल थोड़ा कठिन हो गए हैं जबकि पश्चिमी देशों के प्रति हमारे संबंध और अधिक मज़बूत हो गए हैं."

जी-7 में मोदी पर हो सकता है रूस की आलोचना का दबाव?

जी-7 दुनिया की सबसे विकसित अर्थव्यवस्थाओं का समूह है. इसमें अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, कनाडा और यूरोपीय संघ हैं. रूस पहले इसका सदस्य था लेकिन क्राइमिया पर आक्रमण के बाद रूस के इससे हटा दिया गया है. चीन इसमें कभी जगह नहीं बना पाया है.

इस बार जी-7 के सम्मेलन में भारत और ब्रिक्स के एक और सदस्य देश दक्षिण अफ़्रीका को बुलाया जा रहा है. आशियान के विकासशील देश इंडोनेशिया को भी इस बार आमंत्रित किया गया है. इन देशों को बुलाने के राजनीतिक कारण हैं क्योंकि इन देशों को एंगेज करके यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में और भारत-प्रशांत रणनीति के संदर्भ में विकसित देश ग्लोबल साउथ के प्रति हाथ बढ़ा सकते हैं. इसके अलावा जलवायु परिवर्तन, वैक्सीन डिप्लोमेसी पर बात हो सकती है. विकसित देश इसे महत्व दे रहे हैं.

जी-7 सम्मेलन में यूक्रेन युद्ध का मुद्दा भी उठ सकता है और प्रधानमंत्री मोदी पर यूक्रेन पर कुछ बोलने का दबाव भी हो सकता है. हालांकि विश्लेषक मानते हैं कि दबाव के बावजूद भारत अपने अब तक के रुख पर बरक़रार रहेगा.

जर्मनी के लिए रवाना हुए मोदी

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स्वास्ति राव कहती हैं, "भारत को जी-7 में बुलाने का मुख्य कारण ये है कि पश्चिमी देश भारत की तरफ़ फिर से हाथ बढ़ाना चाहते हैं. यूक्रेन के संदर्भ में भारत ने स्पष्ट कर दिया था कि वह कोई पक्ष नहीं लेगा और गुटनिरपेक्ष बना रहेगा. हो सकता है पश्चिमी देश भारत से ये बात कहें कि भले ही आप खुलकर रूस की आलोचना ना करें लेकिन जो साझा मूल्य हैं, लोकतांत्रिक मूल्य हैं, उन पर साथ आएं."

क्या मोदी जी-7 में किसी दबाव में होंगे, इस सवाल पर भाटिया कहते हैं, "दबाव हो सकता है या नहीं या कितना होगा, लेकिन ये बात विश्वास के साथ कही जा सकती है कि पश्चिमी सरकारों के लोगों को ये अच्छी तरह से पता है कि यूक्रेन पर भारत का रुख कोई विशेष मामला नहीं है, विशेष मामला ये है कि अमेरिका और पश्चिमी देशों ने रूस को शीत युद्ध की समाप्ति के बाद ठीक से संभाला नहीं और इसलिए ही आज की परिस्थिति खड़ी हुई है."

"भारत इसमें एक सक्रिय और रचनात्कम भूमिका निभाने की, कोशिश कर रहा है, भारत की नीति यही है कि कोई भी समस्या युद्ध से नहीं सुलझ सकती है, कूटनीति से ही हल निकल सकता है. जब भी ऐसे मामले में दिल्ली पर कोई दबाव पड़ेगा, दिल्ली यही कहेगी कि आप युद्ध से हटकर कूटनीति के रास्ते पर चलिए. ऐसे में ऐसी कोई संभावना लगती नहीं है कि भारत के प्रधानमंत्री पर कोई दबाव होगा, और दबाव के आगे झुकने का तो कोई प्रश्न ही नहीं खड़ा होता है."

वहीं स्वास्ति राव मानती हैं कि भारत का रुख यूक्रेन को लेकर संयत ही बना रहेगी. वो कहती हैं, "यूक्रेन को लेकर भारत का पक्ष शुरू से संयत है और आगे भी संयत ही रहेगा. इसी संयत व्यवहार की वजह से भारत ब्रिक्स में भी है, क्वाड में भी है, उसे जी-7 में भी बुलाया जा रहा है और वो दूसरे भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जाता है."

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