इसराइल पर ईरान के हमले से क्या नेतन्याहू को मिली नई लाइफ़लाइन

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- Author, जेरेमी बोवेन
- पदनाम, बीबीसी इंटरनेशनल एडिटर
अभी कुछ दिनों पहले तक इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू भारी दबाव में थे.
पहली अप्रैल को ग़ज़ा में हुए इसराइली सेना के हमले में वर्ल्ड सेंट्रल किचन के सात सहायता कर्मियों की मौत हो गई थी, इसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन अपने सहयोगी देश इसराइल पर धीरज खोते दिखे.
इसी दिन इसराइल ने दमिश्क में ईरानी राजनयिक परिसर पर भी हमला किया था, जिसमें एक वरिष्ठ जनरल समेत कम से कम 6 अफ़सरों की मौत हो गई थी. साथ ही इस हमले से दूतावासों पर हमले को रोकने वाली संधियों का उल्लंघन भी हुआ.
इसराइल ने दावा किया कि जिस वाणिज्य दूतावास पर हमला उसकी तरफ़ से हुआ है, ईरान उसका इस्तेमाल सैन्य चौकी के तौर पर कर रहा था. ऐसे में ईरान ने संधियों से मिलने वाली सुरक्षा को खो दिया था.
ईरान ने इसके बाद जवाबी कार्रवाई की बात की थी लेकिन ईरान के सीनियर कमांडर्स पर हुए हमले के बाद कार्रवाई से ज़्यादा बयानबाजी ही देखने को मिली थी.
बाइडन के बयान से नेतन्याहू पर दबाव

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ईरान के बाहर, अमेरिका स्थित चैरिटी संस्थान वर्ल्ड सेंट्रल किचन पर हुआ हमला दमिश्क के हमले पर भारी पड़ गया.
व्हाइट हाउस ने राष्ट्रपति बाइडन का नाराज़गी भरा बयान जारी किया. वो 'गुस्से में और बेहद दुखी' थे. ये ऐसा कोई पहला मामला नहीं था. इसराइल, सहायताकर्मियों और फ़लीस्तीन के नागरिकों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठा रहा था.
प्रधानमंत्री नेतन्याहू के साथ बातचीत में उन्होंने (बाइडन) कई रियायतों की मांग की. ग़ज़ा में मानवीय सहायता को बढ़ाया जाना चाहिए. मानवीय सहायता पहुंचाने के लिए इसराइल को ज़्यादा सीमाओं को खोलना चाहिए. उत्तरी ग़ज़ा में भूख से मर रहे बच्चों तक सहायता पहुंचाने के लिए अशदोद बंदरगाह को भी खोला जाना चाहिए जो कि वहां से केवल एक घंटे की दूरी पर है.
प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने वादा किया कि चीजें बदलेंगी बावजूद इसके इसराइल टालमटोल कर रहा था. एक तरफ़ नेतन्याहू व्हाइट हाउस की तरफ से दबाव झेल रहे थे, साथ ही उनपर अतिराष्ट्रवादी चरमपंथियों का भी दबाव था, जिन चरमपंथियों के दमपर पर नेतन्याहू की गठबंधन सरकार चल रही है.
ये चरमपंथी न केवल ग़ज़ा में मानवीय सहायता को बढ़ाने का विरोध कर रहे थे, साथ ही इनका मानना है कि इस युद्ध ने यहूदियों को ग़ज़ा में फिर से बसाने का मौका दिया है. साल 2005 में इसराइल ने यहां से यहूदी बस्तियों को खाली करा दिया था और उन्हें नष्ट कर दिया था.
''इसराइल को बिना शर्त सैन्य सहायता नहीं दी जा सकती''
पिछले हफ्ते के आखिर तक, अमेरिकी दबाव बढ़ रहा था. गुरुवार को यूनाइटेड स्टेट्स एजेंसी फ़ॉर इंटरनेशनल डेवेलपमेंट की एडमिनिस्ट्रेटर सामंथा पावर ने कहा था कि अकाल पहले से ही ग़ज़ा के कुछ इलाकों को प्रभावित कर रहा है.
इसराइल के दोस्तों और दुश्मनों के लिए ये साफ़ था कि ग़ज़ा की छह महीने की घेराबंदी ने दुनिया के सबसे बड़े खाद्य संकट को पैदा किया है. एक और अटकलें लगाई जा रही हैं कि इसराइल को जो हथियार अमेरिका आपूर्ति करता है उन हथियारों के इस्तेमाल पर अमेरिका शर्तें लागू कर सकता है.
ईरान के हमले से कुछ घंटे पहले शनिवार की सुबह 'द न्यूयॉर्क टाइम्स' में गहरी नाराज़गी की बात छपी, ख़ासकर अमेरिकी कांग्रेस के प्रमुख डेमोक्रेट्स के बीच गहराते गुस्से को इस लेख में बताया गया. इन लोगों ने इसराइल में हथियारों की आपूर्ति को रोकने की मांग की थी.
आर्टिकल में लिखा गया कि इसराइल को बिना शर्त सैन्य सहायता नहीं दी जा सकती, अखबार के संपादकीय बोर्ड ने अमेरिका के साथ 'भरोसे के रिश्ते' को तोड़ने के लिए नेतन्याहू और सरकार के कट्टरपंथियों की आलोचना की.
इसमें लिखा गया है कि इसराइल को खुद की रक्षा करने के अधिकार के प्रति अमेरिका की प्रतिबद्धता का ये मतलब नहीं है कि राष्ट्रपति बाइडन ''नेतन्याहू को दोहरा खेल खेलने की इजाजत दें.''
इस बीच ईरान के इसराइल पर पहले सीधे हमले ने प्रधानमंत्री नेतन्याहू को लाइफलाइन दे दी.
अमेरिका की अपील को इसराइल ने किया नज़रंदाज़

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अमेरिका और अन्य पश्चिमी सहयोगी देशों की सेनाओं की मदद से इसराइल ने ईरान के 300 से ज़्यादा ड्रोन्स और मिसाइलों को मार गिराया. ग़ज़ा में इसराइल के हमले के जितने बड़े आलोचक जॉर्डन के किंग अब्दुल्ला रहे हैं उतना कोई दूसरा अरब लीडर नहीं रहा है.
लेकिन जॉर्डन की वायुसेना भी इसराइल की तरफ़ जाने वाले मिसाइल और ड्रोन को मार गिराने के ऑपरेशन में शामिल हो गई
इसराइल को सैन्य सहायता देने पर शर्ते लगाने की आवाज़ों की जगह एकजुटता दिखाने की बात ने ले ली. प्रधानमंत्री नेतन्याहू के सामने नए राजनीतिक अवसर बने, कम से कम एक या दो दिन के लिए ही सही ग़ज़ा सुर्ख़ियों से बाहर है.
प्रधानमंत्री नेतन्याहू पर दबाव बदला है लेकिन पूरी तरह से ख़त्म नहीं हुआ है. इसराइल का अगला कदम इस दबाव को दोगुना कर सकता है.
राष्ट्रपति बाइडन ने ये साफ कर दिया है कि आगे क्या होना चाहिए इस पर वो क्या सोचते हैं. इसराइल को जीत की घोषणा करनी चाहिए और संघर्ष को आगे नहीं बढ़ाना चाहिए. बाइडन ने फिर से एलान किया है कि इसराइल के लिए अमेरिका का "दृढ़" समर्थन है.
हमास के हमले के बाद से ही अमेरिका का ये रुख उनकी पॉलिसी में फिट बैठता है. राष्ट्रपति बाइडन और उनके प्रशासन ने मध्य पूर्व में एक व्यापक युद्ध को रोकने के लिए कड़ी मेहनत की है.
हालांकि, अमेरिका ने इसराइल को हथियारों की बड़े पैमाने पर आपूर्ति भी की है जिसका इस्तेमाल ग़ज़ा में विनाश के लिए किया गया.
अक्टूबर से इसराइल, हथियारों और राजनयिक समर्थन को स्वीकार करता गय. युद्ध के नियमों का सम्मान साथ ही नागरिकों की सुरक्षा के लिए बाइडन की अपीलों को नजरंदाज करता गया.
ईरान के ख़िलाफ़ मिले अभूतपूर्व सैन्य सहयोग के बाद भी इसराइल एक बार फिर जो बाइडन की सलाह को नजरंदाज करता दिख रहा है.
सिर्फ़ इतना ही नहीं शनिवार को हुए हमले में सहयोग देने वाले दूसरे देशों की समान भावनाओं को भी इसराइल नजरंदाज करने के लिए तैयार है.
जो बाइडन की ही तरह ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ऋषि सुनक, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने लड़ाकू विमान तैनात किए थे और ईरान की निंदा की थी. दोनों ही देशों ने इसराइल से जवाबी हमला नहीं करने का आग्रह भी किया है.
ये देश इसराइल में लंबे समय से चली आ रही मान्यताओं के उलट बात कर रहे हैं. ऐसी ही एक मान्यता है कि इसराइल का अस्तित्व हमलों का जवाब देने पर निर्भर है.
दूसरा बिन्यामिन नेतन्याहू की सोच है, जिसे वो कई बार सामने रख चुके हैं कि ईरान, इसराइल का सबसे ख़तरनाक दुश्मन है. बहुत से इसराइली भी यही सोचते हैं.
अब, 1979 में इस्लामिक क्रांति से चली आ रही दुश्मनी के कई साल बाद ईरान ने इसराइल पर सीधा हमला किया है.
इसराइल ने कहा है कि अब सवाल ये नहीं है कि वो जवाबी हमला करेगा, बल्कि सवाल ये है कि कब और कैसे.
इसराइल कब और कैसे हमला करेगा?

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सरकार इस बात पर चर्चा कर रही है कि किस तरह बिना किसी व्यापक युद्ध को शुरू किए हुए जवाबी हमला किया जाए.
आखिर में, कोई भी हमला ये संकेत देगा कि ईरान भी व्यापक युद्घ नहीं चाहता है और इसी हिसाब से जवाब भी देगा. ये एक खतरनाक धारणा है. क्योंकि दोनों ही पक्ष एक दूसरे के इरादों को गलत समझ चुके हैं.
बिन्यामिन नेतन्याहू और उनकी सरकार एक बार फिर अपने सहयोगियों की सलाह को अनदेखा कर रहे हैं. इसराइली सरकार के अतिराष्ट्रवादी सहयोगी ईरान पर तगड़ा हमला करने की मांग कर रहे हैं.
वहीं दूसरी तरफ ग़ज़ा में मानवीय तबाही जारी है. दुनिया भर की निगाहें इससे हट गई हैं लेकिन वापस आएंगी. इसराइली सेना अब भी ग़ज़ा में अपने अभियान चला रही है और नागरिकों को मार रही है.
वेस्ट बैंक में फ़लीस्तिनियों और यहूदी निवासियों के बीच हिंसा फिर से बढ़ गई है. हिज़बुल्लाह के साथ इसराइल का युद्ध तेजी से बढ़ सकता है.
इसराइल के किसी हमले का ईरान ने अधिक मजबूती के साथ जवाब देने की बात की है.
ईरान के सशस्त्र बलों के चीफ़ ऑफ़ स्टाफ, होसैन बाक़ेरी ने कहा है कि इसराइल पर हमला ''सीमित'' था और अगर इसराइल ने जवाबी कार्रवाई की तो ''कहीं अधिक बड़ी'' प्रतिक्रिया दी जाएगी.
अमेरिका का कहना है कि अगर इसराइल ईरान पर हमला करता है तो वो मदद नहीं करेंगे. लेकिन इस बात पर भरोसा करना कठिन है कि अगर ईरान ने इसराइल पर फिर हमला किया तो बाइडन की ''दृढ़'' समर्थन वाली प्रतिबद्धता उसे युद्ध से दूर रखेगी.
मध्य पूर्व में व्यापक युद्ध और गहरे वैश्विक संकट की आशंका गहराती जा रही है.
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