ईरान और इसराइल के बीच दुश्मनी कितनी पुरानी है?

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- Author, गिलर्मो डी ओल्मो
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़ वर्ल्ड
ईरान ने शनिवार रात इसराइल पर ड्रोन और मिसाइलों से हमला किया. इस हमले के बाद से मध्य पूर्व में तनाव बढ़ता जा रहा है.
ईरान की सरकारी मीडिया ने ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड के हवाले से बताया है कि हमला शनिवार रात हुआ. ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड ईरान के सशस्त्र सुरक्षा बलों की एक शाखा है.
इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने अपनी वॉर कैबिनेट की बैठक में जानकारी दी कि इस हमले का सामना करने के लिए रक्षात्मक प्रणालियां तैनात की गई हैं.
दमिश्क स्थित ईरानी वाणिज्य दूतावास पर 1 अप्रैल को हमला हुआ था. इसमें ईरान के दो वरिष्ठ सैन्य कमांडरों की मौत हो गई थी. इसी के बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई की चेतावनी दी थी. हमले के लिए ईरान ने इसराइल को ज़िम्मेदार ठहराया था.
हाल के समय में ईरान की संभावित प्रतिक्रिया की उम्मीद बढ़ गई थी, जब अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने शुक्रवार को कहा था कि उन्हें देर-सबेर ईरान की ओर से हमला किए जाने की उम्मीद है.
दरअसल यह एक पुराने झगड़े की नई कड़ी है.
इसराइल और ईरान में खूनी प्रतिद्वंद्विता सालों से चली आ रही है. इस प्रतिद्वंद्विता की तीव्रता भू राजनीतिक हालात पर घटती-बढ़ती रहती है. इसकी नब्ज़ मध्य-पूर्व में अस्थिरता के मुख्य स्रोतों में से एक बन गई है.
ईरान के लिए इसराइल के पास उसके अस्तित्व में रहने का कोई अधिकार नहीं है. ईरान के शासक इसराइल को 'छोटा शैतान' मानते हैं, जो मध्य-पूर्व में अमेरिका का सहयोगी है. अमेरिका को वो 'बड़ा शैतान' बताते हैं. ईरान चाहता है कि अमेरिका और इसराइल इस क्षेत्र से गायब हो जाएं.
इसराइल ईरान पर चरमपंथी समूहों के वित्त पोषण और अयातुल्ला के यहूदी-विरोधी भावना से प्रेरित होकर उसके हितों के खिलाफ हमला करने का आरोप लगाता है.
इन दो कट्टर दुश्मनों की प्रतिद्वंद्विता में बड़ी संख्या में लोग मारे गए हैं. यह अक्सर गुप्त कार्रवाइयों का परिणाम होता है. इसकी ज़िम्मेदारी कोई भी सरकार नहीं लेती है.
ग़ज़ा में जारी युद्ध ने हालात को और भी बदतर बना दिया है.
ईरान और इसराइल की दुश्मनी शुरू कैसे हुई

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इसराइल और ईरान के संबंध 1979 तक काफी सौहार्दपूर्ण थे. उस दौरान अयातुल्लाह खोमैनी की तथाकथित इस्लामी क्रांति ने तेहरान में सत्ता हासिल की थी.
हालांकि इसने फ़लस्तीन के विभाजन की योजना का विरोध किया था. इसकी वजह से 1948 में इसराइल राज्य का निर्माण हुआ था. तुर्की के बाद ईरान इसराइल को मान्यता देने वाला दूसरा मुस्लिम बहुल देश था.
उस समय, ईरान पहलवी वंश के शाहों की ओर से शासित एक राजतंत्र था. वह मध्य-पूर्व में अमेरिका के मुख्य सहयोगियों में से एक था. इस वजह से इसराइल के संस्थापक और उसकी पहली सरकार के प्रमुख डेविड बेन-गुरियन ने अपने अरब पड़ोसियों द्वारा नए यहूदी राज्य के प्रति ईरान की मित्रता की तलाश कर उसे हासिल किया.
लेकिन 1979 में अयातुल्लाह खोमैनी की क्रांति ने शाह को उखाड़ फेंका और एक इस्लामी गणतंत्र लागू किया. उन्होंने खुद को पीड़ितों के रक्षक के रूप में पेश किया. अमेरिका और उसके सहयोगी इसराइल के साम्राज्यवाद को नकारना उनकी मुख्य पहचान थी.
अयातुल्लाह की सरकार ने इसराइल के साथ संबंध तोड़ लिए. उसने उसके नागरिकों के पासपोर्ट की वैधता को मान्यता देना बंद कर दिया और तेहरान में इसराइली दूतावास को ज़ब्त कर फ़लस्तीन लिबरेशन ऑर्गनाइज़ेशन (पीएलओ) को सौंप दिया. उस समय अलग फ़लस्तीन राज्य के लिए इसराइल के खिलाफ लड़ाई का नेतृत्व पीएलए कर रहा था.
कभी दोस्त भी थे ईरान और इसराइल

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विश्लेषण करने वाले इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप सेंटर में ईरान प्रोग्राम के निदेशक अली वेज ने बीबीसी मुंडो से बात की. उन्होंने बताया कि इसराइल के प्रति शत्रुता नई ईरान सरकार का एक आधार थी, क्योंकि उसके कई नेताओं ने फ़लस्तीनियों के साथ लेबनान जैसी जगहों पर गुरिल्ला युद्ध में प्रशिक्षण और भाग लिया था. उनके मन में उनके प्रति बहुत सहानुभूति थी.
वेज का मानना है कि नया ईरान खुद को एक इस्लामिक ताकत के रूप में पेश करना चाहता था. इसलिए उसने इसराइल के खिलाफ फ़लस्तीनी मुद्दे को उठाया, जिसे अरब मुस्लिम देशों ने छोड़ दिया था.
इस तरह खोमैनी ने फ़लस्तीनी मुद्दे पर अपना दावा पेश करना शुरू कर दिया. इसके बाद तेहरान में बड़े फ़लस्तीनी समर्थक प्रदर्शन आम बात हो गई. इन समर्थनों को सरकार का समर्थन हासिल था.
वेज बताते हैं कि इसराइल में ईरान को लेकर शत्रुता का भाव 1990 के दशक तक शुरू नहीं हुआ था, क्योंकि तब सद्दाम हुसैन के इराक को एक बड़ा खतरा माना जाता था.
इतना ही नहीं इसराइल सरकार उन मध्यस्थों में से एक थी जिसने तथाकथित ईरान-कॉन्ट्रा को संभव बनाया था. यह वह गुप्त कार्यक्रम था, जिसके ज़रिए अमेरिका ने 1980 से 1988 के बीच पड़ोसी इराक के खिलाफ छेड़े युद्ध में उपयोग के लिए ईरान को हथियार दिए थे.
लेकिन समय के साथ-साथ इसराइल ने अपने अस्तित्व के लिए खतरों में से एक के रूप में ईरान को देखना शुरू कर दिया.
इसराइल-ईरान का छाया युद्ध

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वेज बताते हैं कि ईरान को एक दूसरी बड़ी क्षेत्रीय शक्ति सऊदी अरब का भी सामना करना पड़ा. ईरान मुख्य रूप से फ़ारसी और शिया है, वहीं अरब जगत सुन्नी है. ईरान की सरकार ने इसे महसूस किया, उसे लगा कि उसके दुश्मन एक दिन उस पर हमला करने लगेंगे. इसे रोकने के उद्देश्य से उसने एक रणनीति पर काम शुरू किया.
इसके बाद ईरान से गठबंधन करने वाले संगठनों का एक नेटवर्क तैयार हो गया. इन संगठनों ने अपने हितों के मुताबिक सशस्त्र कार्रवाई की. अमेरिका और यूरोपीय संघ की ओर से आतंकवादी बताया गया लेबनान का हिज़बुल्लाह इन संगठनों में सबसे प्रमुख है. आज ईरान का तथाकथित 'एक्सिस ऑफ रेज़िस्टेंस' लेबनान, सीरिया, इराक और यमन तक फैला हुआ है.
इसराइल शांत नहीं बैठा रहा. उसने ईरान और उसके सहयोगियों पर हमले किए. ये हमले अक्सर तीसरे देशों में हुए, जहां ईरान अपने समर्थक सशस्त्र समूहों का वित्त पोषण और समर्थन करता है.
ईरान-इसराइल की लड़ाई को 'छाया युद्ध' बताया गया है, क्योंकि दोनों देशों ने कई मामलों में अपनी भूमिका आधिकारिक तौर पर स्वीकार किए बिना एक-दूसरे पर हमले किए.
ईरान से जुड़े इस्लामिक जिहाद समूह ने ब्यूनस आयर्स में इसराइली दूतावास को उड़ा दिया था. इसमें 29 लोगों की मौत हो गई थी. इससे कुछ ही समय पहले हिज़बुल्लाह नेता अब्बास अल मुसावी की हत्या कर दी गई थी. इस हमले के लिए इसराइल की खुफिया एजेंसी को ज़िम्मेदार ठहराया गया था.
ईरान का परमाणु कार्यक्रम

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ईरानी परमाणु कार्यक्रम को रोकना और उसके परमाणु हथियार संपन्न होने से रोकना इसराइल का लक्ष्य है.
इसराइल ईरान की उस दलील को नकारता है कि उसका परमाणु कार्यक्रम केवल नागरिक उद्देश्यों के लिए है. व्यापक रूप से यह माना जाता है कि इसराइल ने अमेरिका के साथ मिलकर स्टक्सनेट कंप्यूटर वायरस विकसित किया. इस वायरस ने इस सदी के पहले दशक में ईरानी परमाणु सुविधाओं को भारी नुकसान पहुंचाया.
ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम के प्रभारी समेत कुछ प्रमुख वैज्ञानिकों पर हमलों के लिए इसराइली खुफिया एजेंसी को ज़िम्मेदार ठहराया है.
इनमें सबसे उल्लेखनीय 2020 में मोहसिन फखरीज़ादेह की हत्या थी. इसराइली सरकार ने कभी भी ईरानी वैज्ञानिकों की हत्या में अपना हाथ स्वीकार नहीं किया है.
इसराइल ने अपने पश्चिमी सहयोगी देशों के साथ मिलकर ईरान पर उसके क्षेत्र में ड्रोन और रॉकेट हमलों के साथ-साथ साइबर अटैक का भी आरोप लगाया है.

साल 2011 से सीरिया में छिड़ा गृह युद्ध टकराव का एक और कारण था. पश्चिमी खुफिया एजेंसियों ने संकेत दिया कि ईरान ने राष्ट्रपति बशर अल असद को उखाड़ फेंकने की कोशिश कर रहे विद्रोहियों के खिलाफ उनकी सेना को समर्थन देने के लिए पैसा, हथियार और ट्रेनर भेजे. इससे इसराइल में खतरे की घंटी बज गई.
इसराइल का मानना है कि उसका पड़ोसी सीरिया उन मुख्य रास्तों में से एक है, जिसके ज़रिए ईरान लेबनान में हिज़बुल्लाह को हथियार और उपकरण भेजता है.
अमेरिकी खुफिया पोर्टल स्ट्रैटफोर के मुताबिक अलग-अलग समय पर इसराइल और ईरान दोनों ने सीरिया में कार्रवाई की, जिसका उद्देश्य दूसरे को बड़े पैमाने पर हमला करने से रोकना था.
यह 'छाया युद्ध' 2021 में समुद्र तक पहुंच गया. उस साल इसराइल ने ओमान की खाड़ी में इसराइली जहाजों पर हमलों के लिए ईरान को दोषी ठहराया. वहीं ईरान ने इसराइल पर लाल सागर में उसके जहाजों पर हमले का आरोप लगाया.
हमास का इसराइल पर हमला

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7 अक्टूबर, 2023 को हमास ने इसराइल पर हमला किया. इसके जवाब में ग़ज़ा में इसराइली सेना ने कार्रवाई शुरू की. इसके बाद दुनिया भर के विश्लेषकों और सरकारों ने चिंता जताई कि यह लड़ाई इलाके में प्रतिक्रियाओं को भड़का सकता है. ईरान और इसराइल में सीधे टकराव की भी आशंका जताई गई थी.
हाल के महीनों में लेबनान सीमा पर इसराइली बलों और कथित तौर पर हिज़बुल्लाह से जुड़े मिलिशिया के बीच झड़पें बढ़ गई थीं. वेस्ट बैंक के कब्जे़ वाले क्षेत्रों में फलस्तीनी प्रदर्शनकारियों के साथ भी झड़पें हुईं.
बीते शनिवार तक ईरान और इसराइल दोनों ने अपनी शत्रुता बढ़ाने और बड़े पैमाने पर लड़ाई से परहेज़ किया था. ईरान की ओर से ड्रोन और मिसाइलें छोड़े जाने के साथ ही यह बदल गया.
वेज के मुताबिक, ''विडंबना यह है कि अब कोई भी बड़े पैमाने पर संघर्ष नहीं चाहता है. ग़ज़ा में हमास के खिलाफ युद्ध छह महीने से चल रहा है. इसने अंतरराष्ट्रीय मंच पर इसराइल की प्रतिष्ठा को बहुत नकारात्मक रूप से प्रभावित किया है. उसे पहले से कहीं अधिक अलग-थलग कर दिया है."
विश्लेषकों का कहना है कि हमास से उलट ईरान एक देश है, इसलिए बहुत अधिक ताकतवर है.
दमिश्क में ईरान के वाणिज्य दूतावास पर हुए हमले में 13 लोग मारे गए. इनमें से कुछ वरिष्ठ कमांडर, जैसे रिवोल्यूशनरी गार्ड के जनरल मोहम्मद रज़ा ज़ाहेदी और उनके डिप्टी हादी हजरियाहिमी शामिल थे. इस हमले ने ईरान को आहत किया.
इस हमले के बाद ईरानी विदेश मंत्रालय ने हमलावर को सज़ा देने का वादा किया. वहीं सीरिया में ईरान के राजदूत हुसैन अकबरी ने घोषणा की कि प्रतिक्रिया निर्णायक होगी.
यह निश्चित रूप से दोनों देशों की लंबी अदावत में अंतिम हमला नहीं होगा.
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