पश्चिम बंगाल पंचायत चुनावः अदालत के आदेश से क्यों याद आया 2013 का चुनाव?
प्रभाकर मणि तिवारी
कोलकाता से, बीबीसी हिंदी के लिए

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पश्चिम बंगाल में आठ जुलाई को होने वाले पंचायत चुनाव में केंद्रीय सुरक्षा बल की तैनाती के मुद्दे पर क्या चुनाव आयोग 'सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे' की तर्ज पर आगे बढ़ रहा था?
पंचायत चुनाव में होने वाली हिंसा को ध्यान में रखते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट ने नामांकन के साथ ही केंद्रीय बलों की तैनाती का निर्देश दे दिया था.
राज्य की ममता बनर्जी सरकार ने हाईकोर्ट के फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी लेकिन देश की सर्वोच्च अदालत ने उस फ़ैसले को बरकरार रखा.
इसके बाद चुनाव आयोग ने केंद्रीय गृह मंत्रालय से पश्चिम बंगाल के 22 ज़िलों में तैनाती के लिए केंद्रीय बलों की 22 कंपनियों की मांग की थी.
इससे विपक्षी पार्टियां नाराज़ हो गईं और अदालत की अवमानना का मामला दायर किया.
उनका कहना था कि केंद्रीय बल की महज़ एक-एक कंपनी एक ज़िले में सुरक्षा का ज़िम्मा कैसे संभाल सकती है? जबकि राज्य में 61 हज़ार से भी अधिक मतदाता केंद्र बनाए गए हैं.

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कलकत्ता हाई कोर्ट सख़्त
बुधवार को कलकत्ता हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि साल 2013 में जितनी तादाद में केंद्रीय सुरक्षा बल के जवान तैनात थे, इस बार उससे कम की तैनाती नहीं की जाएगी.
हाईकोर्ट ने राज्य चुनाव आयोग को 24 घंटे के भीतर केंद्र को इस संबंध में पत्र भेजने का आदेश भी दिया है.
बीजेपी की ओर से शुभेंदु अधिकारी और कांग्रेस नेता अबू हासेम ख़ान ने हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की. याचिका पर सुनवाई करते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट ने राज्य चुनाव आयुक्त से यह भी कहा कि अगर वो अदालत के फ़ैसले पर अमल नहीं कर सकते तो उन्हें इस्तीफ़ा दे देना चाहिए, राज्यपाल किसी और अधिकारी को इस पद पर नियुक्त करेंगे.
उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश टीएस शिवज्ञानम ने कहा कि राज्य चुनाव आयोग के ख़िलाफ़ अवमानना का मामला दायर होना दुर्भाग्यपूर्ण है.

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दोहराई जा रही है पुरानी कहानी!
पश्चिम बंगाल में केंद्रीय बलों की तैनाती को लेकर चल रही खींचतान ने 10 साल पुराने पंचायत चुनाव की यादें ताज़ा कर दी हैं. तब भी यह मुद्दा हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया था.
फ़र्क़ केवल इतना था कि तब यह लड़ाई राज्य सरकार और तत्कालीन राज्य चुनाव आयुक्त मीरा पांडे के बीच थी और विपक्ष मूकदर्शक की भूमिका में था.
वहीं इस बार राज्य सरकार और चुनाव आयोग एक पाले में हैं और विरोध में विपक्षी पार्टियां बीजेपी और कांग्रेस से है.
साल 2013 में जहां सरकार को कोर्ट में झटका लगा, वहीं कई विश्लेषक अब आए आदेश को भी राज्य सरकार के साथ राज्य चुनाव आयोग के लिए भी झटका मान रहे हैं.
2013 के बाद राज्य चुनाव आयुक्त मीरा पांडे एक साल तक अपने पद पर रहीं, लेकिन 17 नगरपालिकाओं की समय सीमा पार होने के बावजूद वहां चुनाव नहीं कराया था.
जहां तक सरकार और चुनाव आयोग का सवाल है, 10 साल पहले और मौजूदा मामले की तुलना करें तो बहुत से सवालों के जवाब मिल जाते हैं.

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2013 बनाम 2023
साल 2013 में चुनाव आयोग ने राज्य में केंद्रीय बलों की 825 कंपनियां तैनात की थीं.
तब जुलाई में (दार्जिलिंग को छोड़ कर) राज्य के 17 ज़िलों में पांच चरणों में चुनाव कराए गए थे और हर ज़िले में औसतन 48 कंपनियां तैनात की गई थीं. जबकि अगले महीने होने वाले चुनाव में प्रत्येक ज़िले में केवल एक-एक कंपनी की मांग ही की गई है.
यानी 2013 में जहां एक ज़िले में 48 कंपनियां तैनात की गई थीं इस बार समूचे राज्य में इसकी आधे से भी कम की मांग की गई.
राज्य चुनाव आयोग ने इस बार जब 8 जून को पंचायत चुनाव की तारीख़ का एलान किया, तब अगले दिन से ही नामांकन दाखिल करने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी. नामांकन दाखिल करने के लिए भी केवल सात दिन का समय दिया गया.
पहले दिन से ही हिंसा शुरू होने के बाद बीजेपी और कांग्रेस ने कलकत्ता हाईकोर्ट में अलग-अलग याचिकाएं दायर कीं.
उन पर सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने 15 जून को चुनाव आयोग को 48 घंटों के भीतर हर ज़िले में केंद्रीय सुरक्षा बल के जवानों को तैनात करने का निर्देश दिया था.
अदालत के फ़ैसले के बाद चुनाव आयुक्त राजीव सिन्हा ने इस निर्देश के पालन की बात कही लेकिन उसके बाद सरकार और चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में उस फ़ैसले को चुनौती दी.
जब सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की राय बहाल रखी तो मंगलवार शाम चुनाव आयोग ने केंद्रीय गृह मंत्रालय को पत्र लिखकर 22 कंपनियां भेजने का अनुरोध किया जिसे केंद्र ने मंजूरी दे दी.
लेकिन बुधवार शाम को हाईकोर्ट के कड़े फ़ैसले से तस्वीर बदल गई.

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फ़ैसले से खुश बीजेपी
विधानसभा में विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी अदालत के फ़ैसले पर प्रसन्नता जताते हुए कहते हैं, "हर ज़िले में केंद्रीय बलों की महज एक कंपनी तैनात करने का फ़ैसला सही नहीं था.राज्य में चुनावी हिंसा में अब तक आठ लोगों की मौत हो चुकी है. इनमें से सात की मौत हाईकोर्ट के निर्देश के बाद हुई है. अगर सरकार और आयोग ने उस फ़ैसले को पहले ही मान लिया होता तो इन लोगों की जान बचाई जा सकती थी."
उन्होंने चुनाव आयोग के ऊपर सरकार के इशारे पर काम करने का आरोप भी लगाया.
बीजेपी प्रवक्ता शमीक भट्टाचार्य ने पत्रकारों से कहा कि चुनाव आयोग राज्य सरकार के 'हितों की रक्षा करना चाहता है'. लेकिन उसे इसमें कामयाबी नहीं मिलेगी.
उनका कहना था कि केंद्रीय बल की तैनाती के बिना निष्पक्ष चुनाव संभव नहीं है.

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कांग्रेस और सीपीएम का रुख़
सीपीएम की केंद्रीय समिति के नेता सुजन चक्रवर्ती कहते हैं, "चुनाव आयुक्त को नैतिक आधार पर अपने पद से इस्तीफ़ा दे देना चाहिए. केंद्रीय बलों की तैनाती सही तरीके से की जानी चाहिए ताकि ग्रामीण इलाकों के लोग निडर होकर मतदान कर सकें.”
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रदीप भट्टाचार्य ने कहा कि 'पुलिस और प्रशासन मुख्यमंत्री के इशारे पर काम' कर रहे हैं.
कांग्रेस नेता का कहना है कि राज्य पुलिस की मौजूदगी में मुक्त, निष्पक्ष और शांतिपूर्ण चुनाव संभव ही नहीं है. केंद्र सरकार के हस्तक्षेप के बिना लोग निडर होकर मतदान नहीं कर सकते.
टीएमसी की प्रतिक्रिया
लेकिन तृणमूल कांग्रेस के प्रवक्ता शांतनु सेन कहते हैं, " हम इससे चिंतित नहीं हैं. पूरे साल पढ़ाई करने वाले छात्र को परीक्षा की चिंता नहीं होती. परीक्षक कैसा भी हो, उस छात्र का रिजल्ट बढ़िया ही होता है.”
उन्होंने कहा, ''2021 के विधानसभा चुनाव भी केंद्रीय बलों की निगरानी में हुए थे. उसके बाद आसनसोल लोकसभा सीट और विधानसभा की सीटों के लिए उपचुनाव भी केंद्रीय बलों की निगरानी में ही कराए गए थे. इसका नतीजा सबके सामने है. इसलिए केंद्रीय बलों की मौजूदगी के बावजूद तृणमूल कांग्रेस की जीत तय है.''
शांतनु सेन ने कहा कि चुनाव में राज्य पुलिस रहे या केंद्रीय सुरक्षा बल, तृणमूल कांग्रेस को कोई परेशानी नहीं होगी. राज्य के मतदाताओं ने बार-बार साबित कर दिया है कि वे हमारे साथ हैं.
राजनीतिक विश्लेषक प्रोफ़ेसर समीर पाल कहते हैं, "हाईकोर्ट का फ़ैसला राज्य सरकार और राज्य चुनाव आयोग के लिए करारा झटका है. लेकिन केंद्रीय बलों की मौजूदगी के बावजूद हिंसा का अंदेशा तो बना ही रहेगा."
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