ममता बनर्जी ने ख़ास मौक़े पर मुसलमानों के बीच जाकर क्यों उठाया एनआरसी का मुद्दा?

ममता बनर्जी

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    • Author, अमिताभ भट्टासाली
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़ बांग्ला

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कोलकाता में ईद उल फ़ितर की नमाज़ के लिए हुई सबसे बड़ी जुटान में कहा है कि देश के कुछ लोग नफ़रत की राजनीति फैला कर विभाजन करना चाहते हैं और इस विभाजन को रोकने के लिए ज़रूरत पड़ने पर वे अपनी जान तक देने को तैयार हैं.

पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के रेड रोड पर शनिवार को ईद के मौक़े पर नमाज़ पढ़ने के लिए सबसे ज़्यादा लोग जुटे थे. हर बार की तरह इस साल भी ममता बनर्जी वहां मौजूद थीं.

इस मौक़े पर उनका कहना था, "जो लोग देश का विभाजन करना चाहते हैं, ईद के मौक़े पर मैं उनसे वादा करती हूं कि मैं अपनी जान देने के लिए भी तैयार हूं. लेकिन देश का विभाजन नहीं होने दूंगी. हम लोग दंगे नहीं चाहते, किसी तरह का संघर्ष नहीं चाहते. हम शांति चाहते हैं."

उन्होंने कहा कि बंगाल में एनआरसी लागू नहीं करने दिया जाएगा. ममता ने आरोप लगाया कि कुछ लोग भाजपा से पैसे लेकर मुस्लिम वोटों को बांटने का भी प्रयास कर रहे हैं.

मुख्यमंत्री का कहना था, "हम लोग पश्चिम बंगाल में शांति चाहते हैं, कोई दंगा नहीं चाहते. हम देश का कोई विभाजन नहीं चाहते"

लेकिन केंद्र में सत्तारूढ़ हिंदू राष्ट्रवादी दल भाजपा ने धार्मिक उत्सव के मंच का इस्तेमाल राजनीतिक संदेश देने के लिए करने पर कटाक्ष किया है.

दूसरी ओर, विश्लेषकों का मानना है कि राज्य के मुसलमानों का एक गुट तृणमूल कांग्रेस से मुंह फेर रहा है. हाल की कुछ घटनाओं से ऐसा संकेत मिलने के कारण ममता बनर्जी की पार्टी चिंतित है. इसी वजह से ममता ने धार्मिक उत्सव के मंच से साफ़ राजनीतिक संदेश दिया है.

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ईद के मौके़ पर क्या कहा ममता बनर्जी ने

ममता ने ईद के मौके़ पर अपने भाषण में एनआरसी का मुद्दा भी उठाया. उनका कहना था, "अगर लोकतंत्र ख़त्म होता है तो सब कुछ ख़त्म हो जाएगा. अब संविधान और इतिहास को बदला जा रहा है. वो एनआरसी ले आए हैं. मैंने कह दिया है कि यहां एनआरसी लागू नहीं होने दिया जाएगा."

राज्य में कुछ दिनों बाद ही हज़ारों सीटों पर पंचायत चुनाव होने हैं और अगले साल लोकसभा चुनाव हैं. इस मुद्दे पर ममता ने कहा, "कुछ लोग भाजपा से पैसे लेकर कह रहे हैं कि मुस्लिम वोटों का विभाजन कर देंगे. मैं उनसे कहती हूं कि उनमें भाजपा के पक्ष में मुस्लिम वोटों को बांटने की हिम्मत नहीं है. यह मेरा आपसे वादा है. चुनाव में एक साल है. देखते हैं कि कौन जीतता है?"

हिंदुत्ववादी लंबे अरसे से ममता पर अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण का आरोप लगाते रहे हैं.

बीजेपी प्रदर्शन

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भाजपा की प्रवक्ता केया घोष कहती हैं, "ममता ने आज एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि एक धार्मिक मंच का राजनीतिक मंच के तौर पर कैसे इस्तेमाल किया जाता है. वो पहले भी ऐसा कर चुकी हैं."

उनका कहना था, "अल्पसंख्यक वोटों को फिर से हासिल करने की उनकी हताशा आज के भाषण में दिखी. इससे साफ है कि एक राजनेता और राज्य की मुख्यमंत्री कैसे एक खास तबके का तुष्टिकरण कर सकती हैं."

भाजपा ने ईद के नमाज़ के मौके पर अचानक एनआरसी का मुद्दा उठाने की मंशा पर भी सवाल उठाया है. केया घोष कहती हैं, "एनआरसी का तो कोई प्रसंग ही नहीं उठा था. आखिर मुख्यमंत्री ने यह बात क्यों कही? वो राज्य के लोगों को भड़का रही हैं. संशोधित नागरिकता कानून या सीएए को देश की संसद में पारित हुआ है, तो क्या ममता संसद को चुनौती दे रही हैं?"

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ईद के मौके़ पर राजनीतिक भाषण क्यों?

माना जाता है कि पश्चिम बंगाल में लंबे समय से तृणमूल कांग्रेस को मुसलमानों के ज़्यादातर वोट मिलते रहे हैं. लेकिन हाल की कुछ घटनाओं से संकेत मिला है कि मुसलमानों का एक तबका तृणमूल कांग्रेस से नाराज़ हो गया है.

विश्लेषकों का कहना है कि करीब एक साल से मुसलमानों के एक तबके में सरकार के प्रति नाराज़गी बढ़ रही है. सामाजिक कार्यकर्ता अनीस खान की मौत के समय पहली बार इसकी झलक देखने को मिली थी.

हावड़ा ज़िले की पुलिस आधी रात को अनीस को गिरफ्तार करने पहुंची थी और दूसरी मंज़िल से गिरने के कारण उनकी मौत हो गई थी.

उनके परिजनों से लेकर विपक्षी पार्टियों तक को लगता है कि अनीस की हत्या की गई थी. इस घटना पर व्यापक विरोध प्रदर्शन हुआ था.

कुछ महीने पहले मुस्लिम बहुल राजनीतिक पार्टी आईएसएफ़ के एकमात्र विधायक और फुरफुरा शरीफ पीर परिवार के सदस्य नौशाद सिद्दीकी को 42 दिनों तक जेल में रखने के मुद्दे पर भी मुसलमानों में नाराज़गी है.

हाल में मुर्शिदाबाद ज़िले के सागरदीघी उपचुनाव में तृणमूल कांग्रेस को कांग्रेस से मात खानी पड़ी थी. उससे पहले वह लगातार दो बार वह सीट जीत चुकी थी.

सागरदीघी उपचुनाव में तृणमूल की हार के बाद ममता को लगने लगा कि मुस्लिम वोटरों का मोहभंग हुआ है.

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इमेज कैप्शन, सागरदीघी उपचुनाव में तृणमूल की हार के बाद ममता को लगने लगा कि मुस्लिम वोटरों का मोहभंग हुआ है.

सागरदीघी उपचुनाव से सबक़

उसके बाद ही तृणमूल कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को आभास हुआ कि शायद मुसलमान अब एकजुट होकर पार्टी को वोट नहीं दे रहे हैं.

इस मुस्लिम बहुल सीट पर इससे पहले तृणमूल कांग्रेस करीब 25 हज़ार वोटों के अंतर से जीती थी. लेकिन उपचुनाव में वाममोर्चा समर्थित कांग्रेस उम्मीदवार की जीत का अंतर करीब 52 हज़ार रहा था.

इससे साफ है कि तृणमूल कांग्रेस को पिछली बार मिले करीब 75 हज़ार वोट विपक्षी दलों के पाले में चले गए.

राजनीतिक विश्लेषक शुभाशीष मैत्रा कहते हैं, "ममता बनर्जी ने ईद के मौक़े पर पहली बार ऐसा नहीं कहा है. वे इन मुद्दों पर पहले भी बोल चुकी हैं और शायद आगे भी बोलेंगी. अहम बात यह है कि उन्होंने अपने राजनीतिक भाषण के लिए ईद की नमाज़ के मौके को चुना है. अलग-अलग दौर में अलग-अलग राजनीतिक पार्टियां मुस्लिम वोटों को अपनी निजी संपत्ति मानते रहे हैं."

मैत्रा कहते हैं, "तृणमूल कांग्रेस का दावा था कि मुसलमान उसे ही वोट देते हैं. लेकिन सागरदीघी उपचुनाव में अलग तस्वीर देखने को मिली. शायद उसी चिंता के कारण ममता ने ईद के मंच से यह बातें कही हैं."

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