पश्चिम बंगाल में पंचायत चुनावों को लेकर हर बार बवाल क्यों होता है?
प्रभाकर मणि तिवारी
कोलकाता से बीबीसी हिंदी के लिए

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पश्चिम बंगाल में अगले महीने होने वाले पंचायत चुनाव की तारीख़ के ऐलान के साथ ही राज्य के विभिन्न इलाकों में बड़े पैमाने पर हिंसा शुरू हो गई है. आख़िर इस चुनाव में होने वाली हिंसा की वजह क्या है?
क्या है यह पंचायत व्यवस्था जिसके चुनाव पर इतना घमासान मचा है? क्यों तमाम राजनीतिक दल इसमें जीत के लिए ऐड़ी-चोटी का ज़ोर लगाने के साथ ही धनबल और बाहुबल के इस्तेमाल से भी पीछे नहीं हटते?
आख़िर इस चुनाव की इतनी अहमियत क्यों है और इस पर तमाम राजनीतिक दल एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप क्यों लगाते रहे हैं?
क्या सचमुच नेताओं में ग्रामीण इलाकों के विकास की भावना इतनी प्रबल है कि उनके लिए पंचायत चुनाव की अहमियत विधानसभा और लोकसभा चुनाव से भी अधिक है?
बीबीसी ने अगले लोकसभा चुनाव से पहले आठ जुलाई को होने वाले पंचायत चुनाव से जुड़े ऐसे ही कुछ सवालों के जवाब तलाशने का प्रयास किया है.

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त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था
साल 1977 में सत्ता में आने के बाद वाममोर्चा सरकार ने पंचायत अधिनियम 1973 के प्रावधानों के तहत राज्य में त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था लागू की थी. इसमें ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और ज़िला परिषद शामिल है.
इनके कामकाज की निगरानी का ज़िम्मा राज्य सरकार की ओर से नियुक्त पंचायत निदेशक के ज़िम्मे है.
इसके लिए जून, 1978 में पहली बार पंचायत चुनाव कराए गए थे. तब पश्चिम बंगाल ऐसा करने वाला देश का पहला राज्य था.
राज्य में 3,317 ग्राम पंचायतें हैं. इन ग्राम पंचायतों की 63,229 पंचायत समितियों की 9,730 सीटों और 22 ज़िला परिषदों की 928 सीटों यानी कुल 73,887 सीटों के लिए आठ जुलाई को मतदान होगा.
वैसे, पंचायत चुनाव में हिंसा का यह पहला मौका नहीं है. इससे पहले वर्ष 2018 में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस ने पंचायतों की करीब 90 फीसदी सीटों के अलावा सभी 22 ज़िला परिषदों पर कब्ज़ा कर लिया था.
उस समय भी बड़े पैमाने पर हिंसा हुई थी और विपक्ष ने आरोप लगाया था कि तृणमूल कांग्रेस के लोगों ने ज्यादातर विपक्षी उम्मीदवारों को या तो नामांकन पत्र ही दाखिल नहीं करने दिया या फिर उसे वापस लेने पर मजबूर कर दिया.
उससे पहले वर्ष 2013 में केंद्रीय बलों की निगरानी में हुए पंचायत चुनाव में भी तृणमूल कांग्रेस ने करीब 85 फीसदी सीटें जीती थीं.
लेकिन केंद्रीय बलों की मौजूदगी के बावजूद विपक्षी दलों ने तृणमूल कांग्रेस पर बड़े पैमाने पर चुनावी धांधली के आरोप लगाए थे.
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कहती हैं कि पंचायत चुनाव में हिंसा वाममोर्चा के कार्यकाल में भी होती रही है.
उन्होंने आंकड़ों के हवाले से कहा है, "वर्ष 2003 के पंचायत चुनाव में 70 लोग मारे गए थे और 2008 में 36 लोग. उस लिहाज़ से देखें तो नामांकन पत्र दाखिल करने की प्रक्रिया इतनी शांतिपूर्ण पहले कभी नहीं रही है."

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क्यों अहम हैं ग्राम पंचायत चुनाव?
राजनीतिक विश्लेषक प्रोफेसर समीरन पाल बताते हैं, "मोटे तौर पर एक ज़िला परिषद अपने पांच साल के कार्यकाल के दौरान करीब पांच सौ करोड़ रुपए खर्च कर सकती है. जिले के क्षेत्रफल के हिसाब से यह रकम कम या ज्यादा हो सकती है."
पंचायत विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, राज्य की एक-एक ग्राम पंचायत को विकास के मद में पांच साल के दौरान पांच से 18 करोड़ तक की रकम मिलती है. इसका ज्यादातर हिस्सा केंद्र सरकार से मिलता है.
इस रकम को खर्च करने का अधिकार पंचायत समिति के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के पास होता है.
केंद्र ने वर्ष 2020-21 के दौरान ग्रामीण विकास के मद में राज्य सरकार को 4,412 करोड़ रुपए दिए थे.
2021-22 में यह रकम 3,261 करोड़ थी. इस साल के पंचायत चुनाव के बाद राज्य सरकार को अगले चार साल में इस मद में क्रमशः 3,378, 3415, 3,617 और 3,528 करोड़ रुपए मिलेंगे. यानी हर साल हर पंचायत को केंद्र से कम से कम एक करोड़ की रकम तो मिलेगी ही.
पंचायत विभाग के एक अधिकारी नाम नहीं छापने की शर्त पर बताते हैं कि पैसों को खर्च करने के मामले में पंचायत के सदस्यों के अधिकार किसी विधायक या सांसद से ज्यादा होते हैं.
इसी वजह से इस चुनाव के टिकट और इसमें जीत के लिए मारामारी मची रहती है.
खासकर ज्यादातर पार्टियां चाहती हैं कि पंचायतों में विपक्षी पार्टी का कोई सदस्य नहीं रहे. इससे उनको अपना काम करने में आसानी होगी और उन पर कोई सवाल नहीं उठेगा.

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धांधली के आरोपों में कितना दम?
राज्य के पंचायत चुनाव में धांधली के आरोप सबसे ज़्यादा लगते हैं. वर्ष 2018 में तृणमूल कांग्रेस ने करीब 34 फीसदी सीटों पर निर्विरोध जीत हासिल की थी.
इस साल भी उत्तर दिनाजपुर के चोपड़ा में नामांकन पत्र दाखिल करने के आखिरी दिन हिंसा और फायरिंग के आरोप लगे थे, वहां तृणमूल कांग्रेस ने 217 में से 214 सीट निर्विरोध जीत ली हैं.
प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सुकांत मजूमदार आरोप लगाते हैं कि बंगाल में विपक्षी उम्मीदवारों को डरा-धमका कर या तो नामांकन पत्र ही दाखिल नहीं करने दिया जाता या फिर उनको नाम वापस लेने पर मजबूर कर दिया जाता है.
इस साल भी हाईकोर्ट के निर्देश पर उत्तर 24-परगना जिले के बसीरहाट में पार्टी के 60 उम्मीदवारों ने समयसीमा खत्म होने के बाद नामांकन पत्र दाखिल किया है.
लेकिन विपक्ष का आरोप है कि राज्य के दूसरे इलाकों में कई लोग नामांकन ही दाखिल नहीं कर सके.
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी ने पत्रकारों से बातचीत में आरोप लगाया है कि राज्य में केंद्रीय बलों के बिना मुक्त और निष्पक्ष चुनाव संभव ही नहीं हैं. हमें स्थानीय पुलिस पर भरोसा नहीं है.
लेकिन तृणमूल कांग्रेस ने इन आरोपों का खंडन किया है. खुद मुख्यमंत्री ने कहा है कि इस चुनाव के लिए 2.31 लाख उम्मीदवारों ने नामांकन पत्र दाखिल किया है.
उनका सवाल है कि अगर विपक्ष के आरोप में दम होता तो इतने लोग नामांकन पत्र कैसे दाखिल कर पाते?
ममता बनर्जी ने दक्षिण 24-परगना जिले की एक सभा में 2013 के चुनाव का जिक्र करते हुए कहा, “उस साल केंद्रीय बलों की मौजूदगी में चुनाव के बावजूद 39 लोगों की मृत्यु हुई थी. केंद्रीय बल तो मणिपुर में भी तैनात हैं. लेकिन उसके बावजूद केंद्रीय मंत्री का घर जला दिया गया और 150 लोगों की मौत हो चुकी है.”

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अदालत की भूमिका
राज्य में हाल के वर्षो में शायद ही ऐसा कोई चुनाव हो जिसमें धांधली और हिंसा का मुद्दा कलकत्ता हाईकोर्ट तक नहीं पहुंचा हो.
वर्ष 2018 में तृणमूल कांग्रेस की कथित चुनावी धांधली के खिलाफ हाईकोर्ट में विपक्षी दलों की ओर से कई याचिकाएं दायर की गई थीं.
लेकिन आखिर इस मामले में कुछ नहीं हुआ. इस साल भी चुनाव की तारीख के ऐलान के बाद ही भाजपा, कांग्रेस और सीपीएम ने अलग-अलग कई याचिकाएं दायर की थीं.
उन पर सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश टी.एस.शिवज्ञानम की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने नामांकन पत्र दाखिल करने की समयसीमा बढ़ाने या चुनाव की तारीख आगे बढ़ाने से तो इंकार कर दिया.
लेकिन उसने चुनाव आयोग को तमाम संवेदनशील इलाकों में 48 घंटों के भीतर केंद्रीय बलों को तैनात करने का निर्देश दिया है. लेकिन राज्य सरकार और चुनाव आयोग ने इस समयसीमा के खत्म होने से पहले ही इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है.
हालांकि पहले चुनाव आयुक्त राजीव सिन्हा ने अदालती निर्देश का पालन करने की बात कही थी. अदालत ने राज्य सरकार से हिंसा के कई मामलों पर सफाई भी मांगी है.
दूसरी ओर, राज्यपाल सी.वी.आनंद बोस ने भी कोलकाता से सटे सबसे हिंसाग्रस्त भांगड़ इलाके का दौरा करने के बाद कहा है कि चुनाव के दौरान किसी तरह की गड़बड़ी बर्दाश्त नहीं की जाएगी.
वरिष्ठ पत्रकार तापस कुमार मुखर्जी कहते हैं, "चुनाव के समय तमाम दलों का एक-दूसरे पर आरोप लगाना कोई नई बात नहीं है. लेकिन आंकड़े असली कहानी बताते हैं."
"ऐसे आरोप लगाने वाली भाजपा ने इस बार कुल 56,321 यानी 76.22 फीसदी सीटों पर नामांकन पत्र दाखिल किया है जबकि वर्ष 2018 में यह कड़ा 34,507 था लेकिन बाद में कुछ लोगों के नामांकन वापस लेने के कारण उम्मीदवारों की संख्या घट कर 28,430 यानी 48.43 फीसदी रह गई थी. तब पार्टी का आरोप था कि तृणमूल ने करीब छह हजार लोगों को जबरन नाम वापस लेने पर मजबूर किया है."
राजनीतिक विश्लेषक समीरन पाल बताते हैं, "राज्य के किसी भी चुनाव में हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना अब एक परंपरा बनती जा रही है. लेकिन अदालत आमतौर पर चुनावी प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने से बचती रही है. कलकत्ता हाईकोर्ट ने केंद्रीय बलों की निगरानी में चुनाव का निर्देश जरूर दिया है. लेकिन उसका वह फैसला कितना लागू होगा, यह तो आगे ही पता चलेगा."
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