गर्भनाल ब्लड बैंक क्या है, दुनिया भर में क्यों बढ़ रहा है इसका चलन?

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- Author, अंजलि दास
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
"केवल एक रक्त कोशिका से ही हमारे शरीर में छह पिंट यानी 3.4 लीटर तक ख़ून बन सकता है."
हार्वर्ड मेडिकल स्कूल में प्रोफ़ेसर और बोस्टन में स्टेम सेल प्रोग्राम के डायरेक्टर लियोनार्ड ज़ोन बताते हैं कि हर साल स्टेम सेल ब्लड की मदद से किए जा रहे ट्रांसप्लान्ट से हज़ारों जिंदगियां बचाई जा रही हैं.
कॉर्ड ब्लड स्टेम सेल से भरा होता है. वैज्ञानिकों ने ये साबित किया है कि स्टेम सेल ब्लड से लाल रक्त कोशिकाएं या श्वेत रक्त कोशिकाएं विकसित की जा सकती हैं.
मेडिकल एक्सपर्ट स्टेम सेल ब्लड की मदद से कई तरह की ख़ून से संबंधित बीमारियों को ठीक करने का दावा करते हैं. इसे जानलेवा बीमारियों से पीड़ित रोगियों के इलाज में उपयोग किया जा सकता है.
इसमें ब्लड कैंसर, बोनमैरो की बीमारी, सिकिल सेल एनीमिया, इम्यून सिस्टम या प्रतिरक्षा प्रणाली की दुर्बलता, मेटाबॉलिज़्म (शरीर में भोजन को एनर्जी में बदलने की प्रक्रिया) से जुड़ी समस्याएं और दुर्लभ आनुवांशिक बीमारियां शामिल हैं.
स्टेम सेल या मूल कोशिकाओं को गर्भनाल या अम्बलिकल कॉर्ड से एकत्र कर एक लंबी अवधि के लिए कॉर्ड बैंक में सुरक्षित रखने की एक सुविधा उपलब्ध है.
वैसे तो पूरी दुनिया में भी कॉर्ड ब्लड बैंक में स्टेम सेल को सुरक्षित रखने का चलन अभी बहुत कम है लेकिन इसमें धीरे धीरे वृद्धि देखने को मिल रही है.
सेल ट्रायल डेटा के आंकड़ों के मुताबिक, अमेरिका में जन्म ले रहे 3 प्रतिशत बच्चों के माता-पिता इसे अपना रहे हैं तो ब्रिटेन में यह 0.3% और फ़्रांस में तो बहुत कम 0.08% है.
वहीं भारत में देखा जाए तो इसका चलन 0.4% है.

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महंगा स्टोरेज
इसकी सबसे बड़ी वजह इसके भंडारण में लगने वाली रक़म है.
कॉर्ड लाइफ़ साइंसेज़ इंडिया प्राइवेट लिमिटेड का पश्चिम बंगाल में कॉर्ड ब्लड बैंक है. ये देश भर से स्टेम सेल इकट्ठा कर वहीं के बैंक में इसे सुरक्षित रखती है.
कॉर्ड लाइफ़ पेरेंट्स को कई तरह के पैकेज ऑफ़र करती है जिसकी रक़म करीब 56,500 रुपये से 5,53,000 रुपये तक है.
यह एक बड़ी रकम है जिसे हर कोई आसानी से ख़र्च नहीं कर पाता.
ऐसा इसलिए भी है कि पूरी दुनिया में निजी कॉर्ड ब्लड बैंकों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है और ये महंगे भी है.
भारत में कई निजी बैंक भविष्य में चिकित्सीय उपयोग के वादे के साथ गर्भनाल रक्त बैंक के अपने विज्ञापनों में लगे हुए हैं.
आईसीएमआर की रिपोर्ट के अनुसार, ऐसे विज्ञापन अक्सर जनता को गुमराह करने वाले होते हैं और इनमें व्यापक और सटीक जानकारी का अभाव होता हैं.
अभी तक भविष्य में अपने उपयोग के लिए गर्भनाल रक्त के संरक्षण का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है और इसलिए यह प्रथा नैतिक और सामाजिक चिंताओं को जन्म देती हैं.
ये पेरेंट्स को बच्चे के भविष्य के बारे में बता कर उनसे ये कहते हैं कि स्टेम सेल की मदद से 80 बीमारियों का इलाज किया जा सकेगा और उनका ये दावा वैज्ञानिक रूप से समर्थित नहीं है.

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लोगों का अनुभव
ऐसा ही अनुभव ओडिशा के अभिनव सिन्हा को मिला.
वे कहते हैं, "जब हमारा पहला बेबी आने को था तो हमने उसके भविष्य की सुरक्षा के लिए उसके स्टेम सेल ब्लड को अम्बलिकल कॉर्ड बैंक में सुरक्षित रखने का फ़ैसला लिया."
"लेकिन तीन महीने बाद मैंने ईएमआई नहीं भरी और बैंक की ओर से भी इसे लेकर कोई कॉल नहीं आई और न ही उनकी ओर से मुझे इसकी याद दिलाई गई."
वे कहते हैं, "मैंने ये उनके विज्ञापन की वजह से लिया था लेकिन आखिरकार मुझे इससे निराशा हुई."
लेकिन पुडुचेरी के रहने वाले अनबालगन लक्ष्मण का अनुभव अलग है.
वे कहते हैं, "मैं अपने दोनों बच्चों के अम्बलिकल कॉर्ड ब्लड बैंक के इंश्योरेंस से काफ़ी संतुष्ट हूं. मुझे नहीं पता कि आने वाले समय में क्या होगा लेकिन मैं भविष्य में अगर ऐसी कोई परिस्थिति आती है जिसमें इलाज के लिए स्टेम सेल की ज़रूरत पड़े तो मैं उसके लिए तैयार हूं."
कनाडा ब्लड सर्विस के फंड से किए गए एक शोध में यह बताया गया है कि एक बच्चे को स्टेम सेल ब्लड की भविष्य में ज़रूरत पड़ने की कितनी संभावना है.

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भारत में जानकारों का क्या कहना है
इसमें बताया गया है कि 20 हज़ार में एक बच्चे (0.005%) से लेकर ढाई लाख में एक बच्चे (0.0004%) को इसकी ज़रूरत पड़ सकती है.
इंडियन एकेडमी ऑफ़ पेडिएट्रिक्स का कहना है कि वो भविष्य के लिए कॉर्ड ब्लड जमा करने की अनुशंसा नहीं करते हैं क्योंकि इसके उपयोग की संभावना बहुत कम है.
इसके मुताबिक़ स्टेम सेल ब्लड की ज़रूरत 20 वर्षों में 0.04% से 0.005 प्रतिशत बच्चों की हो पड़ सकती है.
ठीक ऐसा ही कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का भी कहना है.
इसमें अमेरिकन एकेडमी ऑफ़ पेडिएट्रिशियन, अमेरिकन सोसाइटी फ़ॉर ब्लड ऐंड मैरो ट्रांसप्लांट, रॉयल कॉलेज ऑफ़ ऑब्स्ट्रेटिशियन्स ऐंड गायनेकोलोजिस्ट, यूरोपियन ग्रुप ऑन एथिक्स इन साइंस ऐंड न्यू टेक्नोलॉजिज समेत कई अन्य संस्थाएं शामिल हैं.

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यथार्थ अस्पताल में सीनियर कन्सल्टेंट डॉ. ममता झा कहती हैं कि अम्बलिकल कॉर्ड ब्लड को डिलीवरी के वक़्त की एकत्र किया जाता है.
हालांकि वे कॉर्ड ब्लड बैंक के विचार को पूरी तरह ख़ारिज करते हुए कहती हैं, "अगर स्वास्थ्य के नज़रिए से देखें तो अम्बलिकल कॉर्ड बैंक में स्टेम सेल को सुरक्षित करने का वादा किया जाता है. हालांकि यह एक तरह से मार्केटिंग रणनीति है जिसमें आपसे बहुत सी बीमारियों से बचाव का वादा किया जाता है. लेकिन यह उस योग्य नहीं है."
वे कहती हैं, "इसकी ज़रूरत 20 हज़ार में से किसी एक को पड़ सकती है. मैं इसकी सलाह बिल्कुल भी नहीं करती हूं. मैं अपने रोगियों को स्वस्थ्य जीवन जीने के तरीके बताती हूं. अगर आप किसी को सही सात्विक तरीक़ा सीखा दोगे तो उसे क्यों किसी ऐसे चीज़ की ज़रूरत पड़ेगी."
वे कहती हैं, "भोजन शरीर का इंधन है. हमें संतुलित आहार लेना चाहिए. अपनी बॉयलॉजिकल क्लॉक पर काम करना चाहिए. सुबह उठें, उस समय आपको प्रकृति से सबसे अधिक ऑक्सीजन मिलेगी. प्राणायाम करें. अपने दिमाग़ को नियंत्रित रखें आपका शरीर भी नियंत्रित रहेगा."

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कुल मिलाकर भारत में पेरेंट्स कॉर्ड ब्लड के संरक्षण के लिए निजी बैंकों को बहुत बड़ी रक़म अदा करते हैं या उसे संरक्षित नहीं करते हैं.
अमेरिका में पब्लिक यूसीबी बैंकों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है वहीं आईसीएमआर के अम्बलिकल कॉर्ड ब्लड बैंकिंग गाइडलाइन 2023 में बताया गया है कि भारत में एक भी पब्लिक यूसीबी बैंक नहीं हैं.
जहां तक भविष्य में इसकी उपयोगिता की बात है तो इंडियन सोसाइटी ऑफ़ ब्लड एंड मैरो ट्रांसप्लांट के आंकड़े बताते हैं कि 2012 से 2022 के बीच भारत में केवल 60 कॉर्ड ब्लड ट्रांसप्लांट किए गए.
तो क्या कॉर्ड ब्लड बैंक के विचार को पूरी तरह से ख़ारिज कर दिया जाना चाहिए?
यूनिवर्सिटी ऑफ़ पीट्सबर्ग मेडिकल सेंटर चिल्ड्रेन हॉस्पिटल ने दान किए हुए कॉर्ड ब्लड स्टेम सेल से 44 बच्चों के 20 अलग अलग कैंसर से अलग आनुवांशिक बीमारियों का सफल इलाज किया.
इसमें सिकिल सेल एनीमिया, हंडर सिंड्रोम और शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र की कमी जैसी समस्याएं शामिल थीं.
इस शोध ने भविष्य के लिए यह उम्मीद भी जगाई है कि आनुवांशिक रोगों के इलाज में किसी अन्य के स्टेम सेल का इस्तेमाल कर उसे ठीक किया जा सकता है.
टेक्सस की जोड़ी गुडिपती और राज ने अपने बेटे के कॉर्ड ब्लड को दान कर दिया है और अब उसे पब्लिक बैंक में संरक्षित रखा गया है.
वे कहते हैं, "हम मेरे बेटे के अम्बलिकल कॉर्ड ब्लड को बर्बाद नहीं होने देना चाहते थे. वो इस दुनिया में किसी के जीवन की नई उम्मीद बन कर आया है."
अम्बलिकल कॉर्ड ब्लड बैंक से जुड़ी शिकायतें केन्द्रीय औषध मानक नियंत्रण संगठन यानी सीडीएससीओ के ज़ोनल ऑफ़िस में की जानी चाहिए.
शिकायत की एक एक कॉपी सीडीएससीओ और आईसीएमआर को भेजी जाना चाहिए. आप चाहें तो उपभोक्ता फोरम में भी जा सकते हैं.
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