ये युवा नहीं चाहते बच्चे, क्यों बढ़ रहा है ऐसा चलन

चाइल्ड फ्री दंपत्ति

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    • Author, आदर्श राठौर
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

“मैंने उससे कहा, देखो, मैं बच्चे नहीं चाहता. मैं नहीं चाहूंगा कि तुम अपनी इच्छा को दबाओ या फिर बाद में मुझ पर किसी तरह का दबाव आए.”

नोएडा में एक समाचार चैनल में काम करने वाले निशांत (बदला हुआ नाम) बताते हैं कि यह बात उन्होंने श्वेता (बदला हुआ नाम) को प्रपोज़ करने से पहले कही थी.

निशांत की पिछली 'रिलेशनशिप' भी उस समय टूट गई थी, जब उन्होंने गर्लफ्रेंड से कहा था कि वह शादी तो करना चाहते हैं मगर बच्चे नहीं चाहते.

निशांत को डर था कि इस बार भी वैसा ही कुछ होगा. मगर उनके लिए श्वेता का यह कहना एक सुखद आश्चर्य लेकर आया कि वह भी 'बच्चे नहीं चाहतीं.'

आज दोनों की शादी को पांच साल हो चुके हैं और वे ‘चाइल्ड-फ़्री’ रहकर हंसी-खुशी जीवन बिता रहे हैं.

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चाइल्ड-लेस और चाइल्ड-फ़्री में फ़र्क़

जिन वयस्कों के अभी बच्चे नहीं हैं लेकिन आगे चलकर बच्चे पैदा करना चाहते हैं या फिर जो चाहकर भी बच्चे पैदा नहीं कर पा रहे, उन्हें ‘चाइल्ड-लेस’ कहा जाता है.

कई बार लोग किसी मेडिकल समस्या के कारण बच्चे पैदा नहीं कर पाते. इसी तरह साथी न मिल पाने या शादी न होने जैसे सामाजिक कारणों से भी कोई चाइल्ड-लेस हो सकता है.

इसके विपरीत, ‘चाइल्ड-फ़्री’ वे वयस्क हैं, जो अपनी मर्ज़ी से तय करते हैं कि उन्हें बच्चे नहीं चाहिए.

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सरल शब्दों में समझें तो जो लोग अपनी मर्ज़ी से बच्चे नहीं चाहते, उन्हें कहा जाएगा- चाइल्ड-फ़्री और जिन लोगों के किसी कारण बच्चे नहीं हैं, उन्हें कहा जाएगा- चाइल्ड-लेस.’

'चाइल्ड-फ़्री' शब्द को 1900 की शुरुआत से ही इस्तेमाल किया जाता रहा है मगर इसके चलन ने 1970 के दशक में ज़ोर पकड़ा. नारीवादियों ने उन महिलाओं के समूह को अलग पहचान देने के लिए इसे इस्तेमाल किया जो अपनी इच्छा से ‘चाइल्ड-लेस’ थीं.

‘चाइल्ड’ के आगे ‘फ़्री’ शब्द को इसलिए लगाया गया ताकि इसमें मुक्ति का भाव आए और ऐसा न लगे कि बच्चे पैदा न करके उन्होंने कोई दायित्व पूरा नहीं किया है.

एलिज़ाबेथ हिंट्ज़ अमेरिका की कनेक्टिकट यूनिवर्सिटी में संचार की सहायक प्रोफ़ेसर हैं और उन्होंने ‘चाइल्ड-फ़्री’ विषय पर काफ़ी अध्ययन किया है.

वह बताती हैं कि ज़्यादातर शोधों में चाइल्ड फ़्री और चाइल्ड-लेस, दोनों को एक ही श्रेणी से डाल देने के कारण तुलनात्मक आंकड़े जुटाने में दिक्कत होती है. फिर भी, सोशल मीडिया के इस दौर में ‘चाइल्ड-फ़्री’ होने की पहचान तेज़ी से बढ़ी है क्योंकि बच्चे न पैदा करने का फ़ैसला लेने वाले खुलकर आगे आ रहे हैं.

शोध भी इशारा करते हैं कि पश्चिमी देशों में स्वेच्छा से बच्चे न चाहने वालों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है.

प्यू रीसर्च सेंटर ने अमेरिका में साल 2021 में एक शोध किया था. इसमें बिना बच्चों वाले 18 से 49 साल के 44 फ़ीसदी लोगों का कहना था कि उन्हें नहीं लगता कि वे भविष्य में बच्चे पैदा करेंगे. 2018 के शोध में ऐसा कहने वालों की संख्या 37 प्रतिशत थी.

इनमें से कुछ ने स्वास्थ्य संबंधित कारण गिनाए तो कुछ का कहना था कि वे अकेले बच्चे की परवरिश नहीं करना चाहते. लेकिन आधे से ज़्यादा लोगों का कहना था कि वे बच्चे पैदा ही नहीं करना चाहते.

इसी तरह इंग्लैंड और वेल्स में यूगॉव ने 2020 में शोध किया जिससे पता चला कि 35 से 44 साल के जिन लोगों के बच्चे नहीं थे, उनमें आधे से ज़्यादा आगे भी बच्चे नहीं चाहते थे.

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क्या हैं कारण?

चाइल्ड-फ़्री श्रेणी में कुछ लोग ऐसे हैं जो हमेशा से ही बच्चे नहीं चाहते तो कुछ ऐसे हैं जो काफ़ी बाद में बच्चे न पैदा करने का फ़ैसला लेते हैं और इस पर क़ायम रहते हैं.

कुछ ऐसे लोग भी हैं जिन्हें कभी लगता है कि बच्चे नहीं चाहिए तो कभी लगता है कि चाहिए.

निशांत और श्वेता, पहली श्रेणी में आते हैं और दोनों के बच्चा न चाहने के कारण एक जैसे हैं.

श्वेता कहती हैं, “हम सिर्फ़ इसलिए बच्चे नहीं पैदा कर सकते कि हर कोई ऐसा करता है. ऐसा नहीं है कि हमें बच्चे नापसंद हैं. बात यह है कि बच्चों के बिना भी हमारा जीवन अच्छा चल रहा है और हमें कभी कोई कमी महसूस नहीं हुई.”

दिल्ली की मनोवैज्ञानिक डॉक्टर पूजा शिवम जेटली बताती हैं कि बच्चे न चाहने का फ़ैसला करने के पीछे कई कारण होते हैं.

वह कहती हैं, “कुछ लोगों को लगता है कि उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है या उनके पास दोस्तों या परिवार का सहारा नहीं है. कुछ लोग गर्भावस्था और प्रसव से जुड़े ख़तरों को लेकर बेचैन रहते हैं. वहीं कुछ को लगता है कि वे अपनी और पार्टनर की ही ज़िम्मेदारी उठा सकते हैं. ऐसे में वे बच्चों के लिए मानसिक तौर पर तैयार नहीं हो पाते.”

डॉक्टर जेटली एक और कारण बताती हैं जिसके चलते बहुत से लोग 'चाइल्ड-फ़्री' होना चुन रहे हैं.

वह कहती हैं, “आजकल की युवा पीढ़ी के लिए जीवन के निजी अनुभव सबसे ज़्यादा अहमियत रखते हैं. वे अपनी ज़िंदगी को अपने तरीक़े से जीना चाहते हैं. वे आज़ादी चाहते हैं. मेरे पास एक कपल आया था, जिसमें महिला तय नहीं कर पा रही थी कि उसे बच्चे चाहिए या नहीं जबकि उनके पार्टनर को बच्चे नहीं चाहिए थे. उनका कहना था कि वे दुनिया घूमना चाहते हैं लेकिन बच्चों के साथ आने वाली ज़िम्मेदारियों के कारण इसमें मुश्किल आएगी.”

इसे जोड़े को यह भी लगता था कि दुनिया के हालात ऐसे नहीं हैं कि यहां एक और बच्चा लाया जाए.

ऐसा और लोग भी सोचते हैं. 2021 में प्यू रीसर्च द्वारा किए गए शोध में बिना बच्चों वाले नौ प्रतिशत लोगों ने कहा दुनिया के हालात के कारण शायद वे भविष्य में बच्चे पैदा नहीं करना चाहेंगे. पांच फ़ीसदी ने इसके लिए जलवायु परिवर्तन का हवाला दिया.

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चाइल्ड फ़्री लोगों की मुश्किलें

27 साल की मार्सेला मुनोज़ ‘चाइल्ड-फ़्री मिलेनियल’ नाम से टिकटॉक, इंस्टाग्राम और यूट्यूब हैंडल चलाती हैं. वह उन इन्फ्लुएंसर्स में से एक हैं जो अपने कॉन्टेंट के माध्यम से बताते हैं कि वे क्यों बच्चे नहीं चाहते.

वह कहती हैं, “मैं उन लोगों से भेदभाव नहीं करती जिनके बच्चे हैं. मेरे कई दोस्तों के बच्चे हैं. लेकिन मुझे ख़ुशी है कि माता-पिता बनने से पहले लोग अब गहराई से सोचने लगे हैं.”

मुनोज़ अपने टिक टॉक पर मज़ाकिया लहज़े में कॉन्टेंट बनाती हैं मगर वहां कई गंभीर पहलुओं पर बात होती है. जैसे कि उनके कुछ फ़ॉलोवर बच्चे नहीं चाहते मगर उन्हें डर है कि अगर चाइल्ड-फ़्री रहने का फ़ैसला करते हैं तो इससे उनकी दोस्ती टूट सकती है या माता-पिता निराश हो सकते हैं.

ऐसा ही निशांत और श्वेता के साथ हुआ. बच्चे पैदा न करना सामाजिक बंदिशों को तोड़ने वाला फ़ैसला है मगर फिर भी वे अपनी वास्तविक पहचान ज़ाहिर नहीं करना चाहते.

कारण बताते हुए निशांत कहते हैं, “हम तो अपने फ़ैसले पर अडिग हैं लेकिन बुज़ुर्ग माता-पिता का दिल नहीं दुखाना चाहते. मैंने एक बार घर पर इस बारे में बात की तो कई दिनों तक तनाव बना रहा. इसलिए हमने फ़िलहाल उनसे यह कहा है कि अभी बच्चे पैदा नहीं कर सकते, बाद में सोचेंगे.”

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समाज के निशाने पर

सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म रेडिट पर ‘ग्लोबल चाइल्ड-फ़्री’ नाम का एक ग्रुप है जिसके 15 लाख से अधिक सब्स्क्राइबर हैं.

यहां चाइल्ड-फ़्री लोग अपने अनुभव साझा करते हैं. कुछ कहते हैं कि उन्हें माता-पिता, यहां तक कि अनजान लोगों के भी ताने सुनने पड़ते हैं. ये कहा जाता है कि 'अपने करियर पर ज़्यादा ही ध्यान दे रहे हो या फिर देखना, तुम अपनी राय बदल लोगे.'

चाइल्ड फ़्री कॉन्टेंट क्रिएटर मुनोज़ को भी अपने कॉन्टेंट को लेकर ऑनलाइन हेट सामना करना पड़ता है. कुछ कहते हैं कि तुम बच्चा विरोधी हो, स्वार्थी हो, तुम्हें पछतावा होगा, अकेली मरोगी, कौन बुढ़ापे में ख्याल रखेगा, तुम कभी असल प्रेम का सुख नहीं ले पाओगी, वगैरह. उन्हें धार्मिक हवाले देकर भी कोसा जाता है.

प्रोफ़ेसर एलिज़ाबेथ हिंट्ज़ कहती हैं कि चाइल्ड फ़्री लोगों को समाज के बाक़ी हिस्सों से कड़ी प्रतिक्रियाओं और आलोचनाओं का सामना करना पड़ता है, ख़ासकर महिलाओं को.

वह कहती हैं, “बच्चे पैदा करने के फ़ैसले अक्सर महिलाओं पर थोप दिए जाते हैं. मातृत्व और स्त्रीत्व को एक दूसरे गूंथ दिया गया है. ऐसे में महिलाओं पर जिंदगी की परंपराओं को निभाने का ज़्यादा दबाव रहता है. उन देशों में भी, जहां लैंगिक समानता की दिशा में बहुत काम हुआ है.”

मगर विशेषज्ञों को उम्मीद है कि आने वाले समय में चाइल्ड-फ़्री होना एक सामान्य बात हो जाएगी. जब लोग ज़्यादा चाइल्ड-फ़्री लोगों से मिलेंगे तो इस मिथक को ख़त्म करने में मदद मिलेगी की वे स्वार्थी और सिर्फ़ अपने बारे में सोचने वाले लोग होते हैं.

हालांकि, इस मामले में कहां कितना बदलाव आएगा, यह बात उस जगह के मीडिया पर और वहां के राजनीतिक और धार्मिक परिवेश पर भी निर्भर करेगी.

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