वर्ल्ड म्यूज़ियम डे: यक्षिणी, तारा या फिर मुमताज़, हेयर स्टाइल से क्या पता चलता है

वर्ल्ड म्यूज़ियम डे

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    • Author, सीटू तिवारी
    • पदनाम, पटना से, बीबीसी हिंदी के लिए

बिहार म्यूज़ियम में इन दिनों एक अनोखी प्रदर्शनी देखने को मिल रही है. 'केश कला' नाम वाली इस प्रदर्शनी के ज़रिए बालों के सौंदर्य के महत्वपूर्ण पहलुओं को दर्शाने की कोशिश की गई है.

पटना स्थित बिहार म्यूज़ियम पूरे मई महीने इस प्रदर्शनी आयोजित कर रहा है.

बेल्जियम की गेंट यूनिवर्सिटी इसमें सहयोग कर रही है. इस प्रदर्शनी की क्यूरेटर गेंट यूनिवर्सिटी की प्रोफ़ेसर डेनिला डी सिमोन और बिहार म्यूज़ियम की विशि उपाध्याय हैं.

डेनिला ने मौर्य काल के पाटलिपुत्र पर अपनी पीएचडी की है. वो साल 2015 से 2020 तक ब्रिटिश म्यूज़ियम की क्यूरेटर रही हैं.

बीबीसी से बातचीत में डेनिला कहती हैं, "किसी भी दूसरे देश की तुलना में भारत में बालों की स्टाइल के साथ बहुत सारे फ़ैक्टर जुड़े हुए है. यहां अच्छे बाल सिर्फ़ ख़ूबसूरती के साथ ही जुड़े नहीं रहे हैं, बल्कि प्राचीन समय में बालों की सेहत और केश सज्जा महिलाओं के सामाजिक और राजनैतिक स्तर, सुंदरता, स्वास्थ्य और प्रजनन क्षमता का परिचायक था. बाल उनके मूड को भी दिखाता था. जैसे काली और चामुंडा का स्टाइल अलग है तो मोहिनी का अलग. द्रौपदी को तो भरी सभा में उनके खुले केश पकड़ कर ही खींचते हुए लाया गया था."

महिलाओं के बालों के इन अलग-अलग मूड और एक्सप्रेशन को ही इस प्रदर्शनी की थीम बनाया गया है.

आम महिलाओं, जनजातीय महिला के बालों की प्रचलित स्टाइल, विधवा और जैन मनीषियों का बाल मुंडवाना, बालों की सुंदरता, ऐश्वर्य, प्रजनन क्षमता आदि को बालों के ज़रिए इस प्रदर्शनी में दिखाया गया है.

दीदारगंज यक्षिणी

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इमेज कैप्शन, दीदारगंज की यक्षिणी के गेटअप में एक मॉडल

यक्षिणी, तारा, ब्रह्माणी, परिचारिका और मुमताज़

इस प्रदर्शनी में केश सज्जा को लाइव मॉडल्स के ज़रिए भी दर्शकों से रू-ब-रू कराया गया. इसके लिए पटना वीमेंस कॉलेज की पांच छात्राओं ने ऐतिहासिक महिला किरदारों का रूप धारण कर रैम्प वॉक किया.

क्यूरेटर विशि उपाध्याय बताती हैं, "हमने रैम्प वॉक के लिए महिलाओं को तीन कैटेगरी में बांटा है. यक्षिणी, रानी और देवी. यक्षिणी यानी सौंदर्य, संपन्नता और प्रजनन क्षमता की प्रतीक वाली महिलाएं. रानी यानी सोशल स्टेट्स और देवी में इमोशन्स को बालों के ज़रिए दर्शाने वाली महिलाएं. बिहार और पटना म्यूज़ियम से ऐसी पांच मूर्तियों का चयन किया गया और फिर उन मूर्तियों के हिसाब से ही मॉडल्स के बालों की स्टाइलिंग की गई."

इतिहास की पांच महिला पात्रों के रूप में दीदारगंज की यक्षिणी, गुप्त काल की परिचारिका (दासी), पाल कालीन तारा, गुप्त कालीन देवी ब्रह्माणी और मुग़ल रानी मुमताज़ को चुना गया.

देवी ब्रह्माणी

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इमेज कैप्शन, देवी ब्रह्माणी

इन महिला पात्रों का इतिहास देखें तो मौर्यकालीन दीदारगंज की यक्षिणी सौंदर्य का अप्रतिम उदाहरण मानी जाती है. उनके बालों को बहुत कलात्मक ढंग से बांधा गया है और सिर पर बंधे हुए स्कार्फ़ से बालों की कुछ लटें बाहर निकलकर चेहरे पर बिखरी हुई हैं.

एक तरफ यक्षिणी की हल्की झुकी हुई मूर्ति विनम्रता का प्रतीक है, वहीं इस प्रदर्शनी में ब्रह्माणी क्रोध का प्रतीक हैं.

ब्रह्माणी के बाल खुले हैं और हाथ में रक्त का कटोरा है. ब्रह्माणी को सप्त मातृका में से एक माना गया है जो रक्तबीज नाम के राक्षस का संहार करती हैं.

देवी तारा

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देवी की कैटेगरी में पाल काल की देवी तारा को भी शामिल किया गया है.

देवी तारा को हरित तारा भी कहा जाता है.

ये एक बौद्ध देवी हैं जिन्हें वन को बचाने वाली माना गया है.

पटना वीमेंस कॉलेज की छात्रा आंचल प्रिया ने इस प्रदर्शनी में पाल कालीन तारा का रूप धरा है.

आंचल प्रिया ने बताया, "मैं बहुत एक्साइटेड हूं क्योंकि पहली बार मैं तारा देवी के बारे में जान रही हूं. ये भी समझ आ रहा है कि बाल कितना महत्वपूर्ण एक्सप्रेशन रहा है ह्यूमन बॉडी का."

मुमताज़

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डांसिंग गर्ल, स्माइलिंग ब्वॉय और नग्न औरतें

इन सब किरदारों के बीच गुप्तकालीन परिचारिका और मुमताज़ भी हैं.

परिचारिका बहुत बेफ़िक्री से अपना जीवन जीने वाली किरदार हैं.

इस प्रदर्शनी में मौर्यकालीन डांसिंग गर्ल और स्माइलिंग ब्वाय की टेराकोटा की मूर्तियां आकर्षित करती हैं.

ये दोनों ही पटना के बुंलदीबाग से मिली हैं.

डांसिंग गर्ल

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डांसिंग गर्ल के बाल लंबे हैं और वो बहुत घेरदार स्कर्ट पहनकर खड़ी है.

उसके बालों से बीच की मांग निकालकर दो चोटियां गुंथी हुई हैं जिसे कमल और शंख के आकार जैसी वस्तुओं से सजाया गया है.

गांधार कला का प्रभाव लिए इस मूर्ति के वैभव को देखकर ये लगता है कि ये मौर्यकाल की स्थानीय देवी रही होगी.

स्माइलिंग ब्वॉय

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इमेज कैप्शन, स्माइलिंग ब्वॉय

वहीं स्माइलिंग ब्वॉय को देखें तो उसके सर पर बालों का एक बड़ा गुच्छा है और चेहरे पर आकर्षक और सुकून देने वाली मुस्कराहट है.

इसी प्रदर्शनी में पाकिस्तान के मोहनजोदड़ो से कांसे की नृत्यरत कन्या के पेंसिल स्केच हैं.

साथ ही बिहार के बक्सर से मिली पक्की मिट्टी की छोटी मूर्तियां है जिनका केश विन्यास बहुत विस्तृत है.

मोहनजोदड़ो से मिली नृत्यरत महिलाओं के स्केच

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आम औरतों की केश सज्जा

कांसे की नृत्यरत कन्या की बात करें तो ये नग्न हैं. लेकिन हाथ और गले में आभूषण है. उसके लंबे बालों में एक चोटी गुंथी हुई है जो दाएं कंधे पर रखी हुई है.

पटना आने वाले इतालवी यात्री और लेखक निकोलो मनुची ने मुगल इतिहास पर 'स्टोरिया डो मोगोर' किताब लिखी है.

वो इसमें लिखते हैं, "भारतीय रईस स्त्रियां के बाल बहुत अच्छी तरह से गुंथे एवं सुगंन्धित तेल से महकते रहते थे. वे अपने सिर को विविध ढंग और रंग की सोने की चादर से बने कपड़े से ढंकती थीं."

लेकिन रईस महिलाओं से इतर आम महिलाओं के बाल कैसे होते थे?

आम औरतों की केश सज्जा

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पटना कलम

इसका जवाब प्रदर्शनी में लगे 'पटना कलम' के चित्रों में मिलता है.

पटना कलम, अठाहरवीं शताब्दी में विकसित हुई पेन्टिंग की एक शैली है.

इस शैली के ज़रिए अंग्रेजों ने आम भारतीयों के जीवन और उनकी आर्थिक गतिविधियों (जिसे फिरका कहा जाता था) को डाक्यूमेंटेड करवाया.

पटना कलम के इन चित्रों में स्ट्रीट वेंडर और गैर कामकाजी महिलाओं को अपने बालों को पीछे करके उन्हें ढीला बांधे हुए दिखाया गया है.

ये महिलाएं अपने इन ढीले बंधे बालों को अपनी साड़ी के पल्लू से छुपा लेती हैं.

सिर्फ़ एक नट जाति की लड़की की केश सज्जा उसके व्यवसाय के अनुरूप है.

क्या उस वक्त विग भी प्रचलित थी?

प्रोफ़ेसर डेनिला डी सिमोन कहती हैं, "प्राचीन रोम में इस बात के प्रमाण मिलते हैं कि विग का इस्तेमाल होता था और इस विग के लिए भारतीय उपमहाद्वीप से लाए गए बाल इस्तेमाल होते थे. ख़ासतौर पर दक्षिण भारत में रहने वाले लोगों के बालों की अच्छी डिमांड थी."

बाल

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बालों के लिए नई इज़्ज़त

ऐसे में ये सवाल स्वाभाविक है कि जब प्राचीन भारत में बालों की स्टाइलिंग का क्रेज़ महिलाओं में था तो धीरे-धीरे वो कहां ग़ायब हो गया?

पुरातत्वविद् जलज कुमार तिवारी कहते हैं, "पहले महिलाओं की सार्वजनिक जीवन में बहुत भूमिका नहीं थी. ऐसे में पब्लिक डोमेन में उनकी छवि गढ़ने में उनका अपीयरेंस या लुक बहुत महत्वपूर्ण रोल अदा करता था. लेकिन वक्त बीतने के साथ महिलाएं ख़ुद को सार्वजनिक जीवन में मौखिक या अन्य तरीकों से अभिव्यक्त करने लगी. जिसके चलते कॉस्ट्यूम और केश सज्जा का ये मसला सेकेंडरी होता गया."

ऐसे में बहुत संभव है कि अब आप किसी के हेयर स्टाइल को देखेंगे तो सोचेंगे ज़रूर. जैसाकि बिहार सरकार की कला संस्कृति और युवा विभाग की सचिव वंदना प्रेयसी कहती है, "ये प्रदर्शनी देख कर बालों के लिए नई इज़्ज़त पैदा हो गई है."

वीडियो कैप्शन, क्या आप भी चाहती हैं ऐसा हेयर स्टाइल?

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