क्या है लव बॉम्बिंग, कैसे होते हैं लोग इसका शिकार?

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- Author, आदर्श राठौर
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
वे आपसे दिन में कई-कई बार टेक्स्ट मेसेज, ईमेल और फ़ोन कॉल के माध्यम से संपर्क करते हैं. आपकी तारीफ़ में चिकनी-चुपड़ी बातें करते हैं और जताते हैं कि आपसे बढ़कर और कोई नहीं है.
भले ही आपको उनसे मिले कुछ ही दिन हुए होते हैं लेकिन वे कई घंटे आपकी ख़ुशामद और वादे करने में बिता चुके होते हैं.
इस तरह के व्यवहार को ‘लव बॉम्बिंग’ कहा जाता है.
लव बॉम्बिंग और नौकरी
अक्सर ये शब्द डेटिंग के संबंध में इस्तेमाल किए जाते हैं जब कोई रिझाने के लिए तारीफ़ों के पुल बांधता है या फिर ऐसा कुछ करता है कि सामने वाला अहसान मानने लगे.
लेकिन लव बॉम्बिंग रोमांटिक रिश्तों तक सीमित नहीं है. बहुत से लोगों को काम के क्षेत्र में भी इस तरह के व्यवहार से दो चार होना पड़ता है. कई कंपनियां भी अपने यहां ख़ाली पदों के लिए उम्मीदवार तलाशने के दौरान ऐसा व्यवहार करती हैं.
कंपनी रिक्त पदों को भरने के लिए उम्मीदवारों के साथ ऐसा व्यवहार करती हैं जहां पद से जुड़े कामों और ज़िम्मेदारियों वगैरह के बारे में जानकारी देने की बजाय अभ्यर्थियों के अनुभव की तारीफ़ करने और कई तरह के वादे करके उन्हें लुभाने पर ज़्यादा ज़ोर देती हैं.
बेंगलुरु में एक बिज़नेस सॉल्यूशन कंपनी में मैनेजर रोहित पराशर बताते हैं कि पिछली नौकरी में उनके साथ ऐसा ही हुआ था. वह वडोदरा में एक कंपनी में काम करते थे और वेतन न बढ़ने के कारण बदलाव चाहते थे.

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उन्होंने गुरुग्राम की एक कंपनी के लिए इंटरव्यू दिया और चुन लिए गए.
इसी बीच पिछली कंपनी में भी रोहित का वेतन बढ़ गया लेकिन गुरुग्राम की कंपनी के एचआर विभाग से उन्हें कई दिनों तक कॉल करके ऑफ़र स्वीकार करने के लिए मनाया जाता रहा.
रोहित बताते हैं, “मुझे बार-बार बताया गया कि कंपनी न सिर्फ़ अच्छा वेतन दे रही है बल्कि यहां और भी कई सुविधाएं हैं. काम का माहौल अच्छा है, हम कर्मचारियों का बहुत ख़्याल रखते हैं, आपको आपकी प्रोफ़ाइल के अनुरूप काम दिया जाएगा और अच्छे प्रदर्शन के आधार पर वेतनवृद्धि भी होगी.”
लंबी ऊहापोह के बाद आख़िरकार रोहित ने ऑफ़र को स्वीकार कर लिया और वडोदरा छोड़कर गुरुग्राम चले आए.
अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में करियर कोच सैमॉरन सेलिम कहती हैं कि ऐसा व्यवहार अक्सर तब देखने को मिलता है जब लेबर मार्केट में ख़ाली पदों के अनुरूप योग्य अभ्यर्थी उपलब्ध न हों.
सैमॉरन कहती हैं, “ऐसी परिस्थिति में अभ्यर्थी मज़बूत स्थिति में होते हैं जबकि कंपनियों में अच्छी प्रतिभाएं तलाशने की होड़ मची होती है. ऐसे में भर्ती करने वालों की कोशिश होती है कि वे कंपनी को ज़्यादा से ज़्यादा विकल्प उपलब्ध करवाएं. जब उम्मीदवार कम होते हैं तो उन्हें लुभाने के लिए काफ़ी संघर्ष करना पड़ता है.”

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सिर्फ़ अच्छा पक्ष दिखाना
कई बार कंपनियां भी अपने लिए भर्ती करने वालों पर दबाव बनाती हैं कि वे उनकी मज़बूत और सकारात्मक छवि ही दिखाएं.
करियर कोच सैमॉरन सेलिम कहती हैं कि यह किसी रोमांटिक रिश्ते की शुरुआती डेट्स की तरह होता है जहां भर्ती करने वाले अभ्यर्थियों को अपनी कमियों या कमज़ोरियों की बजाय अपना बेहतर पक्ष दिखाना चाहते हैं.
भर्तियां करने वाली वैश्विक कंपनी सिएलो की ब्रिटेन की प्रबंध निदेशक सैली हंटर मानती हैं कि बहुत से भर्ती करने वालों को इस बात का अहसास नहीं होता कि वे लव बॉम्बिंग जैसा व्यवहार कर रहे हैं.
वह कहती हैं, “भर्ती करने वाले लोग आशावादी और बेचने की कला में भी माहिर होते हैं. ऐसे में उनका यह व्यवहार अच्छी भावना के कारण होता है. वे चाहते हैं कि उम्मीदवार को नौकरी भी मिले और वह उसमें ख़ुश भी रहे.”
लेकिन सैली चेताती हैं कि लव बॉम्बिंग जैसे व्यवहार के पीछे कई बार कुछ और कारण भी हो सकते हैं. जब भर्ती करने वाले को किसी थर्ड पार्टी (कंपनी आदि) ने अपने ख़ाली पदों को भरने के लिए नियुक्त किया होता है, तब वह अपने फ़ायदे के लिए अभ्यर्थियों से बहुत बढ़ा-चढ़ाकर बातें कर सकता है.
वह कहती हैं, “अगर भर्ती करने वालों का वेतन कम है और वे भर्ती करने के बदले मिलने वाले कमीशन पर बहुत ज़्यादा निर्भर हैं तो उनकी कोशिश होगी कि किसी भी ख़ाली पद को भरने के लिए ज़्यादा से ज़्यादा अवसर बनाएं. इसके लिए वे अभ्यर्थियों से लव बॉम्बिंग जैसा व्यवहार कर सकते हैं.”

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नुक़सान पहुंचाने वाली ख़ुशामद
आमतौर पर ये सब किसी दुर्भावना से नहीं किया जाता मगर कंपनियों के इरादे जो भी हों, कई बार कर्मचारियों को नुक़सान भी उठाना पड़ता है. कोई उम्मीदवार दबाव में आकर ऐसी नौकरी ले सकता है, जो उसके लिए मुफ़ीद न हो.
ऐसा ही रोहित पराशर के साथ भी हुआ था. अच्छे भविष्य की आस में उन्होंने गुरुग्राम आकर नई कंपनी तो जॉइन कर ली लेकिन पता चला कि तस्वीर बहुत अलग है.
वह बताते हैं, “ग़लती होने पर सीनियर का जूनियर सदस्यों पर चिल्लाना आम था. कॉर्पोरेट जगत में सभी को उनके नाम से बुलाया जाता है लेकिन मैंने देखा कि हमारे मैनेजर इस बात से चिढ़ गए जब मैंने उनके नाम के आगे ‘सर’ नहीं लगाया. टीम में कोई समस्या उभरती थी तो मैनेजर अलग जगह ले जाकर बात करने के बजाय सबके सामने फ़्लोर पर बात करते थे.”
ये माहौल उससे अलग था, जिसका वादा नौकरी का प्रस्ताव देते समय किया गया था.
रोहित कहते हैं कि वह इस परिवेश में ख़ुद को नहीं ढाल पाए और चौथे महीने ही उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया.
इसी तरह अमेरिका की 46 वर्षीय महिला कियर्स्टन ग्रेग्स के साथ हुआ था. वह ख़ुद भी रिक्रूटर हैं यानी कंपनियों के लिए प्रतिभाओं को भर्ती करने के काम से जुड़ी हैं. वह बताती हैं कि वॉशिंगटन डीसी की एक कंपनी में निकली नौकरी को लेकर उन्हें बहुत सब्ज़बाग़ दिखाए गए थे.
ग्रेग्स कहती हैं, “मुझसे कहा गया कि इस फ़ील्ड में आपका बहुत नाम है. मुझे तो सीधे ही नौकरी का प्रस्ताव दे दिया गया था. कहा गया था कि आप घर से काम कर सकती हैं और आपको और भी सुविधाएं मिलेंगी.”
लेकिन भर्ती प्रक्रिया ख़त्म होते ही चीज़ें बदल गईं.
पहले ही दिन मैनेजमेंट ने ग्रेग्स को ऑफ़िस आने को कहा. जब वह दफ़्तर पहुंचीं तो किसी ने उनका स्वागत नहीं किया, किसी ने टीम से उनका परिचय नहीं करवाया. जब उन्होंने मैनेजर से संपर्क किया तो घर से काम करने का वादा टूट गया. उन्हें बताया गया कि यह कंपनी की पॉलिसी नहीं है.
ग्रेग्स वहां का ख़राब वर्क कल्चर देखकर भी हैरान थीं. दफ़्तर में ख़राब भाषा इस्तेमाल की जाती थी. उन्होंने देखा कि एक भर्ती के लिए विकलांग उम्मीदवार से सही व्यवहार नहीं किया जा रहा था. उन्होंने आठ दिन बाद ही नौकरी छोड़ दी.

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मनोबल पर असर
करियर कोच सेलिम कहती हैं कि एक मसला और भी है. कुछ उम्मीदवार कोई ऑफ़र मिलने पर बहुत उत्साहित हो सकते हैं लेकिन बाद में उन्हें नौकरी नहीं दी जाती.
वह बताती हैं, “ऐसा इसलिए होता है क्योंकि कुछ रिक्रूटर बहुत सारे उम्मीदवारों से संपर्क साधकर उन्हें भ्रम में रखे रहते हैं ताकि कंपनियों को अधिक से अधिक विकल्प उपलब्ध हो सकें. ऐसे में अगर वे किसी से कहें कि आप भर्ती प्रक्रिया में बाक़ी अभ्यर्थियों से आगे चल रहे हैं, तो इसका मतलब यह नहीं है कि आपको नौकरी मिल ही जाएगी.”
करियर काउंसलर परवीन मल्होत्रा इसका एक और कारण भी बताती हैं.
वह कहती हैं, “अमूमन ऐसी नौकरियां कम और अभ्यर्थी ज़्यादा होने के कारण होता है. लेकिन कई बार ऐसा भी देखने को मिलता है कि कंपनी ने पहले से ही तय किया होता है कि किस पद पर किसे रखना है. पारदर्शी दिखने के लिए वे विज्ञापन जारी कर देते हैं और भर्ती प्रक्रिया का दिखावा करते हैं..”
लेकिन ऐसा करना न सिर्फ़ किसी उम्मीदवार का मनोबल तोड़ सकता है बल्कि उसका आर्थिक नुकसान भी हो सकता है. हो सकता है कि उसने किसी और कंपनी का जॉब ऑफ़र उस लव बॉम्बिंग करके नौकरी न देने वाली कंपनी के ऑफ़र के लिए ठुकरा दिया हो.

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बचें तो कैसे?
कोई रिक्रूटर कैसे किसी नौकरी तलाशने वाले से पेश आता है, इसका तरीका बदल पाना तो मुश्किल है. लेकिन जब आपको पता है कि लव बॉम्बिंग जैसा व्यवहार किया जा रहा है तो सावधान हो जाना चाहिए.
सैन फ्रैंसिस्को में करियर कोच सैमॉरन सेलिम कहती हैं, “अभ्यर्थियों को संकेतों को पकड़ना चाहिए. भर्ती करते समय अभ्यर्थी के अनुभव और प्रतिभा की तारीफ़ करना असामान्य नहीं है. वैसे भी नौकरी ऑफ़र करते समय सामने वाले को महत्व देना ज़रूरी होता है. मगर अभ्यर्थियों को तब सावधान हो जाना चाहिए जब सामने से बहुत बढ़ा-चढ़ाकर बातें की जा रही हों या फिर पारदर्शिता न अपनाई जा रही हो.”
करियर काउंसलर परवीन मल्होत्रा के मुताबिक़, "कहा जाता है कि ख़रीददारी करते समय ख़रीददार को सावधान रहना चाहिए. यही सिद्धांत नौकरी तलाशने के मामले में भी लागू होता है."
वह कहती हैं, “बहुत बार ऐसा होता है कि कंपनी जो वादे करती है, कर्मचारियों को उसका आधा भी नहीं मिलता. ऐसे में यह ज़िम्मेदारी अभ्यर्थियों पर आ जाती है कि वे कंपनी के बारे में जानकारी जुटाएं. पहले तो यह काम मुश्किल था मगर अब बहुत से कर्मचारी कंपनी छोड़ने पर उसके बारे में ऑनलाइन रिव्यू डालते हैं. ऐसे में यह ऑनलाइन पता किया जा सकता है कि किस कंपनी में कैसा माहौल है, उसकी नीतियां क्या हैं और वह कितने पानी में है.”
यानी लव बॉम्बिंग और इससे होने वाले नुक़सान से बचने का एक ही तरीक़ा है- सावधानी बरतना.
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