प्रताड़ना के बावजूद बच्चों से अलग क्यों नहीं होते माता-पिता

माता-पिता

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    • Author, आदर्श राठौर
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

“परिवार का ऐसा कोई सदस्य नहीं है, जिससे उसने मारपीट न की हो. एक बार उसने अपनी मां को इतनी बुरी तरह पीटा कि उसकी बांह की हड्डी फ्रैक्चर हो गई. मैं रोकने लगा तो मेरे सिर पर डंडे से वार कर दिया.”

शिमला के पास एक गांव में रहने वाले धर्मवीर (बदला हुआ नाम) बताते हैं कि उनका छोटा बेटा शराब पीकर अक्सर हिंसक हो उठता है.

धर्मवीर कहते हैं, “पहले वह ठीक था लेकिन कॉलेज जाने के बाद उसमें बदलाव आने लगा. अक्सर शराब पीकर घर लौटता और हम टोकते तो हंगामा करता. एक बार उसने अपनी मां से पैसे मांगे, उसने देने से इनकार किया तो धक्का देकर गिरा दिया. मुझे पता चला तो मैंने उसे घर से निकल जाने को कहा.”

मगर धर्मवीर ने दो दिन बाद ही एक रिश्तेदार के यहां ठहरे बेटे को वापस बुला लिया था.

वह बताते हैं, “मैंने सोचा था कि बेचारा कहां भटकेगा. कुछ महीनों तक सब ठीक चला मगर फिर हालात ख़राब हो गए. नशा करके वह हमें पीटने लगा. हम शर्म के मारे चुप रहे. न तो उसने पढ़ाई पूरी की और न ही कोई काम पकड़ा.”

“बदनाम इतना हुआ कि उसकी शादी भी नहीं हुई. अब वह 45 साल का हो चुका है और मेरी पेंशन पर आश्रित है. उसके व्यवहार से तंग आकर बड़ा बेटा औह बहू अलग होकर रहने लगे थे.''

''अब हमारी उम्र भी हो चली है. पता नहीं हमारे बाद उसका क्या होगा.”

धर्मवीर जैसे कई माता-पिता हैं जो अपने बच्चों से लगातार मिल रहे तनाव, प्रताड़ना और शोषण से मुक्ति चाहते हैं.

वे जानते हैं कि ख़तरनाक बन चुके इस रिश्ते को तोड़ना ज़रूरी है मगर चाहकर भी ऐसा नहीं कर पा रहे.

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‘अटूट’ बंधन

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माता-पिता और बच्चों के रिश्ते को प्यार का ऐसा अटूट बंधन माना जाता है जो हर सुख-दुख में बना रहता है. मगर कुछ माता-पिता को इस रिश्ते को बनाए रखने में मुश्किलें आ सकती हैं.

कुछ के जीवन में ऐसा दौर भी आता है, जब वे भारी मन से इस नाते को तोड़ने का फ़ैसला कर लेते हैं.

बच्चों द्वारा अपने माता-पिता से बोलचाल बंद करने के मामलों की चर्चा आजकल आम होने लगी है. माता-पिता भी बच्चों से बोलचाल बंद करते हैं मगर कुछ शोध बताते हैं कि ऐसे मामले कम सामने आते हैं.

ब्रितानी सामाजिक संस्था ‘स्टैंड अलोन’ द्वारा 2015 में किए गए अध्ययन के मुताबिक़, बच्चों से अलग हो चुके माता-पिताओं में पांच फ़ीसदी ही ऐसे थे, जिन्होंने ख़ुद से अलग होने का फ़ैसला किया था.

और इन लोगों का कहना था कि इस तरह का फ़ैसला लेना उनके लिए बहुत ही मुश्किल और कष्टदायक था. इस फ़ैसले ने उन्हें अकेलेपन और शर्मिंदगी की तरफ़ भी धकेल दिया था.

लूसी ब्लेक यूनिवर्स्टी ऑफ़ दि वेस्ट इंग्लैंड, ब्रिस्टल में मनोविज्ञान की वरिष्ठ प्रवक्ता हैं और एस्ट्रेन्जमेंट यानी संबंध विच्छेदन की विशेषज्ञ हैं.

वह कहती हैं, “शोध और संस्कृतिक मुख्यधारा, दोनों में ही बच्चों से संबंध तोड़ने वाले माता-पिता कम देखने को मिलते हैं क्योंकि यह एक वर्जित विषय (टैबू) है और लोग आलोचनाओं के डर से इस तरह के अनुभव को साझा करने से बचते हैं.”

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‘ज़िम्मेदारी’ का बोझ

माता-पिता द्वारा अपने बच्चों से रिश्ते तोड़ने के कारण अमूमन वही होते हैं, जिन कारणों से बच्चे अपने माता-पिता से संबंध तोड़ते हैं. जैसे कि पारिवारिक विवाद, नशे की लत, विचारधारा में फ़र्क़ और ख़राब व्यवहार वगैरह. लेकिन बच्चों के मुक़ाबले माता-पिता के लिए इस रिश्ते को तोड़ना आसान नहीं होता.

लखनऊ में क़रीब दो दशक से काउंसलिंग कर रहे मनोवैज्ञानिक राजेश पांडे इसकी वजह बताते हैं कि सामाजिक तौर पर माता-पिता से उम्मीद की जाती है कि वे बच्चों को बिना शर्त प्यार करें और उनकी देखभाल करते रहें.

वह कहते हैं, “माता-पिता बच्चों को जन्म देते हैं, उनकी परवरिश करते हैं. मनोवैज्ञानिक तौर पर उन्हें लगता है कि बच्चे को आगे ले जाना पूरी तरह हमारी ज़िम्मेदारी है. जबकि बच्चे के नज़रिये से देखें तो उसे माता-पिता से हमेशा कुछ न कुछ मिला ही होता है, उसने दिया नहीं होता. ऐसे में वह उतना क़रीब नहीं हो पाता, जितना माता-पिता होते हैं.”

“माता-पिता अपना भविष्य अपने बच्चे के अंदर देखते हैं. जबकि बच्चे जब अपना भविष्य देखते हैं तो उनकी प्राथमिकताएं अलग होती हैं, जैसे कि करियर, पैसा, कामयाबी. माता-पिता भी उनकी प्राथमिकताओं में होते हैं लेकिन वे पहले नंबर पर नहीं होते. लेकिन माता-पिता अक्सर बच्चे को ही सबसे ऊपर रखते हैं.”

संभवत: यही कारण है कि जब बच्चे परेशान कर रहे होते हैं, चोट पहुंचा रहे होते हैं, तब भी माता-पिता उन्हें नहीं छोड़ पाते.

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धर्मवीर और उनकी पत्नी, बेटे के हिंसक व्यवहार के बावजूद उसके साथ रहते हैं. वह कहते हैं कि कई बार अलग होकर बड़े बेटे के पास जाने की योजना बनाई मगर यह सोचकर नहीं गए कि छोटे बेटे का क्या होगा.

ब्रिटेन की केंट यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान की प्रवक्ता जेनिफ़र स्टोरी ने अन्य व्यक्तियों से की जाने वाली हिंसा के विषय का अध्ययन किया है.

वह कहती हैं, “मुझे एक भी मामला ऐसा याद नहीं आ रहा जहां कोई मां या पिता अपने बच्चे से रिश्ता तोड़ना चाहते हों. लगभग सभी चाहते हैं कि प्रताड़ना और शोषण बंद हो जाए मगर रिश्ता बना रहे.”

इस तरह के हालात में माता-पिता, बच्चों और उनके आसपास के लोगों के लिए भी हक़ीक़त को स्वीकार करना आसान नहीं होता.

लूसी ब्लेक कहती हैं, “हम माता-पिता से बहुत ज़्यादा अपेक्षाएं रखते हैं. ठीक भगवान जैसी. हम चाहते हैं कि वे बिना शर्त प्यार करते रहें. लेकिन इससे कई समस्याएं पैदा हो सकती हैं. आप यह उम्मीद करने लगते हैं कि उन्हें हर तरह का व्यवहार स्वीकार करना चाहिए. मानसिक और आर्थिक शोषण भी.”

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सामाजिक ढांचा

अमैंडा हॉल्ट ने किशोरों द्वारा माता-पिता को प्रताड़ित किए जाने पर ‘अडॉलसेंट टु पैरेंट अब्यूज़: करंट अंडरस्टैंडिंग इन रीसर्च, पॉलिसी एंड प्रैक्टिस’ नाम की क़िताब लिखी है.

वह बताती हैं, “आमतौर पर यह माना जाता है कि माता-पिता ही शक्तिशाली होते हैं. लेकिन जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, स्थिति बदलने लगती है. लोगों को इस बात का एहसास नहीं हो पाता कि बच्चे भी माता-पिता को प्रताड़ित कर सकते हैं या इस हद तक कर सकते हैं कि रिश्ता ही तोड़ना पड़े. यह भी एक कारण है कि माता-पिता नाता तोड़ने का फ़ैसला लेने से हिचकते हैं.”

अमैंडा हॉल्ट के मुताबिक़, बच्चों के साथ माता-पिता के जैविक, क़ानूनी और सामाजिक बंधन होते हैं. अगर आप बोलचाल बंद कर दें, तब भी ये बंधन बने रहते हैं. इन्हें तोड़ना बहुत मुश्किल होता है.

मनोवैज्ञानिक राजेश पांडे कहते हैं, “भारत में शायद एक लाख में एक-दो पैरेंट्स ही ऐसे होंगे जो बच्चे से अलग हो पाए होंगे क्योंकि हमारी संस्कृति और समाज में इसे पाप की तरह देखा जाता है. हमारा सामाजिक ढांचा इसे स्वीकार नहीं करता.”

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सकारात्मक माहौल ज़रूरी

अक्सर बच्चों की कामयाबी और नाकामयाबी को उनके माता-पिता से जोड़ा जाता है. ऐसे में अगर ऐसे बच्चे से रिश्ता तोड़ने की नौबत आ जाए, तब वे शर्म महसूस करते हैं और ख़ुद को क़ुसूरवार मानने लगते हैं.

इससे वे अकेलेपन का शिकार हो सकते हैं और अपने मित्रों, यहां तक सगे संबंधियों से भी दूरी बना सकते हैं.

लूसी ब्लेक कहती हैं, “बच्चों से अलगाव उनके जीवन के कई पहलुओं को प्रभावित कर सकता है. नाता तोड़ने की पहल करने वाले माता-पिता के पास ऐसे लोग बहुत कम होते हैं, जो उनके प्रति समझ और सहानुभूति दिखा सकें. यह एक अलग तरह का कष्ट है क्योंकि उन्हें लग सकता है कि उनका जीवन ख़ाली और निरर्थक हो गया है. नतीजतन वह परिवार के अन्य सदस्यों और दोस्तों से भी नाता तोड़ सकते हैं.”

विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे रिश्तों से बाहर निकलने वाले माता-पिताओं के लिए समाज में ऐसा वातावरण तैयार करना ज़रूरी है, जहां वे अकेला महसूस न करें. खासकर त्योहारों या जन्मदिन जैसे ख़ास मौक़ों पर. ‘स्टैंड अलोन’ का शोध भी कहता है कि अलग रह रहे लोग इन दिनों ज़्यादा भावुक महसूस करते हैं.

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