प्रेम विवाह से पहले क्या माता-पिता की अनुमति लेना ज़रूरी होना चाहिए?

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- Author, सुशीला सिंह और जय शुक्ला
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
क्या प्रेम विवाह से पहले माता-पिता की रज़ामंदी लेना अनिवार्य बनाया जाना चाहिए?
इस मामले में समाज दो मतों में बँटा हुआ नज़र आता है.
जहाँ एक पक्ष का मानना है कि शादी जैसे 'पवित्र' बंधन में बंधने से पहले माता-पिता से अनुमति और आशीर्वाद लेना चाहिए, क्योंकि वही बच्चे का पालन-पोषण करते हैं.
वहीं दूसरा पक्ष ये तर्क देता है कि लड़का और लड़की जब बालिग हैं, तो वे अपने निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र होते हैं.
प्रेम विवाह से पहले अनुमति लेने का मामला अब गुजरात से निकलकर देशभर में चर्चा का विषय बन रहा है.
मामला क्या है?
दरअसल राज्य के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने पाटीदार समुदाय के एक कार्यक्रम में रविवार को कहा , ''संविधान के दायरे में रहकर सरकार प्रेम विवाहों में अभिभावकों की सहमति को अनिवार्य बनाने की संभावना पर विचार कर रही है.''
मेहसाणा ज़िले में आयोजित छात्रों के समारोह में उन्होंने कहा कि इधर आने से पहले राज्य के स्वास्थ्य मंत्री ऋषिकेश पटेल ने उन्हें शादी के लिए लड़कियों के भागने के मामलों का अध्ययन करने का सुझाव दिया ताकि प्रेम विवाह के लिए अभिभावकों की सहमति को अनिवार्य बनाने की दिशा में कुछ किया जा सके.

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बीजेपी के तर्क
बीबीसी से बातचीत में बीजेपी की प्रवक्ता श्रद्धा राजपूत कहती हैं- हम किसी जाति या धर्म के ख़िलाफ़ नहीं हैं लेकिन हम ये नहीं चाहते कि किसी भी तरह से महिला के सशक्तीकरण पर असर पड़े.
वो कहती हैं , ''राज्य में ये देखा गया है कि लड़के, स्कूल और कॉलेज में पढ़ने वाली लड़कियाँ जो अच्छे खानदान से भी आती हैं, उनकी मैपिंग करते हैं. फिर झूठी पहचान और जानकारी देकर उनसे शादी कर लेते हैं.''
इन मामलों में देखा गया है कि ऐसे लड़कों की आर्थिक स्थिति काफ़ी कमज़ोर होती है और उनकी निगाह केवल लड़की की जायदाद पर होती है.
वो कहती हैं कि गुजरात एक प्रगतिशील राज्य है लेकिन गृह मंत्रालय के सामने कई शिकायतें आ रही हैं और इस बारे में आँकड़े भी एकत्रित किए गए हैं.
उन्होंने कहा कि कितनी ही एफ़आईआर 'लव जिहाद' के मामलों में हुई है.
श्रद्धा राजपूत के अनुसार, ''हम चाहते हैं कि हमारी लड़कियाँ पढ़े लिखें और सशक्त बनें. हम नहीं चाहते वो हमारी लड़कियों को ले जाकर मारें, पीटें और उनका धर्मान्तरण करें. अगर वो हमारी बेटियों को पीछे धकेलेंगे तो हम उन्हें ऐसा नहीं करने देंगे. हम अपनी बेटियों को वापस लाएँगे और उसका पुनर्वास करेंगे.''
इससे पहले 18 मई को गुजरात के मोरबी में गृह मंत्री हर्ष संघवी ने एक बयान में कहा था, ''अगर कोई सलीम, सुरेश बनकर हमारी भोलीभाली बेटियों को फँसाएगा तो उनका भाई बनकर मैं यहाँ आया हूँ. वहीं अगर कोई सुरेश, सलीम बन कर प्रेम करे तो वो भी ग़लत है.''
उन्होंने कहा था कि ऐसी कोई शिकायत आएगी तो उसे गंभीरता से लिया जाएगा.
इस बयान के बाद भी राज्य में विवाद हुआ था.

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विपक्ष का क्या कहना
राज्य में कांग्रेस के प्रवक्ता मनीष दोशी के अनुसार किसी ग़ैर मुद्दे को मुद्दा बनाना बीजेपी की फ़ितरत है.
वे कहते हैं कि कांग्रेस पार्टी संविधान को मानती है और व्यवस्था में यक़ीन करती है.
उनके अनुसार, ''बीजेपी ख़ुद को राष्ट्रवादी पार्टी मानती है लेकिन वो लोगों के मन में मोहब्बत की बजाए अलगाव पैदा करके राजनीति करती है.चुनाव के आसपास उसे राम याद आते हैं, हिंदू-मुस्लिम का मुद्दा बनाकर कर वो ध्रुवीकरण की राजनीति करती है और उसका फ़ायदा उठाती है.''
लेकिन कांग्रेस पार्टी के जमालपुर के खाडिया सीट से राज्य के एकमात्र मुस्लिम विधायक इमरान खेडावाला इससे इतर राय रखते हैं.
वे कहते हैं कि सरकार इस मामले में मॉनसून सत्र में विधेयक लेकर आती है, तो वो उसका समर्थन करेंगे.
इमरान खेडावाला कहते हैं उनके पास कई माता-पिता ऐसी शिकायत लेकर आते हैं, जहाँ लड़कियाँ भाग जाती हैं और बाद में पता चलता है कि उन्होंने शादी कर ली.
वे बीबीसी से बातचीत में कहते हैं, ''इस मामले में मैं बीजेपी का लव जिहाद का एजेंडा नहीं देखता. चाहे लड़की हिंदू हो या मुस्लमान हर माँ-बाप अपनी बच्चे के लिए भला चाहते हैं इसलिए शादी के लिए माता-पिता की अनुमति ज़रूरी की जाए और संविधान में देखा जाए कि ये कैसे संभव होगा.''
इसी बात को आगे बढ़ाते हुए पाटीदार नेता और विश्व उमिया धाम के प्रमुख आरपी पटेल कहते हैं कि गुजरात में ये देखा जा रहा है कि जाति और धर्म के बाहर शादियाँ ज़्यादा हो रही हैं.
प्रेम विवाह में सामाजिक सरंचना टूट जाती है क्योंकि नए रीति रिवाज निभाना आसान नहीं होता वहीं समाज के ताने भी सहने पड़ते हैं.
ऐसे मामलों में लड़की के लिए मुश्किल होती है, जहाँ वो जाती है वहाँ समझौता करती हैं और आगे जाकर आत्महत्या करती हैं.
वहीं वे बीजेपी की प्रवक्ता श्रद्धा राजपूत की बात पर सहमति जताते हुए कहते हैं कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत लड़कियों को संपत्ति में जो हिस्सा मिलता है ऐसे लड़कों की संपत्ति लेने की कोशिश होती है और ऐसा षडयंत्र शुरू हो गया है.

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लेकिन क्या संविधान में बदलाव हो सकता हैं?
भारतीय क़ानून के मुताबिक़ शादी के लिए लड़की की उम्र 18 साल और लड़के की उम्र 21 साल होना अनिवार्य बताया गया है.
वहीं क़ानून ये कहता है कि ऐसे में लड़का और लड़की चाहें किसी धर्म, जाति के हों, वो शादी कर सकते हैं.
अगर उनके धर्म अलग हैं तो वो स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत शादी का रजिस्ट्रेशन करा सकते हैं.
इसके लिए उन्हें इस रजिस्ट्रेशन कार्यालय के बाहर 30 दिन का नोटिस लगाना होता है ताकि अगर किसी को कोई आपत्ति हो तो वो आकर बता सके.
इसके बाद ऐसे मामलों में दो गवाहों के समक्ष शादी का रजिस्ट्रेशन हो जाता है.
आरपी पटेल कहते हैं कि अगर कोई प्रेम विवाह कर ही रहा है, तो खुलकर बताए और परिवार की सहमति से ऐसा करे.
साथ ही वे सुझाव देते हैं कि जब भी शादी का रजिस्ट्रेशन होता है तो माता-पिता को विटनेस के तौर पर बुलाया जाना अनिवार्य बना देना चाहिए.
ताकि माता-पिता को सही समय पर पता चल जाए कि लड़का कौन है. अगर लड़का सही है तो शादी की अनुमति दे दी जाए.
संविधान के जानकार फ़ैजान मुस्तफ़ा बीबीसी से बातचीत में कहते हैं, ''अगर लड़का और लड़की एक दूसरे को पसंद करते हैं और शादी करने का फ़ैसला कर लेते हैं तो ऐसे मामलों में माँ-बाप की कोई भूमिका नहीं रह जाती. बशर्ते वो शादी करने की क़ानूनी उम्र को ध्यान में रखकर ऐसा कर रहे हों.''
भारतीय संविधान के अनुसार भारत के नागरिकों को कई अधिकार दिए गए हैं-
- अनुच्छेद 19 में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है.
- अनुच्छेद 21 में व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार
- स्वतंत्र और गौरवपूर्ण जीवन जीने का अधिकार
क़ानून के जानकार राजेंद्र शुक्ल कहते हैं, ''संविधान में हर व्यक्ति को अधिकार दिए गए हैं और शादी के मामले में अगर ऐसी दख़लअंदाज़ी होती है तो ये मूल अधिकारों का हनन होगा.''

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राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश
साथ ही वे कहते हैं कि सत्ताधारी पार्टी चुनावों के मद्देनज़र इसे राजनीतिक का मुद्दा बनाना चाह रही है.
उनके अनुसार, ''बीजेपी ऐसे मुद्दे उठाकर लोगों की भावनाओं को भड़काना चाह रही है. देश में बेरोज़गारी, क़ानून-व्यवस्था के अहम मुद्दों से ध्यान भटकाना चाहती है और यूसीसी लाने की कोशिश भी इसी दिशा में उठाया गया क़दम है.''
वरिष्ठ पत्रकार दिलीप गोहिल कहते हैं कि राज्य सरकार प्रेम विवाह को लेकर जिस तरह की बयानबाज़ी कर रही है वो न व्यावहारिक है और न ही आधुनिक युग में संभव है.
उनके अनुसार, ''पहले बचपन में शादी हो जाती थी, वहीं ज़्यादातर अरेन्जड मैरिज होती थी. लेकिन हाल के वर्षों में प्रेम विवाह का चलन बढ़ा है. राज्य सरकार ऐसे मुद्दे उठाकर भावनाएँ भड़काना चाहती है और इसका लाभ लेना चाहती है.''
आपको याद होगा कि साल 2021 में गुजरात धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम में संशोधन किया था और विवाह के लिए जबरन या फ़र्जी तरीक़े से धर्मांतरण को दंडनीय अपराध बनाया था.
संशोधित अधिनियम के तहत दोषियों को 10 साल की कारावास की सज़ा देने का प्रावधान किया था.
इस संशोधन के बाद ये मामला काफ़ी तूल पकड़ा था.
हालांकि बाद में गुजरात हाई कोर्ट ने इस अधिनियम की विवादित धाराओं के अमल पर रोक लगा दी थी.
अब इस फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है और मामला अदालत में विचाराधीन है.
इस मामले पर सुझाव देते हुए गुजरात यूनिवर्सिटी में पत्रकारिता विभाग की हेड सोनल पंड्या कहती हैं कि भारत में केवल 2 प्रतिशत अंतरजातीय विवाह होते हैं इनमें से आधे में माता-पिता की सहमति होती है.
ऐसे में इस मामले में क़ानून नहीं बल्कि काउंसलिंग की ज़्यादा ज़रूरत है.
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