सरोगेसी से पिता बनने वाले एक व्यक्ति की कहानी

सरोगेसी से पिता बने प्रीतेश दवे अपने जुड़वां बच्चों के साथ
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    • Author, जय शुक्ल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

प्रीतेश दवे की किस्मत में सरकारी नौकरी नहीं थी. इसी वजह से उनकी शादी नहीं हो पाई.

लेकिन उन्हें बच्चे बहुत पसंद हैं और वो बिना शादी किए भी परिवार बढ़ाना चाहते थे. ऐसे में उन्होंने सरोगेसी का सहारा लेने का निर्णय किया.

वो संभवत: बिना शादी के जुड़वां बच्चों के सिंगल फ़ादर (एकल पिता) बनने वाले चंद आख़िरी लोगों में से एक हैं.

आज वो एक बेटे और एक बेटी की परवरिश कर रहे हैं. दोनों बच्चे एक साल के होने वाले हैं. प्रीतेश दवे ख़ुशकिस्मत रहे कि नया सरोगेसी क़ानून लागू होने से कुछ दिन पहले ही वो सरोगेट फ़ादर बने, वरना अब ऐसा करना उनके लिए मुमकिन नहीं होता.

सरोगेट पिता बनने के पीछे की वजह?

प्रीतेश की मां दादी बनकर खुश हैं
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प्रीतेश 37 साल के हैं और सिंगल हैं. वह कहते हैं कि उनके पास कई लड़कियों के रिश्ते आते थे, लेकिन जब उन्हें पता लगता कि उनके पास सरकारी नौकरी नहीं है तो लड़कियां मना कर देती थीं.

आर्थिक रूप से अच्छे होने के बावजूद उनकी शादी नहीं हो पा रही थी. वो ज़्यादा पढ़े-लिखे भी नहीं हैं. उन्होंने सिर्फ 12वीं तक ही पढ़ाई की है. वो कहते हैं कि एक ये वजह भी थी उन्हें शादी के लिए लड़की ना मिलने की.

बीबीसी गुजराती से बात करते हुए प्रीतेश दवे कहते हैं, ''मेरे समाज में ऐसे कई पुरुष हैं, जिन्हें शादी के लिए लड़कियां नहीं मिलीं, क्योंकि माता-पिता अपनी बेटियों की शादी सरकारी नौकरी वाले युवाओं से करना पसंद करते हैं. हमारे पास ज़मीन और संपत्ति है, लेकिन यह उनके लिए महत्वपूर्ण नहीं है. उनके लिए केवल सरकारी नौकरी अहम है”

प्रीतेश के पिता भानुशंकर दवे के मुताबिक़, “हमारी जाति में ‘साटा’ प्रथा है. इसका मतलब है एक बेटी देना और दूसरी लेना. काफ़ी तलाश करने पर भी प्रीतेश के लिए लडकी नहीं मिल पाई.”

प्रीतेश, भावनगर में एक राष्ट्रीयकृत बैंक के लिए ग्राहक सेवा केंद्र चलाते हैं. उनके माता-पिता सूरत में रहते हैं.

वो सूरत और भावनगर के बीच आते-जाते रहते थे. इस बीच उन्हें अकेलापन महसूस होता था और वह शादीशुदा न होते हुए भी पिता बनना चाहते थे, इसलिए उन्हें कुछ लोगों ने सरोगेसी का सुझाव दिया.

प्रीतेश दवे कहते हैं, "मैं सरोगेसी के ज़रिए पिता बनने पर गौरवान्वित हूं और अपने आपको भाग्यशाली भी मानता हूं क्योंकि अब नए क़ानून के मुताबिक़, मेरे जैसा अविवाहित पुरुष सरोगेसी के ज़रिए पिता नहीं बन सकता. "

अहमदाबाद के बांझपन विशेषज्ञ और प्रीतेश के सरोगेसी सलाहकार डॉक्टर पार्थ बाविसी कहते हैं, ''उन्हें शादी न कर पाने का अफ़सोस है. वो एक भरा-पूरा परिवार चाहते थे. इसलिए वो अपनी ये इच्छा लेकर मेरे पास आए.”

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प्रीतेश के लिए पिता बनने का क्षण महत्वपूर्ण था. प्रीतेश कहते हैं, “जब वो दोनों बच्चे मेरी दुनिया में आए तो मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं था. मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मैं हंसू या रोऊं. शुरुआत में वो कमज़ोर थे तो उन्हें इनक्यूबेटर में रखा गया. जब पहली बार मैंने उन्हें गोद में उठाया तो वो मेरी ज़िंदगी का सबसे अच्छा पल था. मैं उसे बयां नहीं कर सकता.”

डॉक्टर पार्थ बाविसी बताते हैं, ''तब प्रीतेश को देखकर ऐसा लगा जैसे उन्हें दुनिया की सारी ख़ुशियां मिल गईं. ऐसा लग रहा था मानो वो यक़ीन ही नहीं कर पा रहे थे कि वो पिता बन चुके हैं.”

प्रीतेश के पिता भानुशंकर दवे और मां दिव्यानी दवे दादा-दादी बनने की ख़ुशी से फूले नहीं समा रहे हैं.

भानुशंकर कहते हैं, ''बच्चों के बिना घर बड़ा सूना सा लगता था. अब मानो ये पूरा घर ख़ुशी की रोशनी से जगमगा उठा है. कुदरत की कृपा से घर में बेटी और बेटा दोनों ही आ गए.”

प्रीतेश की मां दिव्यानी दवे भी कहती हैं, ''इन दोनों के आने से हमें एक अनमोल ख़ज़ाना मिल गया है. मेरी दादी बनने की तमन्ना भी पूरी हो गई. और भाई को बहन और बहन को भाई मिल गया. ''

परिवार ने बेटे का नाम धैर्य और बेटी का नाम दिव्या रखा है.

प्रीतेश के पिता भानुशंकर दवे अपने पोते धैर्य के साथ
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‘शादी ना होने का अफ़सोस नहीं’

प्रीतेश का कहना है कि उन्हें बच्चे होने के बाद शादी ना करने का कोई अफ़सोस नहीं है.

क्या पसंद की लड़की मिलने पर वो शादी करना चाहेंगे? ये पूछने पर प्रीतीश कहते हैं, “धैर्य और दिव्या के आने के बाद, मैं अब शादी नहीं करना चाहता. मुझे नहीं पता कि मेरी भावी पत्नी बच्चों की देखभाल ठीक से करेगी या नहीं तो मैं अकेला ही उनकी देखभाल करके ख़ुश हूं. अब मेरे जीवन का एक ही लक्ष्य है- अपने बच्चों का अच्छे से पालन-पोषण करना."

भानुशंकर दवे कहते हैं, “हमारा पोते-पोतियों के साथ खेलने का सपना पूरा हो रहा है.”

दिव्यानी दवे कहती हैं, ''इन दोनों को पालने में हमारा समय कहां निकल जाता है, पता ही नहीं चलता. दोनों लड़के-लड़की में हमें फ़र्क नहीं पड़ता. दोनों मेरे प्रिय हैं.”

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सरोगेसी क्या है?

सरोगेसी

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कई महिलाएं प्रजनन संबंधी समस्याओं, गर्भपात या उच्च जोखिम वाली गर्भधारण के कारण गर्भधारण नहीं कर पाती हैं. या कई अपनी इच्छा से गर्भ धारण नहीं करना चाहतीं.

ऐसे में सरोगेसी का विकल्प उनके लिए फ़ायदेमंद है. यानी जब कोई दंपती बच्चा पैदा करने के लिए किसी दूसरी महिला की कोख का सहारा लेता है. इसमें अंडे की मदद लेने से लेकर इस दूसरी महिला के द्वारा दंपत्ति के बच्चे को जन्म देने तक की पूरी प्रक्रिया को सरोगेसी कहा जाता है.

डॉक्टक पार्थ बाविसी कहते हैं, “प्रीतेश के शुक्राणु एकत्र किए गए और एक महिला के अंडे (जिनकी पहचान गुप्त रखी गई है) एकत्र किए गए. फिर आईवीएफ के ज़रिए भ्रूण तैयार किया गया और सरोगेट मां के गर्भ में प्रत्यारोपित किया गया.

“हमने जीवित रहने की संभावना बढ़ाने के लिए दो भ्रूण प्रत्यारोपित किए. लेकिन दोनों भ्रूण विकसित हुए और जुड़वाँ बच्चे पैदा हुए.”

इस सरोगेसी में एक महिला अपने या किसी अन्य दाता की मदद से इस जोड़े के लिए गर्भवती हो जाती है या जोड़े की महिला के अंडे के माध्यम से, दाता या जोड़े के पुरुष के शुक्राणु की मदद से गर्भवती हो जाती है. जो महिला किसी दूसरे के बच्चे को अपनी कोख में पालती है उसे सरोगेट मदर कहा जाता है.

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सरोगेसी के प्रकार

सरोगेसी दो प्रकार की होती है. पारंपरिक सरोगेसी और गर्भकालीन सरोगेसी.

पारंपरिक सरोगेसी- जिसमें पिता या दाता के शुक्राणु का मिलन सरोगेट मां के अंडों से किया जाता है.

फिर डॉक्टर कृत्रिम रूप से शुक्राणु को सीधे सरोगेट महिला के गर्भाशय ग्रीवा, फैलोपियन ट्यूब या गर्भाशय में इंजेक्ट करता है. सरोगेट मां के गर्भ में भ्रूण का निर्माण होता है और फिर सरोगेट मां उस भ्रूण को नौ महीने तक अपने गर्भ में रखती है. इस मामले में सरोगेट मां ही बच्चे की जैविक मां होती है.

यदि इस मामले में पिता के शुक्राणु का उपयोग नहीं किया गया है, तो पुरुष दाता के शुक्राणु का उपयोग किया जा सकता है. यदि दाता के शुक्राणु का उपयोग किया गया था, तो पिता आनुवंशिक रूप से बच्चे से संबंधित नहीं होता है.

गर्भकालीन सरोगेसी- इस सरोगेसी में, सरोगेट मां आनुवंशिक रूप से बच्चे से संबंधित नहीं होती है.

यानी जेस्टेशनल सरोगेसी में सरोगेट मां के अंडों का इस्तेमाल नहीं किया जाता है. वह सिर्फ़ बच्चे को जन्म देती है. इस मामले में सरोगेट मां बच्चे की जैविक मां नहीं है. जेस्टेशनल सरोगेसी में पिता के शुक्राणु और मां के अंडे को मिलाकर सरोगेट मां के गर्भाशय में प्रत्यारोपित किया जाता है.

इसमें आईवीएफ विधि से भ्रूण का निर्माण किया जाता है और सरोगेट मां के गर्भाशय में प्रत्यारोपित कर दिया जाता है.

इस प्रकार, आईवीएफ का उपयोग पारंपरिक सरोगेसी में भी किया जाता है.

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हालाँकि, पारंपरिक सरोगेसी में कृत्रिम गर्भाधान (IUI) विधि का उपयोग किया जाता है. आईयूआई एक बेहद आसान मेडिकल प्रक्रिया है, जिसमें सरोगेट मां को तमाम तरह के टेस्ट और इलाज से नहीं गुजरना पड़ता है. पारंपरिक सरोगेट मां के अंडे का उपयोग किया जाता है, इसलिए जो महिला बच्चा चाहती है उसे अंडा पुनर्प्राप्ति प्रक्रिया की परेशानी से नहीं जूझना पड़ता है.

भारत में सभी आईवीएफ केंद्रों में जेस्टेशनल सरोगेसी अधिक प्रचलित है क्योंकि पारंपरिक सरोगेट मां बच्चे की जैविक मां होती है, जिस पर विवाद होने का ख़तरा रहता है.

जेस्टेशनल सरोगेसी को भी दो भागों में बाँटा गया है

एक है परोपकारी सरोगेसी और दूसरी है व्यावसायिक सरोगेसी.

  • परोपकारी सरोगेसी- जब कोई जोड़ा किसी सरोगेट महिला को अपने साथ रहने के लिए आमंत्रित करता है. सरोगेट महिला कोई रिश्तेदार या अजनबी हो सकती है. इस मामले में, दंपती सरोगेट मां का सारा खर्च वहन करता है.
  • व्यावसायिक सरोगेसी- जिसमें सरोगेट मां को बच्चे को जन्म देने के लिए मुआवजा दिया जाता है. नए क़ानून के मुताबिक़ अब कमर्शियल सरोगेसी पर रोक लग गई है.

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सिंगल पुरुष क्यों नहीं बन सकता सरोगेट फ़ादर

नए सरोगेसी क़ानून, सरोगेसी (विनियमन) अधिनियम, 2021 के अनुसार, केवल विवाहित जोड़े ही सरोगेसी का सहारा ले सकते हैं.

कोई भी अकेला पुरुष सरोगेसी का लाभ नहीं उठा सकता. एकल महिलाएं ज़रूर अब भी इसका लाभ उठा सकती हैं लेकिन केवल तभी जब वो तलाकशुदा या विधवा हों और उनकी उम्र 35 से 45 वर्ष के बीच हो.

समलैंगिक व्यक्तियों को भी सरोगेसी इस्तेमाल करने की मनाही है. जानकार बताते हैं कि पहले ऐसा नहीं था. फ़िल्म निर्माता करण जौहर और अभिनेता तुषार कपूर सरोगेसी की मदद से ही सिंगल पिता बने.

गुजरात की बेबी फैक्ट्री कहे जाने वाले आणंद शहर में सरोगेसी के लिए क्लीनिक चलाने वाली डॉक्टर नैना पटेल कहती हैं, ''क़ानून का यह प्रावधान पुरुष के प्रजनन के अधिकार का उल्लंघन करता है.''

डॉक्टर पार्थ बाविसी ने भी इस पर अपना विरोध जताते हुए कहा, ''आज प्रीतेश जैसे कई पुरुष होंगे जो पसंद का जीवनसाथी ना मिलने के कारण शादी नहीं करेंगे. तो पिता होने की उनकी भावनाओं का क्या होगा? यदि आप भारत में लिंगानुपात को देखें, तो महिलाओं की संख्या पुरुषों की संख्या से कम है. ऐसे मामलों में पुरुषों की पितृत्व की भावनाओं का सम्मान किया जाना चाहिए.”

हालाँकि, देश भर की विभिन्न अदालतों में क़ानून के उस प्रावधान को चुनौती देते हुए कई याचिकाएँ दायर की गई हैं, जिसके तहत एकल पुरुष और एकल महिलाएँ सरोगेसी के माध्यम से बच्चे पैदा नहीं कर सकते हैं.

यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन है. इंडियन सोसायटी फॉर असिस्टेड रिप्रोडक्शन के पूर्व अध्यक्ष डॉक्टर मनीष बैंकर कहते हैं, “हालांकि विभिन्न अदालतों में मामलों की सुनवाई हो रही है, क़ानून अब भी लागू है. सरकार ने कोर्ट में अपना पक्ष रखा है और सरकार के जवाब से ऐसा लग रहा है कि सरकार इस मामले पर कोई समझौता करने को तैयार नहीं है.”

बता दें कि 5 अप्रैल, 2023 को द प्रिंट में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट में दायर एक याचिका के जवाब में सरकार ने सरोगेसी के नए प्रावधानों को "सामाजिक, और नैतिकता का संयोजन बताया था. और इन सख्त प्रावधानों में ढील देने से इनकार कर दिया था.

सरोगेसी

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क्या है नया सरोगेसी क़ानून?

नए क़ानून के मुताबिक़, केवल निःसंतान दंपती ही सरोगेसी का लाभ उठा सकते हैं.

उनकी उम्र 25 से 50 के बीच होनी चाहिए. उनका कोई बच्चा नहीं होना चाहिए और न ही उन्होंने कोई बच्चा गोद लिया हो.

कोई महिला सरोगेसी का लाभ तभी उठा सकती है, जब वह विधवा या तलाकशुदा हो और उसकी उम्र 35 से 45 साल के बीच हो.

क़ानून किसी विधवा या तलाकशुदा महिला को सरोगेसी के लिए अपने अंडे दान करने की अनुमति देता है. हालांकि, उसकी उम्र 35 से 45 साल के बीच होनी चाहिए.

जो दंपती सरोगेसी के तहत बच्चा पैदा करना चाहते हैं, उन्हें सरोगेसी के लिए एक विशेष सरकारी मेडिकल बोर्ड से संपर्क करना पड़ता है. बोर्ड की मंज़ूरी के बाद ही सरोगेसी की प्रक्रिया आगे बढ़ सकेगी.

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एक बार जब दंपती और सरोगेट ने अपना पात्रता प्रमाणपत्र प्राप्त कर लिया, तो वे सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी (एआरटी) से संपर्क कर सकते हैं.

सरोगेट महिलाओं और दंपतियों को अपना आधार कार्ड लिंक कराना होगा ताकि इस सिस्टम में शामिल लोगों के बायोमेट्रिक्स का रिकॉर्ड रहे. अगर आने वाले दिनों में कोई सवाल उठे तो इस रिकॉर्ड की मदद से उनका समाधान किया जा सकता है.

क़ानून का उल्लंघन करने वालों को 10 साल तक की जेल और 25 लाख रुपये का जुर्माना हो सकता है.

अगर दंपती की मृत्यु बच्चे के जन्म से पहले हो जाती है तो बच्चे के भरण-पोषण की ज़िम्मेदारी दंपती द्वारा नामित व्यक्ति पर होगी. यह ज़िम्मेदारी सरोगेट मां की नहीं है.

एकता

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सेलेब्रिटीज़ जिन्होंने लिया सरोगेसी का सहारा

बॉलीवुड एक्ट्रेस प्रियंका चोपड़ा और उनके पति निक जोनस सरोगेसी की मदद से माता-पिता बने हैं.

बॉलीवुड अभिनेत्री प्रीति जिंटा और उनके पति जीन गुडइनफ भी सरोगेसी के ज़रिए जुड़वा बच्चों के मां-बाप बने. शिल्पा शेट्टी भी सरोगेसी की मदद से बेटी समिशा की मां बनीं.

फ़िल्म निर्माता करण जौहर सिंगल फादर हैं जो सरोगेसी के ज़रिए पिता बने हैं. 2017 में वो जुड़वां बच्चों के पिता बने. एकता कपूर भी सरोगेसी के सहारे सिंगल मदर बनीं.

एक्ट्रेस लीसा रे भी सरोगेसी की मदद से मां बनीं. सनी लियोनी ने पहले दो बच्चों को गोद लिया था बाद में वो सरोगेसी की मदद से दो बच्चों की मां बनीं.

शाहरुख़ ख़ान और गौरी ख़ान भी सरोगेसी की मदद से 2013 में माता-पिता बने. उनके बेटे का नाम अबराम है.

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