बस एक बच्चा... क्या इसका चलन बढ़ रहा है?

- Author, फ़ातिमा फ़रहीन
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
अमेरिका और यूरोप के देशों में एक बच्चे का चलन बढ़ा है लेकिन क्या भारत में भी ऐसा है?
क्या आपने कभी किसी से ये सवाल किया है कि ‘आप कितने भाई-बहन हैं?’
अगर हाँ तो आपके कानों को इस जवाब की आदत होगी कि हम दो भाई-बहन हैं या हम तीन या चार भाई-बहन हैं.
आपके साथ ये बहुत कम बार हुआ होगा कि आपने ये सुना हो कि मेरा सिर्फ़ एक ही बच्चा है या फिर मैं ‘सिंगल चाइल्ड’ हूं.
लेकिन अगर आप अमेरिका या यूरोप के किसी देश में रहते हैं तो ‘सिंगल चाइल्ड’ होने की बात सुनना आपके लिए बहुत मामूली सी बात होगी.
जी हां, दरअसल अमेरिका और यूरोप के कई मुल्कों में हाल के कुछ सालों में ‘वन चाइल्ड एंड डन’ यानी एक बच्चा और बस हो गया का ट्रेंड देखने को मिला है.
इन देशों में ज़्यादातर शादीशुदा लोग एक से ज़्यादा बच्चा पैदा करने से बचना चाहते हैं.
कनाडा के ओंटारियो की रहने वाली 31 वर्षीय जेन डाल्टन चार बच्चे चाहती थीं और इसके लिए उन्होंने पूरी तैयारी भी कर ली थी.
लेकिन 2018 में उनकी बेटी के जन्म के ठीक दो महीने बाद जेन और उनके पति ने यह फ़ैसला किया कि उनके लिए एक बच्चा बस काफ़ी है यानी वो ‘वन चाइल्ड एंड डन’ की नीति अपनाएंगे.
लेकिन डाल्टन अकेली नहीं हैं जिन्होंने ऐसा फ़ैसला किया है.
यूरोप में बच्चे वाले परिवार में 49% परिवार ऐसे हैं जिन्हें एक बच्चे हैं. वहीं कनाडा में, एक ही बच्चे वाले परिवार का समूह सबसे बड़ा है, जो 2001 में 37% से बढ़कर 2021 में 45% हो गया है.
2015 में 18% अमेरिकी महिलाओं के सिंगल चाइल्ड थे, जबकि 1976 में केवल 10 फ़ीसद महिलाओं को एक ही बच्चा था.

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एक बच्चे के पक्ष में दलील
‘वन एंड औनली: द फ़्रीडम ऑफ़ हैविंग एन औनली चाइल्ड’, और ‘द जॉय ऑफ़ बीइंग वन’ जैसी किताबों की लेखक और खोजी पत्रकार लॉरेन सैंडलर कहती हैं कि वो अपने बच्चे को लेकर दीवानी थीं, लेकिन उन्हें अपना करियर भी बहुत पसंद था. इसीलिए उन्हें लगा कि केवल एक बच्चा होना सबसे बेहतर रास्ता है.
एक स्टडी के मुताबिक़ अमेरिका में दो बच्चों को पालने में औसतन क़रीब तीन लाख डॉलर ख़र्च होते हैं जिसमें कॉलेज की ट्यूशन फ़ीस शामिल नहीं है.
यूके में एक बच्चे को पालने में क़रीब दो लाख डॉलर ख़र्च होते हैं. ऑस्ट्रेलिया में एक लाख सात हज़ार डॉलर.
कनाडा के कैलगेरी में रहने वाले 25 साल के विक्टोरिया फ़ाहे को जलवायु परिवर्तन की भी चिंता है. फ़ाहे कहती हैं, “संसाधानों के लिए लड़ाई होगी और मैं नहीं चाहती कि मेरे बच्चे को कभी इस बात की चिंता हो कि पानी कहां से मिलेगा.”
वहीं ऐसे फ़ैसले लेना का कारण आर्थिक भी है.
यूरोप में बच्चा होने के बाद महिलाओं के वेतन में औसत 3.6 फ़ीसद की गिरावट देखी गई है.
अमेरिका जैसे देश में भी एक स्टडी में देखा गया है कि बिना बच्चे की महिला वर्कर और दो या तीन बच्चे की मां के वेतन में क़रीब 13 फ़ीसद का अंतर है.
इंग्लैंड के कॉर्नवॉल की रहने वाली 33 वर्षीय लॉरा बेनेट कहती हैं कि एक बच्चे के कारण वो एक अच्छी पार्टनर बन पाती हैं. उनका तर्क है कि एक बच्चे के कारण वो बड़े आराम से दोस्तों के साथ वीकेंड पर या छुट्टियों के दौरान घूमने जाती हैं...और जब उनके पार्टनर भी अपने दोस्तों के साथ जाते हैं तो उन्हें इस पर कोई एतराज़ नहीं होता है...

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सामाजिक दबाव
86 देशों पर आधारित एक स्टडी में यह भी देखा गया कि पहले बच्चे के एक साल तक माता-पिता बहुत ख़ुश थे...लेकिन दूसरे बच्चे के बाद उनकी ख़ुशियां आधी हो जाती हैं और तीसरे के बाद तो कोई ख़ुशी है ही नहीं.
हालाँकि, कई देशों में, अब सिर्फ़ एक ही बच्चा करने का चलन बन रहा है, फिर भी एक से अधिक बच्चे पैदा करने का समाजिक दबाव बना रहता है.
ज़्यादातर पैरेंट्स का कहना है कि उन पर परिवार के सदस्यों से लेकर सड़क चलते अजनबी लोगों तक से एक से अधिक बच्चे पैदा करने के लिए दबाव डाला जाता है.
जो माता-पिता यह विकल्प चुनते हैं उन्हें लोगों को और यहां तक कि ख़ुद को भी यह विश्वास दिलाना पड़ता है कि उन्होंने ऐसा कर के सही काम किया है.

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भारत में क्या है स्थिति
राजधानी दिल्ली से सटे नोएडा में रहने वाली और एक मीडिया कंपनी में काम करने वाली सबीहा ख़ान (नाम बदला हुआ) को सिर्फ़ एक ही बच्चा है और यह उनका सोच समझकर लिया गया फ़ैसला है.
बीबीसी से बातचीत में वो कहती हैं, “एक बच्चे का फ़ैसला वक़्त की ज़रूरत है.” उनके अनुसार, इसमें उनके पति और परिवार के सभी लोगों की रज़ामंदी शामिल है.
वो कहती हैं, “हमारा मानना है कि हमें अपने बच्चे को अच्छी शिक्षा, उस पर ज़्य़ादा ध्यान और उसकी अच्छे से परवरिश करनी चाहिए.”
उनका अपना परिवार तो उनके और उनके पति के इस फ़ैसले में साथ है लेकिन रिश्तेदारों की राय में एक से ज़्यादा बच्चा होना चाहिए. लेकिन सबीहा का मानना है कि अगर आप और आपके पति किसी फ़ैसले में साथ हैं तो बाक़ी दुनिया की ज़्यादा फ़िक्र नहीं करनी चाहिए.
हालांकि सबीहा मानती हैं कि कभी-कभी दूसरे बच्चे का ख़याल आता है लेकिन वो अपने फ़ैसले पर क़ायम हैं. वो ना केवल अपने फ़ैसले पर क़ायम हैं बल्कि एक बच्चे की वकालत भी करती हैं.
वो कहती हैं, “मुझे लगता है कि काम-काजी माता-पिता को इस बारे में सोचना चाहिए. हालांकि यह हर किसी का निजी मामला है लेकिन फिर भी यह हमारी पीढ़ी की ज़रूरत है. हमें अपने लाइफ़स्टाइल को मैनेज करने की ज़रूरत है और इसलिए हमें एक बच्चे को बढ़ावा देना चाहिए.”

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तो क्या सबीहा ख़ान का फ़ैसला कोई ट्रेंड है?
नेशनल लॉ स्कूल ऑफ़ इंडिया यूनिवर्सिटी, बेंगलुरु में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर डॉ अमृता नंदी को नहीं लगता है कि भारत में लोग एक बच्चे पैदा करने के बारे में सोच रहे हैं.
'मदरहुड एंड चॉइस: अनकॉमन मदर्स, चाइल्डफ़्री विमेन' किताब लिखने वाली डॉ नंदी ने बीबीसी से बातचीत में कहा, “कुछ लोग ज़रूर हैं जो ऐसा कर रहे हैं लेकिन उनकी संख्या बहुत छोटी सी है. उनमें उच्च वर्ग, पढ़े लेखे पेशेवर लोग शामिल हैं. और वो विश्वास और प्रैक्टिस के मामले में किसी बड़े पैटर्न की नुमाइंदगी नहीं करते हैं.”
वो आगे कहती हैं, “भारतीय, दूसरे एशियाई लोगों की तरह, सिर्फ़ बच्चा पैदा करने के बारे में नहीं सोचते हैं. बल्कि वे एक से अधिक बच्चों के होने को बेहतरी का संकेत मानते हैं. वो एक से ज़्यादा बच्चे को माता-
पिता और भाई-बहनों के लिए भावनात्मक और वित्तीय सुरक्षा के स्रोत के रूप में देखते हैं.”
वो कहती हैं कि भारत में दो-बच्चे की नीति को ही लागू करना एक कठिन काम रहा है, ऐसे में इसलिए एक-बच्चे की नीति तो ज़्यादातर भारतीय लोगों के लिए सख़्त नाराज़गी की वजह हो सकती है.

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दो बच्चों की चाहत
इसी बात को और विस्तार से समझाते हुए पॉपुलेशन फ़ाउंडेशन ऑफ़ इंडिया की कार्यकारी निदेशन पूनम मुत्तरेजा कहती हैं, “नेशनल फ़ैमिली हेल्थ सर्वे (एनएफ़एचएस) 2019-2021 के आंकड़ों के मुताबिक़ 15 से 49 के बीच महिला और पुरुष दोनों ही 2.1 बच्चा चाहते हैं जिसका मतलब है साफ़ है कि भारत में औसतन लोग दो बच्चे चाहते हैं.”
एनएफ़एचएस-5 के आंकड़ों का हवाला देते हुए पूनम मुत्तरेजा कहती हैं कि 35 साल से ज़्यादा उम्र के शादी शुदा जोड़े जिनका एक बच्चा है, अब वो और बच्चा नहीं चाहते हैं. हालांकि कम उम्र के शादी शुदा जोड़े एक से ज़्यादा बच्चे चाहते हैं.
डॉ मुत्तरेजा के अनुसार अभिजात वर्ग के कई लोग सिर्फ़ एक बच्चा चाहते हैं लेकिन यह कोई ट्रेंड हो इसको साबित करने के लिए आंकड़े समर्थन नहीं करते हैं.
हालांकि डॉ मुत्तरेजा कहती हैं कि आने वाले दिनों में हो सकता है कि भारत में भी एक बच्चे का चलन बढ़ जाए क्योंकि उनके अनुसार जो इंटरनेशनल ट्रेंड होते हैं, वो इंडिया में कुछ देर बाद आते हैं.
लेकिन क्या एक बच्चे का ट्रेंड भारत के लिए बेहतर होगा, इस पर पूनम मुत्तरेजा कहती हैं कि वो कभी भी एक बच्चे की पॉलिसी का समर्थन नहीं करती हैं. वो चीन और जापान का हवाला देते हुए कहती हैं कि वहां आज काम करने वाले लोगों की कमी हो गई है और बुज़ुर्गों की देखभाल करने वाला कोई नहीं है.
भारत में एक मुद्दा और अहम है. अगर ज़्यादा लोग एक बच्चे पैदा करने का फ़ैसला करते हैं तो कुछ वर्षों के बाद भारतीय संयुक्त परिवार की संस्था ख़त्म हो जाएगी. बच्चों को चाचा-चाची, मामा-मामी और अपने कज़न्स मिलेंगे ही नहीं.
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