गर्भ निरोधक गोली लेने के फ़ायदे और नुक़सान क्या हैं?

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- Author, सुशीला सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
अमेरिका में अब महिलाएं बिना डॉक्टर के पर्चे के गर्भ निरोध की दवाएं या ओरल कॉन्ट्रासेप्टिव पिल ले सकती हैं.
इस बारे में हाल ही में अमेरिका के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने घोषणा की कि गर्भ निरोध की ये दवा ओपिल हर उम्र की महिला ले सकती है.
ओपिल का कहना है कि साल 2024 की शुरुआत में फार्मेसी की दुकानों पर उनकी दवाएं मिलने लगेंगी.
अमेरिका समेत दुनिया के 100 ऐसे देश हैं, जहाँ दवाओं की दुकान पर गर्भ निरोध की दवाएं मिल सकती हैं.
इन देशों की फेहरिस्त में लातिन अमेरिका, चीन, ब्रिटेन के अलावा भारत भी शामिल है.
अमेरिका में महिला विशेषज्ञों का कहना है कि गर्भनिरोध की इन दवाओं को लेकर महिलाओं ख़ासतौर पर किशोर लड़कियों में शर्म या स्टिग्मा होता था, लेकिन अब वो दूर होगा. साथ ही प्रजनन से जुड़ी स्वास्थ्य सेवाएं लेने में उन्हें जो परेशानियां आती थीं, उसमें भी मदद मिलेगी.
नेशनल लाइब्रेरी ऑफ़ मेडिसिन पर छपी जानकारी के मुताबिक़ मेडिसिन के इतिहास में हज़ारों की संख्या में दवाएं विकसित की गईं लेकिन 1950 में गर्भ निरोध दवाओं के विकास के बाद बड़ा बदलाव किया.
इसी पर लिखी जानकारी के अनुसार, इससे महिलाओं को न केवल आज़ादी दी बल्कि प्रजनन की स्वायत्तता भी दी.

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भारत में परिवार नियोजन
स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय पर छपी जानकारी के मुताबिक़ भारत दुनिया का पहला ऐसा देश है जिसने साल 1952 में राष्ट्रीय परिवार नियोजन कार्यक्रम की शुरुआत की थी.
कार्यक्रम के लागू होने के बाद बड़े पैमाने पर इसका विस्तार हुआ. इसके तहत सरकार की तरफ से स्वास्थ्य केंद्रों में गर्भ निरोध दवाएं और कंडोम मुफ़्त भी दिए जाते हैं, वहीं आशा कार्यकर्ता भी इन्हें लोगों तक पहुंचाने का काम करती है.
स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ एसएन बसु बताती हैं, ''भारत में गर्भ निरोध दवाएं, परिवार नियोजन का एक प्रभावी तरीक़ा है. अगर सही तरीक़े से दवाएं ली जाएं तो ये सौ प्रतिशत रोकथाम करती हैं. वहीं इसने महिलाओं को इस बात की आज़ादी दी कि वे एक बच्चे के बाद दूसरा बच्चा कब चाहती हैं.''
गर्भ निरोध दवाओं में या तो दोनों हार्मोन इस्ट्रोजन और प्रोजेस्ट्रोन होते हैं, जिसे सीओसी भी कहा जाता है वहीं दूसरी में केवल प्रोजेस्ट्रोन ही होता है, उन्हें पीओपी कहा जाता है.
दिल्ली स्थित अमृता अस्पताल में स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ प्रतिमा मित्तल कहती हैं कि पहले जो ओरल कॉन्ट्रासेप्टिव या गर्भ निरोध होते थे उनमें इस्ट्रोजन की मात्रा ज़्यादा होती थी जिसके दुष्प्रभाव भी होते थे लेकिन अब ये बहुत कम मात्रा में होती है.
उन्हीं की बात को आगे बढ़ाते हुए मुंबई में स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ सुचित्रा देलवी कहती हैं कि महिलाओं के शरीर में इस्ट्रोजन और प्रोजेस्ट्रोन दोनों ही हार्मोन होते हैं और गर्भ निरोध में इन्हीं हार्मोन का इस्तेमाल होता है जिसका शरीर पर अलग-अलग असर होता है.


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गर्भ निरोधक का प्रभाव
इन तीनों डॉक्टरों का कहना है कि गर्भ निरोध लेने का कोई बड़ा दुष्प्रभाव नहीं होता लेकिन सीओसी और पीओपी लेने से महिलाओं के शरीर पर कुछ प्रभाव ज़रूर पड़ते हैं.
इन डॉक्टरों का कहना है कि जिन दवाओं में इस्ट्रोजेन हार्मोन होता है वो उन महिलाओं की मदद करता है जिन्हें ब्लड क्लॉट की बीमारी हो, दिल की बीमारी, उच्च रक्तचाप बहुत ज़्यादा रहता हो.
जिन दवाओं में प्रोजेस्ट्रोन होता है, उसे इस्तेमाल करने वाली महिलाओं को जी मिचलाना, सिर दर्द, अनियमित माहवारी और चक्कर आना जैसी दिक्कतें हो सकती हैं.
इन डॉक्टरों का कहना है कि इन दवाओं को देने से पहले ये देखा जाता है कि कहीं किसी महिला में किडनी, लिवर, कैंसर जैसी बीमारी तो नहीं है.
डॉक्टरों का कहना है कि इन गर्भ निरोधक दवाओं को लेने से महिलाओं पर अलग-अलग असर हो सकते हैं जिनमें से मुख्य ये हैं
इन दवाओं से शरीर पर होने वाले असर
- शरीर में पानी जमा होना
- शरीर में भारीपन महसूस होना
- मुंहासे बढ़ने का ख़तरा
- स्तन में भारीपन होना
- मूड स्विंग्स होना

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डॉ प्रतिमा मित्तल बताती हैं कि गर्भ निरोध को लंबे समय तक लिया जा सकता है और इसके ज़्यादा दुष्प्रभाव नहीं होते.
डॉ सुचित्रा देलवी जो कि महिला अधिकारों के मुद्दों को भी खुलकर उठाती हैं, वे कहती हैं, ''अगर कोई महिला धूम्रपान करती है और वो गर्भ निरोध ले रही हैं जिसमें इस्ट्रोजन हो तो उससे उन्हें ब्लड क्लॉटिंग हो सकती हैं वहीं अगर दवा में प्रोजेस्ट्रोन हो तो उससे प्रभाव नहीं पड़ता है.''
वहीं डॉक्टरों का कहना है कि अलग-अलग महिलाओं के स्वास्थ्य परिस्थिति के मुताबिक इसके सेवन से कुछ फ़ायदे भी होते हैं.
गर्भ निरोधक के फ़ायदे

- सबसे अहम, गर्भ निरोध से परिवार नियोजन कर सकते हैं
- माहवारी को नियमित करने में मदद
- माहवारी के दौरान होने वाली हैवी ब्लीडिंग को कम करने में मदद
- ओवरियन कैंसर की आशंका कम होती है
डॉ प्रतिमा मित्तल कहती हैं कि ऐसी भ्रांति है कि इस दवा को लेने से कैंसर का ख़तरा बढ़ जाता है बल्कि ऐसा नहीं है.
डॉ सुचित्रा देलवी कहती हैं कि इसका मतलब ये कतई नहीं है कि अगर रोज़ आप ये दवाएं ले रहे हैं तो ये हार्मोन आपके शरीर में जमा हो रहा हैं बल्कि लिवर के ज़रिए ये शरीर के बाहर निकल जाते हैं.
डॉ कहते हैं कि अगर बिना किसी सुरक्षा के संबंध बनाए जाते हैं तो वहां 120 घंटों के भीतर आईपिल लेने की सलाह दी जाती है जिससे गर्भधारण होने की आशंका कम हो जाती है.
वहीं आईपिल में भी प्रोजेस्ट्रोन इस्तेमाल होता है और उसकी मात्रा ज़्यादा होती है.
महिलाओं पर ही बोझ क्यों?
जानकार मानते हैं कि गर्भ निरोध की दवाओं ने महिलाओं को परिवार नियोजन की स्वतंत्रता तो दी लेकिन फिर इसकी ज़िम्मेदारी भी उन्हीं पर पड़ने लगी जो ज़्यादातर महिलाएं अभी तक उठा रही हैं.
ऐसा नहीं है कि पुरुषों के लिए गर्भ निरोध के साधन नहीं है.
वहीं सरकार के परिवार नियोजन कार्यक्रम के तहत गर्भ निरोध गोलियों के साथ-साथ कंडोम भी दिए जाते हैं लेकिन आंकड़ा देखें तो इसका इस्तेमाल कम ही होता है.
डॉक्टरों के अनुसार पुरुषों के लिए बेशक निरोध के साधन कम हैं जिसमें कंडोम और नसबंदी शामिल हैं.
लेकिन दोनों को लेकर मिथक जुड़े हुए हैं जैसे कंडोम के इस्तेमाल को लेकर जहां ये सोच बरकरार है कि इससे यौन सुख कम होता है तो वहीं नसबंदी को लेकर उन्हें शरीर में कमज़ोरी होने का डर रहता है जिसका विपरीत असर महिलाओं पर पड़ता है.
इन डॉक्टरों की राय है कि हालांकि सरकार की तरफ़ से कई जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं ताकि इन मिथकों को दूर किया जा सकते , पुरुषों की सोच में बदलाव भी आया है लेकिन उसका प्रतिशत काफी कम है.
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