सिकेल सेल एनीमिया:आदिवासियों में क्यों ज़्यादा होती है ये बीमारी
सुशीला सिंह
बीबीसी संवाददाता

ख़ून की कमी या एनीमिया के कारण होने वाली थकान , चिड़चिड़ापन आदि समस्या के बारे में आपने ज़रूर सुना होगा लेकिन क्या आप ख़ून से ही सबंधित सिकल सेल एनीमिया या बीमारी के बारे में जानते हैं?
दरअसल सिकल सेल एनीमिया एक अनुवांशिक बीमारी होती है. हर साल 19 जून को वर्ल्ड सिकल सेल अवेयरनेस डे मनाया जाता है.
22 साल की स्वाति इसी बीमारी से ही पीड़ित हैं.
गुजरात के तापी ज़िले के एक गांव में रहने वाली स्वाति के परिवार के सभी सदस्य सिकल सेल बीमारी से पीड़ित हैं.
वे बीबीसी से बातचीत में कहती हैं कि मेरे परिवार के सभी पांच सदस्यों में ये बीमारी है और उन्हें सातवीं या आठवीं कक्षा में ये पता चला कि उन्हें सिकल सेल बीमारी है.
उनके अनुसार, ''जब मैं छोटी थी तो मेरे हाथ-पांव में दर्द होता था और साल में एक बार अस्पताल में भर्ती होना पड़ता था और ख़ून चढ़ाना पड़ता था. मेरी दो साल से दवा चल रही है जिसकी वजह से अब मुझे अस्पताल में भर्ती नहीं होना पड़ा है.''
स्वाति के पिता विजय गामित इसी बात को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं कि इस बीमारी की वजह से उनपर आर्थिक बोझ पड़ रहा है और कई बार रिश्तेदारों के सामने इलाज के लिए हाथ भी फैलाना पड़ता है जिसकी वजह से शर्मिंदगी भी महसूस होती है.

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स्वाति गुजरात के जिस इलाके में रहती हैं वो आदिवासी बहुल ज़िला है.
भारत के जनजातीय कार्य मंत्रालय के मुताबिक़ ये बीमारी आदिवासी आबादी में ज़्यादा पाई जाती है वहीं अनुसूचित जनजाति में 86 में से एक को जन्म से ही सिकल सेल बीमारी होती है.
ये बीमारी लाल रक्त कोशिकाओं में मौजूद हिमोग्लोबिन पर प्रभाव डालती है जो शरीर में ऑक्सिजन ले जाने का काम करता है.

लेकिन इसके सही से काम न करने पर बीमारियां होने और मौत होने की आशंका बढ़ जाती है.
इस बीमारी के बारे में हेमेटोलॉजिस्ट डॉ भार्गव कहते हैं कि हर व्यक्ति के रक्त में लाल रक्त कोशिकाएं होती हैं जो आकार में गोल, लचीली और नर्म होती हैं. लेकिन जब ये बीमारी होती है तो वो अंग्रेज़ी के अक्षर सी (सिकल या हंसिया) का आकार ले लेती है. और वो धमनियों में अवरोध पैदा करती है.
वे समझाते हुए बताते हैं, ''इसके बाद सिकल सेल ख़त्म होने लगते हैं जिससे लाल रक्त कोशिकाएं कम होने लगती हैं और उसका असर शरीर को मिलने वाले ऑक्सिजन पर पड़ता है. जिससे कई तरह की समस्याएं और बीमारियां होती हैं.''
सिकल सेल बीमारी से होने वाली समस्याएं

आदिवासी बहुल इलाक़े में बीमारी का कारण
विश्व स्वास्थ संगठन के अनुसार नाइजीरिया और कांगो के बाद भारत तीसरा ऐसा देश है जहां सिकल सेल एनीमिया के सबसे ज़्यादा मामले हैं.
वहीं भारत के आदिवासी बहुल इलाकों में लोग ज़्यादा इस बीमारी से पीड़ित होते हैं.
साल 2011 की जनगणना के मुताबिक़ भारत की आबादी में 8.6 प्रतिशत हिस्सा आदिवासियों का है.
केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की तरफ़ से आदिवासियों के स्वास्थ्य पर बनी विशेष समिति ने दस विशेष बीमारियों की सूची में सिकल सेल को भी शामिल किया है.

शोध में ये भी पाया गया है सिकल सेल एनीमिया के मामले उन रिहायशी इलाक़ो में अधिक हैं जहां मलेरिया की समस्या रही है.
डॉ अतुल देसाई कहते हैं, ''साधारण शब्दों में अगर समझें तो मेडिकल शोध ये बताते हैं कि हज़ारों साल पहले जो लोग जंगल के इलाक़ों में रहते थे उनमें मलेरिया के मामले अधिक होते थे. लेकिन बार-बार मलेरिया होने की वजह से उनकी इस बीमारी के ख़िलाफ़ प्रतिरोधक क्षमता भी विकसित हुई.''
''इससे जेनेटिक लेवल पर केमिकल में बदलाव हुए जिससे शरीर में ख़ामी आई और सिकल सेल शरीर में बनने लगे.''

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आदिवासियों तक सीमित नहीं रही बीमारी
पिछले 32 साल से तापी ज़िले में आदिवासियों में सिकल सेल एनीमिया और उनके पोषण पर काम कर रहे आयुर्वेद के डॉ अतुल देसाई कहते हैं कि हालांकि अब ये बीमारी केवल आदिवासियों तक ही सीमित नहीं है.
फोर्टिस अस्पताल में हेमेटोलॉजिस्ट डॉ राहुल भार्गव के आदिवासियों में सिकल सेल बीमारी के अधिक मामले होने का एक और कारण बताते हैं.
उनके अनुसार, ''आदिवासी समुदाय आपस में ही शादी कर लेते हैं ऐसे में वही जीन यानी अगर मां या पिता दोनों में सिकल सेल ट्रेट (लक्षण) या बीमारी हो तो वो बच्चे में ट्रांसफ़र हो जाती है. यानी जीन का पूल वहीं घूमता रहता है."
साथ ही वे कहते हैं, ''अब लोग नौकरी की तलाश में एक राज्य से दूसरे राज्यों में भी जाते हैं. ऐसे में आबादी का प्रवासन हो रहा है और जब ऐसे ही अंतरराजीय शादियां होंगी तो दो लोगों के जीन का भी प्रवासन होगा ऐसे में ये अब आदिवासियों की ही दिक्कत नहीं बल्कि शहरी लोगों में भी सिकल सेल एनीमिया के मामले सामने आ रहे हैं.''

सरकार का मिशन
इस साल (2023-24) के बजट में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा था कि सरकार साल 2047 तक सिकल सेल एनीमिया को ख़त्म करने के लिए एक मिशन के तहत काम करेगी.
वहीं नेशनल सिकल सेल डिज़ीज़ कंट्रोल प्रोग्राम के तहत लोगों के बीच सिकल सेल बीमारी के प्रति जागरूकता लाने और बड़े पैमाने पर इसकी स्क्रीनिंग कराने की बात भी मिशन में कही गई है.
डॉक्टर ये सलाह देते हैं कि जैसे शादी से पहले जन्म पत्री मिलाई जाती है वैसे ही ब्लड पत्री बनवा ली जाए तो पता चल जाएगा कि महिला या पुरुष में किसे सिकल सेल ट्रेट या बीमारी है.
डॉ राहुल भार्गव कहते है, ''शादी के बाद महिला गर्भवती होती है तो 9-12 हफ़्ते के बीच जांच करा लेनी चाहिए. अगर जांच में आता है कि महिला में सिकल सेल ट्रेट है तो प्रेग्नेंसी में कोई दिक्कत नहीं है लेकिन अगर वो बीमारी निकलती है तो गर्भपात कराना ही सही फ़ैसला होता है.''
डॉक्टर कहते हैं कि अगर ऐसे बच्चे को जन्म दिया जाता है तो उसे काफ़ी परेशानी हो सकती है इसलिए गर्भपात ही करा लेना चाहिए.
किस तरह अपना ध्यान रखें?
केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के अनुसार जो लोग सिकल सेल बीमारी से पीड़ित हैं उन्हें ज़्यादा से ज़्यादा पानी (कम से कम 10-15 ग्लास) पीना चाहिए.
- हर दिन फॉलिक एसिड की गोली(5 मिली ग्राम) लेनी चाहिए
- मादक पदार्थों के सेवन से बचें
- संतुलित आहार लें
- उल्टी दस्त लगने पर डॉक्टर से संपर्क करें
- हर तीन महीने में हिमोग्लोबिन और श्वेत रक्त कोशिकाओं की संख्या की जांच करवाएं
(नीरव कंसारा के इनपुट के साथ)
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