मोटापे की समस्या क्या इन दवाओं से हल हो सकती है? - दुनिया जहान

इमेज स्रोत, Getty Images
जून 2023 में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ने देश में मोटापे की समस्या सुलझाने के लिए एक शुरुआती योजना यानी पायलट प्रोजेक्ट की घोषणा की. इस योजना पर 4 करोड़ पाउंड खर्च होंगे.
उन्होंने कहा कि देश के लोगों में ओबेसिटी यानी मोटापा घटाने के लिए नवीनतम दवाओं के इस्तेमाल से बड़ी सफलता मिल सकती है.
इसमें से एक दवा की मांग तो अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में अभी से आसमान छू रही है.
सोशल मीडिया पर भी अटकलों का बाज़ार गर्म है कि हॉलीवुड के कौन से सितारे इस दवा के इस्तेमाल से मोटापा घटा रहे हैं? मगर यह सबके लिए नहीं है.
इस सप्ताह दुनिया जहान में हम यह समझने की कोशिश करेंगे कि क्या दवाओं के इस्तेमाल से मोटापे की समस्या हल हो सकती है?

इमेज स्रोत, Getty Images
मोटापा एक ग्लोबल समस्या
डॉ. दिशा नारंग अमेरिका के इलिनॉय राज्य के नॉर्थ वेस्टर्न वेकफॉरेस्ट अस्पताल के ओबेसिटी मेडिसिन विभाग की निदेशक हैं.
वो कहती हैं कि आजकल वज़न घटाने के लिए ओज़ेंपिक नाम की दवा का इस्तेमाल काफ़ी प्रचलित हो रहा है.
उन्होंने कहा कि यह दवा मुख्य तौर पर मधुमेह या डाइबिटीज़ के इलाज के लिए बनाई गई थी. यह जीएलपी1 एगॉनिस्ट की कैटेगरी में आती है.
जीएलपी1 हमारे शरीर के भीतर पाया जाने वाला एक हार्मोन होता है. इस दवा के इस्तेमाल से यह हार्मोन बेहतर तरीके से काम करता है.
इस ट्रीटमेंट से शरीर में ब्लड शुगर के स्तर को नियंत्रित करने में मदद मिलती है. लेकिन यह दूसरे काम भी करता है.
डॉ. नारंग कहती हैं, “ओज़ेंपिक पिछले एक दो सालों में बहुत लोकप्रिय हुई है क्योंकि इससे वज़न घटाने में भी मदद मिलती है. यह टाइप 2 डाइबिटीज़ को नियंत्रित करती है और साथ ही उस हार्मोन को भी जिसकी वजह से हमें भूख महसूस होती है. इसके इस्तेमाल से मरीज़ों में शुगर तो कम होती है और बार बार कुछ खाने की इच्छा भी कम हो जाती है.”
ब्रिटेन में मोटापा घटाने के लिए जिस पायलट स्कीम की घोषणा की गई है उसमें वीगोवी और ओज़ेंपिक का इस्तेमाल किया जाएगा.
डॉ. दिशा नारंग का कहना है कि यह दोनों दवाएं सेमाग्लूटाइड ही हैं जिसका इस्तेमाल टाइप 2 डाइबिटीज़ के इलाज के लिए होता है. ये दोनों दवाएं एक ही तरह से काम करती हैं. सेमाग्लूटाइड से इलाज के बाद दोबारा वज़न बढ़ने को भी रोका जा सकता है.
अमेरिका ने दी इस दवा को मंज़ूरी
हालांकि वो आगाह करती हैं कि “यह ऐसा इलाज नहीं है कि झटपट आपका वज़न चार या पांच किलो घट जाएगा. कई लोग लंबे समय तक मोटापा कम करने के लिए जूझते रहते हैं. कई बार वज़न घट भी जाए तो कुछ समय बाद वह फिर बढ़ जाता है.”
अमेरिका में औषधि और खाद्यान्नों के नियंत्रण संबंधी संस्था यूएस फ़ूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने जून 2021 में विगोवी को मोटापे के इलाज के लिए मंज़ूरी दे दी थी.
डॉ. नारंग कहती हैं कि ओबेसिटी की समस्या दुनिया भर में है. 2030 तक अमेरिका में लगभग 13 करोड़ लोग ‘ओबीस’ कैटेगरी में आ जाएंगे. यह केवल फिट दिखने की चाहत नहीं है बल्कि एक न्यूरो-होर्मोनल बीमारी है.
किसी अन्य बीमारी की तरह इसके इलाज के लिए भी लंबे समय तक दवा लेने की ज़रूरत है. अमेरिका में यह दवा पाने के लिए कुछ मापदंड निर्धारित किए गए हैं.
ये दवा उन्हें दी जाती है जिनका बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई) कम से कम 27 हो और साथ ही मोटापे की वजह से होने वाली कोई बीमारी हो.
मिसाल के तौर पर उन्हें डाइबिटीज़, दिल की बीमारी या हाई ब्लड प्रेशर की बीमारी हो या फिर मरीज़ को कोई बीमारी ना हो लेकिन उसका बीएमआई इंडेक्स 30 से अधिक हो.
यह सब होने के बावजूद कई मरीज़ों को यह दवा नहीं मिल पाती क्योंकि यह बेहद महंगी है.
दवा की क़ीमत और डोज़
मरीज़ को इस दवा का एक इंजेक्शन हर सप्ताह लेना होता है.
डॉ. दिशा नारंग बताती हैं कि कई बीमा कंपनियां अपने प्लान में इसे कवर नहीं करतीं. एक महीने के इलाज यानी इस दवा के 4 इंजेक्शन की क़ीमत 1300 डॉलर है. दूसरी समस्या इसकी उपलब्धता की भी है.
डॉ. दिशा नारंग ने बताया कि पिछले एक दो सालों में इस दवा की मांग काफ़ी बढ़ गई है. और इसकी एक वजह सोशल मीडिया पर इसकी चर्चा भी है. मांग ज़्यादा है और सप्लाई बहुत कम है.
सोशल मीडिया पर लोग अटकलें लगा रहे हैं कि किस सेलेब्रेटी ने इस दवा के इस्तेमाल से अपना कायापलट किया होगा. हॉलीवुड के कौन से सितारे इसका इस्तेमाल कर रहे होंगे.
टिकटॉक पर हैशटैग ओज़ेंपिक को एक अरब से अधिक व्यूज़ मिले हैं जबकि हैशटैग वीगोवी को 50 करोड़ से ज्यादा बार देखा गया है.
डॉ. दिशा नारंग कहती हैं कि दवा की किल्लत से डाइबिटीज़ और मोटापे से जूझ रहे मरीज़ों को समय पर दवा मिलने में दिक्कत हो रही है.
कैसे पैदा होती है दवाओं की किल्लत
यूरोप की दवा उत्पादक कंपनियों के एसोसिएशन मेडिसिन्स फॉर यूरोप के महानिदेशक एड्रियन वैन होवेन का कहना है कि दवा कंपनियां मांग के आधार पर उत्पादन की मात्रा तय करती हैं. कई बार यह अनुमान ग़लत होते हैं और दवाओं की किल्लत हो जाती है.
होवेन ने बताया कि ज़्यादातर दवाओं के निर्माण में कोई कंपनी एक नया रासायनिक या जैविक सबस्टेंस बनाती है और परीक्षण कर देखती है कि वो किसी बीमारी की रोकथाम में कारगर है.
अगर वह सबस्टेंस असरदार होता है तो उसका इस्तेमाल कर दवा बनाई जाती है और उसका परीक्षण किया जाता है.
इसके बाद इस्तेमाल की मंज़ूरी के लिए उस दवा को अमेरिकी दवा एजेंसी यूएस-एफ़डीए और यूरोपीयन्स मेडिसिन एजेंसी को भेजा जाता है.
वो कहते हैं, “स्वीकृति मिलने के बाद उस दवा के पेटेंट पर कंपनी को लगभग बीस साल के लिए निर्माण का एकाधिकार मिल जाता है. साथ ही इन दवाओं को तुलनात्मक रूप से ऊंची कीमत पर बेचा जा सकता है ताकि कंपनी निवेश पर पर्याप्त मुनाफ़ा कमा सके.”
लगभग 20 साल के बाद उस ओरिजिनल दवा जैसी ही जेनेरिक दवा बनायी जाती है जिसे दूसरी कंपनियां भी बना सकती हैं.
होवेन के अनुसार, कई बार दूसरी कंपनियां बढ़ती मांग के अनुसार उत्पादन नहीं बढ़ा पातीं. मगर किल्लत पैदा होने की एक और वजह भी है.

इमेज स्रोत, Getty Images
वो कहते हैं, “कुछ दवाओं को एक ख़ास बीमारी के इलाज के लिए मान्यता दी जाती है. मिसाल के तौर पर डाइबिटीज के इलाज की दवा. मगर बाद में डॉक्टरों को लगता है कि उसका इस्तेमाल दूसरी बीमारियों के इलाज के लिए भी हो सकता है. वे उसे दूसरी बीमारी के इलाज के लिए भी प्रेस्क्राइब करते हैं. इस वजह से भी उस दवा की मांग में भारी वृद्धि हो जाती है जिसका पहले से अनुमान लगा पाना मुश्किल होता है.”
इन दवाओं के उत्पादन के लिए विशेष प्रशिक्षण प्राप्त कर्मचारियों की आवश्यकता होती है जिन्हें लंबे समय तक प्रशिक्षण दिया जाता है. ऐसे कर्मचारियों की संख्या अचानक बढ़ा पाना मुश्किल होता है.
कंपनियों के सामने दूसरी समस्या यह होती है कि हर दवा की एक एक्सपाइरी डेट होती है जिसके बाद उसे इस्तेमाल नहीं किया जा सकता.
इसलिए सभी दवाओं को पहले से बना कर स्टोर भी नहीं किया जा सकता है. मिसाल के तौर पर गोलियों और कैप्सूल को लंबे समय तक स्टोर किया जा सकता है लेकिन इंजेक्शन की एक्सपाइरी अवधि छोटी होती है.
जो पेटेंटेड महंगी दवाइयां हैं उनका वितरण इस बात पर निर्भर करता है कि किस बाज़ार में उसे महंगी क़ीमत पर बेचा जा सकता है.
ऐसी दवाएं बनाने वाली कंपनियां उन देशों को अधिक सप्लाई करती हैं जहां ऊंची क़ीमत मिलती है.

इमेज स्रोत, Thinkstock
जीवनभर की दवा
मोटापा कम करने के लिए दवाओं का इस्तेमाल कोई नई बात नहीं है. इसकी शुरुआत के बारे में जानने के लिए बीबीसी ने बात की डॉ. जेना ट्रोनियेरी से जो पेन्सिलवेनिया यूनिवर्सिटी के पेरेलमैन मेडिकल कॉलेज में क्लिनिकल सर्विसेज़ की निदेशक हैं.
उन्होंने बताया कि वज़न घटाने की सबसे पुरानी दवा है फ़ेंट्रामीन जिसे अमेरिका में 1959 में स्वीकृति दे दी गई थी और आज भी वज़न घटाने के लिए इसका इस्तेमाल अन्य दवाओं के साथ कोंबिनेशन बनाकर किया जाता है.
इससे भूख को कम करने में मदद मिलती है और इसका इस्तेमाल थोड़े समय के लिए किया जाता है.
जेना ट्रोनियेरी ने बताया कि एक और दवा है ओर्लीस्टैट, जिसके छोटे डोज़, कुछ जगहों पर बिना प्रिस्क्रिप्शन के भी उपलब्ध हैं. यह शरीर में चर्बी को घुलने या जमा होने से रोकती है और इससे खाने के माध्यम से शरीर में पहुंचने वाली कैलरी की मात्रा कम हो जाती है. जबकि दूसरी दवाइयां शरीर के भीतर भूख के हार्मोन को नियंत्रित कर के वज़न घटाने का काम करती हैं.
जेना के अनुसार, उनके अस्पताल में मोटापा कम करने के लिए दवाओं के साथ साथ जीवनशैली में बदलाव और खानपान के तरीके में सुधार पर भी बल दिया जाता है.
उन्होंने बताया, “हमने अपने मेडिकल सेंटर में पाया कि मरीज़, केवल एक्सरसाइज़, जीवनशैली और खाने-पीने की आदतों में बदलाव करके 5 से 10 किलो तक ही वज़न कम कर पाते हैं. जबकि दूसरी दवाओं के इस्तेमाल से उनका वज़न 20 किलो तक या उससे ज़्यादा भी कम हो जाता है.”
सोशल मीडिया पर कई बार यह देखने सुनने में आता है कि इन दवाओं से थोड़े समय के भीतर ही वज़न घट जाता है जो कि ग़लत जानकारी है. सच्चाई यह है कि ये दवाएं लंबे अरसे तक लेनी पड़ती हैं.
जेना ट्रोनियेरी का कहना है कि आमतौर पर यह देखा गया है कि जब मरीज़ यह दवा लेना बंद कर देते हैं तो वज़न फिर बढ़ने लगता है. यह ब्लड प्रेशर के इलाज के लिए इस्तेमाल होने वाली दवाओं की तरह ही है. ऐसा नहीं कि ब्लड प्रेशर नियंत्रित होते ही आप वो दवा लेना बंद कर दें. उसे लंबे समय तक जारी रखना पड़ता है.
जेना ट्रोनियेरी यह भी याद दिलाती हैं कि इन दवाओं के साइड इफ़ेक्ट्स भी होते हैं. इनके इस्तेमाल से पेट में गैस और मतली की समस्या पैदा हो सकती है और यह समस्या का बेहतरीन हल तो नहीं हैं.

इमेज स्रोत, Getty Images
सेमाग्लूटाइड से क्यों बढ़ी उम्मीद
जॉश जोर्डी स्विट्ज़रलैंड स्थित बायो टेक्नॉलॉजी कंपनी ‘एराकल थेराप्यूटिक्स’ के सीईओ हैं. वो कहते हैं कि मोटापे का हल निकालने में आज तक ख़ास सफलता हाथ नहीं लगी थी. लेकिन सेमाग्लूटाइड से कुछ आशा बंधी है.
उनके मुताबिक, 'हालांकि यह मोटापे की समस्या का हल नहीं है. हमें इसके साथ और भी उपाय खोजने होंगे.'
“विज्ञान कहीं रुकता नहीं है और ना ही उसकी कोई आख़िरी मंज़िल होती है. तरक्की करते जाना इंसान का स्वभाव है.”
जोर्डी कहते हैं कि फ़िलहाल यह दवा इंजेक्शन के रूप में ली जाती है. सभी मरीज़ों के लिए हर सप्ताह इंजेक्शन लेना सुविधाजनक नहीं होता. इस दवा को गोली या कैप्सूल की शक्ल में लाने की ज़रूरत है.
लेकिन इससे उसकी रासायनिक संरचना बदल जाएगी. इसका हल निकालने के लिए और रिसर्च की ज़रूरत है.
जॉश जोर्डी ने कहा कि दूसरी कई क्रॉनिक बीमारियों के लिए दवाएं टैबलेट की शक्ल में उपलब्ध हैं और उन्हें आशा है कि मोटापा घटाने के लिए इस्तेमाल होने वाली दवाएं भी गोली या कैप्सूल के रूप में उपलब्ध हो जाएंगी.
मगर इसमें कितना समय लगेगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है क्योंकि किसी भी नई दवा को बनाने की प्रक्रिया पेचीदा और महंगी होती है. इसमें सात-आठ साल का समय लग जाता है और इसकी गारंटी नहीं होती कि वो परीक्षणों के बाद सफल भी हो.

इमेज स्रोत, Getty Images
टैबलेट में कब आएगी सेमाग्लूटाइड?
जॉश जोर्डी ने बताया कि उनकी कंपनी भी मोटापा घटाने वाली एक ऐसी दवा बना रही है जो टैबलेट की शक्ल में होगी और भूख कम करने में मददगार होगी.
फ़िलहाल मोटापा कम करने के लिए इस्तेमाल की जा रही दवा सेमाग्लूटाइड ओज़ेंपिक और वीगोवी के ब्रांडनेम से बिक रही हैं. सेमाग्लूटाइड को नोवोनॉर्डिस्क कंपनी ने बनाया था और इसका मार्केट शेयर सबसे ज़्यादा है.
जॉश जोर्डी के अनुसार, अब दूसरी कंपनियां भी इस स्पर्धा में आ गई हैं. ‘इलाय लिली’ भी मोटापा घटाने वाली दवा विकसित कर रही है और जो डेटा उन्होंने पेश किया है वो काफ़ी उत्साहजनक लग रहा है.
अनुमान है कि उसकी दवा अगले छ: महीने में बाज़ार में आ सकती है और विगोवी को चुनौती दे सकती है.
सेमाग्लूटाइड का पेटेंट 2030 में समाप्त हो जाएगा. हो सकता है कि पेटेंट को पांच साल से बढ़ा दिया जाए.
लेकिन उसके बाद यह दवा जेनेरिक कैटेगरी में आ जाएगी यानी इसके उत्पादन की मोनोपोली ख़त्म हो जाएगी और दूसरी कंपनियां भी इसे बना सकेंगी जिससे इसकी कीमत कम हो जाएगी.
मगर जॉश जोर्डी की राय है कि इसे बिना प्रिस्क्रिप्शन के नहीं बेचा जाना चाहिए.
वो कहते हैं, “ये एक ऐसी दवा है जिस पर कड़ा नियंत्रण होना चाहिए. हो सकता है कि लोग इसे फ़िल्मी सितारों की दवा की तरह देखने लगें और किसी सेलेब्रेटी जैसा शरीर बनाने के लिए इसका इस्तेमाल करने लगें. अगर ऐसा होता है तो यह बहुत बुरा होगा क्योंकि यह काफ़ी ताकतवर दवा है.”
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)



















