स्टेम सेल ट्रांसप्लांट का कमाल, कैंसर के साथ एचआईवी भी हुआ ठीक

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जुलाई 2022 में जब एचआईवी से पीड़ित एक अमेरिकी मरीज़ को इस बीमारी से पूरी तरह मुक्त घोषित किया गया तो पूरी दुनिया में एड्स के वायरस का इलाज खोज निकालने में इसे एक बड़ी सफलता की तरह लिया गया.
यह मरीज दुनिया के उन पांच लोगों में शामिल है, जो स्टेम सेल ट्रांसप्लांट इलाज़ से एचआईवी और ल्यूकीमिया से पूरी तरह ठीक हो गए.
66 साल के इस मरीज को 1988 में अपने एड्स बीमारी का पता चला था. उन पांच में वो उम्र में सबसे अधिक हैं और बीमारी के साथ सबसे अधिक जिंदा रहने वाले व्यक्ति भी हैं.
उस समय वो अपनी पहचान उजागर नहीं होने देना चाहते थे लेकिन एक साल बाद पॉल एडमंड्स ने सार्वजनिक होने का फैसला किया और उनसे पहला इंटरव्यू बीबीसी न्यूज़ ब्राज़ील को दी.
एडमंड्स कुछ समय चाहते थे लेकिन अब उन्होंने अपनी कहानी सुनाने का फैसला किया, "मैं एड्स पीड़ितों के लिए प्रेरणा बनना चाहता हूं और उनके प्रति सम्मान जताना चाहता हूं जो इस बीमारी से हार गए."
एचआईवी यानी ह्यूमन इम्यूनोडेफ़िसियंसी वायरस मरीज की प्रतिरोधक तंत्र पर हमला करता है.
गंभीर चरण में ये एड्स (एक्वायर्ड इम्यून डिफ़िसियंसी सिंड्रोम) बन सकता है जो मरीज के प्रतिरोध तंत्र के फेल होने पर एक के बाद एक उन बीमारियों को जन्म देता है, जो कमज़ोर प्रतिरोध की स्थिति में अपने आप फलती फूलती रहती हैं.
1980 के दशक में एचआईवी का इलाज नहीं था, बहुतों के लिए इसके होने का मतलब मौत पक्की.
लेकिन उनके केस में हालात इससे भी बुरे थे, जब उन्हें एचआईवी के बारे में पता चला तबतक उन्हें एड्स भी हो चुका है.

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हाल के दशकों में नए इलाज़ सफल रहे हैं और आज लोग इस वायरस के साथ भी लंबे समय तक ज़िंदा रह सकते हैं और कई लोगों में तो एड्स तक की नौबत नहीं आती.
बावजूद इसका कोई मुकम्मल इलाज नहीं था और मरीज को पूरी ज़िंदगी दवाओं पर जीना होता था.
2018 में एडमंड्स को एक दूसरी ख़तरनाक़ बीमारी ल्यूकीमिया का पता चला. इस बीमारी से पूरी तरह ठीक होने को वो 'चमत्कार' कहते हैं.
ये एक किस्म का कैंसर है जो बोन मैरो और रक्त कोशिकाओं को प्रभावित करता है.
डॉक्टरों ने एडमंड्स को स्टेम सेल ट्रांसप्लांट की सलाह दी. ये बहुत जटिल प्रक्रिया है लेकिन ठीक होने का एकमात्र तरीक़ा भी है.
अब उन्हें एक ऐसे डोनर की ज़रूरत थी जिसमें एक जेनेटिक म्यूटेशन (सीसीआर5 डेल्टा 32) हुआ हो, जो एचआईवी वायरस के प्रति प्रतिरोधक हो.
एडमंड्स का इलाज 2019 में कैलिफ़ोर्निया के सिटी ऑफ़ होप कैंसर सेंटर में हुआ. दो साल बाद 2021 में वो एचआईवी की दवाओं से पूरी तरह आज़ाद हो गए.
आज तक उनके अंदर एचआईवी या ल्यूकीमिया का कोई लक्षण नहीं दिखा और वो पूरी तरह ठीक हो चुके हैं.
हालांकि एचआईवी पॉज़िटिव मरीज़ों के लिए ऐसा ट्रांसप्लांट अपवाद ही है. लेकिन एडमंड्स और अन्य चार मरीजों की प्रगति से डॉक्टरों और रिसर्चरों में इस बीमारी के नए इलाज खोज निकालने की उम्मीद बढ़ गई है.
एडमंड्स का इलाज़ करने वाली टीम के डॉक्टर जाना डिक्टर ने बीबीसी को बताया, "स्टेम सेल ट्रांसप्लांट एक जटिल प्रक्रिया है जिसका बहुत अधिक साइड इफ़ेक्ट हो सकता है."
वो कहती हैं, "अधिकांश एचआईवी मरीज़ों के लिए ये बिल्कुल सटीक विकल्प नहीं है, लेकिन ये उन मरीज़ों के लिए एक विकल्प ज़रूर है जिनमें ब्लड कैंसर विकसित हो गया हो और उन्हें इसका फ़ायदा हो सकता है."

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शुरुआती जांच और एचआईवी के साथ रहना
एडमंड्स जियार्जिया के ग्रामीण इलाक़े में क़रीब 10 हज़ार की आबादी वाले टोकोआ कस्बे में पले बढ़े.
एक धार्मिक और संकीर्ण विचारों वाले समाज में रहने के बावजूद, जब उन्होंने अपनी पहचान समलैंगिक के रूप में ज़ाहिर की तो उनके माता पिता ने उनका साथ नहीं छोड़ा.
1976 में 21 साल की उम्र में वो कैलिफ़ोर्निया के शहर सैन फ्रांसिस्को चले गए जहां समलैंगिक आंदोलन बहुत मजबूत था.
उन दिनों को याद करते एडमंड्स कहते हैं, "वो बहुत शानदार समय था. हर जगह से समलैंगिक सैन फ्रांसिस्को में आकर जमा हो गए थे."
लेकिन 1980 के दशक में इनमें अधिकांश बीमार होने लगे, "ये बहुत डरावना था, कोई नहीं जानता था कि क्या हो रहा है. लोग इसे नई बीमारी 'गे कैंसर' कहने लगे. लोग डर गए थे."
अधिकांश एचआईवी मरीज़, बीमारी के पता चलने के कुछ समय बाद ही मर गए.
मौतें इतनी बढ़ गईं कि अख़बार में अपने परिचितों और दोस्तों के नाम देख कर वो भावुक हो उठते.
वो कहते हैं कि 1988 में जब उन्होंने एचआईवी टेस्ट कराने का फ़ैसला किया तो इसके कोई लक्षण उनमें नहीं थे. हालांकि उन्हें ये शुबहा ज़रूर था कि वो वायरस के 'कैरियर' हो सकते हैं.

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टेस्ट का रिजल्ट उन्हें क्लीनिक में इंटर्नशिप करने वाली एक लड़की देने आई, "वो समझ नहीं पा रही थी वो कैसे मुझे बताए, ये उसके लिए बहुत मुश्किल लग रहा था और ये उसके चेहरे से साफ़ झलक रहा था. मेरे लिए भी ये सदमे से कम नहीं था."
एडमंड्स के मुताबिक, "यही नहीं मुझे एड्स का भी पता चला क्योंकि मेरा टी लिम्फ़ोसाइट काउंट (सीडी4) 200 (प्रति क्यूबिक मिलीमीटर खून) से कम था, जिसे आधिकारिक रूप से एड्स माना जाता था."
उन्हें लगा कि उनका भी हश्र उनके दोस्तों जैसा होने वाला है. इस हताशा में वो अधिक शराब पीने लगे लेकिन आखिरकार उन्होंने खुद को संभाला और नियमित इलाज़ कराने लगे.
वो बताते हैं, "जब भी नई दवा आती मुझे बदलना पड़ता, ये बहुत पीड़ादायी था क्योंकि इनके साइड इफ़ेक्ट बहुत होते थे. इनसे बचने के लिए इलाज में इस्तेमाल होने वाली भांग का इस्तेमाल करता था."
1992 में उनकी मुलाक़ात अपने पार्टनर अर्नाल्ड हाउस से हुई और उन्हें भी एचआईवी टेस्ट कराने के लिए उन्होंने राज़ी कर लिया.
एडमंड्स कहते हैं, "और वो भी पॉज़िटिव निकला. ये सदमे से कम नहीं था, लेकिन उसने धैर्य से काम लिया और हम लोग ज़िंदगी में आगे बढ़ गए."
अपने पार्टनर से 2014 में क़ानूनी रूप से विवाह किया और उनके साथ एडमंड्स ने 31 साल बिताए. बड़े लगाव से वो बताते हैं, "शुरू से जो औचक आकर्षण महसूस हुआ वो जैसे ठहर गया हो. जिस दिन हम मिले उसके बाद से आज तक हम अलग नहीं हुए."

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ट्रांसप्लांट और डोनर की खोज
समय के साथ एचआईवी के बेहतर इलाज़ आ रहे थे. 2018 में उन्हें मायलोडिसप्लास्टिक सिंड्रोम (एमडीएस) का पता चला जो कई बीमारियों के समूह को कहा जाता है जिससे ब्लड कैंसर हो सकता है. ये बाद में मायलॉयड ल्यूकीमिया में बदल गया.
उन्हें इसका कोई लक्षण नहीं था, बस थकावट होती थी. डॉक्टरों ने कहा कि इस इलाज़ से उनका कैंसर ख़त्म हो सकता है और शायद एचआईवी भी.
डॉ. जाना डिक्टर के अनुसार, स्टेम सेल ट्रांसप्लांट में बोन मैरो के उस ऊतक को डोनर की कोशिकाओं से बदला जाता है जिसमें कैंसर होता है.
इसके बाद एक ऐसे डोनर की खोज शुरू हुई जिसमें एचआईवी के ख़िलाफ़ प्रतिरोधक क्षमता हो. अस्पताल के डॉक्टरों के अनुसार, ऐसे लोग पूरी आबादी में महज 1% से 2% होते हैं.
एडमंड्स की हालत जटिल थी. कैंसर के लिए कीमोथेरेपी देनी थी जिससे उनकी प्रतिरोधक क्षमता और कम होती, जबकि एचआईवी के कारण पहले से प्रतिरोधक क्षमता कम थी.
आख़िरकार 2019 में 63 साल का एक डोनर मिला और यह ट्रांसप्लांट सफल रहा.
एडमंड्स इसके नतीजे की चिंता किए बिना इलाज पर ध्यान दे रहे थे और देश भर से उन्हें शुभकामनाएं आ रही थीं.
इसी दौरान कोविड-19 महामारी आई जिसकी वजह से एचआईवी का इलाज रुक गया.
दो साल बाद मार्च 2021 में एडमंड्स ने एंटीरिट्रोवियल थेरेपी (एचआईवी का इलाज) पूरी तरह छोड़ दी.
तबसे वो एचआईवी और ल्यूकीमिया से पूरी तरह मुक्त हैं, लेकिन डॉक्टर इसे 'पूरा इलाज' की बजाय 'लंबे समय तक ठीक होना' कहते हैं.
जाना डिक्टर का कहना है, "एचआईवी के इलाज में हम बीमारी पूरी तरह ख़त्म हो गई, ये नहीं कहते लेकिन दो साल से एडमंड्स दवा नहीं ले रहे और उनके शरीर में एचआईवी का हमें कोई सबूत नहीं मिला है."
संक्रमण वाली बीमारियों के एक्सपर्ट का कहना है कि हमें अभी और समय और डेटा चाहिए ताकि एडमंड्स को हम आधाकारिक रूप से 'पूरी तरह ठीक हो चुका' कह सकें.
हालांकि पांच साल तक अगर लक्षण नहीं दिखता तो ये एक मानक है जिसमें माना जाता है कि मरीज एचआईवी से पूरी तरह ठीक हो गया है.

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उम्मीद जगाता दुर्लभ इलाज
डॉ. जाना के अनुसार, पूरी दुनिया में अभी तक सिर्फ 15 एचआईवी मरीज़ों का ही इस तरह का इलाज हुआ है, इनमें आठ की मौत हो गई और एडमंड्स समेत पांच लंबे समय तक के लिए ठीक हो गए हैं. दो को अभी भी एचआईवी की दवा लेनी पड़ रही है.
एडमंड्स को 'सिटी ऑफ़ होप पेशेंट' कहा जाता है. बाकी चार मरीज़ बर्लिन, लंदन, न्यू यॉर्क और डूसेलडॉर्फ़ से हैं.
ये इलाज़ बहुत से एचआईवी मरीज़ों को उपलब्ध नहीं हो पाता क्योंकि इसमें रिस्क अधिक है और डोनर ढूंढना बहुत ही मुश्किल.
इसलिए ये इलाज उन्हीं एचआईवी मरीज़ों तक अभी सीमित है जिन्हें साथ में कैंसर भी हो चुका है.
लेकिन इस सफ़ल इलाज से इस वायरस के बारे में और जानकारी मिल सकेगी और अन्य मरीजों के लिए उम्मीद बढ़ेगी.
एडमंड्स पर अभी और अध्ययन हो रहा है और उन्हें कई परीक्षणों से होकर गुजरना है.
डॉ. जाना डिक्टर का कहना है कि कैंसर के साथ एचआईवी से भी मुक्ति का यह इलाज़ खोजना बहुत महत्वपूर्ण और भविष्य के मरीज़ों के लिए एक ठोस उम्मीद बनेगी.
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