ख़ुशी-ख़ुशी चीज़ों को छोड़ने का साहस लाना ज़रूरी क्यों

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- Author, नताशा बधवार
- पदनाम, जानी-मानी स्तंभकार
"तुम्हें देख कर मुझे अपनी याद आती है, जब मैं तुम्हारी उम्र की थी."
मैंने ये संदेश अपनी नई सहकर्मियों को भेजा था. हम एक ही मीडिया टीम में काम कर रहे थे और शार्ट डॉक्युमेंट्रीज़ बनाने के सिलसिले में अमूमन एक साथ यात्रा करते थे.
मैंने गौर किया था कि वह ख़ामोश रहती थी लेकिन जब उसे बोलना होता तो बड़ी वाकपटुता से अपनी बात रखती थी. मुझे दोनों ख़ूबियों में विरोधाभास नज़र आता था.
मैंने उसे लिखा, "तुम्हारे विचार दृढ़ हैं. तुम्हारे मन में कई सवाल हैं पर सार्वजनिक तौर पर तुम इन मुद्दों पर बहस करने से परहेज करती हो. व्यक्तिगत तौर पर तुम चीज़ों के बारे में गंभीरता से सोचती हो."
उसने जवाब में सवाल पूछा, "क्या आपके लिए यह बदल गया है?" मैंने जवाब लिखा, "अब बोलने को लेकर मेरा भरोसा ज़्यादा हुआ है."
उसने स्माइली इमोजी के साथ पूछा कि आप अपनी छोटी को क्या सलाह देंगी. मैंने स्मार्टफ़ोन की स्क्रीन से दूर देखते हुए सोचा कि इस पर एक कॉलम लिखूंगी.
ख़ुशी ख़ुशी चीज़ों को छोड़ने वाला होना चाहिए. धावक की तरह भागने आना चाहिए. किसी चीज़ को छोड़ने की आज़ादी ख़ुद को देनी चाहिए.
अव्यवस्था, बिना भरोसे वाली संगत और उन लोगों से दूर भागें जो आपको कमतर ठहराने की कोशिश करते हैं. ऐसे लोगों से दूर भागें जो चीज़ों के विषाक्त होने पर भी इससे लिपटे हुए आपको घुटन महसूस कराते हैं.
हमें अपनी आज़ादी का इस्तेमाल करते हुए स्थितियों से दूर जाने की आवश्यकता है. जितना हम करते हैं, उससे कहीं ज़्यादा. इस बात से ना डरें कि आपकी ग़ैर मौजूदगी से दूसरों पर क्या प्रभाव होगा? पहले ख़ुद की ज़रूरतों पर ध्यान दें.

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आप क्यों भाग रहे हैं?
कई बार आपको पता नहीं होता कि आप क्यों भाग रहे हैं. आप सोचेंगे तो पाएंगे कि आप उस स्थिति का सामना नहीं कर पा रहे थे. हो सकता है कि कहीं ज़्यादा सामाजिक, वित्तीय और राजनीतिक ताक़त रखने वालों के बीच आप ख़ुद को असहाय पाते हों, या महसूस करते हों.
जो आपके लिए ग़लत है, उसको छोड़ना एक पॉजिटिव निर्णय है. आपको सालों बाद अहसास होगा कि आपने किसी तरह का समझौता करने से इनकार कर दिया था.
आपने झुकने, रेंगने और ख़ुद से छोटे होने के दबाव को दूर कर दिया. आप पीछे मुड़कर देखेंगे तो आपकी चिंता, कमज़ोरी की निशानी नहीं लगेगी.
दरअसल, आपका पूरा अस्तित्व उस स्थिति का विद्रोह कर रहा था, जिसे वह आपको सही नहीं मान रहा था.
लोगों के साथ अपनी सीमाएं तय करना बेहतर होगा, इस जान लें. लोगों को अलग-थलग करने के अपने डर से उबरना सीखेंगे. जो लोग नाराज़ होने पर ज़ोर देते हैं, वे अक्सर इसके लिए बहाने ढूंढते हैं. किसी को अपनी भावनाओं से खेलने ना दें.

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ख़ुद को डर से बाहर निकालें
आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि आप जिस तरह के लोगों से डरते थे, वह अचानक आपके बड़े होने के साथ-साथ आपसे मित्रवत होने लगेंगे. आपको आश्चर्य होगा कि कौन बदला- वे या आप?
आपकी कमज़ोरियों की तरह ही आपके गुण अलग-अलग संदर्भ में अलग अलग प्रतीत होंगे. आपके कार्यस्थल को आपकी संवेदनशीलता की आवश्यकता नहीं हो सकती है. आपका संयुक्त परिवार आपकी सहानुभूति का फ़ायदा उठा सकता है और आपकी वैचारिकी अक्सर एक दायित्व की तरह प्रतीत होगी जो अवरोध उत्पन्न करेगी.
किसी भी स्थिति में संयम ना खोएं. ख़ुद को बेहतर तरीक़े से जानने के लिए अच्छी प्रक्रिया चुनें. लोग जब आपके बारे में पूछते हैं तो आप क्या कहते हैं, इस पर ध्यान दें. संभव है कि आपको हमेशा सही उत्तर तुरंत न पता हो, लेकिन सवालों पर सोचते रहें, वे आपको आपके बारे में ज़्यादा जानकारी दिलाएंगे.
बचे हुए जीवन का अधिकांश भाग अपने आप को नए सिरे से जोड़ने की यात्रा है. केवल परिवार और बुरे रिश्ते, ही हमें नुक़सान नहीं पहुँचाते हैं. व्यवस्था ठीक नहीं हो तो स्कूल और कार्यस्थल भी नुक़सान पहुँचाते हैं. ये दुनिया अव्यवस्थित है और आपकी आत्मा इसे भांप लेती है.

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सोचने की क्षमता पर बाज़ारवाद हावी
यह हमारे समय में जीवन की प्रकृति है. पूंजीवादी बाज़ार ने हमारे सोचने की क्षमता को ऐसा प्रभावित किया है कि प्रचुरता का मतलब ब्रैंडेड उत्पाद और उससे जुड़े अनुभव भर रह गए हैं.
राजनीतिक दल चाहते हैं कि आप बिना सोचे समझे हमेशा वफ़ादारी निभाते रहें. वहीं मीडिया प्रेरक संदेशों से भरकर अपने लिए सोचने की हमारी क्षमता को ख़त्म करना चाहता है.
यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि हममें से बहुत से लोग अपनी बात कहने में विश्वास खो देते हैं और ख़ुद पर विश्वास करना मुश्किल हो जाता है.
हम जान सकते हैं कि हम क्या चाहते हैं, लेकिन यह सुनिश्चित नहीं है कि हम जो चाहते हैं उसे पाने के योग्य हैं या नहीं. आम तौर पर, जो हमारा है, हमारे लिए ही है, उस पर भी हम दावा नहीं करते हैं.

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बड़े होने का अर्थ है अपने भीतर के बचपने को हासिल कर लेना है. किसी भी समस्या का समाधान उस मानसिकता से नहीं हो सकता है, जिसने उसे क्रिएट किया है. इसके क्या मायने हैं, हम यह समझने की कोशिश करते हैं. तब हम नाप तौल कर जोख़िम लेना शुरू करते हैं. इसलिए स्वयं के संपर्क में रहें.
बड़े होने का मतलब यह भी नहीं है कि अब हमारा नुकसान नहीं होगा. हम ख़ारिज़ किए जाने की स्थिति का भी सामना करेंगे. जिस जगह पर हम रहने के लिए प्रतिबद्ध हों, वहाँ से हमें जाने के लिए कहा जा सकता है. हम सीखेंगे कि दुनिया की भीड़ में कैसे दिखना है.
बड़े होने का अर्थ दुःख महसूस करने की हमारी क्षमता का बढ़ना है, निश्चित तौर पर धीरे-धीरे.
याद रखें कि आप ठीक होने की अपनी क्षमता कभी नहीं खोएंगे. मुझे अपने अनुभव से यह पता है. आप अपनी हँसी खो देंगे. यह वापस आ जाएगा. उम्र का आप पर असर नहीं होगा, आप फिर से जवान महसूस करेंगे.
आप तकलीफ़ और भ्रम की स्थिति को तलाशने के रास्ते ढूंढ लेंगे ताकि उम्मीद और सार्थकता उत्पन्न कर सकें.
आपकी कल्पना हमेशा ख़ुद को चंगा करने के तरीक़े जान लेगी. यह आपके भीतर मौजूद है. यह आपको नए सिरे से उत्साहित रखेगा.
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