हरिशंकर परसाई: हिंदी के महान व्यंग्यकार जिन्होंने अपने समकालीन लेखकों को भी नहीं बख़्शा

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- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी हिंदी
राजनीति और समाज पर परसाई की पकड़ इतनी गहरी थी कि आज उनके गुज़र जाने के बरसों बाद भी नए ज़माने में सोशल मीडिया पर उनके लिखे वाक्य हर तरफ़ नज़र आते हैं.
किसी और दौर में लिखी परसाई की हर चुटीली बात ऐसी लगती है मानो वह बिल्कुल ताज़ा हालात को देखकर लिखी गई है.
एक बार जाने-माने लेखक कमलेश्वर ने परसाई के बारे में कहा था, “ये मेरा सौभाग्य रहा है कि मैंने जो भी पत्रिकाएं संपादित कीं उनमें से कोई भी परसाई के कॉलम के बग़ैर छपी नहीं क्योंकि मुझे लगता था कि जो मैं तमाम रचनाओं के माध्यम से नहीं कह पाऊँगाा, जो मैं संपादकीय के माध्यम से नहीं कह पाऊँगाा, वो मैं परसाई की एक रचना के माध्यम से कह लूँगा इसीलिए मैंने हमेशा परसाई से पहले बात की और पत्रिका का संपादक बाद में बना.”
परसाई के लिखे स्तंभ ऐसे होते थे कि वो वाक़ई किसी पत्रिका के ‘स्तंभ’ बन जाया करते थे. उस पर खड़ी कोई भी पत्रिका स्वयं को गौरवान्वित महसूस करती थी.
1970-1980 के दशक में धर्मयुग हिंदी की सबसे लोकप्रिय पत्रिका हुआ करती थी.

राजेंद्र चंद्रकांत राय हरिशंकर परसाई की जीवनी ‘काल के कपाल पर हस्ताक्षर’ में लिखते हैं, “परसाई धर्मयुग मे हर महीने छपते थे और कभी-कभी तो महीने में दो बार भी. वैचारिक रूप से परसाई न तो धर्मयुग के संपादक धर्मवीर भारती के अनुकूल थे और न ही धर्मयुग को छापने वाली कंपनी बेनेट कोलमैन के. पर वे पाठकों के मन के अनुकूल ज़रूर होते थे.”
कमलेश्वर ने लिखा भी है, “जब भी सारिका में परसाई का स्तंभ शुरू होता था, सारिका का प्रिंट ऑर्डर बढ़ जाता था. परसाई जी हिंदी साहित्य के दिलीप कुमार थे.”
जाने-माने व्यंग्यकार रवींद्रनाथ त्यागी ने बिल्कुल सही कहा था, “आज़ादी से पहले के हिंदुस्तान जानने के लिए जैसे सिर्फ़ प्रेमचंद पढ़ना ही काफ़ी है, उसी तरह आज़ादी के बाद का पूरा दस्तावेज़ परसाई की रचनाओं में सुरक्षित है.”

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कबीर के मुरीद
परसाई ने अपने समय की सच्चाइयों को लोगों के सामने रखने के लिए व्यंग्य को माध्यम बनाया. बीमार व्यवस्था को बदलने की बेचैनी उनमें थी.
वो हिंदी पट्टी के नायक बने और फिर सितारा हुए. वो कबीर के बखियाउधेड़ फक्कड़पन के मुरीद थे.
सन 1974 से 1976 तक उन्होंने सारिका पत्रिका में ‘कबिरा खड़ा बाज़ार’ शीर्षक से एक स्तंभ लिखा जिसमें उन्होंने साक्षात्कार शैली का इस्तेमाल किया. इसमें परसाई कबीर की तरफ़ से देश-विदेश के नामी राजनेताओं और महत्वपूर्ण हस्ताक्षरों से काल्पनिक इंटरव्यू लिया करते थे.
सन 1975 में आपातकाल लगा और उसी वर्ष के सारिका के जून अंक में बाबू जगजीवन राम से ‘कबीर’ का साक्षात्कार छपा था. इसमें जगजीवन राम ने कबीर से कहा था, ‘अगर जयप्रकाश नारायण का सरकार बनाना पक्का हो जाए तो मैं उनकी तरफ़ चला जाऊँ.’
सेंसर वालों ने इस अंक की दुर्गति कर दी थी. आधे पन्ने काले करने पड़े. दिलचस्प बात ये थी कि करीब डेढ़ साल बाद जगजीवन राम वाक़ई कांग्रेस छोड़कर जयप्रकाश नारायण से जा मिले थे. परसाई 16 और 32 पेज वाली कॉपियों पर अपने लेख लिखा करते थे.
बाद में वो बोलकर भी लिखवाने लगे थे. उनके जीवनीकार राजेंद्र चंद्रकांत राय लिखते हैं, “डॉक्टर राम शंकर तिवारी उनके नज़दीक रहते थे. ज़्यादातर वही उनका डिक्टेशन लेते थे. फिर वही कॉपी संपादकों को डाक से भेज दी जाती थी. मेरे लिए अचरज वाली बात ये थी कि उसकी कॉपी अपने पास नहीं रखते थे.”

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सब पर थी परसाई की पैनी नज़रें
पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह पर केंद्रित एक स्तंभ ‘संन्यासी की वापसी’ का मज़ा लीजिए में वो लिखते हैं, ‘‘चर्चिल के बारे में कहा जाता है कि वो जहाँ जाते थे, वहाँ सबके ध्यान के केंद्र होना चाहते थे. वो अगर बारात में जाएं तो दूल्हा होना चाहेंगे और शव यात्रा में जाएं तो लाश होना चाहेंगे. ऐसा ही अपने चौधरी साहब का व्यक्तित्व है इसलिए उन्होंने कह दिया कि विपक्षी एकता में अगर मैं प्रधानमंत्री बना दिया जाऊँ तो मैं अपना संन्यास छोड़ता हूँ.”
‘ये माजरा क्या है’ स्तंभ में परसाई ‘डॉक्टरेट की कथा’ शीर्षक लेख में लिखते हैं, ‘फ़्रांस में डॉक्टरेट बहुत सस्ती हो गई थी. कोई 500 फ़्रैंक विश्वविद्यालय को भेज दे और मनचाहे विषय पर डॉक्टरेट ले ले. एक रईस ने 8-10 विषयों पर डॉक्टरेट ले ली. वो अपने घोड़े को बहुत प्यार करते थे. उन्होंने यूनिवर्सिटी को 500 फ़्रैंक भेजे और लिखा कि मेरे घोड़े को भी एक डॉक्टरेट दे दी जाए. जवाब आया, हम घोड़ों को डॉक्टरेट नहीं देते, सिर्फ़ गधों को देते हैं.’
कपिल कुमार सिंह राघव अपनी किताब ‘हरिशंकर परसाई का व्यंग्य साहित्य’ में लिखते हैं, ‘हिंदी में स्तंभ लेखन के माध्यम से अपने मन की बातें जितनी परसाई ने कहीं किसी अन्य ने इतने तीक्ष्ण रूप में नहीं कहीं. कोई समाज, कोई राज्य, कोई राष्ट्र परसाई की नज़रों से बचा नहीं है. उन्होंने बहुत बड़े पैमाने पर पढ़े-लिखे समुदाय को अपने आसपास की सच्चाई के बारे में सजग किया है.’

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प्लेग में माँ को खोया
स्वाभाविक है कि परसाई के पाठकों को इसमें दिलचस्पी हो कि वो जो इतना हँसते और हँसाते हैं, जिसमें मस्ती है, जो ऐसे तीखे हैं, कटु हैं. इनकी अपनी ज़िंदगी कैसी रही?
परसाई सारिका में प्रकाशित अपने आत्मकथ्य ‘गर्दिश के दिन’ में लिखते हैं कि उनके बचपन की सबसे तीखी याद प्लेग की है. 1936 या 37 रहा होगा. तब वे आठवीं के छात्र थे. प्लेग के कारण कस्बे की सारी आबादी घर छोड़कर जंगल में टपरे बनाकर रहने चली गई थी. वे नहीं गए थे क्योंकि उनकी माँ सख़्त बीमार थीं. उन्हें लेकर जंगल नहीं जाया जा सकता था.
परसाई ने लिखा है, “भाँय-भाँय करते पूरे इलाके में हमारे घर पर चहल पहल थी. कुत्ते तक बस्ती छोड़ गए थे. रात के सन्नाटे में हमारी आवाज़ें हमें ही डरावनी लगती थीं. रात को मरणासन्न माँ के सामने हम लोग आरती गाते. गाते-गाते पिताजी सिसकने लगते. माँ बिलखकर हम बच्चों को सीने से लगा लेतीं. हम भी रोने लगते.”
आत्मकथ्य में उन्होंने लिखा है, “रात को पिताजी, चाचा और दो एक रिश्तेदार बल्लम लेकर घर के चारों तरफ़ घूम-घूम कर पहरा देते. वो सब नहीं जानते थे कि वो पहरेदारी किससे कर रहे हैं? चोरों से…? डकैतों से…? या आसन्न मृत्यु से...? ऐसे भयानक वातावरण में एक रात तीसरे पहर माँ की मृत्यु हो गई. प्लेग की वो रातें मेरे मन में गहरे उतरी हैं. जिस आतंक, अनिश्चय, निराशा और भय के बीच में हम जी रहे थे उसके सही अंकन के लिए बहुत पन्ने चाहिए.”

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व्यंग्य लेखक का जन्म
परसाई के जीवन में सब कुछ अंधकारमय नहीं था. उसमें मस्ती भी थी और बेफ़िक्री भी.
‘गर्दिश के दिन’ में ही परसाई लिखते हैं, ‘एक विद्या मुझे आ गई थी, वो थी बिना टिकट सफ़र करना. जबलपुर से इटारसी, खंडवा, देवास बार-बार चक्कर लगाने पड़ते. पैसे थे नहीं. मैं बिना टिकट बेखटके गाड़ी में बैठ जाता. बचने की बहुत तरकीबें आ गई थीं. पकड़ा जाता तो अच्छी अंग्रेज़ी में अपनी मुसीबत का बखान करता. टिकट चेकर प्रभावित हो जाते और कहते, ‘लेट्स हेल्प द पुअर ब्वॉय.’
परसाई लिखते हैं, ‘इन गर्दिशों का ज़िक्र आख़िर मैं क्यों विस्तार से कर गया? गर्दिशें बाद में भी आईं. अब भी आती हैं लेकिन उस उम्र की गर्दिशों की अपनी अहमियत है. लेखक की मानसिकता और व्यक्तित्व निर्माण से इसका गहरा संबंध है. मैंने सोचा दुखी और भी हैं. अन्याय पीड़ित और भी हैं. अनगिनत शोषित हैं. मैं उनमें से एक हूँ. पर मेरे हाथ में कलम है और मैं चेतना संपन्न हूँ. यहीं कही व्यंग्य लेखक का जन्म हुआ.’

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समकालीन साहित्यकारों की चुटकी
परसाई ने लेखन के अलावा अपने समकालीन साहित्यकारों पर बेबाक टिप्पणियाँ की हैं.
वो लिखते हैं, ‘इनका सहज कुछ नहीं होता था. उनके शब्द बनावटी, उन्हें बोलते वक्त होठों के मोड़ बनावटी, आँखों का भाव बनावटी, मुस्कान बनावटी. ये लोग समझते थे कि सब कुछ उनकी कविता और कहानी से हो जाने वाला है. मैं इन्हें देखता था, सुनता था पर पास नहीं जाता था. वे मूर्ति थे, जिन पर फूल चढ़ा सकते थे पर जिनसे बात नहीं कर सकते थे.’
उन दिनों साहित्य का तीर्थ इलाहाबाद हुआ करता था. परसाई वहाँ अक्सर जाते थे.
वो अपनी किताब ‘जाने पहचाने लोग’ में लिखते हैं, ‘मेरी आदत नहीं है कि अगर तीर्थ गए हैं तो हर मंदिर में नारियल फोड़ूँ. अज्ञेय से मेरी आज तक दुआ सलाम नहीं हुई इसका कारण मेरा अहंकार नहीं है, संकोच है. अज्ञेय मुझे चित्र से और सामने से भी एक उदास दार्शनिक लगते हैं. मैं उनसे मिलने जाता तो वो 22वीं सदी के मनुष्य की चिंता में लीन हो जाते. मैं उनसे क्या बात करता? वैसे भी लेखकों से बात करना मेरी लिए कठिन है.’

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बेबाक टिप्पणियाँ
परसाई मैथिलीशरण गुप्त से भी कभी नहीं मिले लेकिन उनके बारे में कई दिलचस्प बातें लिखी. उनके बारे में कहा जाता था जब कोई लेखक उनसे मिलने जाता था तो उनके घर के बाहर उनका कोई भाई या भतीजा मिलता था.
परसाई लिखते हैं, ‘वो लेखक से पूछता था, हिंदी का सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य कौन-सा है? यदि लेखक ‘कामायनी’ (जयशंकर प्रसाद की रचना) का नाम ले देता और ‘साकेत’ (मैथिलीशरण की रचना) का नहीं तो उसके साथ वहाँ अच्छा व्यवहार नहीं किया जाता था.’
इलाहाबाद में ही परसाई को उपेंद्रनाथ अश्क से भी मिलने का कई बार मौका मिला.
परसाई लिखते हैं, ‘अश्क जी से मिलना एक विशिष्ट अनुभव है. अपने को कुछ नहीं बोलना पड़ता. वो ही बोलते हैं और अपने बारे में बोलते हैं. उनके पास बैठने से सबसे बड़ी प्राप्ति ये होती है कि सारे लेखकों की बुराई मालूम हो जाती है और उनकी नई से नई कलंक कथा आप जान जाते हैं. इलाहाबाद में महादेवी जी से भी कई बार भेंट हुई. वो खुलकर बात करती हैं और खुली हँसी हँसती हैं.’

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श्रीकांत वर्मा के लिए स्नेह
जैनेंद्र कुमार से भी हरिशंकर परसाई की अक्सर नोकझोंक हुआ करती थी, एक बार दोनों को दिल्ली में एफ़्रो-एशियाई शांति सम्मेलन में आमंत्रित किया गया.
परसाई लिखते हैं, "जैसे ही जैनेंद्र ने मुझे देखा मुझसे कुटिल मुद्रा में बोले, ‘इस सम्मेलन में आने के लिए तुम्हें रूस से बहुत पैसा मिला होगा.’ मैंने कहा ‘जी हाँ इस सम्मेलन को बिगाड़ने के लिए जितना पैसा सीआईए से आपको मिला है.’ जैनेद्र हंसे और कहने लगे, तुम्हारी कटाक्ष की क्षमता अद्भुत है."
श्रीकांत वर्मा के लिए परसाई के मन में बहुत स्नेह था. उनकी नज़र में श्रीकांत में बहुत आत्मीयता थी. ऊपर से कटु और ‘एरोगेंट’ लगने वाला ये आदमी भीतर से बहुत कोमल था. परसाई को तभी आभास हो गया था कि श्रीकांत महत्वाकांक्षी है.
परसाई लिखते हैं, ‘मुझे लग गया था कि वो दूसरे क्षेत्रीय कवियों की तरह कवि-सम्मेलनों में कविता पढ़कर संतुष्ट नहीं होगा. श्रीकांत मुझसे और मुक्तिबोध से भिन्न था. हम दोनों कस्बे में रह कर भी अपना काम कर लेते थे. श्रीकांत को विराटता चाहिए थी और ‘स्पेस’ भी. वो बहुत अध्ययन करता था. साथ ही वो अपनी अलग तेज़ धारदार भाषा बना रहा था. इस भाषा की कोई नकल नहीं कर सकता था. वो भाषा श्रीकांत के साथ ही चली गई.’
परसाई अपने साथी लेखकों और कवियों को बहुत बारीकी से देखते थे. कुछ कवि तो मंच पर जाने से पहले बाल सँवारते थे लेकिन कुछ कवि ऐसे थे जो इनके सामने खड़े होकर सँवरे हुए बालों को बिखेरते थे. कभी बेहद लोकप्रिय कवि नीरज को परसाई ने बाल बिखराते और बदहवासी का भाव धारण करते देखा था.

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शमशेर बहादुर सिंह और नामवर सिंह के प्रशंसक
शमशेर बहादुर सिंह के साथ भी हरिशंकर परसाई की बहुत नज़दीकी थी. शमशेर में बहुत नफ़ासत थी. वो काफ़ी अंतर्मुखी थे.
परसाई लिखते हैं, “शमशेर की मुस्कान ‘डिसआर्मिंग’ है. वो निहायत संकोची और अपना अधिकार तक छोड़ने वाला आदमी है. नागार्जुन भी कविता में रहते हैं पर व्यवहारिक मामलों में चतुर, चालाक, हिसाबी और अपना हक झपट लेने वाले हैं. शमशेर अंग्रेज़ी, हिंदी, उर्दू, फ़ारसी और फ़्रेंच के विद्वान हैं. उर्दू उनकी पहली भाषा है, हिंदी दूसरी. जिस अदा से वो ‘डॉट्स’, ‘हाइफ़न’ और ‘डैश’ के साथ सोचते हैं, वैसा ही लिखते और बोलते भी हैं. ‘एबसेंट माइंडेड’ हो जाना उनकी आदत है.”
नामवर सिंह के लिए भी परसाई के मन में ‘सॉफ़्ट कॉर्नर’ था. जब वो 60 साल के हुए तो उन्होंने उन्हें लिखा, ‘लोग आपसे शतायु होने के लिए कह रहे होंगे, मगर मैं आपसे ऐसा नहीं कहता. मैं कहता हूँ कि आप जवान रहें और सक्रिय रहें.’
उनके बारे में परसाई ने लिखा था, ‘आँखों का उपयोग नामवरजी हथियार की तरह करते हैं. उनकी आँखों में शैतानी चमक तब भी आ जाती थी और आज भी आ जाती है. उनके लेखन में एक सहज प्रवाह है. उनकी भाषा में विलक्षण ‘तरलता’ है. कटाक्ष भी है और ‘वाकपटुता’ भी है.’

बेचन शर्मा उग्र से वाकयुद्ध
बेचन शर्मा उग्र एक फक्कड़ लीजेंड थे और बहुत ही बदज़बान भी. उनसे एक बार परसाई की चिट्ठी-पत्री हो गई. एक प्रकाशक ने उनसे एक कहानी संग्रह तैयार करने के लिए कहा.
उसमें उन्होंने उग्र की कहानी ‘उसकी माँ’ लेना तय किया. उग्र को लिख भी दिया कि प्रकाशक आपको 100 रुपए भेजेगा. पर प्रकाशक ने संग्रह छापने का विचार छोड़ दिया.
करीब पाँच महीने बाद परसाई को उग्र का पत्र मिला, जिसमें लिखा था, “वो पुस्तक तो अब खूब बिक रही होगी. प्रकाशक और तुम खूब पैसे कमा रहे होगे पर तुमने मुझे 100 रुपए नहीं भेजे. मैं तुम जैसे कमीने, बेईमान और लुच्चे लेखकों को अच्छी तरह से जानता हूँ.”

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परसाई ने उन्हें जवाब में लिखा, ‘प्रकाशक ने वो पुस्तक नहीं छापी, इसलिए आपको पैसे नहीं भेजे गए. जहाँ तक मुझे दी गई आपकी गालियों का सवाल है, मैंने काफ़ी गालियाँ आप से ही सीखी हैं. और अपनी प्रतिभा से कुछ और गालियाँ जोड़ कर मैंने उनका काफ़ी बड़ा भंडार कर लिया है. मैं आपसे श्रेष्ठ गालियों का नमूना इसी पत्र में पेश कर सकता हूँ पर इस बार आपको छोड़ रहा हूँ.’
इसके जवाब में उनका एक कार्ड आया जिस पर सिर्फ़ इतना लिखा था ‘शाबाश पट्ठे!’
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