कवि अशोक वाजपेयी ने लगाया सेंसरशिप का आरोप, रेख़्ता ने किया इनकार, क्या है पूरा मामला

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- Author, कमलेश मठेनी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
वरिष्ठ साहित्यकार अशोक वाजपेयी ने दिल्ली में हो रहे 'अर्थ कल्चर फेस्ट' में 'सेंसरशिप' का आरोप लगाया है.
उन्होंने शुक्रवार को कहा कि वो दिल्ली में होने वाले 'अर्थ कल्चर फेस्ट' में हिस्सा नहीं लेंगे क्योंकि इसमें कविताओं पर सेंसरशिप लगाई जा रही है.
अशोक वाजपेयी का आरोप है कि कार्यक्रम के आयोजकों ने राजनीतिक आलोचना वाली कविताओं को लेकर सवाल पूछा है जबकि आयोजकों का कहना है कि उनकी तरफ़ से ऐसा कोई सवाल नहीं पूछा गया है.
दिल्ली में सुंदर नर्सरी ग्राउंड में 24 से 26 फरवरी तक तीन दिवसीय 'अर्थ कल्चर फेस्ट' आयोजित हो रहा है.
इसमें अशोक वाजपेयी को 'हिंदी कविता संध्या' में कविता पाठ करना था. इसमें अन्य कवि और लेखक भी शामिल होने वाले थे जैसे कवयित्री अनामिका, अभिनेता और लेखक मानव कौल, कवि और लेखक बद्री नारायण और कवि दिनेश कुशवाहा.
लेकिन, कार्यक्रम के एक दिन पहले अशोक वाजपेयी ने इसमें शामिल होने से इनकार कर दिया. उन्होंने 'कभी-कभार' नाम के एक फेसबुक पन्ने पर भी इसकी जानकारी दी.
अशोक वायपेयी साहित्य जगत में जाना-माना नाम हैं. वो वरिष्ठ कवि होने के साथ-साथ पूर्व नौकरशाह हैं. फिलहाल वो 'रज़ा फाउंडेशन' के मैनेजिंग ट्रस्टी हैं. वो साहित्यिक कार्यक्रमों में अक्सर हिस्सा लेते रहते हैं.
अशोक वायपेयी ने इस घटनाक्रम पर बीबीसी हिंदी से बात की. उन्होंने कहा, ''कुछ हफ़्ते पहले अर्थ फाउंडेशन के अधिकारी मेरे पास आये थे. उन्होंने बताया कि सुंदर नर्सरी में एक कविता पाठ का आयोजन करना है और मुझे इसके लिए बुलाने आए हैं. मुझे उस समय लगा कि वो रेख़्ता से हैं. उन्होंने अर्थ और ज़ी फाउंडेशन का भी ज़िक्र किया होगा लेकिन मैंने उस पर ध्यान नहीं दिया.''
''फिर मैं देश से बाहर चला गया था. फिर 23 तारीख़ को एक सज्जन का फ़ोन आया. मुझे लगा कि वो रेख़्ता फाउंडेशन के होंगे. उन्होंने कहा कि आप आप कौन-सी कविताएं पढ़ेंगे और उनका विषय क्या होगा. मैंने बताया कि मैंने सात कोरस लिखे हैं जो ग्रीक नाटक परंपरा से हैं. उनमें से दो-तीन पढूंगा.''

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वायपेयी ने कहा,''उन्होंने पूछा कि आपकी कविता में राजनीति या सरकार की आलोचना तो नहीं है. मैंने कहा कि सीधे-सीधे तो नहीं है लेकिन वो आज के हालात पर हैं. पर इस पर मेरा माथा ठनका कि ये तो एक तरह की बहुत ही बारीक सेंसरशिप है. तो मैंने फौरन ही रेख़्ता फाउंडेशन को फ़ोन करके आने से मना कर दिया. मैं किसी सेंसरशिप को बर्दाश्त नहीं कर सकता.''
लेकिन, फ़ेसबुक पर इसकी घोषणा करने को लेकर वो बताते हैं, ''24 तारीख़ की सुबह मैंने फेसबुक पर उस कविता पाठ के बारे में एक पोस्टर देखा था जिसमें मेरी तस्वीर थी. इसलिए मैंने ये बताना उचित समझा कि मैं नहीं आ रहा हूं और क्यों नहीं आ रहा हूं.''

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क्या है अर्थ- ए कल्चर फेस्ट
'अर्थ- ए कल्चर फेस्ट' एक सांस्कृतिक कार्यक्रम है जिसे ज़ी समूह आयोजित करता है. इसमें साहित्यकार, फ़िल्म निर्माता और राजनेता शामिल होते रहे हैं. इसमें कई साहित्यिक, सांस्कृतिक और सामाजिक मुद्दों पर चर्चा होती है.
इस आयोजन में 24 फरवरी को करीब आठ बजे से एक कार्यक्रम होना था 'हिंदी कविता संध्या'. सिर्फ़ इस कार्यक्रम के लिए ज़ी समूह रेख़्ता फाउंडेशन, हिंदवी से जुड़ा था.
रेख़्ता फाउंडेशन की ज़िम्मेदारी इसको तैयार करना था और वो ही कवियों और लेखकों के संपर्क में थे. रेख़्ता की हिंदी संपादक के मुताबिक उन्हें इस कार्यक्रम में पांच कवि बुलाने थे.
रेख़्ता की हिंदी संपादक अनुराधा शर्मा अशोक वाजपेयी को निमंत्रण देने गई थीं. उनका कहना है कि पहले वाजपेयी ने कार्यक्रम के लिए हां कहा था लेकिन बाद में कोई और व्यवस्तता के चलते मना कर दिया. लेकिन, उनसे राजनीति की आलोचना से जुड़ा कोई सवाल नहीं पूछा गया था.
अनुराधा शर्मा ने बताया, ''करीब एक महीना पहले जब कार्यक्रम तैयार हो रहा था तो सबसे पहले मैं अपने एक सहकर्मी के साथ अशोक वाजपेयी जी के यहां निमंत्रण देने गई थी. उन्होंने हां बोला था और उन्हें पता था कि कार्यक्रम ज़ी का है.''
''फिर कार्यक्रम से दो दिन पहले उन्होंने कहा कि वो इसमें शामिल नहीं हो पाएंगे. उन्हें किसी अन्य कार्यक्रम में शामिल होना है. मैंने उनसे कहा कि ये गलत है क्योंकि रेख़्ता से आपकी पहले बात हुई है. फिर उन्होंने समय निकालकर आने के लिए हां कर दी.''
''लेकिन, फिर एक दिन पहले फ़ोन आया कि उनसे राजनीतिक टिप्पणियों के बारे में पूछा गया है जो उन्हें ठीक नहीं लगा इसलिए वो कार्यक्रम में शामिल नहीं होंगे. मैंने कुछ नहीं कहा क्योंकि मैं पहले ही उनसे बहुत अनुरोध कर चुकी थी. फिर भी हम उनके इनकार का सम्मान करते हैं.''
अनुराधा शर्मा ने कहा, ''हमारे यहां से सिर्फ़ ये पूछा गया था कि क्या आपकी कोई थीम है. तब उन्होंने बताया था कि ग्रीस नाटकों से कोरस लिखे हैं जो वो कार्यक्रम में बोलेंगे. सात कविताएं हैं जिनमें से तीन सुनाएंगे. ये हम अन्य कवियों और लेखकों से भी पूछते हैं ताकि कार्यक्रम तैयार करने में सुविधा हो सके.''
वह कहती हैं, "रेख़्ता भाषा और साहित्य का संसार है और हम राजनीतिक और धार्मिक बातों से दूर रहते हैं क्योंकि हमें साहित्यिक काम करने हैं. फिर अशोक वाजपेयी अपने आप में एक मंच हैं उनकी आवाज़ को कौन दबा सकता है तो रेख़्ता ऐसा क्यों करेगा."

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अन्य वक्ताओं ने भी की राजनीतिक टिप्पणियां
रेख़्ता फाउंडेशन के हेड ऑफ़ कम्यूनिकेशन में सतीश गुप्ता भी अनुराधा शर्मा की तरह राजनीति से जुड़ा सवाल पूछने की बात से इनकार करते हैं.
उन्होंने कहा, ''रेख़्ता इतने आयोजन करते हैं और हमने कभी किसी से नहीं पूछा कि उन्हें क्या बोलना है. यहां वक्ता आते हैं और बोलते हैं. कोई राजनीतिक टिप्पणी भी कर जाता है. हम किसी को नहीं रोकते. वो वरिष्ठ कवि हैं तो मेरे दफ़्तर से कोई जूनियर उनसे ऐसा कैसे पूछ सकता है.''
सोशल मीडिया पर कुछ लोग रेख़्ता फाउंडेशन पर दबाव होने की बात कह रहे हैं. इस पर सतीश गुप्ता कहते हैं, ''अगर हम पर ज़ी का दबाव होता तो उस कार्यक्रम में प्रकाश राज भी आए थे. वो अपने सरकार विरोधी रुख के लिए जाने जाते हैं.''
फ़िल्म निर्माता और अभिनेता प्रकाश राज भी 24 तारीख़ को 'अर्थ- द कल्चर फेस्ट' में किसी अन्य कार्यक्रम में शामिल हुए थे. इस कार्यक्रम में फ़िल्मों के बॉयकॉट और 'पठान' फ़िल्म के गाने 'बेशर्म रंग' को लेकर हुए विवाद पर चर्चा हुई थी.
इसी तरह 'हिंदी कविता संध्या' में भी एक कवि ने सत्ता को लेकर एक व्यंग्य किया था. हालांकि, अन्य कवियों और लेखकों से कार्यक्रम से पहले क्या पूछा गया था ये ज़ाहिर नहीं हुआ है.
इस पर अशोक बाजपेयी कहते हैं, ''मुझे ये पता है कि वो बार-बार ये कह रहे हैं कि उन्होंने जावेद अख़्तर और अन्य को भी बुलाया है और उन पर कोई बंदिश नहीं लगी. लेकिन, फिर वही बताएं कि मुझसे ऐसा क्यों पूछा गया.''
''रेख़्ता के कार्यक्रमों में ऐसा कभी नहीं हुआ. रेख़्ता की गतिविधियों का मैं प्रशंसक रहा हूं और अभी भी हूं. लेकिन, इस तरह की बारीक सेंसरशिप लागू करना ये रेख़्ता की अपनी परंपरा के भी विरुद्ध है.''

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क्या राजनीतिक झुकाव ज़िम्मेदार?
किसी गलतफहमी से इनकार करते हुए अशोक वाजपेयी कहते हैं, ''इसमें कोई गलतफहमी नहीं है. अगर उन्होंने सिर्फ़ थीम पूछी होती तो मैं ये सब बातें क्यों कहता. चाहे डर हो या सावधानी के कारण लेकिन उन्होंने मुझसे ये पूछा था.''
कांग्रेस की 'भारत जोड़ो यात्रा' में भी अशोक वाजपेयी शामिल हुए थे. हालिया वाकये का इससे कोई संबंध है इस सवाल पर वाजपेयी कहते हैं, ''मुझे ऐसा नहीं लगता. लेकिन, इस समय की राजनीति जिस तरह षड्यंत्र करती है और षड्यंत्र खोजती रहती है तो कुछ भी संबंध बनाया जा सकता है.''
कुछ लोगों का कहना है कि अशोक वाजपेयी ने मध्य प्रदेश में कद्दावर अधिकारी रहते हुए कुछ ऐसे आयोजन किए थे, जिसमें सरकार को लेकर कोई सवाल नहीं उठे थे, जैसे कि आपातकाल के दौरान हुआ साहित्यिक आयोजन हो या फिर भोपाल गैस कांड के बाद साहित्यिक आयोजन.
उस दौर में केंद्र में और मध्य प्रदेश में भी कांग्रेस की सरकारें थीं. हालांकि, अभी तक किसी कवि या लेखक या कलाकार ने सीधे तौर पर अशोक वाजपेयी की ओर से किसी तरह के पाबंदी लगाने की बात नहीं कही है.
लेकिन, अशोक वाजपेयी इन आरोपों से इनकार करते हुए कहते हैं, ''मैंने राजनीतिक झुकाव को देखते हुए कभी किसी पर प्रतिबंध नहीं लगाया. कोई इसका सबूत दे दे. मैंने समावेशिता का उदार परिसर बनाने का प्रयत्न किया है वो हिंदी में अद्वितीय है.''
इस मामले पर ज़ी समूह ने बयान जारी किया है. ज़ी ने कहा है, ''अर्थ के फेस्टिवल के निर्देशकों को अशोक वाजपेयी जी के बयान के बारे में जानकारी मिली और उनका कहना है कि फेस्टिवल में उनका स्वागत किया जाता है ताकि वो अपने बहुमूल्य विचार रख सकें. ना ही फेस्टिवल के निर्देशकों और ना ही आयोजकों ने उन्हें अपने विचार को सीमित रखने के लिए कहा है. हम अलग-अलग विचारों की सराहना करते हैं और समाज के सभी वर्गों से वक्ताओं का स्वागत करते हैं.''
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