होली: कभी भारत से दुनियाभर में जाता था गोमूत्र से बना पीला रंग

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- Author, जान्हवी मूले
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
नीला दुर्लभ खनिज, ममी अवशेष और गोमूत्र. ये सब एक दूसरे से बेहद अलग हैं लेकिन इन सभी का उपयोग कभी रंग बनाने के लिए किया जाता था.
इस बात पर यक़ीन करना भले मुश्किल है कि दुनिया की कई मशहूर पेंटिंग्स इनसे बने अजीब रंगों से तैयार की गई हैं.
प्राचीन काल में रंगों के मनपसंद शेड तैयार करना आज की तरह आसान नहीं था. तब सिंथेटिक रंग बनाने की कोई तकनीक भी मौजूद नहीं थी. लेकिन लोग रंगों का इस्तेमाल करते थे.
चाहे वह अजंता की पेंटिंग हों, मुगल काल के बने लघुचित्र हों या मध्यकालीन यूरोपीय पेंटिंग हों.
इनमें चित्रित रंगों का इस्तेमाल कैसे हुआ, ये जानना भी कम दिलचस्प नहीं है.
गोमूत्र से बना भारतीय पीला रंग
'इंडियन येलो' नारंगी रंग के साथ एक पीला रंग है. इसका उपयोग चमकीले सुनहरे रंगों को चित्रित करने के लिए किया जाता था.
इस रंगद्रव्य का उपयोग 15वीं शताब्दी में भारत में शुरू हुआ और वहां से जल्द ही यह यूरोप तक पहुंच गया.
यह रंग मुग़ल काल के कई लघुचित्रों में पाया जाता है.
यूरोप में कई चित्रकारों ने इस छाया का उपयोग भित्ति चित्रों, तैल चित्रों और जलरंगों में भी किया.

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विंसेंट वान गॉग की 'द स्टारी नाइट' में पीला चाँद और अंग्रेज़ चित्रकार जोसेफ मैलोर्ड विलियम टर्नर की पेंटिंग में सूरज की रोशनी भी इसी भारतीय पीले रंग की वजह से दिखती है.
लेकिन यह रंग कैसे बना? दावा किया जा रहा है कि यह डाई गोमूत्र से बनाई गई थी. लेकिन आमतौर पर उसके लिए गाय के मूत्र का इस्तेमाल नहीं किया जाता था.
दावे के मुताबिक गोमूत्र को पीला रंग देने के लिए इन गायों को केवल आम के पत्ते खिलाए जाते थे. इसके लिए उन्हें भूखा भी रखा जाता था, इसलिए वे आम के पत्ते खाते थे.
ऐसी गायों के गोमूत्र को मिट्टी के बर्तनों में एकत्र किया जाता था और फिर उसे उबाला जाता था. इसके बाद छानकर और सुखाकर छोटे छोटे टुकड़े तैयार किए जाते थे.
चित्रकार इसे पैलेट पर लेते थे, पानी या तेल के साथ मिलाते थे और अपनी आवश्यकता के अनुसार चित्र बनाते थे.
यह रंग कैसे तैयार किया जाता है, इसकी जानकारी देने वाली एक रिपोर्ट 1883 में लंदन में सोसाइटी ऑफ आर्ट्स में प्रस्तुत की गई थी.
इस रिपोर्ट को तैयार करने के लिए प्रसिद्ध लेखक त्रिलोकीनाथ मुखोपाध्याय मौजूदा समय के बिहार के मुंगेर गए और वहां उन्होंने इनके बनने पर शोध किया था.
उन्होंने इसके लिए गायों पर होने वाले अत्याचारों का ब्यौरा भी लिखा था. 1908 में इस रंग पर प्रतिबंध लगा दिया गया और बाद में आधुनिक रसायनों का उपयोग करके पीले रंग का रंग तैयार किया गया.
अजंता के चित्र

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प्राचीन काल में भारतीय चित्रकला कितनी समृद्ध थी इसकी झलक अजंता के तैलचित्रों से मिलती है. इन चित्रों में लाल और पीले रंग का प्रयोग काफ़ी ज़्यादा दिखता है.
यह लाल-पीला रंग, लाल गेरू और पीला गेरू से बना है. दिवाली में रंगोली बनाने से पहले ज़मीन पर बिछाए जाने वाले रंग भी गेरू से तैयार किए जाते थे.
दरअसल गेरू लाल-पीले रंग की मिट्टी है. ऐसी मिट्टी में आयरन ऑक्साइड की मात्रा अधिक होती है. इसका रंग मिट्टी में लोहे और अन्य तत्वों की मात्रा के मुताबिक बदलता भी रहता है.

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कुछ विद्वानों के अनुसार, गेरू मनुष्य द्वारा प्रयोग किया जाने वाला पहला रंगद्रव्य रहा होगा.
क्योंकि गेरू का उपयोग दुनिया भर में गुफा चित्रों में किया जाता है. यानि कि यह रंगद्रव्य लगभग एक लाख साल पुराना है.
आदिवासी क्षेत्र में आज भी आदिवासी अपने शरीर को रंगने के लिए इसी का उपयोग करते हैं.

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लापीस लाजुली और हान पर्पल यानी नीले रंग का जादू
अजंता के चित्रों में एक और रंग याद आता है, जो नीले समुद्र की तरह गहरा, चमकीला और कुछ-कुछ रहस्यमय दिखता है.
आज के दौर में अल्ट्रामरीन के नाम से मशहूर नीले रंग के इस शेड की कहानी भी दिलचस्प है. इसका रिश्ता सीधे तौर पर अफ़ग़ानिस्तान से जुड़ा है.
दरअसल खनिज 'लापीस लाजुली' अफ़ग़ानिस्तान के उत्तरी भाग की खदानों में पाया जाता है. इसे हिंदी और अरबी में लाजवर्द या राजावर्त के नाम से जाना जाता है.

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इस खनिज का उपयोग हड़प्पा सभ्यता (सिंधु सभ्यता) के दौरान भी किया जाता था. मेसोपोटामिया में लाजुली मोती भी पाए गए हैं.
प्राचीन मिस्रवासी भी नील नदी और शाही नीले रंग से आकर्षित थे. लेकिन वे इस रंग को वहां लाने का जोख़िम नहीं उठा पाए.
यही कारण है कि मिस्र के कलाकारों ने सिलिका, चूना, तांबा और क्षार का उपयोग करके रासायनिक रंग बनाए.

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मिस्रवासियों द्वारा बनाया गया यह रंग दुनिया का पहला रासायनिक रंगद्रव्य माना गया.
चीन में भी, बेरियम, तांबा और सिलिकेट रंगद्रव्य का उपयोग करके नीले और बैंगनी रंग तैयार किए गए थे. इन रंगों को हान ब्लू और हान पर्पल के नाम से जाना जाता है.
भारत में उससे पहले भी नील का उपयोग विशेषकर नीले रंग के कपड़े बनाने के लिए किया जाने लगा था लेकिन लापीस लाजुली के रंग का आकर्षण उससे ज़्यादा था.
यह रंगद्रव्य नीले खनिज के बारीक पाउडर को पिघले हुए मोम, तेल, पाइन राल में मिलाकर तैयार किया जाता था.

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यह खनिज बेहद दुर्लभ था और उस समय तक केवल अफ़ग़ानिस्तान में ही मिलता था. यही वजह है कि पश्चिम में नीले रंग का ज़्यादा प्रयोग भी नहीं होता था और कुछ भाषाओं में नीले रंग के लिए एक शब्द भी नहीं था.
लेकिन करीब एक हज़ार साल पहले लाजवर्द अरब व्यापारियों के साथ यूरोप पहुंचा और उसके बाद वहां की तस्वीर बदल गई. उस समय यूरोप में यह सोने से भी अधिक महंगा था इसलिए इसका प्रयोग कुछ ही स्थानों पर किया गया.
इस रंग का उपयोग यीशु, मैरी और कभी-कभी शाही परिवार की महत्वपूर्ण हस्तियों को चित्रित करने के लिए किया जाता था.
यहां तक कि माइकल एंजेलो और राफेल जैसे कलाकार भी इस रंग का ख़र्च नहीं उठा सकते थे. डच कलाकार जोहान्स वर्मीर ने अपनी पेंटिंग्स में इस रंग का खुलकर इस्तेमाल किया, लेकिन वे इसके चलते कर्ज़ के बोझ में दब गए थे.
19वीं शताब्दी से नीले सिंथेटिक रंगद्रव्य का उपयोग किया जाने लगा. लेकिन लापीस लाजुली का आकर्षण आज भी कायम है.
सिंदूर

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सिनेबार यानी सिंदूर, पारे का एक अयस्क है. इसे विषैला भी माना जाता है.
इस ज्वालामुखीय खनिज का उपयोग प्राचीन काल में चमकदार लाल रंग बनाने के लिए किया जाता था.
इस रंग को सिन्दूरी लाल के नाम से जाना जाता है.
चीन, भारत और माया (मेक्सिको की मेसो अमेरिकन) सभ्यता में इस पदार्थ का उपयोग रंग बनाने के लिए किया जाता था.
मम्मी ब्राउन

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सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी में, मिस्र में मम्मी ब्राउन नामक भूरा रंगद्रव्य काफ़ी लोकप्रिय हो गया था.
कला इतिहासकार विक्टोरिया फिनले ने अपनी पुस्तक कलर्स-ट्रेवल्स थ्रू द पेंटबॉक्स में इसके बारे में बताया है.
चूंकि यह रंग कुछ हद तक पारदर्शी होता है, इसलिए इसका उपयोग चित्रों में मानव शरीर के आकार को रंगने या शैडो बनाने के लिए किया जाता था.
इसे बनाने में बेहद प्राचीन ममियों के अवशेषों का इस्तेमाल किया गया था.
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