जन्माष्टमी: कृष्ण की द्वारका को खोजने के लिए समुद्र की तलहटी में गए गोताखोरों को क्या मिला?

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- Author, जयदीप वसंत
- पदनाम, बीबीसी गुजराती सेवा
द्वारका हिंदुओं के सप्तपुरियों और चार धाम के पवित्र तीर्थ स्थलों में से एक है.
हिंदू मान्यता और महाभारत काल की किंवदंतियों के मुताबिक़ इस शहर की स्थापना मूल रूप से भगवान कृष्ण ने की थी और उनकी मृत्यु के बाद यह पानी में डूब गया था.
देवभूमि द्वारका गुजरात के आधुनिक द्वारका ज़िले में अरब सागर के तट पर स्थित है. इसके डूबने का सही समय का अनुमान लगाना एक मुश्किल काम है लेकिन परिस्थितिजन्य ऐसे साक्ष्य मौजूद हैं, जिनके बारे में अनुमान लगाया जा सकता है.
भारत सरकार के पुरातत्व विभाग ने द्वारका सागर में शोध एवं उत्खनन कार्य किया है, जिससे कुछ रोचक वस्तुएँ और तथ्य सामने आए हैं.
दरअसल, भारत ही नहीं दुनिया के कई दूसरे देशों में प्रलय, जल प्रलय, ज्वालामुखी जैसी घटनाओं, या फिर बाढ़ में शहरों के डूबने की घटनाओं के उदाहरण मौजूद हैं.
इसी आधार पर 1966 में वैज्ञानिक डोराती विटालियानो ने भू-विज्ञान की एक शाखा के तौर पर जियोमिथोलॉजी की स्थापना की, जिसका उद्देश्य किसी मिथक के पीछे के भूवैज्ञानिक घटना की जांच करना था.
हिंदू मान्यता के अनुसार ब्रह्मा 'सृष्टि के रचयिता' हैं, विष्णु 'सृष्टि के पालनकर्ता' हैं और शिव 'सृष्टि के संहारक' हैं. कृष्ण भगवान विष्णु के आठवें अवतार हैं और उनके जन्मदिन पर द्वारका और मथुरा सहित पूरे देश में जन्माष्टमी के रूप में मनाया जाता है.

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मान्यताओं में कृष्ण और द्वारका
हिंदुओं के पवित्र ग्रंथ श्रीमद्भागवत महापुराण में कृष्ण के जन्म, पालन-पोषण, कंस-वध, मथुरा वापसी, पलायन, द्वारका की स्थापना, पराक्रम और यादवों के पतन का उल्लेख है. इसके अलावा 'महाभारत' और 'विष्णुपुराण' समेत अन्य ग्रंथों में भी उनके बारे में इन बातों का ज़िक्र मिलता है.
'श्रीमद्भागवत महापुराण' और महाकाव्य 'महाभारत' के अनुसार, कृष्ण द्वारा कंस का वध करने से मगध का शासक जरासंध क्रोधित हो गया, क्योंकि कंस उसकी दो पुत्रियों अस्ति और प्राक्षी का पति था.
जरासंध ने 17 बार मथुरा पर आक्रमण किया, हर बार कृष्ण और बलराम ने अपने शहर की रक्षा की. जरासंध ने जब 18वीं बार हमला किया तो मथुरा की हार निश्चित लगने लगी तब कृष्ण नगरवासियों सहित द्वारका आ गए और उन्होंने यहां नया नगर बसाया.
धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक कृष्ण ने एक नया शहर बसाने के लिए समुद्र से 12 योजन (एक योजन- सात से आठ किलोमीटर) भूमि प्राप्त की थी.
शहर का निर्माण देवताओं के वस्तुकार विश्वकर्मा ने किया था. मान्यता के मुताबिक शहर में कृष्ण की 16 हजार 108 पत्नियों के लिए महल और नगरवासियों के लिए घर बनाए गए थे.
मथुरा छोड़ने के चलते ही कृष्ण को रणछोड़ नाम से जाना गया है जबकि द्वारका के संस्थापक के तौर पर उन्हें द्वारकाधीश भी कहा जाता है.
हिंदू मान्यता के अनुसार, भगवान राम विष्णु के सातवें अवतार थे और 'रामायण' उनकी जीवनी है. वे 'मर्यदा पुरुषोत्तम' थे जबकि कृष्ण 'पूर्णपुरुषोत्तम' थे. उनकी मृत्यु के बाद द्वारका में जलप्रलय आ गया.

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कैसे नष्ट हुई थी द्वारका?
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के पूर्व पुरातत्वविद् के. के. मोहम्मद कहते हैं कि महाभारत का काल 1400 या 1500 ईसा पूर्व था. 'श्रीमद्भागवत महापुराण' में बताया गया है, '125 वर्षों तक पृथ्वी पर शासन करने के बाद, कृष्ण वैकुंठवासी बन गए. उसके बाद समुद्र ने श्रीकृष्ण का महल छोड़कर सारी भूमि वापस ले ली.'
हालांकि, हिंदुओं की धार्मिक आस्था और पुरातत्वविदों के समय अनुमान के बीच लगभग 1,500 साल का अंतर है.
पुराणों और आख्यानों के विद्वान देवदत्त पटनायक (द किंगडम ऑफ द्वारका, डिस्कवरी चैनल) में कहते हैं, 'कुरुक्षेत्र का युद्ध समाप्त होने के बाद, जब भगवान कृष्ण कौरवों की मां गांधारी से मिलने गए, तो उन्होंने कृष्ण को श्राप दिया कि हमारा राजवंश नष्ट हो गया, तुम्हारा राजवंश भी तुम्हारी आँखों के सामने नष्ट हो जाएगा. 36 साल बाद गांधारी का श्राप सच हुआ और कृष्ण कुछ नहीं कर सके.'
हिंदू मान्यता के अनुसार, कौरवों और पांडवों का कुरुक्षेत्र के रेगिस्तानी इलाके में आमना-सामना हुआ था. हालाँकि, अर्जुन अपने परिवार के सदस्यों, गुरुओं और सम्माननीय लोगों को युद्ध मैदान में सामने देखकर, युद्ध लड़ने का साहस नहीं जुटा पा रहे थे.
ऐसे समय में, कुरुक्षेत्र युद्ध के मैदान में, कृष्ण अर्जुन को धर्म की रक्षा और क्षत्रिय धर्म के लिए लड़ने के लिए प्रोत्साहित करते हैं. यह उपदेश ही भगवद् गीता के तौर पर जाना जाता है, जिसके बाद अर्जुन युद्ध के लिए तैयार हुए.
इस दिन को हिंदू पीढ़ी दर पीढ़ी गीता जयंती के तौर पर मनाते आए हैं. इसके बाद महाभारत का युद्ध 18 दिनों तक चलता है, जिसमें अंततः पांडवों की जीत हुई थी.
वर्ष 2023 में 5 हजार 160वीं गीता जयंती मनाई जाएगी. इस प्रकार कुरुक्षेत्र के युद्ध और गांधारी के श्राप की पूर्ति के बीच लगभग 36-37 साल का अंतर सामने आता है.

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द्वारका समुद्र के तल में कैसे डूब गई?
1960 के दशक की शुरुआत में, द्वारका में द्वारकाधीश जगत मंदिर के पास एक घर को ध्वस्त करते समय मंदिर का शीर्ष पाया गया था.
तब यह खुदाई डेक्कन कॉलेज, पुणे ने की थी और इसमें नौवीं शताब्दी के विष्णु मंदिर के अवशेष मिले थे. अन्य स्थानों पर अन्वेषण के दौरान दूसरी वस्तुएं मिलीं थीं.
इसके आधार पर वैज्ञानिकों का अनुमान है कि द्वारका को एक से अधिक बार नष्ट किया गया था. जबकि स्थानीय लोगों का मानना है कि द्वारका छह बार डूब चुकी है और वर्तमान द्वारका सातवीं द्वारका है.
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पूर्व महानिदेशक और जाने माने पुरातत्ववेत्ता डॉ. शिकारीपुर रंगनाथ राव वैसे तो कर्नाटक के थे लेकिन उन्होंने गुजरात में अपना घर बना लिया था.
इसके बाद उन्होंने वहां समुद्र में और अधिक शोध करने का फ़ैसला किया. उन्होंने राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान की ओर से पानी के नीचे पुरातत्व खोजबीन का बीड़ा उठाया.

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क्या क्या मिला है शोधकर्ताओं को
1989 के आसपास खोजबीन के दौरान समुद्री घास और रेत के नीचे आयताकार पत्थरों का पता चला, जिन्हें शोधकर्ताओं ने एक संरचना का हिस्सा माना था.
इसके अलावा अर्धवृत्ताकार पत्थर भी मिले हैं, जो मानव निर्मित थे.
इसके अलावा पत्थर के लंगर भी मिले हैं, जिनमें छेनी से छेद किये गये थे. जिनका आकार लगभग एक जैसा है. यह पत्थर चूना पत्थर था, जो सदियों से आसपास के क्षेत्र में बहुतायत में पाया जाता है, जिसका उपयोग इंटरलॉकिंग या लकड़ी भरने के लिए किया गया होगा.
इसके अलावा मिट्टी के बर्तन, आभूषण और मुद्राएं भी मिलीं. इस प्रकार के सिक्के ओमान, बहरीन और मेसोपोटामिया यानी इराक में भी पाए गए थे.
2007 के सर्वेक्षण से पहले समुद्र में दो नॉटिकल मील गुणा एक नॉटिकल मील इलाक़े में हाइड्रोग्राफिक सर्वेक्षण किया गया था. जिसके आधार पर जल प्रवाह की भविष्यवाणी की गई थी.
इसके आधार पर 200 वर्ग मीटर का क्षेत्रफल ग्रिडिंग (ग्राफ़ के अनुसार ऊर्ध्वाधर और क्षैतिज रेखाओं द्वारा चित्रण) द्वारा निर्धारित किया गया था. अंत में मार्किंग के आधार पर 50 वर्ग मीटर के क्षेत्र में सर्वे किया गया.
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अतिरिक्त महानिदेशक डॉ. आलोक त्रिपाठी ने पहले बीबीसी को बताया था, "इसके बाद 1979 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा एक और खुदाई की गई, जिसमें कुछ जहाजों के अवशेष पाए गए. माना जाता है कि वे 2000 ईसा पूर्व के थे. द्वारका के आसपास खुदाई और खोज में कई पुरातात्विक अवशेष मिले."

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उनके अनुसार, "500 से अधिक जीवाश्म पाए गए हैं. इन वस्तुओं की कार्बन डेटिंग से यह साबित होता है कि यहां की संस्कृति चरणों में कैसे विकसित हुई होगी और जो मिट्टी के बर्तन मिले हैं, वे 2000 ईसा पूर्व के हैं. समुद्र की गहराई से पत्थर की वस्तुएं भी मिली हैं. हालाँकि इसके साथ मिट्टी के बर्तन आदि नहीं मिले हैं, क्योंकि उस हिस्से में समुद्र की धारा बहुत तेज़ रही है.”
समुद्र के स्तर में ऐतिहासिक वृद्धि और गिरावट के बारे में बात करते हुए सीएसआईआर-एनआईओ के पूर्व मुख्य वैज्ञानिक डॉ. राजीव निगम कहते हैं, "लगभग 15,000 साल पहले, समुद्र का स्तर अब की तुलना में 100 मीटर कम था. उसके बाद, समुद्र का स्तर फिर से थोड़ा बढ़ गया और 7,000 साल पहले यह आज की तुलना में अधिक था."
"लगभग 3500 साल पहले इसमें फिर से गिरावट आई और उसी समय द्वारका शहर की स्थापना हुई होगी. लेकिन फिर समुद्र का स्तर फिर से बढ़ने लगा और शहर डूबने लगा."
द्वारका के खोजबीन वाले जगह पर ज्वारीय अंतर्धारा के कारण, केवल दिसंबर और जनवरी ही पानी के नीचे गोता लगाने के लिए उपयुक्त हैं.
चूंकि देश में अंडरवॉटर पुरातत्वविद बहुत कम हैं, इसलिए यह शोध धीमी गति से आगे बढ़ा है.
पुरातत्वविद् (अब एएसआई से सेवानिवृत्त) के. के. मोहम्मद का मानना है कि शोध के लिए पर्याप्त संसाधन भी उपलब्ध नहीं हैं.

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कहां-कहां है डूबे शहर की मान्यता
पश्चिमी सोलोमन द्वीप समूह, सेंटोरिनी (ग्रीस), ऑस्ट्रेलिया द्वीप में भी 'डूबे हुए शहर' की मान्यता है.
ऑस्ट्रेलिया के आदिवासियों का मानना है कि समुद्र का जलस्तर बढ़ने के कारण ज़मीन का एक बड़ा क्षेत्र जलमग्न हो गया था और इसको लेकर कई किंवदंतियां प्रचलित हैं.
ऐसी एक मान्यता तमिलनाडु के पास महाबलीपुरम में भी प्रचलित है. साल 2004 की सुनामी के दौरान ये बात सामने आई थी कि इसके कुछ हिस्से समुद्र से बाहर आ गए थे.
द्वारका गुजरात के पश्चिमी छोर पर अरब सागर पर स्थित है.
'नेचर कम्युनिकेशंस जर्नल' में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक आने वाले दिनों में समुद्र स्तर बढ़ने से सूरत, कच्छ, भावनगर और भरूच भी प्रभावित हो सकते हैं.
वहीं जामनगर, देवभूमि द्वारका, पोरबंदर, जूनागढ़, अमरेली, नवसारी, वलसाड और गिर सोमनाथ मध्यम से हल्के रूप से प्रभावित होंगे.
इसके अलावा रिपोर्ट में यह आशंका भी व्यक्त की गई है कि कच्छ एक बार फिर द्वीप बन जाएगा.
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