इस्लाम का स्वर्ण युग: अरब दर्शन के संस्थापक अल-किंदी जिन्होंने विज्ञान पर भी किया काम

अरब दर्शन के संस्थापक अल-किंदी कौन थे और विज्ञान में उनका क्या योगदान था?

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बीबीसी रेडियो थ्री की विशेष श्रृंखला 'इस्लाम का स्वर्ण युग' की इस कड़ी में, प्रोफ़ेसर जेम्स मॉन्टगोमरी अरब दार्शनिक अल-किंदी के बारे में बता रहे हैं. पढ़िए उनका लेख -

अबू युसूफ़ याक़ूब इब्ने इसहाक़ अल-किंदी नौवीं सदी के दौरान इराक़ में रहते थे. इस दौर को मानव चिंतन और सांस्कृतिक गतिविधियों का एक महत्वपूर्ण दौर माना जाता था. यह वह समय था जब बग़दाद, एथेंस और रोम जैसे बड़े केंद्रों के साथ आसानी से मुक़ाबला किया करता था.

किंदी नाम अरब क़बीले किंदा से जुड़े होने का संकेत देता है. किंदी की वंशावली अल-अशअत बिन क़ैस से जुड़ती है. अल-अशअत बिन क़ैस शुरुआती दौर में इस्लाम क़बूल करने वालों में से हैं और वो पैगंबर साहब के मित्र भी थे.

अल-किंदी के पिता कूफ़ा के एक शहज़ादे थे और उनका जन्म एक अमीर और उच्च श्रेणी के परिवार में हुआ था. उन्हें "अरब दार्शनिक" की उपाधि मिली, जो इस बात की तरफ़ संकेत करता है कि उन्होंने अरबी में दर्शन (फिलॉसफ़ी) की नींव रखी.

यह एक ऐसी उपाधि है जो इसलिए भी सच है, क्योंकि अल-किंदी से पहले अरबी में दर्शन शास्त्र नाम की कोई चीज़ नहीं थी. हम जानते हैं कि अल-किंदी का दर्शन के प्रति झुकाव अपने साथियों के बीच बहुत लोकप्रिय नहीं था. आइए थोड़ी देर के लिए एक दृश्य का ख़ाका खींचते हैं.

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यह 850 ईस्वी में बग़दाद के एक पुस्तक बाज़ार का दृश्य है, जहां पुस्तक प्रेमी लोग बहुत उत्साहित दिखाई दे हे हैं. इसका कारण एक लोकप्रिय गद्य लेखक, धर्म शास्त्र के माहिर और कई प्रसिद्ध पुस्तकों के लेखक जाहिज़ द्वारा लिखी पुस्तक का लोकार्पण होना था.

उनके प्रतिद्वंद्वी लेखक भी इस अवसर पर वहां उपस्थित थे ताकि "द फ़ादर ऑफ़ अरेबिक प्रोज़" की नई पुस्तक की सामग्री के बारे में जान सकें.

अबू उस्मान उमर बहर अल-कनानी अल-बसरी अल मारूफ जाहिज़ की पिछली दो किताबें, किताब अल-बयान वा-अल-तबिय्यीन और सात-खंडो पर आधारित अल-हयवान पिछले दशक की सबसे लोकप्रिय किताबों में से थीं. ये पुस्तकें न सिर्फ़ लोकप्रिय थी बल्कि उनकी वजह से ये किताब अरबी वक्तव्य शैली के साथ-साथ उनके प्रतिद्वंदियों पर भी कभी न मिटने वाले निशान छोड़ गई.

किताब अल हयवान विशेष रूप से लोकप्रिय हुई, और यहां तक कि अरस्तू का महान कार्य जाहिज़ के सामने कम लगने लगा. कुछ साल पहले तक, कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं था जो अरस्तू के काम के अनुवाद के अलावा कुछ और पढ़ना चाहता हो. अरस्तू की अल ख़िताबा, माबाद अल तबीया और अल मक़ूलात जैसी पुस्तकें बहुत लोकप्रिय थीं और वह अरस्तू की बुद्धि के प्रशंसक थे.

हालांकि,अब, जाहिज़ के कारण, पाठक महान धर्म शास्त्र विवादों पर पुस्तकों को पढ़ना चाहते थे.

जाहिज़ के प्रकाशक ने घोषणा की थी कि वह अपनी नई पुस्तक में उन विषयों पर चर्चा करेंगे, जिन्होंने उस समय इराक़ में सबसे अच्छे दिमागों को भ्रमित किया हुआ था. यानी "क्या ख़ुदा ने सर्वश्रेष्ठ दुनिया का निर्माण किया?" क्या वह इससे बेहतर दुनिया बना सकता था, जो सभी बीमारियों और पीड़ाओं से मुक्त हो? अगर वह एक बेहतर दुनिया बना सकता था, तो उसने ऐसा क्यों नहीं किया? और क्या बुराई की उपस्थिति का मतलब है कि कोई ख़ुदा नहीं है?'

जब जाहिज़ की यह किताब प्रकाशित हुई, तो इसके ख़िलाफ़ आक्रोश व्यक्त किया गया और इसे समझ से परे की बात घोषित किया गया. यह बात जंगल की आग की तरह फैल गई. जाहिज़ ने इस किताब का नाम किताब अल-बुख़ला रखा. वहां मौजूद किसी व्यक्ति ने जुमला कसा कि एक बख़ील (कंजूस) व्यक्ति को बुराई की समस्या से क्या लेना-देना है?

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सभी ने कहा कि इस बूढ़े व्यक्ति ने बीमारी के कारण अपना होश खो दिया है. एक दुर्भावनापूर्ण प्रतिद्वंद्वी ने कहा कि किसी को भी समझ नहीं आ रहा है कि इसने क्या लिखा है.

हालांकि, जब लोगों ने इस पुस्तक को पढ़ना शुरू किया, तो यह वास्तव में एक तरह का हास्य था जिसमें समाज के शिष्टाचार और कुछ लोगों पर व्यंग्य किया गया था.

इसके पृष्ठ समकालीनों के बारे में विवरणों से भरे हुए थे. हो सकता है इनमें से कुछ पात्रों के नाम बदल दिये गए हों. जाहिज़ द्वारा लिखे गए शाब्दिक रेखा चित्रों में मौजूद पात्रों की पहचान करने के प्रयास में भीड़ ने एक-दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा शुरू कर दी.

लोग एक-दूसरे से पूछने लगे:

"इनमें से कंजूस कौन है जो पत्थर के दीपक के बजाय कांच के दीपक का उपयोग करता है ताकि वो तेल बचा कर पैसे बचा सके?"

रुको, रुको, इसमें अल-किंदी का भी उल्लेख है!

क्या कहा? "अरब दार्शनिक" अल-किंदी?

हाँ, इसमें सिर्फ़ अल किंदी लिखा है!

तो चलो फिर हमें बताओ कि यह अल किंदी के बारे में क्या कहता है.

यह धार्मिक विद्वान माबद द्वारा सुनाई गई एक लंबी कहानी है, जो कुछ समय के लिए अल किंदी के किरायेदार रहे हैं.

एक अवसर पर माबद को एक महीने के लिए दो मेहमानों को ठहराना था. अल-किंदी ने इस महीने के लिए उनके किराए में 33 फीसद की वृद्धि कर दी. किंदी ने इस बारे में तर्क दिया कि घर में दो अतिरिक्त लोगों की उपस्थिति, भले ही यह केवल एक महीने के लिए ही क्यों न हो, तार्किक चरणों और कारण व प्रभाव सिद्धांत के अनुसार मालिक पर बोझ डालती है.

उनके अनुसार, इससे स्थानीय नालियों पर दबाव पड़ता है और पीने के पानी की मांग बढ़ जाती है. मकान मालिक का आर्थिक रूप से नुक़सान होता है क्योंकि उसकी संपत्ति का मूल्य कम हो जाता है और कोई भी भविष्य में यहां किराए पर रहना पसंद नहीं करता.

यह अल-किंदी का तर्क लगता भी है.

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सुनो, यह अल किंदी ही होगा.

ये भी उसी के शब्द हैं कि, "अगर आप इच्छा को उभरते ही मार दें, तो मैं आपको एक सुखद भविष्य की गारंटी दे सकता हूं." अल किंदी अपने इस नैतिक सिद्धांत पर इस अंदाज़ में व्यंग्य होता देख कर खुश नहीं होंगे.

कुलीन वर्ग के साथ संबंधों ने ख़लीफ़ा के दरबार में अल-किंदी का महत्व बढ़ा दिया. ख़लीफ़ा अल-मूतसिम, जिन्होंने 833 से 842 तक शासन किया, अल-किंदी को अरस्तू की "फ़र्स्ट फिलॉसफ़ी" पर काम करने की ज़िम्मेदारी सौंपी.

दर्शन पर एक किताब लिखने के लिए ख़लीफ़ा का कदम कई लोगों के लिए हैरान करने वाला था, क्योंकि उन्हें साम्राज्य के सबसे मज़बूत व्यक्तियों के रूप में प्रतिष्ठित किया गया था. एक ऐसा जर्नल जो किसी का भी दिमाग अपने हाथ से टुकड़े-टुकड़े कर देता था. शायद अल-मूतसिम युद्ध के मैदान पर अपना पूरा जीवन बिताने के बाद अपनी मानसिक क्षमताओं को भी बढ़ाना चाहता था.

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अल-किंदी की लाइब्रेरी और उनके बुरे दिन

अल-किंदी के बुरे दिन ख़लीफ़ा अल-मुतवकिल (847-861) के शासनकाल के दौरान आए और कुलीन वर्ग के साथ उनके संबंध और एक धनी परिवार में उनके जन्म का भी उन्हें कोई ख़ास लाभ नहीं हुआ. ख़िलाफ़त के दौर में बग़दाद एक अत्यधिक प्रतिस्पर्धी समाज था. यहां प्रतियोगिता का महत्वपूर्ण क्षेत्र - विज्ञान था.

उस समय के प्रसिद्ध गणितज्ञ बनू मूसा भाइयों से अल-किंदी की नहीं बनती थी, जिन्हें ख़लीफ़ा का पूरा समर्थन था. उन्होंने ख़लीफ़ा को राज़ी किया कि वो अल किंदी को वहां चोट पहुंचाए जहां वह सबसे अधिक कमज़ोर था, यानी उनसे उनकी लाइब्रेरी ले ली जाये.

इस तरह पुस्तकालय के बिना, किसी भी अन्य विद्वान की तरह किंदी भी कार्य नहीं कर पाएंगे. लेकिन इस कहानी में एक महत्वपूर्ण मोड़ आना अभी बाकी था और बनू मूसा भाइयों को सज़ा मिलने का समय भी जल्दी आ गया था.

ख़लीफ़ा की एक ज़िम्मेदारी अपने साम्राज्य को ठीक से चलाने की भी थी. और इसमें विभिन्न जटिल नहरों और जलमार्गों का प्रबंधन भी शामिल था जो इराक़ के प्रमुख शहरों से हो कर गुज़रती थी. बनू मूसा भाइयों ने एक नाक़ाबिल इंजीनियर को एक नहर परियोजना के लिए नियुक्त किया था. ऐसा हुआ कि यह योजना बुरी तरह से विफ़ल हो गई और केवल अल किंदी का एक दोस्त ही इसे बचा सकता था.

यहां से बनू मूसा भाई ख़लीफ़ा की नज़रों में गिर गए और इस तरह अल-किंदी को उनकी लाइब्रेरी मिल गई. नौवीं सदी के दौरान, इराक़ में विभिन्न विषयों के विद्वानों की कमी नहीं थी. हालांकि, ऐसे युग में भी, अल-किंदी की विशेषज्ञता और विभिन्न विषयों में बुद्धिमत्ता ने उसके महत्व और स्थिति को बढ़ा दिया.

उनकी आत्मकथा लिखने वालों ने लगभग तीन सौ के क़रीब दस्तावेज़ छोड़े हैं जिनमें उनके विज्ञान और दर्शन से संबंधित कार्य को समेटा गया है.

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अल-किंदी न केवल एक महान दार्शनिक थे, बल्कि उनके काम का एक व्यावहारिक महत्व भी था जो सैन्य क्षेत्र में भी इस्तेमाल किया जा सकता था.

उनके कांच (शीशे) से संबंधित काम को ख़लीफ़ा की सेना ने एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया था. उन्होंने तलवारों और लोहे की विभिन्न क़िस्मों पर भी काम किया और उनके उपयोग पर विशिष्ट निर्देश दिए और यह भी बताया कि उनसे सबसे अच्छे हथियार कैसे बनाए जा सकते हैं.

उन्होंने महासागर में उठने वाले ज्वार भाटा, बादलों की गरज, चमक समेत अन्य मौसम संबंधी रुझानों पर भी शोध किया. उन्होंने जानवरों और मक्खियों पर शोध किया, उनके इत्र और दूरी मापने का शोध भी लोकप्रिय हैं. उन्होंने राजनीति और नैतिकता पर भी काम किया और सुकरात की बातों का एक संकलन तैयार किया. अल-किंदी ने दुःख और उदासी से निपटने के बारे में भी लिखा और शासन के बारे में भी.

उन्होंने आत्मा पर भी शोध किया और ग़ैर-इस्लामी समूहों के साथ धार्मिक विवादों से संबंधित भी उनका काम मौजूद है. उन्होंने खगोल विज्ञान, ज्योतिष विज्ञान, ब्रह्मांड विज्ञान, चिकित्सा, गणित के विषय ज्यामिति, अंक गणित, मंडलियों और संगीत पर भी काम किया. उन्होंने तर्क शास्त्र और दर्शन शास्त्र पर भी काम किया.

उन्होंने यह भी जांच की कि दर्शन शास्त्र का पाठ्यक्रम क्या होना चाहिए, अरस्तू की पुस्तकों का संपादन और उनका अपना सबसे व्यापक कार्य, यानी 'फ़र्स्ट फ़िलॉसफ़ी.

किसी भी दृष्टिकोण से देखा जाये, तो यह निश्चित रूप से एक बहुत प्रभावशाली सूची है. हालांकि, समय अल-किंदी के पुस्तकालय पर ज़्यादा असरे तक मेहरबान नहीं रहा. हम इस बुद्धिमान विचारक द्वारा किए गए अधिकांश कार्यों को खो चुके हैं.

अल-किंदी का सबसे लोकप्रिय काम फ़र्स्ट फिलॉसफ़ी पर है. उनकी इस पुस्तक के केवल पहले भाग को संरक्षित किया जा सका है. इसे और चार भागों में विभाजित किया गया है. प्रत्येक भाग में एक अलग विषय पर बात की गई है.

पहले भाग में दर्शन के पक्ष में और इसके बचाव में बात की गई है. ध्यान रहे कि अल-किंदी अरबी भाषा में दर्शन शास्त्र का परिचय करवा रहे थे, इसलिए यह स्पष्ट है कि दर्शन शास्त्र पर उनके विचारों के विरोधी भी मौजूद थे.

दूसरे भाग में इस दार्शनिक दृष्टिकोण का खंडन किया गया था कि यह दुनिया शाश्वत है, इसलिए इसे अस्तित्व में लाने के लिए किसी निर्माता की कोई आवश्यकता नहीं है.

तीसरे भाग में एकेश्वरवाद के सही अर्थ पर बात की गई है, जबकि चौथे भाग में एकेश्वरवाद पर बात करते हुए बताया गया है, कि इसके अस्तित्व का विस्तार से वर्णन नहीं किया जा सकता है, अर्थात् दूसरे शब्दों में, यह अवर्णनीय है.

इस्लाम का स्वर्ण युग: अरब दर्शन के संस्थापक अल-किंदी और विज्ञान में उनका योगदान

ये चार विषय अल-किंदी के चार मुख्य दार्शनिक चिंताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं. उनके कार्यों के शेष अंश और बातों से उनके पसंदीदा विषय की निशानदेही होती है, और वह है अधिपत्य (लॉर्ड शिप). यानी निर्माण की प्रकृति के बारे में प्रसिद्ध दार्शनिक सवाल जिस पर 850 में अधिकांश लोग सिर खपाते रहे, इसके लिए अल किंदी 'अस्पष्ट' होगा.

हां, दुनिया बहुत अच्छी है. इंसान को बस इसे सही ढंग से समझने की ज़रूरत है और अल-किंदी के दार्शनिक प्रणाली में इसे समझने के लिए इशारे ढूंढे जा सकते हैं.

ये महत्वपूर्ण विषय उनके पसंदीदा थे. दार्शनशास्त्र उनका "जुनून" था और इन विषयों के बारे में वो बार-बार बात करते हैं. जैसे दर्शन शास्त्र की आवश्यकता, ब्रह्मांड की रचना, एकेश्वरवाद का अर्थ, ईश्वर की अवर्णनीय प्रकृति और अधिपत्य.

वे दर्शन को एक विशेष प्रकार की धर्मपरायणता के रूप में देखते हैं जिसके माध्यम से शिक्षित कुलीन अपने जीवन को सही करके स्वर्ग में प्रवेश कर सकते हैं.

उनके विषय मुख्य रूप से इस्लामी विचारधारा के इर्द-गिर्द घूमते हैं. उनके लिए दर्शन और धर्म में कोई संघर्ष नहीं है. अल-किंदी के लिए, दर्शन धार्मिक अटकलों का उच्चतम स्तर है और दर्शन कुरान में प्रकट रहस्योद्धाटन के अनुरूप है.

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लेकिन इसे फ़र्स्ट फ़िलॉसोफ़ी का नाम क्यों दिया गया?

शायद इसका कारण यह है कि यह पुस्तक ईश्वर की एकता के बारे में थी. वो पहला कारण जिसके अस्तित्व से हर चीज़ चलती है. और क्योंकि ख़ुदा हर चीज़ से पहले आता है उसी तरह, नंबर एक (1) भी सबसे पहले आता है, और इसे अल-किंदी और उसके साथी एक नंबर नहीं मानते थे. तो "फ़र्स्ट फ़िलॉसफ़ी" भौतिकी और नैतिकता सहित सभी दार्शनिक अटकलों से पहले आता है.

यही वजह है कि, दार्शनिक विचार के उदय के कारण, यह वह स्थान है जहां हर दार्शनिक पहुंचना चाहता है, इसलिए इसे सबसे अंत में पढ़ा जाना चाहिए.

अल-किंदी संख्याओं में भी बहुत रुचि रखते थे और उनका उपयोग उन सभी चीजों पर करते थे जिनके बारे में वह सोचते थे. वह वास्तव में एक संख्याविज्ञानी थे और उनका मानना था कि ये ब्रह्मांड पॉलीहाइड्रिक रूपों से अस्तित्व में आया था. यानी आग का पिरामिड की तरह का आकार, पृथ्वी एक घन के आकार में, हवा की आठ भुजाएं हैं और आकाशीय गोले की 12 भुजाएं हैं.

जाहिज़ अल-किंदी के शाब्दिक रेखा चित्र में, संख्याओं के प्रति उनके लगाव को भी मज़ाक का निशाना बनाया गया है. अल किंदी अपनी संख्याओं की पहचान को कहां तक ले जाना चाहते थे?

अल-किंदी की जीवनी लिखने वाले उनके द्वारा लिखी गई एक प्रेम भरी कविता का भी उल्लेख करते हैं, जो कुछ इस तरह है:

मैं अपने चार हिस्सों में आपके बारे में चार चीज़ों से मुहब्बत करता हूँ

मुझे नहीं मालूम कि कौन-सी चीज़ मुझे सांस लेना भी भुला देती है

मेरी आँखों में आपका चेहरा,मेरे मुंह में आपका ज़ायक़ा(स्वाद) मेरे कानों में आपके अलफ़ाज़ (शब्द) या मेरे दिल में आपके लिए मुहब्बत

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महान अरबी दार्शनिक अल-किंदी एक ऐसे व्यक्ति थे जिसने जैसा सोचा और महसूस किया, वैसे ही जीवन गुज़ारा. उनका निधन कब हुआ किस तारीख़ में हुआ, इसकी कोई पुष्टि नहीं हुई लेकिन कुछ स्रोतों के अनुसार उनकी मृत्यु वर्ष 873 के आसपास हुई.

हालांकि हमें नहीं पता कि उनकी मौत क्यों हुई, लेकिन हम यह जानते हैं कि उनकी मौत कैसे हुई. अफसोस की बात है कि उनकी मौत सुकरात की तरह महान नहीं थी, जो एथेंस की एक जेल में अपने दोस्तों के बीच ज़हर पीते हुए मर गए. अल-किंदी की मौत एक चिकित्सक द्वारा खुद को धोखा देने की एक दुःखद घटना है.

कुछ समय से उनके घुटने में संक्रमण हो चुका था, जिसके कारण मवाद भी पड़ चुकी थी. उस समय, यह समझा जाता था, कि चूंकि बलगम चार तरल पदार्थों में से एक है, इसलिए इसे अन्य तरल पदार्थों के साथ संतुलित किया जा सकता है: यानी रक्त, पित्त और काली पित्त.

अल-किंदी ने पहले पुरानी शराब पी और फिर जब इसका कोई असर नहीं हुआ, तो उन्होंने शहद भी पी कर देखा, लेकिन यह इलाज वैसे संभव नहीं हो सका जैसे अल-किंदी ने सोचा था. शराब और शहद की गर्मी उनकी नसों से उनके घुटनों तक नहीं गई और वो संतुलन नहीं बन सका जिसकी उनको आशा थी. इसके विपरीत, बलगम ने उनके मानस पर हमला किया और यह दर्द उनके दिमाग़ तक फैल गया और दौरा पड़ने से उनकी मृत्यु हो गई.

विडंबना यह है कि अब हम उनकी मृत्यु के बारे में लिख रहे हैं, तो उनके एक शोध का शीर्षक आंखों के सामने घूमता है, जिसका शीर्षक था 'बलगम के लक्षण और अचानक मृत्यु का कारण'.. हालांकि, यह एक महान व्यक्ति का सबसे दुःखद लेकिन आश्चर्यजनक रूप से शुभ अंत था.

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