रईस अमरोहीः जॉन एलिया के भाई, जिनके क़त्ल ने कराची को हिला दिया

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- Author, जाफ़र रिज़वी
- पदनाम, पत्रकार, लंदन
"क़ातिल बड़े इत्मीनान के साथ घर में दाखिल हुआ. इससे भी ज़्यादा इत्मिनान के साथ उसने सिर्फ़ एक गोली से अपना काम पूरा किया और उसी आराम से वापस चला गया."
रईस अमरोही की हत्या की कहानी बताते हुए पूर्व पुलिस अधिकारी बहुत दुखी नज़र आ रहे थे.
मैं इन पूर्व पुलिस अधिकारी से 2011 में मिला था. वह 1980 के दशक में कराची पुलिस में तैनात थे और किसी तरह रईस अमरोही की हत्या की जांच में शामिल थे.
बौद्धिक, कवि और पत्रकार रईस अमरोही की आज से ठीक 33 साल पहले, 22 सितंबर, 1988 को कराची के संपन्न इलाक़े गार्डन ईस्ट में उनके ही घर में हत्या कर दी गई थी.
इस हत्या ने पाकिस्तान के सबसे बड़े शहर कराची को झकझोर कर रख दिया था.
उस समय गार्डन ईस्ट में रईस अमरोही के बड़े मकान के मुख्य दरवाजे खुले थे क्योंकि उन्हें देखने आने वाले लोग दिन भर आते-जाते रहते थे.
उनके घर में मुख्य प्रवेश द्वार के ठीक बाद एक बड़ा आंगन था, उसके बाद उनका कार्यालय और फिर परिवार के रहने के लिए क्वार्टर थे.
पुलिस अधिकारी का कहना था कि घर में मौजूद परिवार के लोग रईस अमरोही से मिलने आने वाले लोगों की वजह से या फिर उनके काम में खलल ना पड़े इस वजह से उनके कार्यालय में कम ही जाते थे. रईस अमरोही को जब कोई ज़रूरत होती थी या चाय या खाने का सामान पहुंचाने के लिए ही परिवार के लोग कार्यालय की तरफ़ जाते थे.
घर का आकार बड़ा होने के कारण आवाज़ भी घर में अंदर तक सुनाई नहीं देती थी.
पुलिस अधिकारी ने कहा कहना था कि, 'शायद हत्यारों ने यह जानकारी मिलने के बाद ही हत्या की योजना बनाई थी और इसी वजह से उसने जानकारी और माहौल का पूरा फायदा उठाया और बड़े इत्मिनान और तसल्ली के साथ घटना को अंजाम दिया.'
कौन थे रईस अमरोही?
12 सितंबर, 1914 को भारत के अमरोहा में जन्मे रईस अमरोही का असली नाम सैयद मुहम्मद मेहदी था.
अमरोहा न केवल भारतीय उपमहाद्वीप में बल्कि पूरी दुनिया में अपनी कला, संस्कृति और बौद्धिक लोगों के लिए प्रसिद्ध था. लेकिन इसी शहर में रहने वाले रईस अमरोही के परिवार को जो ज्ञान और फन मिला वो अपने आप में अद्वितीय था.
रईस अमरोही के पिता अल्लामा शफीक हसन एलिया हों या भाई सैयद मोहम्मद तकी (प्रख्यात पत्रकार और बुद्धिजीवी और दैनिक 'जंग' के संपादक) हों या दूसरे भाई प्रसिद्ध कवि जॉन एलिया या उनके चचेरे भाई और प्रसिद्ध भारतीय फिल्म निर्माता कमाल अमरोही हों, इन सबने अपनी अलग पहचान और मुकाम बनाया. अमरोहा से निकले इन लोगों ने जिस तरफ़ भी रुख किया अपनी सफलता, योग्यता और महारत का झंडा ख़ूब लहराया.
रईस अमरोही स्वयं दैनिक जंग में प्रकाशित अपने लेखों के लिए प्रसिद्ध थे, लेकिन वास्तव में उन्हें एक शोधकर्ता, दार्शनिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक विज्ञान में विशेषज्ञ माना जाता था.
दुनिया भर में उन्हें पढ़ने वाले आज भी उनसे जुड़ने को सम्मान की बात मानते हैं.
रईस अमरोही की प्रसिद्धि को चार चांद तब लगे जब उनकी नज़्म 'उर्दू का जनाज़ा है ज़रा धूम से निकले' 1972 में पाकिस्तान की सिंध प्रांतीय विधानसभा में भाषा विधेयक की शुरूआत के अवसर पर दैनिक जंग में प्रकाशित हुई थी. ये नज़्म उन्होंने 1948 में लिखी थी. ये फिर से प्रकाशित हुई और पूरे देश में लोकप्रिय हो गई.

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बाद में वो भौतिकी, दर्शन, आध्यात्मिकता और ध्यान जैसे विज्ञान और कला के क्षेत्रों में एक प्रमुख विद्वान बन गए और इन विषयों पर कई किताबें लिखीं.
उनके प्रमुख कार्यों में अलिफ़, मसनवी लालाजार, पस-ए-ग़ुबार, हिकायत, बहजरत-ए-यज़्दान, मालबूस-ए-बहार, अशार, नसीम-ए-सहार, ज़मीर-ए-खामा, माबूद-अल-नफ़सियाद, नफ़सियात-ओ-माबूद-अल-नफ़सियात, अज़ायब-ए-नफ़्स, ले सांस भी आहिस्ता, जिंसियात, आमिल बरज़ख़, हाज़राते-अरवाह, हिप्नोटिज़्म, जिन्नात, आलम-ए-अरवाह, अल्मिया मशरिकी पाकिस्तान, अच्छे मिर्ज़ा, अन्ना मन अल हुसैन प्रसिद्ध हैं. इसके अलावा उन्होंने अनगिनत उर्दू कविताएं लिखी हैं और आला दर्जे की शायरी की है.
नरम मिजाज़ थे रईस अमरोही
रईस अमरोही को बचपन से ही अपने परिवार का सबसे नाज़ुक और प्यारा सदस्य माना जाता था. रईस अमरोही की बेटी फरज़ाना रईस के मुताबिक उन्हें जन्म के बाद उनके सगे ताऊ नफ़ीस हसन ने गोद ले लिया था क्योंकि उनकी कोई औलाद नहीं थी. वो उनके सगे खालू भी थे.
वहां नाज़ुक मिजाज़ रईस अमोरही की परवरिश और भी चाव और नाज़ के साथ की गई थी. सात-आठ साल की उम्र तक उन्होंने खाना भी नहीं खाया था, उन्हें दूथ ही पिलाया जाता रहा था.
फ़रज़ाना रईस के मुताबिक जब उनके पिता ने बचपन में पहली बार खाना खाया था तो उनके लिए कई तरह का खाना पकवाया गया था और परिवार में उनके पहली बार खाना खाने का जश्न मनाया गया था.
रईस अमरोही 1936 में पत्रकारिता से जुड़े और अमरोहा से प्रकाशित समाचार पत्रों 'क़र्तस' और 'मुखबर आलम' का संपादन किया.
भारत के विभाजन के बाद 19 अक्टूबर 1947 को रईस अमरोही अपने परिवार के साथ कराची, पाकिस्तान चले गए और गार्डन ईस्ट इलाक़े में बस गए.
मुझे रईस अमरोही के जीवन और दुखद हत्या की कहानी लिखने में उनके परिवार और परिवार के सदस्यों, दोस्तों और पाकिस्तान में कानून प्रवर्तन एजेंसियों के कई जिम्मेदार अधिकारियों और ने मदद की.
परिजनों के मुताबिक हत्या का दिन गुरुवार था और उस दिन शाम करीब साढ़े पांच बजे तक रईस अमरोही घर पर अपने ऑफिस में काम करने में व्यस्त थे.

लुबना जरार नकवी रईस अमरोही की पोती हैं और लंबे समय तक अंग्रेजी अखबार 'द न्यूज' के साथ काम करने के बाद इन दिनों स्वतंत्र पत्रकारिता कर रही हैं.
रईस अमरोही की हत्या के समय लुबना खुद उसी घर में रहती थीं और उस दिन को याद करते हुए कहती हैं, "घर काफ़ी बड़ा था. हम बाहर बरामदे में बैठे थे. दरवाजे बंद नहीं थे, चौकीदार भी नहीं था. घर खुला था और कोई भी आ सकता था."
"मैं अपने भाई हसन के साथ बैठी थी, तभी अचानक एक छोटा धमाका हुआ और उसी समय घर में नीम के पेड़ पर बैठे पंछी उड़ गए. हम बाहर की तरफ़ भागे लेकिन जब कोई नहीं दिखा था तो हम वापस आकर बैठ गए थे.'
वो याद करती हैं, "थोड़ी देर बाद, हमारी मां (शहाना नकवी) आई, फिर कुछ लोग आए, जिन्होंने बाबा (रईस अमरोही) को उठा लिया था. बाबा ख़ून से लथपथ थे. तभी हंगामा हो गया और उस वक्त भी किसी को शक नहीं हुआ कि किसी ने बाबा को मारने की कोशिश की है. फिर जब हमारे परिजन अस्पताल पहुंचे तो कुछ देर बाद उनकी मौत गई.'
लुबना बताती हैं, "हम में से जो घर पर थे, मेरे भाई और मेरे चचेरे भाई सब्तीन (जो अब मेरे पति हैं) बाबा के कार्यालय के अंदर गए और देखा कि वहां एक लोहे की वस्तु पड़ी थी जो मारी गई गोली का खोल थी, हमने उसे उठा लिया था.'
रईस अमरोही की बेटी शाहाना नक़वी का कहना है कि उस दिन उनकी मां एक पार्टी में गईं थीं और वो उन्हें पहुंचाने गईं थीं.
"जब हम अम्मी को पहुंचा कर वापस घर पहुंचे तो मैं ने देखा कि हमारी चाची (सैयद मोहम्मद तक़ी की पत्नी) भागती हुईं आ रहीं थीं और उन्होंने बताया कि भाई (हम अपने पिता को भाई ही कहा करते थे) को पंखे से चोट लग गई है.'
"जब हम वहां पहुंचे, तो हमारे चाचा और कार्यालय के कर्मचारी ने उन्हें उठाया हुआ था. उन्हें कार में बैठाया जा रहा था, हर तरफ खून बिखरा हुआ था. बड़े चाचा (सैयद मुहम्मद तकी) नंगे पैर थे. उन्हें अस्पताल ले जाया गया, लेकिन एक घंटे के भीतर ही उनकी मौत हो गई.

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शाहाना नक़वी के मुताबिक, ''क़त्ल के दिन मैंने उन्हें फ़ोन किया और पूछा कि भाई, दो दिन से आपके बहुत उदास क़ते प्रकाशित हो रहे हैं, आप ठीक तो हैं ना? तो उन्होंने कहा कि मैं ठीक हूं तुम शाम को आ रही हो ना. मैंने कहा कि गर्मी बहुत हैं, कल आउंगी, तो उन्होंने कहा कि नहीं तुम शाम को तो आओगी ही, शायद उन्हें अहसास था कि ये उनका आख़िरी दिन है.
वो याद करते हुए बताती हैं कि वह सफ़र का महीना था उसके बावजूद मैं गुनगुनाने लगी, जाने वाले से मुलाक़ात ना होने पाई, और ना जाने क्यों मैं ख़ुद ब ख़ुद बेतहाशा रोने लगी, जिस पर मेरे शौहर ने पूछा भी था कि तुम उदास क्यों हो.
इतनी देर में फ़ोन आया कि भाई (रईस अमरोही) गिर गए हैं और उन्हें अस्पताल ले जाया गया है, मुझे गोलीबारी के बारे में कुछ नहीं बताया गया था.
तभी यह खबर पूरे शहर में जंगल की आग की तरह फैल गई और फोन की घंटी बजने लगी और सभी फोन करने वाले पूछ रहे थे कि रईस साहब का हाल क्या है? मुझे समझ नहीं आया कि वास्तव में क्या हो रहा था.
कुछ ही देर में मेरी माँ पार्टी से घर लौट आई और वह भी बहुत घबराई हुई थीं. मेरी बहन ख़ैरियत के लिए तस्बीह पढ़ रही थी कि तस्बीह गिर गई और टूट गई. क्या आप जानते हैं कि हम कितने अंधविश्वासी हैं? अभी तस्बीह टूटी ही थी कि मेरे चाचा के बेटे घर में दाख़िल हुए और बताया कि वो दम तोड़ चुके हैं.
उन्होंने कहा, ''कुछ दिन पहले उसने मुझसे कह रहा था कि वह रईस अमरोही के जश्न के सिलसिले में दुबई जा रहा है. मेरे बेटे बॉबी (जुल्फिकार नकवी) ने कहा, 'मैं तुम्हारे साथ जाऊंगा.'
फरजाना रईस का कहना है कि उस ज़माने में 32 लोगों की एक 'हिट लिस्ट' भी मशहूर हुई थी. जो (मेरे ख्याल से) फर्जी थी वरना बाकी 31 लोग कौन थे और फिर उन्हें क्यों नहीं मारा गया?
रईस अमरोही के परिवार के सभी सदस्यों जिनसे इस संबंध में बात की गई सभी ने दावा किया कि रईस अमरोही की हत्या से ठीक पहले, दक्षिणपंथी विचारधारा के एक साप्ताहिक अख़बार में कई बार प्रकाशित हुए कि रईस अमरोही पाकिस्तान को एक शिया स्टेट बनाना चाहते हैं और उनकी हत्या कर दी जानी चाहिए. इस साप्ताहिक अख़बार में रईस अमरोही की तस्वीर पर फांसी का फंदा बनाकर ये सब लिखा जाता था.
फरज़ाना रईस का मानना है कि उन्होंने खुद इस साप्ताहिक के कम से कम तीन अंक में ऐसी सामग्री पढ़ी थी, जबकि परिवार के अन्य सदस्य भी इसकी पुष्टि करते हैं.
एक प्रभावशाली कानून प्रवर्तन एजेंसी के एक करीबी सूत्र ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, "इस (हत्या) को काफ़ी समय हो गया है मैं बहुत कुछ तो नहीं बता पाउंगा लेकिन इतना पक्के तौर पर कह सकता हूं कि जांचकर्ताओं ने बाद में फैसल टीपू, जमील मुआविया और एक अन्य व्यक्ति सहित तीन लोगों को गिरफ्तार किया था. उस समय के शीर्ष पुलिस अधिकारी भी कथित हत्यारों को रईस अमरोही के परिवार के पास भी ले गए थे.

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लुबना नक़वी ने कहा, "जब हत्यारों को हमारे घर लाया गया, तो उन्होंने कहा कि उन्हें रईस अमरोही के कुछ लेख पसंद नहीं आए, इसलिए उन्होंने गुस्से में उन्हें मारने का फैसला किया."
इस संबंध में एक विश्वविद्यालय का फ़तवा था और कथित हत्यारे भी इस फ़तवे से प्रभावित हुए थे.
लुबना ने दावा किया, "हत्यारे ने हमें बताया कि हमें बताया गया था कि वह (रईस अमरोही) युवाओं को गुमराह कर रहे थे. हत्यारे ने कहा कि उसने सबसे पहले रेकी की और हत्या वाले दिन जब वह आया तो रईस अमरोही बैठकर कुछ लिख रहे थे.''
लुबना के दावे के मुताबिक, "उसने (कथित हत्यारे ने परिवार को) बताया कि मैं एक पल के लिए रुक गया जब मैंने रईस अमरोही की आंखें देखीं. मैं घबरा गया था. जब रईस अमरोही ने मुझे देखा और कहा, 'आओ' तो मैंने घबरा कर उन्हें गोली मार दी.'
रईस अमरोही की बेटी शाहाना नक़वी ने कहा, "जब हत्यारों को लाया गया तो हमारी मां ने कहा, 'मैं सैयदनी हूं और मेरे पति शहीद हैं. मैं उन्हें (हत्यारों) माफ़ करती हूं. इस तरह उन्हें गिरफ्तार तो कर लिया लेकिन हम तो सिर्फ़ औरतें ही हैं, अब भाई तो नहीं रहे, हमारा तो मक्का ही ढह गया.'
फरजाना रईस के मुताबिक किसी को नहीं पता था कि उन्हें गोली मार दी जाएगी, लेकिन सरकार ने उन्हें बताया था कि उनकी जान को खतरा है. सरकार ने सलाह दी थी कि वो अपने साथ एक हथियारबंद सुरक्षाकर्मी रख लें.
फरजाना के मुताबिक, ''लेकिन उन्होंने कहा सरकार से कहा, 'मियां मैं तो चिढ़िया को भी मरते हुए नहीं देख सकता.'
फरज़ाना रईस ने भी कानून प्रवर्तन अधिकारी के इस दावे की पुष्टि की कि तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया था और पुलिस जांचकर्ताओं के सामने अपराध कबूल करने के बाद उन्हें परिवार के सामने पेश किया गया था.
वो कहती हैं, "यह गिरोह हमारे घर लाया गया था ... हम बुर्के में खड़े थे और सचमुच कांप रहे थे...'
फरजाना रईस का कहना है कि रईस अमरोही को 'कश्ती-नूह' के बारे में एक लेख लिखने के लिए भी धमकी दी गई थी और उन्हें 'इस तरह के प्रचार को रोकने' के लिए कहा गया था.
सांप्रदायिक थी हत्या?

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"हमारा कोई भाई नहीं था और यह एक बिलकुल अंधा केस था इसलिए हम इसकी पैरवी नहीं कर सके. जमील मुआविया की ज़मानत एक धार्मिक राजनीतिक संगठन ने करवाई थी. हमारी मां को शुरू में शक था कि कराची की एक राजनीतिक पार्टी ने रईस अमरोही का क़त्ल करवाया, लेकिन जब कथित हत्यारों को हमारे सामने लाया गया, तो उन्होंने हत्या की बात कबूल कर ली.'
रईस अमरोही के नाती ज़ुल्फ़िक़ार नक़वी (बाबी) का दावा है कि रईस अमरोही की हत्या सांप्रदायिक हिंसा की अभिव्यक्ति थी.
घटना के ठीक दो दिन पहले, गार्डन क्षेत्र में सेंट लॉरेंस चर्च के एक पादरी की हत्या कर दी गई थी, और तब भी पुलिस अधिकारियों को संदेह था कि पादरी की हत्या सांप्रदायिक प्रकृति की थी.
ज़ुल्फ़िक़ार नक़वी ने भी फरजाना रईस द्वारा लगाए गए वही आरोप दोहराए.
ज़ुल्फ़िक़ार नक़वी के मुताबिक, हत्या के वक़्त जब गोली मारी गई तो एक शख्स दौड़ता हुआ आया और उसने बताया था कि रईस साहब अपनी लिखने की मेज़ के नीचे ख़ून से लथपथ पड़े हैं. बाद में पुलिस ने शक़ में उसे गिरफ़्तार भी कर लिया था लेकिन कुछ दिन बाद उसे रिहा कर दिया गया था.
परिजन पहुंचे तो रईस अमरोही बोले, ''फैन...'' इसलिए शुरू में टीवी पर खबर आई कि उनकी मौत एक पंखे से हुई है. हालांकि, अस्पताल के डॉक्टरों ने बाद में कहा कि हो सकता है कि वे पंखा खोलने के लिए कह रहे हों क्योंकि जब किसी को सिर या दिमाग में चोट लगती है तो उन्हें अत्यधिक गर्मी का अहसास होता है.
अस्पताल पहुंचने पर जब डॉक्टरों ने पूछा कि उनका नाम क्या है तो उन्होंने रईस अमरोही नहीं बल्कि सैयद मोहम्मद मेहदी का जिक्र किया था.
जॉन एलिया चाहते थे निश्तर पार्क में हो नमाज़
वो बताते हैं कि रईस अमरोही के दफ़न की तैयारी घर पर ही चल रही थी और जॉन एलिया का ख़्याल था कि उनके जनाज़े की नमाज़ नश्तर पार्क में पढ़ाई जाए क्योंकि उन्हें लगता था कि अंतिम संस्कार में सभी फिरक़ों के लोग आएंगे और उनकी तादाद भी ज़्यादा होगी.
लेकिन सैयद मुहम्मद तक़ी सहित परिवार के कुछ सदस्य इमाम शाह कर्बला ट्रस्ट रिज़विया सोसाइटी में अंतिम संस्कार की नमाज़ अदा करने के पक्ष में थे.
अब्दुल रज़ीक़ ख़ान, जो उस समय मुत्ताहिदा कौमी मूवमेंट (एमक्यूएम) से ताल्लुक रखते थे, कराची के डिप्टी मेयर थे और उन्होंने पेशकश की कि मज़ार-ए-क़ायद (पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना की मज़ार) के अहाते में जनाज़े की नमाज़ पढ़ाई जाए. लेकिन परिवार के सदस्यों की गुज़ारिश पर सखी हसन को चुना गया.
ज़ुल्फ़िक़ार नक़वी के मुताबिक़ अंतिम संस्कार में 10,000 से 15,000 लोग शामिल हुए थे. ट्रैफिक पुलिस आगे का रास्ता रोक रही थी ताकि जनाज़ा अपनी मंज़िल तक पहुंच सके.
क़त्ल में सियासी पार्टी का नाम

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ज़ुल्फ़िक़ार नक़वी के मुताबिक़ कराची में दूसरे दिन विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए थे.
ज़ुल्फ़िक़ार नक़वी ने यह भी दावा किया कि एक बार वह वहां मौजूद थे जब रईस अमरोही को एक धमकी भरा फोन आया. धमकी देने वाले ने उन्हें 'कश्ती-नूह़' के बारे में प्रोपागेंडा बंद करने के लिए कहा था. इधर से रईस अमरोही यही कह रहे थे कि आप अपनी बात जारी रखें, मैं सुन रहा हूं.
ज़ुल्फ़िक़ार नक़वी ने यह भी दावा किया कि जब तक हत्यारे पकड़े नहीं गए थे तब तक इस क़त्ल को लेकर अलग-अलग नाम लिए जा रहे थे और चर्चाएं हो रहीं थीं.
उन्होंने कहा कि बेनजीर भुट्टो के नेतृत्व वाली पीपीपी सरकार बनने के बाद राजनीतिक ताक़तों पर भी हत्या का आरोप लगाया गया.
"मेरे पिता को मुख्यमंत्री का फोन आया कि हमें संदेह है कि हत्या में एक राजनीतिक दल शामिल था. हमारे परिवार के सदस्यों ने कहा कि हमें नहीं पता कि हत्या किसने की थी. आपके पास सरकार है, यह पता लगाना आपका काम है कि किसने मारा. लेकिन सरकार ने ज़ोर देकर कहा कि परिवार आरोप लगाए ताकि जांच को मोड़ा जा सके.'
उनका कहना है कि लंबे समय के बाद हमारे परिवार ने पीपीपी सीनेटर सिंध के मुख्यमंत्री के विशेष सहायक ताज हैदर से मुलाक़ात की. ताज़ हैदर ने रईस अमरोही के परिवार से मुलाक़ात के बाद सियासी पार्टी के क़त्ल में शामिल होने की पुष्टि की.
ज़ुल्फ़िक़ार कहते हैं, 'रईस अमरोही की हत्या की जांच चल ही रही थी कि एक दिन सुबह साढ़े सात बजे सिंध के मुख्यमंत्री अब्दुल्ला शाह का फोन आया कि आप लोग मेरे पास आएं.'
'जब मैं पहुंचा तो मुख्यमंत्री ने मुझे बताया कि आपके घर का एक नक्शा उस व्यक्ति से बरामद किया गया है जो संदेह के आधार पर हिरासत में था और जिन लोगों ने रईस अमरोही का क़त्ल किया वे आपके पिता प्रोफेसर करार हुसैन को भी मारना चाहते हैं. वास्तव में, जब मैंने नक्शा देखा, तो वह गुलशन-ए-इकबाल इलाक़े में हमारा घर था.'
ताज हैदर ने खुलासा किया कि 'बाबा (प्रोफेसर करार हुसैन) लाइब्रेरी में रहते थे, हिरासत में लिए गए कथित अपराधी जमील मुआविया ने जांचकर्ताओं को बताया था कि वो लाइब्रेरी में आ गया था और उसने डेढ़ घंटे तक करार हुसैन का इंतेज़ार किया था ताकि वो उन्हें भी क़त्ल कर सके.'
'संयोग से बाबा उस दिन वहां थे ही नहीं, फिर वो बाद में मेरे कमरे में भी आया था.'
उन्होंने कहा, "इसलिए हमें विश्वास हो गया कि यह सांप्रदायिक हिंसा का संकेत था क्योंकि रईस साहब भी मारे गए थे और बाबा को भी मारना चाहते थे."
ताज हैदर ने दावा किया कि जब सिंध के आईजी अफजल शुगरी अभियुक्तों को रईस साहब के परिवार के पास ले गए कि ये अभियुक्त हैं, तो रईस साहब की पत्नी ने कहा कि हम कोई कार्रवाई नहीं चाहते हैं.
रईस अमरोही की विधवा ने कहा, "वह (रईस अमरोही) चले गए हैं. मैं बच्चों के साथ हूं और अब मैं बच्चों को बचाना चाहती हूं. मैं किसी लड़ाई में नहीं पड़ना चाहती.'
हालांकि, पूर्व आईजी (महानिरीक्षक) सिंध पुलिस अफज़ल शुगरी ताज हैदर और रईस अमरोही के परिवारों के इन दावों से असहमत हैं.
अफज़ल शुगरी ने कहा, ''सबसे पहले तो अब इतना समय हो गया है कि उन्हें याद नहीं कि वह उस वक्त सिंध में तैनात थे या नहीं.''
सिंध के पूर्व आईजी अफ़ज़ल शुगरी ने कहा कि यह अजीब लगता है कि एक पुलिस अधिकारी अभियुक्त को जांच के दायरे में लेकर पीड़ित के परिवार से मिलें.
रईस अमरोही के नाती ज़ुल्फ़िक़ार नक़वी के अनुसार, बाद में सबूतों के अभाव में आरोपियों को बरी कर दिया गया और मामला खारिज कर दिया गया.
रईस अमरोही की नातिन लुबना नक़वी ने कहा, "उन दिनों तीन दिनों तक पूरा शहर हमारे घर पर जमा था. ऐसा लग रहा था जैसे पूरे शहर का कोई अपना मारा गया हो."
फरज़ाना रईस कहती हैं, ''उनके (रईस अमरोही) बाद ऐसा लगता है कि आसमान नहीं रहा. हम बहुत करीब नहीं थे, हमारे और उनके बीच हमेशा हिजाब था. हम कोई रूढ़िवादी परिवार नहीं थे, वे पूरे शहर के बाबा थे, सिर्फ़ हमारे बाबा नहीं थे. लेकिन सोशल लाइफ में बिजी शेड्यूल की वजह से वह अपने परिवार के साथ ज्यादा वक़्त नहीं बिता पाए.
फरज़ाना कहती हैं, ''वह बहुत विनम्र थे. हमारी मां अमरोहा की सबसे खूबसूरत महिला थीं, लेकिन उन्होंने हमेशा शिकायत की कि उन्हें रईस अमरोही जैसे पति से वो तवज्जो नहीं मिल सकी जिसकी वह हक़दार थीं.'
वो कहती हैं, "लेकिन भाई को अपनी हत्या से पहले कई बार दोहरे मायनों वाली बातें कर चुके थे, शायद उन्हें अहसास था कि उन्हें कुछ होने वाला है."
फरजाना रईस के मुताबिक अपने क़त्ल के दिन रईस अमरोही ने जो आख़िरी क़ता लिखा था उसकी आख़िरी पंक्ति थी, 'अंधों का शहर है, ये अंधेरों का शहर है.'
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