'मैं ही सबसे महान, मैं ही सबसे सर्वश्रेष्ठ'- क्या आत्ममुग्धता एक बीमारी है?

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- Author, आर्जव पारेख
- पदनाम, बीबीसी गुजराती संवाददाता
36 वर्षीय आकांक्षा (बदला हुआ नाम) अपने आठ भाई-बहनों में सबसे बड़ी हैं.
उनके परिवार की यह शिकायत रहती थी कि वो परिवार के साथ अच्छे से नहीं रहती हैं, जिस कंपनी में वो काम करती हैं वहां से भी उनकी शिकायत आती है कि वो किसी की बात नहीं सुनतीं और अपनी ही बात मनवाने की कोशिश करती हैं.
अगर उनकी छोटी सी आलोचना भी हो जाये तो उन्हें बुरा लगता है और वो रोने लगती हैं.
जब आकांक्षा से पूछा जाता है तो वे हमेशा शिकायत करती हैं कि उन्हें नींद नहीं आती और अनिंद्रा की शिकायत रहती है.

वो कहती हैं कि ऑफिस और परिवार के तनाव के कारण वह कई सालों से सो नहीं पाई हैं.
लेकिन असल में आकांक्षा को अनिद्रा की समस्या नहीं थी. वो अनिद्रा को कारण बनाकर लोगों का ध्यान खींचने की कोशिश करती थीं.
काउंसलिंग सेशन के दौरान जब उनसे विस्तार से चर्चा की गई तो पता चला कि वे ''नार्सिसिस्टिक पर्सनालिटी डिसऑर्डर'' से पीड़ित हैं, लेकिन आकांक्षा ने खुद यह स्वीकार नहीं किया कि उन्हें ये डिसऑर्डर है.
क्या है ये डिसऑर्डर?

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भोपाल ज़िला अस्पताल के क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. राहुल शर्मा बीबीसी से बात करते हुए कहते हैं, ''इस डिसऑर्डर को सामान्य भाषा में आत्ममुग्धता कहा जाता है. ये कोई बीमारी नहीं है, बल्कि पर्सनैलिटी डिसऑर्डर की श्रेणी में आती है. मनोचिकित्सा की दुनिया में ऐसे 10 से 12 मान्यता प्राप्त विकार हैं. जिन्हें नार्सिसिस्टिक पर्सनालिटी डिसऑर्डर कहा जाता है.''
सायकोएजुकेशन देने के बाद आकांक्षा ने इस समस्या को स्वीकार किया और साइकोएनालिटिक काउन्सलिंग के लगभग 8 से 10 सत्रों के बाद उन्होंने खुद को बेहतर स्थिति में महसूस किया. इतना ही नहीं, परिवार और ऑफिस में भी उनका प्रदर्शन और व्यवहार बेहतर हुआ.
हमारे आसपास कई लोगों के स्वभाव में चिड़चिड़ापन, नकारात्मकता, स्वार्थीपन जैसे लक्षण देखने को मिलते हैं. हम आमतौर पर इसे 'नेचर' समझकर नज़रअंदाज कर देते हैं. लेकिन यह वास्तव में एक विकार है. आइए इसके बारे में और जानें.
क्या हैं इसके लक्षण?

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मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, हम सब कभी न कभी आत्ममुग्धता के लक्षण दिखाते हैं.
आत्ममुग्धता की परिभाषाएं अलग-अलग हो सकती हैं, लेकिन कुछ प्राथमिक लक्षण हैं. जैसे कि बहुत से लोगों को अपने बारे में दृढ़ विश्वास होता है कि वे दूसरों से बेहतर हैं. उनके ऐसे विश्वास को दूसरे लोग अहंकार या घमंड के रूप में देखते हैं.
डॉ. शर्मा कहते हैं, ''आत्ममुग्धता एक बहुत पुरानी अवधारणा है. इसका उल्लेख ग्रीक और यूनानी कहानियों में मिलता है. भारत समेत दुनियाभर में इस विषय पर कई पौराणिक कहानियाँ लिखी गई हैं.''
''एक आत्ममुग्ध व्यक्ति सामाजिक रिश्तों को बिल्कुल भी प्राथमिकता नहीं दे सकता है, और अगर वह देता भी है तो भी अपने तरीके़ से. वह हर जगह खुद को महत्व देता है, हर काम खुद को केंद्र में रखकर करता है, खुद से प्यार करता है.”
किसी भी इंसान को देखकर यह अंदाज़ा लगाना मुश्किल होता है कि वह आत्ममुग्ध है या नहीं.
अहमदाबाद स्थित मनोचिकित्सक डॉ. कलरव मिस्त्री ने बीबीसी से कहा, ''आत्ममुग्धता व्यक्ति के व्यवहार या बोलचाल में आमूल-चूल परिवर्तन नहीं लाती. इस विकार से पीड़ित मरीज़ इतने होशियार होते हैं कि अगर आप उनसे बात करेंगे तो आपको लगेगा कि वे बहुत परिपक्व, समझदार हैं. लेकिन उनका रवैया अंदर से स्वार्थी होता है. लेकिन बाहर से वह बहुत विनम्र, ध्यान खींचने वाला, दयालु व्यवहार करता है."

आत्ममुग्धता के लक्षण कुछ इस प्रकार के होते हैं:
- स्वयं को महान मानना, अपने हुलिए पर गर्व करना
- अपने आप को ज़्यादा महत्व देना
- अपनी कल्पनाओं में लीन रहना, जैसे कि मैं रातों-रात अमीर हो जाऊंगा
- लगातार अपने व्यवहार से ध्यान आकर्षित करना
- मेलोड्रामा, अति नाटकीयता करना
- हमेशा आलोचना नहीं, प्रशंसा चाहना
- दूसरों की सफलता से ईर्ष्या करना
बीबीसी डिजिटल हेल्थ एडिटर मिशेल रॉबर्ट्स की रिपोर्ट के अनुसार शोधकर्ताओं ने व्यक्तित्व लक्षणों के आधार पर आत्ममुग्ध लोगों को तीन श्रेणियों में रखा है.
एजेंटिक: जो लोग खुद को दूसरों से श्रेष्ठ मानते हैं और हमेशा अपनी प्रशंसा चाहते हैं.
एन्टागोनिस्टिक: दूसरों को प्रतिस्पर्धी मानने वाले, सहानुभूति का जिनमें अभाव होता है.
न्यूरोटिक: असुरक्षा की भावना वाले, आलोचना के प्रति अत्यधिक संवेदनशील.
इसके कारण क्या हैं?

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इस विकार के कारण को समझाते हुए डॉ. शर्मा कहते हैं, “अमेरिका, यूरोप में किए गए विश्वसनीय अध्ययनों से पता चला है कि दुनियाभर में 0.8 से 1 प्रतिशत लोग इस नार्सिसिस्टिक डिसऑर्डर से पीड़ित हैं. यह महिलाओं की तुलना में पुरुषों में अधिक आम है.”
वह कहते हैं, ''यह असल में व्यक्तित्व विकास की समस्या है. हमारे परिवार, दोस्तों, पड़ोसियों से लेकर सभी के गुणों का हमारे व्यक्तित्व पर प्रभाव झलकता है. कभी-कभी परिवार में ऐसी स्थिति होती है जहां बच्चे को लगता है कि मुझे महत्व नहीं मिल रहा है. ऐसी भावना फिर उम्र के साथ एक विकार में बदल जाती है.''
डॉ. कलरव मिस्त्री भी कहते हैं, ''जब बच्चा मां के गर्भ में होता है तब से मां की मनोदशा, पारिवारिक माहौल, माता-पिता का रवैया, दोस्त सभी बच्चे के व्यक्तित्व को आकार देने में भूमिका निभाते हैं. 18 वर्षों तक पारिवारिक स्थिति, आर्थिक तंगी, तनाव आदि बच्चे के व्यक्तित्व को आकार देते हैं. इसलिए जब कोई व्यक्ति 25 की आयु तक पहुंचता है, तो अतीत के बुरे अनुभवों के आधार पर बदला लेने की भावना उसमें हावी हो जाती है, धीरे-धीरे वह आत्ममुग्धता की ओर बढ़ता है."
सोशल मीडिया की क्या भूमिका है?

14 साल की आसमा हमेशा उदास रहती थीं. वह इतना झूठ बोलती थीं कि लोगों को पता चल जाता था. कांच के बर्तन या मोबाइल फेंक कर तोड़फोड़ करती थीं.
जब डॉक्टरों ने उनकी दिनचर्या का अध्ययन किया तो देखा कि वह दिन में सात से आठ घंटे सोशल मीडिया पर बिताती हैं. उनके दोस्तों से झगड़े की शिकायतें भी थीं.
डॉ. शर्मा कहते हैं, ''बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जो आत्ममुग्धता से ग्रस्त हैं और सोशल मीडिया पर बहुत सक्रिय भी हैं. वे अपनी फ़ोटो अपलोड करके लोगों को कॉल करते हैं और उसे लाइक करने के लिए कहते हैं. आज लोगों के सोशल मीडिया पोस्ट को देखकर भी यह पता लगाया जा सकता है कि कोई व्यक्ति आत्ममुग्धता से पीड़ित है या नहीं."
डॉ. मिस्त्री भी आत्ममुग्धता के पीछे सोशल मीडिया को अधिक प्रभावशाली मानते हैं. वह कहते हैं, ''आज डिजिटल कनेक्शन बढ़ रहे हैं. सामाजिक संपर्क कम होने के कारण भी लोग अकेलापन महसूस करते हैं. आत्ममुग्ध लोग सोशल मीडिया पर फ़र्ज़ी प्रोफाइल बनाते हैं, बदला लेते हैं.”
कैसे दूर होती है समस्या?
अमेरिकन साइकियाट्रिक एसोसिएशन के अनुसार, एक से दो प्रतिशत अमेरिकियों में आत्ममुग्धता का विकार है. अलग-अलग देशों में इन मरीज़ों का अनुपात एक से पांच प्रतिशत तक है.
वैश्विक मनोरोग वर्गीकरण प्रणाली में आत्ममुग्धता के दो वर्गीकरण हैं: ICD-10 और DSM-5. DSM-5 वर्गीकरण को अमेरिकन साइकियाट्रिक एसोसिएशन द्वारा मानकीकृत किया गया है, जिसमें आत्ममुग्धता का व्यक्तित्व विकार शामिल है.
डॉ. शर्मा कहते हैं, “दोनों प्रकार के वर्गीकरण में किसी न किसी प्रकार के लक्षणों के मानदंड बनाए गए हैं. उसके आधार पर मरीज़ का परीक्षण किया जाता है. मरीज़ का साक्षात्कार लिया जाता है, उनके परिवार से बातचीत की जाती है."
इलाज के बारे में बताते हुए वह कहते हैं, ''मरीज़ की काउंसलिंग, परिवार के साथ चर्चा के आधार पर की जाती है. फिर उन्हें साइकोथेरेपी दी जाती है, और अगर बहुत अधिक समस्याएं होती हैं, तो साइकियाट्रिक के पास भेजा जाता है, वो दवा भी देते हैं."
विशेषज्ञों के अनुसार यह ज़रूरी नहीं है कि आत्ममुग्धता हमेशा एक व्यक्तित्व विकार है. कई बार ये शॉर्ट टर्म के लिए फायदेमंद होती है.
जैसे की इससे आपकी लोकप्रियता बढ़ सकती है, इससे आपको अच्छी नौकरी पाने में मदद मिल सकती है. लेकिन लंबे समय में यह ज़्यादातर एक नकारात्मक चीज़ है. इसकी वजह से कई छोटे-मोटे संघर्ष पैदा हो जाते हैं.
रिसर्च क्या कहती है?

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हाल ही में साइकोलॉजिकल बुलेटिन नामक जर्नल में एक अध्ययन प्रकाशित हुआ था.
इसमें पूर्व में हुए कुल 51 अध्ययनों का उपयोग किया गया है. जिसमें कुल 37,247 लोगों पर शोध किया गया है शोध में भाग लेने वाले लोगों की उम्र आठ साल से लेकर 77 साल तक थी.
शोध का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह था कि जैसे-जैसे लोगों की उम्र बढ़ती है, आत्ममुग्ध लोग अधिक सहानुभूतिशील, थोड़े अधिक उदार हो जाते हैं. उनमें असहमति का स्वर फीका पड़ जाता है.
शोध से पता चलता है कि उम्र के साथ आत्ममुग्धता कम हो जाती है, लेकिन व्यक्तित्व में बदलाव धीमा होता है और व्यक्तित्व में थोड़ा ही बदलाव आता है.
डॉ. मिस्त्री कहते हैं, "आत्ममुग्धता 18 से 35 आयु वर्ग में सबसे अधिक प्रचलित है. क्योंकि आमतौर पर इसी अवधि में करियर स्ट्रेस, रिलेशनशिप स्ट्रेस आदि होता है. जैसे-जैसे व्यक्ति 45 से 50 वर्ष का होता है, वह बड़ी ज़िम्मेदारियों से मुक्त हो जाता है, उसके बच्चे बड़े हो जाते हैं. इसलिए उसमें एक तरह की शर्मिंदगी आ जाती है. तब उसका स्वभाव दयालु हो जाता है और वह अपना अधिकांश गुस्सा पहले ही निकाल चुका होता है. इसलिए, उम्र के साथ आत्ममुग्धता कम हो जाती है.
उनका कहना है, "अगर किसी व्यक्ति का स्वभाव ऑफिस के साथ-साथ घर में भी परेशानी का कारण बन रहा है, शिकायतें आ रही हैं, तनाव में है तो तुरंत काउंसलिंग के लिए जाना चाहिए."
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