एस्ट्राज़ेनेका की वैक्सीन से स्वास्थ्य समस्याओं का दावा करने वालों की लड़ाई में आया अहम पड़ाव

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ब्रिटेन में जेमी स्कॉट नाम के एक व्यक्ति ने दावा किया है कि एस्ट्राज़ेनेका की कोविड वैक्सीन के कारण उनके दिमाग़ को नुक़सान पहुँचा है.
उनके वकील ने बीबीसी को बताया है कि इस ड्रग कंपनी ने अपने क़ानूनी रुख़ में अहम बदलाव किए हैं.
एस्ट्राज़ेनेका ने अदालत में जमा किए गए दस्तावेज़ों में पहली बार ये माना है कि उसके कोरोना की वैक्सीन से कुछ लोगों को कुछ असमान्य साइड इफ़ेक्ट हो सकते हैं.
कोरोना का टीका लगवाने वाले कई लोगों ने मिलकर इस दवा कंपनी पर वैक्सीन के साइड इफेक्ट को लेकर हर्ज़ाने का केस किया है.
ये मुक़दमा दायर करने वाले कुछ लोगों का कहना है कि उन्होंने इस वैक्सीन की वजह से अपने कई रिश्तेदारों को खो दिया और कई अन्य मामलों में कंपनी की कोरोना वैक्सीन से लोगों को गंभीर नुक़सान पहुँचा है.
तमाम अध्ययन ये बताते हैं कि एस्ट्राज़ेनेका समेत तमाम कंपनियों की कोरोना वैक्सीन ने दुनिया भर में करोड़ों लोगों की जान बचाई है.
एस्ट्राज़ेनेका पर हर्ज़ाने का पहला मुक़दमा पिछले साल दो बच्चों के पिता जेमी स्कॉट ने दायर किया था.
अप्रैल 2021 में एस्ट्राज़ेनेका की कोरोना वैक्सीन लेने के बाद जेमी स्कॉट के मस्तिष्क में ख़ून का थक्का जम गया था, जिसकी वजह से उनके मस्तिष्क को नुक़सान हुआ था. इसकी वजह से अब वो काम करने लायक़ नहीं हैं.
जेमी स्कॉट ने जो मुक़दमा दायर किया है, वो ब्रिटेन के कंज़्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट के तहत दाख़िल किया गया है.
इसमें आरोप लगाया गया है कि एस्ट्राज़ेनेका की वैक्सीन ‘ख़राब’ थी और ये लोगों की उन अपेक्षाओं से कहीं कम सुरक्षित थी, जिसके वो हक़दार हैं.
एस्ट्राज़ेनेका का टीका, कोरोना से बचने की वैक्सीन थी, जिसे ब्रिटेन में लगाना शुरू किया गया था.
एस्ट्राज़ेनेका हर्ज़ानों के दावों का विरोध कर रही है. हालाँकि कंपनी ने इंग्लैंड के हाई कोर्ट में इस साल फरवरी में जमा किए गए एक क़ानूनी दस्तावेज़ में ये माना है कि उसकी कोरोना की वैक्सीन से, ‘कुछ बेहद असामान्य मामलों में टीटीएस हो सकता है.’
टीटीएस/वीआईटीटी सिंड्रोम में होता क्या है?

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इस मामले से जुड़े वकील बताते हैं कि टीटीएस का मतलब थ्रॉम्बोसिस विद थ्रॉम्बोसाइटोपेनिया सिंड्रोम होता है. जब टीका लगवाने के बाद ऐसा होता है, तो इसे वीआईटीटी यानी वैक्सीन इंड्यूस्ड इम्यून थ्रॉम्बोसिस विद थ्रॉम्बोसाइटोपेनिया भी कहा जाता है.
टीटीएस/वीआईटीटी एक असामान्य सिंड्रोम या बीमारी है, जिसकी वजह से थ्रॉम्बोसिस (ख़ून के थक्के जमना) और थ्रॉम्बोसाइटोपेनिया (प्लेटलेट की कमी) एक साथ हो जाते हैं.
वकील बताते हैं कि टीटीएस/वीआईटीटी के नतीजे बेहद ख़तरनाक और जानलेवा भी हो सकते हैं. इसकी वजह से दिल का दौरा पड़ने और दिमाग़ में ख़ून जमने के अलावा फेफड़ों में थक्का जमने से ख़ून का प्रवाह रुक सकता है. साथ ही शरीर के कई अंगों को भी नुक़सान पहुँच सकता है.
थ्रॉम्बोसिस या ख़ून का थक्का जमने जैसी समस्या कई अलग अलग रूपों में उन लोगों को भी हो सकती है, जिन्होंने वैक्सीन नहीं लगवाई है.
लेकिन, टीटीएस/वीआईटीटी जैसी असामान्य बीमारी केवल टीका लगवाने के बाद ख़ून के थक्के जमने (थ्रॉम्बोसिस) के कारण होती है.

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मई 2023 में भेजी गई एक चिट्ठी के जवाब में जेमी स्कॉट के वकीलों ने बीबीसी से इस बात की तस्दीक़ की कि एस्ट्राज़ेनेका ने उनसे कहा था, "हम ये नहीं स्वीकार करते कि सामान्य तौर पर टीटीएस (बड़े पैमाने पर) वैक्सीन की वजह से होता है."
लेकिन फरवरी में कोर्ट में जमा कराए गए क़ानूनी दस्तावेज़ में एस्ट्राज़ेनेका ने कहा, "ये स्वीकार किया जाता है कि एस्ट्राज़ेनेका की वैक्सीन से कुछ बेहद असामान्य मामलों में टीटीएस हो सकता है. ये कैसे होता है, ये अभी नहीं पता है."
कंपनी चाहती है कि उस पर हर्ज़ाने का मुक़दमा दायर करने वाला हर दावेदार ये साबित करे कि उसे टीटीएस नाम की ख़ून के थक्के जमने वाली समस्या किसी और वजह से नहीं, बल्कि वैक्सीन की वजह से ही हुई है.
कंपनी ने ये भी कहा , "इसके अलावा टीटीएस, एस्ट्राज़ेनेका का टीका (या कोई और वैक्सीन) लगवाए बग़ैर भी हो सकता है. किसी भी इंसान में ख़ून का थक्का जमने की वजह क्या है, ये तो जानकारों की ओर से दिए जाने वाले सबूत से ही पता चल सकेगा."
भारत में महाराष्ट्र की कंपनी सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया ने 2021 में एस्ट्राज़ेनेका से कोरोना वैक्सीन की कम से कम एक अरब ख़ुराक बनाने का ठेका लिया था.

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‘रुख़ में बेहद अहम बदलाव’
इस मामले में जेमी स्कॉट और दूसरे (कुल मिलाकर 51) दावेदारों के वकीलों का कहना है कि ये इस मामले में एस्ट्राज़ेनेका के रुख़ में आया एक महत्वपूर्ण बदलाव है.
ले डे नाम की लीगल फर्म की सारा मूर ने बीबीसी को बताया, "एस्ट्राज़ेनेका की वैक्सीन से टीटीएस और विशेष रूप से वीआईटीटी होने की बात स्वीकार करना, सामान्य वजह के मामले में बहुत बड़ा क़बूलनामा है."
सारा ने आगे कहा, ‘ये काफ़ी अहम है कि अब औपचारिक क़ानूनी कार्यवाही में उन्होंने अपने रुख़ में ये बदलाव करने का फ़ैसला किया है.’
एस्ट्राज़ेनेका के इस क़बूलनामे से पीड़ितों को और मुआवज़ा मिलने का रास्ता खुल सकता है.
क्योंकि हर्ज़ाने का दावा करने वालों का कहना है कि वो वाजिब मुआवज़ा ही मांग रहे हैं, ताकि उन्हें कुछ हद तक वित्तीय सुरक्षा हासिल हो सके.
मंगलवार को एस्ट्राज़ेनेका ने बीबीसी से बात की. लेकिन, कंपनी ने सारा मूर के उठाए गए मुद्दों पर कोई प्रतिक्रिया देने से इनकार कर दिया.
कंपनी ने बीबीसी को दिए एक बयान में कहा, "उन लोगों के साथ हमारी पूरी हमदर्दी है जिन्होंने अपने प्रियजनों को गंवाया है, या जिनकी सेहत को कुछ समस्याएं हुई हैं. मरीज़ों की सुरक्षा हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है और इस मामले के नियम क़ायदे लागू कराने वाले अधिकारियों ने सभी वैक्सीन समेत दवाओं के सुरक्षित इस्तेमाल के लिए बिल्कुल स्पष्ट और बेहद सख़्त मानक बनाए हुए हैं."

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एस्ट्राज़ेनेका ने अपने बयान में आगे कहा, "क्लिनिकल ट्रायल और वास्तविक इस्तेमाल के आंकड़ों से हमें जो सबूत मिले हैं, उनके मुताबिक़ एस्ट्राज़ेनेका-ऑक्सफोर्ड की वैक्सीन ने लगातार ये दिखाया है कि उसका इस्तेमाल पूरी तरह से सुरक्षित है. और, दुनिया भर के नियामक अधिकारियों ने बार बार ये बात कही है कि टीकाकरण के फ़ायदे, इससे होने वाले बेहद असामान्य और संभावित साइड इफेक्ट से कहीं ज़्यादा हैं."
चीन से बाहर लॉकडाउन लगना शुरू होने के एक साल से भी कम समय के भीतर एस्ट्राज़ेनेका की वैक्सीन लगाई जाने लगी थी.
जैसे कि कीनिया में जहां स्वास्थ्य कर्मचारी को मार्च 2021 में कोरोना का टीका लगा था.

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मेडिकल सलाह में बदलाव
जून 2022 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा था कि एस्ट्राज़ेनेका की वैक्सीन "18 साल और उससे अधिक उम्र के लोगों के लिए सुरक्षित और असरदार है."
"बहुत कम लोगों के बीच ख़ून के थक्के जमने की बेहद असामान्य ख़बरें सामने आने के बाद" 7 अप्रैल 2021 को वैक्सीनेशन ऐंड इम्युनाइज़ेशन की संयुक्त समिति ने 30 साल से कम उम्र के वयस्कों के लिए ये सलाह जारी की थी कि उन्हें एस्ट्राज़ेनेका के टीके के विकल्प उपलब्ध कराए जाएं.
एस्ट्राज़ेनेका ने भी इस तरफ़ इशारा करते हुए बताया कि उसने इस बदलाव के मुताबिक़ अपने टीके के डिब्बों और शीशियों में प्रकाशित होने वाली सावधानियों को बदलने का सुझाव दिया था.
7 मई 2021 को इस सलाह में संशोधन करके इसे 40 साल से कम उम्र के व्यक्तियों के लिए कर दिया गया था.
एस्ट्राज़ेनेका ने बीबीसी को बताया, "अब तक दुनिया भर में ऐसे 30 मुक़दमे वापस लिए जा चुके हैं. अधूरे छोड़ दिए गए हैं या फिर इनमें एस्ट्राज़ेनेका के पक्ष में फ़ैसले आए हैं."
‘उचित मुआवज़ा’
जेमी स्कॉट की पत्नी केट स्कॉट ने पहले बीबीसी को बताया था, "जेमी को दोबारा सेहत बेहतरी के लिए 250 बार एक्सपर्ट्स के पास जाना पड़ा था. उन्हें नए सिरे से चलना, निगलना और बात करना सीखना पड़ा था. उनको याददाश्त की समस्याएं भी हुई थीं."
केट ने कहा, "वैसे तो इन एक्सपर्ट्स के साथ मिलने से जेमी में काफ़ी सुधार आया है. लेकिन, आज हम उस मुकाम पर हैं, जहां हम एक नए जेमी को देख रहे हैं और आगे चलकर वो नया जेमी ही हमारे साथ रहने वाला है. उसको समझने में दिक़्क़तें होती हैं, उनको एफैसिया (जब किसी शख़्स को भाषा या बोलने में दिक़्क़त होती है) की समस्या है, भयंकर सिरदर्द और अंधेपन की बीमारियां हैं."
केटी ने आगे कहा, "हम चाहते हैं कि ब्रिटेन की सरकार वैक्सीन से होने वाले नुक़सान के हर्ज़ाने की योजना में सुधार करे. ये बेकार और बेहद नाइंसाफ़ी भरी है और फिर हम उचित मुआवज़ा चाहते हैं."
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