ऑनलाइन दुनिया के जाल से अपने बच्चों को बचाने का तरीका जानिए

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आज बच्चे पहले के मुकाबले कम उम्र में इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे हैं और दुनिया में हर आधे सेकेंड में एक बच्चा ऑनलाइन होता है.

ऐसे में जानकार चेतावनी दे रहे हैं कि ऑनलाइन दुनिया तक बच्चों की बढ़ती पहुंच से उनके लिए गंभीर ख़तरे भी पैदा हो रहे हैं.

वेस्टर्न सिडनी यूनिवर्सिटी के यंग एंड रेज़िलिएंट सेंटर ने इस बारे में हाल ही में एक स्टडी की है.

इससे पता चला है कि कम आमदनी वाले परिवारों के बच्चे तो ख़ास तौर से अनजान लोगों से अनुचित या ग़ैर-ज़रूरी रिक्वेस्ट ब्लॉक नहीं करते हैं. इस अध्ययन में पाया गया था कि ऐसे लोगों की शिकायत न करने या ब्लॉक नहीं करने की वजह से बच्चे भविष्य में ख़ुद को अनचाहे संपर्क के कहीं ज़्यादा बड़े जोखिम में डाल देते हैं.

ब्रिटेन में ऑनलाइन सेफ्टी एक्ट नाम के नए क़ानून के तहत तकनीकी कंपनियों की ये ज़िम्मेदारी होती है कि वो इंटरनेट पर बच्चों की अधिक सुरक्षा सुनिश्चित करें. लेकिन, इस क़ानून से जुड़े नए नियम 2025 तक लागू नहीं होंगे.

आलोचक कहते हैं कि ये नियम भी बहुत अधिक कारगर नहीं हैं.

दुनिया भर में सरकारों ने ऐसे ही नियम क़ायदे लागू किए हैं.

तो आप ऑनलाइन दुनिया में अपने बच्चों को कैसे महफ़ूज़ रख सकते हैं और बच्चों के लिए इंटरनेट की दुनिया ज़्यादा सुरक्षित बनाने के लिए दुनिया भर की सरकारें और तकनीकी कंपनियां क्या कर रही हैं?

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दुनिया भर में बच्चे ऑनलाइन कितना वक़्त बिताते हैं?

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आज दुनिया भर में बच्चे, पहले से कहीं ज़्यादा वक़्त ऑनलाइन होते हैं. संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक़, दुनिया में हर आधे सेकेंड में कोई न कोई बच्चा पहली बार ऑनलाइन दुनिया में दाख़िल होता है.

आंकड़े दिखाते हैं कि दुनिया में कनेक्टिविटी को बढ़ावा देने में कम उम्र वालों का सबसे ज़्यादा योगदान है. 2023 में दुनिया भर में 15 से 24 साल के 79 प्रतिशत लोग ऑनलाइन हो रहे थे, जो बाक़ी आबादी से 65 प्रतिशत ज़्यादा है.

सिडनी के यंग एंड रेज़िलिएंट सेंटर की सह-निदेशक अमांडा थर्ड कहती हैं, ''आज के बच्चे ऑनलाइन दुनिया में ही बड़े हो रहे हैं और लगातार बदल रहे डिजिटल मंज़र में उन्हें इंटरनेट के सुरक्षित रखने के लिए मदद की ज़रूरत होती है.''

बच्चों के लिए संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनिसेफ के एक अध्ययन के मुताबिक़- 30 देशों में एक तिहाई से ज़्यादा बच्चों को साइबर दुनिया में दादागीरी और धमकियों का सामना करना पड़ता है. इसकी वजह से लगभग 20 प्रतिशत बच्चे स्कूल जाना बंद कर देते हैं.

हेट स्पीच, हिंसक कंटेंट और उग्रवादी संगठनों में भर्ती भी चिंता के विषय हैं. इसके साथ साथ ग़लत जानकारी या फिर साज़िश की मनगढ़ंत कहानियां भी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बहुत चलती हैं. हालांकि, यूनिसेफ का कहना है, ''ऑनलाइन दुनिया में बच्चों को सबसे ज़्यादा ख़तरा यौन शोषण और बुरे बर्ताव से है.''

यूनिसेफ़ के मुताबिक़, ''बच्चों का यौन शोषण करने वालों के लिए अपने शिकार से ऑनलाइन संपर्क करना आज ज़्यादा आसान हो गया है. वो बड़ी आसानी से ऐसी तस्वीरें साझा कर सकते हैं और दूसरों को भी ऐसे अपराध करने के लिए उकसा सकते हैं. 25 देशों में लगभग 80 प्रतिशत बच्चों ने ऑनलाइन दुनिया में यौन शोषण या बुरे बर्ताव के ख़तरों की शिकायत की है.''

ऑनलाइन

मां-बाप के लिए ऑनलाइन निगरानी के कौन से विकल्प मौजूद हैं?

अपने बच्चों पर नज़र रखने के लिए मां-बाप के पास ऐसे कई उपाय उपलब्ध हैं, जो बच्चों को परेशान करने वाले या अनुचित कंटेंट को ब्लॉक कर देते हैं. लेकिन, अध्ययन ये बताते हैं कि अक्सर अभिभावक इनका इस्तेमाल बड़े पैमाने पर नहीं करते हैं.

2019 में हुए ग्लोबल किड्स ऑनलाइन सर्वे में पता चला था कि नौ से 17 साल उम्र के ज़्यादातर बच्चों के मां-बाप, बच्चों की निगरानी के लिए तकनीकी औज़ार इस्तेमाल करने के बजाय बीच बचाव और नियमों पर आधारित पाबंदियों जैसे तरीक़े अपनाते हैं.

इस स्टडी के मुताबिक़, अभिभावकों के बीच बहुत से सांस्कृतिक फ़ासले भी देखने को मिले हैं. यूरोप और दक्षिणी अमेरिका के अमीर देशों के माता-पिता मध्यस्थता करने को तरज़ीह देते हैं. वहीं घाना, फिलीपींस और दक्षिण अफ्रीका में मां-बाप इस मामले में सीमित स्तर पर दख़ल देने की नीति अपनाते हैं.

हालांकि, बच्चों के फोन या दूसरे उपकरणों पर पैरेंटल कंट्रोल का इस्तेमाल बहुत कम बना हुआ है. इस सर्वे में शामिल देशों में तीन प्रतिशत से कम माता-पिता ऐसे थे, जो अपने ऑनलाइन बच्चों पर नज़र रखने के लिए इन तकनीकी औज़ारों का इस्तेमाल कर रहे थे.

ब्रिटेन स्थित कुछ बड़ी इंटरनेट कंपनियों ने मिलकर इंटरनेट मैटर्स नाम से सुरक्षा का एक संगठन बनाया है. इंटरनल मैटर्स ने ऐसे उपलब्ध तकनीकी औज़ारों की एक लिस्ट तैयार की है. और, इसके साथ साथ इसने इन तकनीकी टूल्स के क़दम दर क़दम इस्तेमाल के लिए एक गाइड भी बनाई है.

मिसाल के तौर पर जो मां-बाप अपने बच्चों को सबसे लोकप्रिय प्लेटफॉर्म्स में से एक यानी, यू-ट्यूब और टिकटॉक पर अनुचित कंटेंट देखने से रोकना चाहते हैं, तो वो ख़ास बच्चों के लिए बनाए गए ‘किड्स वर्ज़न’ की सेटिंग कर सकते हैं, जो एडल्ट कंटेंट को फिल्टर कर देता है.

यू-ट्यूब और टिकटॉक की मुख्य साइट इस्तेमाल करने वाले किशोर उम्र बच्चों के लिए अभिभावक निगरानी रखने वाले खाते बना सकते हैं, जिससे उन्हें पता चल सकेगा कि उनके बच्चे इन ऐप्स पर क्या देख रहे हैं.

फैमिली सेंटर के ज़रिए फेसबुक मैसेंजर पर भी नज़र रखी जा सकती है.

टिकटॉक का कहना है कि उसका परिवार से जोड़ने वाला टूल, मां-बाप को ये अख़्तियार देता है कि वो अपने किशोर उम्र बच्चों के खातों को प्राइवेट बना सकें.

इंस्टाग्राम पर भी अभिभावकों के लिए काफ़ी टूल्स मौजूद हैं, जिससे वो रोज़ाना इन्हें देखने की समय सीमा तय कर सकते हैं. ब्रेक का वक़्त भी तय कर सकते हैं और उन खातों की लिस्ट भी बना सकते हैं, जिनकी शिकायत उनके बच्चों ने की हो.

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मोबाइल फोन और कन्सोल में कंट्रोल के कौन से विकल्प हैं?

एंड्रॉयड, एप्पल के फोन और टैबलेट में ऐसे ऐप और सिस्टम होते हैं, जिनका इस्तेमाल मां-बाप कर सकते हैं.

इन टूल्स के ज़रिए कुछ ऐप को ब्लॉक किया जा सकता है या उन तक पहुंच को सीमित किया जा सकता है.

एडल्ट कंटेंट को प्रतिबंधित किया जा सकता है. बच्चों के ख़रीदारी करने पर रोक लगाई जा सकती है और उनकी ब्राउज़िंग पर नज़र रखी जा सकती है.

एप्पल ने इसके लिए स्क्रीन टाइम का टूल दिया है. गूगल फैमिली लिंक के नाम से इसके लिए ऐप देता है. वहीं दूसरे डेवेलपर्स ने भी ऐसे कई ऐप उपलब्ध कराए हैं.

नेटफ्लिक्स जैसे स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म कंटेंट को फिल्टर करने के लिए पैरेंटल कंट्रोल मुहैया कराते हैं.

वहीं, गेमिंग के कंसोल की सेटिंग के ज़रिए बच्चों के मां-बाप उनकी उम्र के मुताबिक़ गेम खेलने की सीमा तय कर सकते हैं और गेम खेलने के दौरान ख़रीदारी पर रोक लगा सकते हैं.

कई देशों में अभिभावकों के लिए नियंत्रण के ये विकल्प ब्रॉडबैंड और टीवी के सब्सक्रिप्शन की सेवाओं की तरफ़ से भी दिए जाते हैं.

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आपको अपने बच्चों से ऑनलाइन सुरक्षा के बारे में कैसे बात करनी चाहिए?

ब्रिटेन की बच्चों की कल्याणकारी संस्था एनएसपीसीसी के मुताबिक़, बच्चों से ऑनलाइन सेफ्टी के बारे में बात करना और उनकी ऑनलाइन गतिविधियों में दिलचस्पी रखना भी काफ़ी अहम है.

ये संस्था मां-बाप को सुझाव देती है कि वो इन मुद्दों पर बातचीत को अपने बच्चों के साथ रोज़मर्रा की बातचीत का हिस्सा बनाएं. ठीक उसी तरह जैसे वो बच्चों से स्कूल में बिताए गए वक़्त के बारे में बातें करते हैं. इससे बच्चों के लिए अपनी चिंताएं, मां बाप से बता पाना और आसान हो जाएगा.

सरे यूनिवर्सिटी में कंप्यूटर सुरक्षा के विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर एलन वुडवार्ड कहते हैं, ‘सबसे ख़राब बात बच्चों से ये कहना होती है कि ‘तुम इसे नहीं देख सकते हो.’ ’

प्रोफ़ेसर वुडवार्ड कहते हैं, ''फिर बच्चे इस रोकथाम से बचने का कोई न कोई रास्ता निकाल ही लेंगे. फिर चाहे इसके लिए उन्हें वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क (वीपीएन) का इस्तेमाल करना पड़े, जहां उन्हें ऐसी पाबंदियों से बचने का मौक़ा मिल जाता है. या फिर वो किसी दूसरे के लॉगिन के ज़रिए वो सब देखने लगते हैं.''

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दुनिया भर में सरकारें इसके लिए क्या कर रही हैं?

हाल के वर्षों में विनियमन की संस्थाओं ने निजता के ऐसे क़ानून लागू करने पर ज़ोर देना तेज़ कर दिया है, जिनसे बच्चों की ऑनलाइन दुनिया में हिफ़ाज़त हो सके. इस मामले में क़ानून बनाने वाले भी काफ़ी सक्रियता दिखा रहे हैं.

हालांकि, इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ प्राइवेसी प्रोफेशनल्स (आईएपीपी) का कहना है कि इनमें से बहुत से लोग इस बात पर सहमत हैं कि ‘ऑनलाइन दुनिया में प्राइवेसी और सुरक्षा बनाए रखने के लिए और क़ानूनों की ज़रूरत है. लेकिन न्यायिक अधिकार क्षेत्र इस साझा मक़सद के लिहाज़ से अलग अलग तरीक़े अपना रहे हैं.’

मिसाल के तौर पर ब्रिटेन या फिर कैलिफ़ोर्निया में ये कंपनियों की ज़िम्मेदारी है कि वो अपनी सेवाओं को इस तरह तैयार करें, जिससे बच्चों की निजता और सुरक्षा को सक्रियता से महफ़ूज़ बनाया जा सके.

ब्रिटेन की तकनीकी सचिव मिशेल डोनेलान ने बड़ी तकनीकी कंपनियों से गुज़ारिश की थी, ‘आप हमारे साथ मिलकर तैयारी करें. भारी जुर्माना लगने और सख़्त क़ानून लागू होने का इंतज़ार न करें, अपनी ज़िम्मेदारी निभाने में सक्रियता दिखाएं और अभी कार्रवाई करें.’

अमेरिका के कुछ क़ानून, इंटरनेट तक बच्चों की पहुंच की निगरानी के लिए मां-बाप की ज़िम्मेदारियों पर ज़ोर डालते हैं.

1998 का अमरीकी चिल्‍ड्रेन्स ऑनलाइन प्राइवेसी प्रोटेक्शन एक्ट मां-बाप की इजाज़त के बग़ैर, ऑनलाइन कंपनियों को बच्चों से जुड़ी कुछ जानकारियां प्रॉसेस करने पर रोक लगाता है.

अमेरिका के अरकंसास, लूसियाना, टेक्सस और यूटा राज्यों में हाल में पारित किए गए कुछ क़ानून मोटे तौर पर सोशल मीडिया सेवाओं को बच्चों को उनके मां-बाप की इजाज़त के बग़ैर इस्तेमाल करने की इजाज़त देने पर रोक लगाते हैं.

2020 में ब्राज़ील ने निजी डेटा जमा करने को लेकर एक क़ानून पारित किया था, लेकिन, ब्राज़ील के सांसद अभी भी डिजिटल माहौल में बच्चों और किशोरों की हिफ़ाज़त करने की व्यवस्थाओं जैसे कि इंटरनेट सेवाएं और ऑनलाइन प्रोडक्ट देने वालों के लिए यौन शोषण की चेतावनी देने वाली व्यवस्था बनाने को लेकर अभी परिचर्चाएं ही कर रहे हैं.

2022 में फ्रांस ने इंटरनेट से जुड़ी डिवाइस के लिए मां-बाप की इजाज़त को अनिवार्य बना दिया है.

अगस्त 2023 में भारत ने एक विवादित डेटा प्राइवेसी बिल को मंज़ूरी दी थी, जिसमें बच्चों के निजी डेटा को जमा करने के लिए उनके मां-बाप से तस्दीक़ के साथ इजाज़त लेना ज़रूरी बना दिया गया था. इस क़ानून में ख़ास बच्चों को निशाना बनाकर ऑनलाइन विज्ञापन करने पर भी रोक लगा दी गई थी.

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तकनीकी कंपनियां इस समस्या से कैसे निपट रही हैं?

आज तकनीकी कंपनियों के ख़िलाफ़ न केवल निजता से जुड़ी चिंताओं बल्कि यूज़र की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर भी विरोध प्रदर्शन बढ़ता जा रहा है.

दुनिया भर में एक्टिविस्ट और अभिभावक तकनीकी कंपनियों को ये ज़िम्मेदारी लेने या फिर ऐसे मंच तैयार करने का दबाव बना रही हैं, जो बच्चों और कम उम्र के यूज़र के लिए ‘बनावट में ही सुरक्षित’ हों.

इसी साल जनवरी के आख़िर में अमेरिकी संसद में सुनवाई के दौरान मेटा के सीईओ मार्क ज़करबर्ग ने उन बच्चों के मां-बाप से माफ़ी मांगी थी, जिन्हें ऑनलाइन दुनिया में शोषण का शिकार बनाया गया था.

दि बिग टेक ऐंड दि ऑनलाइन चाइल्ड सेक्सुअल एक्सप्लॉयटेशन क्राइसिस की ये सुनवाई इसलिए की गई थी, ताकि ‘ऑनलाइन दुनिया में बच्चों के यौन शोषण के बढ़ते मामलों की पड़ताल की जा सके.’

मेटा, स्नैप, डिस्कॉर्ड, एक्स और टिकटॉक जैसी सभी कंपनियों के अधिकारियों को गवाही देने के लिए बुलाया गया था. हालांकि सबसे ज़्यादा चर्चा मार्क ज़करबर्ग और टिकटॉक के चीफ एग्ज़ीक्यूटिव शोउ च्यू की पेशी की सबसे ज़्यादा चर्चा हुई थी.

सुनवाई के दौरान मार्क ज़करबर्ग ने कहा था, ‘आप सबको जिन हालात से गुज़रना पड़ा उसके लिए मैं माफ़ी मांगता हूं. आपके परिवारों को जिन चीज़ों का सामना करना पड़ा, उसकी तक़लीफ़ किसी को भी नहीं झेलनी चाहिए.’

अमेरिकी संसद में ये सुनवाई तब हुई थी, जब मेटा के एक पूर्व वरिष्ठ कर्मचारी ने कांग्रेस को बताया था कि वो ये मानते हैं कि इंस्टाग्राम किशोरों को यौन शोषण से महफ़ूज़ रखने के लिए पर्याप्त क़दम नहीं उठा रहा है.

मेटा और स्नैपचैट ने कहा कि उन्होंने 18 साल से कम उम्र वाले अपने यूज़र्स के लिए पहले से ही सुरक्षा के अधिक उपाय कर रखे हैं. उन्होंने मां-बाप की निगरानी आसान बनाने वाले टूल्स के बारे में भी बताया.

स्नैपचैट के एक अधिकारी ने कहा, ‘नौजवान पीढ़ी के बीच लोकप्रिय एक प्लेटफॉर्म के तौर पर हमें अपनी अतिरिक्त ज़िम्मेदारियों का एहसास है कि हमें एक सुरक्षित और सकारात्मक अनुभव देना चाहिए.’

मेटा के एक प्रतिनिधि ने कहा कि उनकी कंपनी चाहती है कि युवा पीढ़ी के लोग ‘अन्य लोगों से ऐसे माहौल में जुड़ सकें, जहां वो ख़ुद को सुरक्षित महसूस करते हों.’

उन्होंने कहा, ‘हिंसा और ख़ुदकुशी को उकसावा देने वाला कंटेंट, ख़ुद को चोट पहुंचाने या फिर खान-पान की बीमारी बढ़ाने वाले कंटेंट हमारे नियमों के ख़िलाफ़ हैं- और हमें जब भी अपने प्लेटफॉर्म पर ऐसा कंटेंट मिलता है, हम उसे हटा देते हैं.’

हालांकि, बीबीसी समेत कई मीडिया और निगरानी रखने वाले संगठनों ने बताया है कि अनुचित या दुर्व्यवहार करने वाले कंटेंट की शिकायत करने के बावजूद ये कंपनियां या तो तुरंत इन्हें हटाती नहीं हैं.

अक्सर ऐसा होता है कि कई बार संपर्क करने के बावजूद भी ऐसे कंटेंट को यूं ही पड़ा रहने दिया जाता है.

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