सुशील कुमार मोदी का अब राजनीतिक भविष्य क्या है?

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- Author, विनीत खरे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
"सुशील मोदी भारत के केंद्रीय वित्त मंत्री के पद के योग्य थे लेकिन दुर्भाग्यवश वो बिहार के वित्त मंत्री और उपमुख्यमंत्री बनकर रह गए."
बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री और वित्त मंत्री सुशील मोदी के बारे में ये शब्द बिहार के वरिष्ठ पत्रकार सुरूर अहमद के हैं.
वो कहते हैं, "सुशील मोदी बिहार में 2005 से लेकर 2013 तक उपमुख्यमंत्री और वित्त मंत्री रहे, जीएसटी एंपावर्ड कमिटी के प्रमुख रहे, जीएसटी आदि आर्थिक विषयों पर वो लेख लिखते रहे. जब वो विपक्ष में थे तो चाहे बजट हो या फिर कुछ और आर्थिक विषय, वो उन पर बात करते थे, सवाल उठाते थे."
लेकिन आज विश्लेषक उनके राजनीतिक भविष्य पर सवाल उठ रहे हैं.
बीजेपी ने नहीं बनाया राज्य सभा उम्मीदवार

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दरअसल पार्टी ने बिहार की राज्यसभा सीटों के लिए होने वाले उप चुनाव के लिए अपने दो उम्मीदवारों का ऐलान कर दिया है.
बीजेपी ने बिहार से डॉक्टर धर्मशीला गुप्ता और डॉक्टर भीम सिंह को राज्यसभा चुनाव के लिए उम्मीदवार बनाया है. इस सूची में सुशील कुमार मोदी का नाम नहीं है. सुशील मोदी का कार्यकाल अप्रैल में पूरा हो रहा है.
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लोक जनशक्ति पार्टी नेता और केंद्रीय मंत्री रहे रामविलास पासवान की मृत्यु के बाद खाली हुई सीट पर बचे कार्यकाल के लिए साल 2020 में सुशील मोदी को बिहार की राज्यसभा सीट से सांसद बनाया गया था.
अपना कार्यकाल ख़त्म होने के बाद एक ट्वीट में सुशील मोदी ने कहा, "देश में बहुत कम कार्यकर्ता होंगे जिनको पार्टी ने 33 वर्ष तक लगातार देश के चारों सदनों में भेजने का काम किया हो. मैं पार्टी का सदैव आभारी रहूंगा और पहले के समान कार्य करता रहूंगा."
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इस ट्वीट को कई हलकों में विदाई लेने वाले ट्वीट की तरह पढ़ा गया. सुशील मोदी का पक्ष जानने के लिए हमने उनसे संपर्क करने की कोशिश की लेकिन बातचीत नहीं हो सकी.
बिहार में लालू प्रसाद यादव विरोध के केंद्र में रहे सुशील मोदी पर लंबे वक्त से कई आरोप लगते रहे हैं कि उनके नेतृत्व में भाजपा नीतीश कुमार की बी-टीम बनकर रह गई, वो राज्य में भाजपा का चेहरा नहीं बन पाए, उनके रहते बिहार में कोई नई लीडरशिप नहीं उभर पाई. ऐसे वक्त में जब विधानसभा में बीजेपी की जदयू से ज़्यादा सीटें हैं उसके बावजूद भाजपा ने एक बार फिर नीतीश कुमार के नेतृत्व में सरकार बनाई है.
जेपी आंदोलन से जुड़े रहे सामाजिक कार्यकर्ता सत्यनारायण मदन सुशील मोदी और भाजपा की राजनीतिक सोच से सहमत नहीं हैं, लेकिन वो मानते हैं, "भाजपा की राजनीति में उनका जो योगदान है उसमें तो मानना पड़ेगा और आज भाजपा में जितने चेहरे हैं उनका योगदान उतना नहीं है जितना सुशील मोदी का है. लेकिन फिर भी वो आज अलग-थलग हैं."
"इस बार जब वो सांसद बने, उनको केंद्र में मंत्री नहीं बनाया गया जबकि वो बिहार भाजपा में वरिष्ठतम नेता हैं. वो एंटी लालू राजनीति के केंद्र में रहे हैं. उनको भाजपा राजनीतिक पद दे नहीं रही है. न (उनकी) केंद्र में जगह है न राज्य में जगह है."
साल 2013 से 2022 तक सुशील मोदी का मीडिया का काम देख चुके वरिष्ठ पत्रकार राकेश प्रवीर कहते हैं, "उन्हें (सुशील मोदी को) मैं नज़दीक से जानता हूं लेकिन बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व क्या सोच रहा है उसका अनुमान लगाना मुश्किल है. अगर (उन्हें) कोई ज़िम्मेदारी नहीं मिली तो (वो) बहुत कोशिश नहीं करेंगे. हो सकता है कोई किताब लिखें, अखबारों में कॉलम लिखें."
"व्यक्तिगत तौर पर वो खुद ही कहते थे कि अगर मैं राजनीति में न आया होता तो मैं पत्रकार बनता. बिहार की राजनीति में आज की तारीख में वो हाशिए पर हैं. संसदीय बोर्ड में या कोर कमेटी में, या पार्टी की डिसीज़न मेकिंग टीम में उनकी कोई बड़ी भूमिका नहीं है."
लेखक और पत्रकार नलिन वर्मा के मुताबिक़ सुशील मोदी के राजनीतिक अंत की बातें 2017 में ही शुरू हो गई थीं.
वो कहते हैं, "सुशील मोदी आडवाणी, वाजपेयी के दिनों के नेता हैं- चाहे वसुंधरा राजे हों, शिवराज सिंह चौहान हों या सुशील कुमार मोदी हों. वो अमित शाह से तो सीनियर हैं हीं और एक तरह के नरेंद्र मोदी के समकालीन हैं. नब्बे के दशक में उनका स्टेचर भी बराबर था. जब भाजपा के अभी के नेतृत्व की नई राजनीति शुरू हुई तो उन्होंने अपने ब्रैंड के नेताओं को बनाना शुरू कर दिया जो उनके वफ़ादार हों."
छात्र राजनीति से मंत्री पद तक

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नीतीश कुमार और सुशील मोदी बिहार में 70 के दशक के जेपी आंदोलन की उपज हैं. आरएसएस से जुड़े रहे सुशील कुमार मोदी की छात्र राजनीति की शुरुआत 1971 में हुई.
सत्यनारायण मदन उन्हें पटना विश्वविद्यालय के दिनों से जानते हैं. उनके मुताबिक़ सुशील मोदी दक्षिणपंथ का उदार चेहरा हैं, हालांकि उन्होंने नब्बे के दशक में उनके "बहुत आक्रामक भाषण" भी देखे हैं.
सुशील मोदी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में महत्वपूर्ण पदों पर रहे.
1990 में सुशील कुमार मोदी ने पटना केन्द्रीय विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा और विधानसभा पहुंचे. साल 2004 में वे भागलपुर लोकसभा क्षेत्र से चुनाव जीते. साल 2005 में उन्होंने संसद सदस्यता से इस्तीफ़ा दिया और विधान परिषद के लिए निर्वाचित होकर उपमुख्यमंत्री बने. यहीं से नीतीश कुमार के साथ उनका साथ शुरू होता है.
नलिन वर्मा के मुताबिक वो दौर ऐसा था जब नीतीश कुमार बड़े नेता थे और भाजपा जूनियर पार्टनर थी.
वो कहते हैं, "उस वक्त डिप्टी चीफ़ मिनिस्टर से बड़ी पोस्ट कोई हो नहीं सकती थी. अगर उस ज़माने में भाजपा अपने बल पर सत्ता में आई होती तो निश्चित रूप से यही (सुशील कुमार मोदी) मुख्यमंत्री बनते. वो पहले से ही भाजपा का चेहरा थे."
साल 2005 के बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा को 55 सीटें मिली थीं, जबकि जदयू को 88.
भाजपा को जदयू की बी-टीम बनाने का आरोप

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सुशील मोदी पर आरोप लगते रहे हैं कि उप-मुख्यमंत्री के उनके लंबे कार्यकाल के दौरान भाजपा जनता दल यूनाइटेड की बी-टीम बन कर रह गई.
साल 2005 में जहां भाजपा को 55 सीटें मिली थीं, 2010 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के उम्मीदवार 102 सीटों पर लड़े जिनमें 91 पर विजयी हुए. जदयू को 115 सीटें मिलीं. लेकिन एक बार फिर नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने और सुशील मोदी उप-मुख्यमंत्री.
पत्रकार सुरूर अहमद के मुताबिक 2022 में जब भाजपा और नीतीश कुमार अलग हुए, वो एकमात्र मौका था जब सुशील मोदी ने पिछले कई सालों के साथ के दौरान नीतीश कुमार की आलोचना की हो.
इसकी तुलना में अगर नीतीश कुमार के नेतृत्व में बनी ताज़ा सरकार में बनें उप-मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को देखें तो वो नीतीश कुमार के कड़े आलोचक रहे हैं. हालांकि ताज़ा विधानसभा में जनता दल यूनाइटेड के 45 विधायक हैं जबकि भाजपा के 78.
पत्रकार राकेश प्रवीर के मुताबिक बी-टीम से जुड़ा आरोप सुशील मोदी पर सही नहीं बैठता.
उनके मुताबिक़ सुशील मोदी का कहना है कि उन्हें जब जो आदेश दिया उन्होंने उसका पूरी क्षमता से पालन किया, और अगर बीजेपी नेतृत्व ने ये कहा कि आप डिप्टी सीएम बनिए तो उनका काम नीतीश कुमार से लड़ना नहीं बल्कि मिलजुल कर सरकार चलाना था, जो उन्होंने किया.
वो कहते हैं, "उसमें बीजेपी बी टीम बन गई और बाकी बीजेपी को क्या क्षति हुई, ये देखना तो शीर्ष नेतृत्व का काम था. 2020 में चुनाव परिणाम के बाद बीजेपी आरजेडी के बाद बड़ी पार्टी बनकर उभरी. उसके बाद भी बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व ने नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाया. 2020 में जब बीजेपी जदयू से बड़ी पार्टी बन गई तो बीजेपी जदयू की, नीतीश कुमार की पिछलग्गू क्यों बनी रही और अपना सीएम कैंडीडेट क्यों नहीं आगे किया? उसमें सुशील मोदी की क्या ग़लती है, उनकी क्या भूमिका है?"
राकेश प्रवीर मानते हैं कि नीतीश कुमार और सुशील मोदी साथ काम करने में सहज थे और उनमें कामकाज को लेकर समझ थी, लेकिन ये कहना कि इससे भाजपा जदयू की बी टीम बन कर रह गई, सही नहीं होगा.
वो पूछते हैं, "संगठन का काम बाक़ी लोग भी देख रहे थे. भाजपा में संगठन मंत्री होते हैं, क्षेत्रीय संगठन मंत्री होते हैं, राज्य प्रभारी होते हैं. वो सब लोग संगठन का काम देखते हैं. वो सब लोग क्या कर रहे थे. बीजेपी में सारे निर्णय सुशील मोदी थोड़े ही करते थे."
वो इन आरोपों को भी ग़लत बताते हैं कि सुशील मोदी ने बिहार में भाजपा को आगे बढ़ने नहीं दिया.
राकेश प्रवीर कहते हैं, "साल 2015 के चुनाव में बीजेपी से जदयू अलग थी. और मैंने देखा है कि पार्टी के प्रभारी बिहार में बैठे रहे. प्रधानमंत्री की 40 से ज़्यादा सभाएं बिहार में कराई गईं. और फिर भी मोहन भागवत के एक बयान को आधार बनाकर लालू यादव ने इस तरह का कैंपेन चलाया कि भाजपा पिछड़ गई. उसमें सुशील मोदी कहां दोषी हैं?"
"सुशील मोदी किसी भी दौर में इतने भी ताक़तवर नहीं थे कि वो बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व को सुपरपास करें या उसकी अवज्ञा करें. तो ऐसी स्थिति में सारा दोषारोपण सुशील मोदी पर नहीं किया जा सकता है."
आडवाणी कैंप और गुज़रे कल का बयान

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एक सोच के मुताबिक आज के दौर में सुशील मोदी के साइडलाइन होने की वजह गुज़रे दिनों की घटनाएं और बयान हैं, खासकर उन दिनों जब नरेंद्र मोदी भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर उभर रहे थे. सुशील मोदी को लाल कृष्ण आडवाणी का नज़दीकी माना जाता था.
ऐसे में उनका मीडिया में रिपोर्ट हुआ एक बयान काफ़ी चर्चा का विषय बना था जब रिपोर्टों के मुताबिक उन्होंने कहा था कि नीतीश कुमार प्राइम मिनिस्टर मैटिरियल हैं और 2014 के आम चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे.
उस वक्त की एक रिपोर्ट के मुताबिक भाजपा नेता इससे नाखुश हुए थे.
विश्लेषकों के मुताबिक 2009 में आम चुनाव में भाजपा की हार की वजह से भी कई भाजपा नेताओं ने नरेंद्र मोदी का रुख़ किया था.
राकेश प्रवीर के मुताबिक सुशील मोदी इस बात का कई बार खंडन कर चुके हैं.
वो कहते हैं, "किसी सवाल में उलझकर उन्होंने ये ज़रूर कहा था. (जब) किसी ने पूछा कि क्या नीतीश कुमार भी प्रधानमंत्री बन सकते हैं या पीएम मैटिरियल हैं तो सुशील मोदी ने कहा, हां मैटिरियल तो हैं. लेकिन इसका ये मतलब नहीं था कि उन्होंने ये कह दिया कि नीतीश कुमार ही प्रधानमंत्री बनेंगे."
हालांकि बाद में एक ट्वीट में सुशील मोदी ने ये भी लिखा, "आडवाणी जी पब्लिक के मूड का अनुमान लगाने में असफल रहे हैं. आडवाणी जी ने खुद अटल जी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर घोषणा की थी और वो नमो (नरेंद्र मोदी) के लिए भी ऐसा कर सकते थे."
'पार्टी में तो इन्होंने अच्छा ही काम किया. कभी पार्टी नहीं बदली. पार्टी के सिद्धांतों पर कभी उन्होंने समझौता नहीं किया.
लेकिन गुज़रे कल के बाद आज को देखें तो अभी साफ़ नहीं है कि सुशील मोदी का आगे का राजनीतिक सफ़र कैसा होगा. सवाल उठ रहे हैं कि क्या उन्हें लोकसभा चुनाव लड़वाया जाएगा, या फिर उन्हें संगठन के काम के लिए खींचा जाएगा.
नलिन वर्मा कहते हैं, ''पार्टी में तो इन्होंने अच्छा ही काम किया. कभी पार्टी नहीं बदली. पार्टी के सिद्धांतों पर कभी उन्होंने समझौता नहीं किया."
"सुशील कुमार मोदी लंबे समय तक डिप्टी सीएम थे और आज के वक्त के अलायंस में वो फ़िट बैठते थे. वो उस तरह से कटु नहीं हैं. आज की रैडिकल हिंदुत्व राजनीति में वो सूट नहीं करते. वो आरएसएस एबीवीपी से जुड़े व्यक्ति हैं. वो कहीं जाएंगे तो नहीं ये पक्की बात है."
नलिन वर्मा कहते हैं, "इन लोगों के राजनीतिक करियर का एक तरह से अंत नज़र आता है. इन लोगों को महत्वहीन कर दिया जाएगा लेकिन वो पार्टी नहीं बदलेंगे. ये विचारधारा वाले लोग हैं. उनको लगेगा कि मेरे भाग्य में इतना तक ही था. पार्टी बदल गई. हो गया काम."
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