सुशील मोदी जिन्होंने नीतीश कुमार के साथ लिखी लालू यादव की शिकस्त की कहानी

सुशील मोदी और नीतीश कुमार

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    • Author, सीटू तिवारी
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

बिहार में एनडीए ने सत्ता पर अपना कब्ज़ा क़ायम रखा है, नीतीश कुमार की मुख्यमंत्री की गद्दी भी नहीं बदली है, मगर एनडीए की इस नई सरकार में एक बड़ा बदलाव होने जा रहा है. इस बार नीतीश का हाथ सुशील कुमार मोदी नहीं बँटाएँगे. नई नीतीश कुमार सरकार में कप्तान तो वही रहेगा, पर उपकप्तान नया होगा.

सुशील मोदी ने स्वयं इस संबंध में ट्वीट कर उपमुख्यमंत्री की कुर्सी में बदलाव का संकेत दिया जब उन्होंने कहा कि उनसे "कार्यकर्ता का पद तो कोई नहीं छीन सकता".

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बिहार में समकालीन राजनीति के बारे में कहा जाता है कि राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव को अगर चुनावी ज़मीन पर शिकस्त देने वाले नीतीश कुमार हैं तो उन्हें तथ्य और दस्तावेजों के ज़रिए शिकस्त देने वाले सुशील कुमार मोदी.

नीतीश, मोदी और लालू -सत्तर के दशक में छात्र आंदोलन से उभरे चेहरे, जिनके इर्द-गिर्द आज भी बिहार की राजनीति बुनी हुई है.

दिलचस्प है कि सुशील कुमार मोदी ने तो लालू यादव के साथ छात्र राजनीति शुरू की, लेकिन लालू प्रसाद यादव को जेल पहुंचाने में भी अहम भूमिका निभाई.

आइए नज़र डालते है सुशील कुमार मोदी के सफर पर.

सुशील मोदी

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1971 से छात्र राजनीति से शुरुआत

सुशील कुमार मोदी की छात्र राजनीति की शुरुआत 1971 में हुई. वो उस वक्त पटना विश्वविद्यालय संघ की 5 सदस्यीय कैबिनेट के सदस्य निर्वाचित हुए. 1973 में वो महामंत्री चुने गए.

उस वक्त पटना विश्वविद्यालय संघ के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव और संयुक्त सचिव रविशंकर प्रसाद चुने गए थे. वनस्पति विज्ञान में पटना विश्वविद्यालय में ग्रैजुएशन (ऑनर्स) कर चुके सुशील कुमार मोदी बेहद जहीन छात्र माने जाते थे.

सुशील मोदी

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लेकिन जेपी आंदोलन के प्रभाव में आने के बाद उन्होंने पोस्ट ग्रैजुएशन में पटना विश्वविद्यालय में दाखिला लेकर पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी. आपातकाल में वे 19 महीने जेल में रहे. 1977 से 1986 तक वो अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में महत्वपूर्ण पदों पर रहे.

भारतीय जनता पार्टी के सिद्धांतकार और संघ विचारक रहे केएन गोविंदाचार्य को सुशील कुमार मोदी का मेंटर माना जाता है.

गोविंदाचार्य ने बीबीसी को बताया, "मैंने सुशील मोदी को 1967 से देखा है. उस वक्त भी आप उनके व्यक्तित्व को अलग से नौजवानों की भीड़ में चिह्नित कर सकते थे. सादगी, मितव्ययिता, किसी काम को बहुत केन्द्रित और अनुशासित होकर करना उनकी ख़ासियत थी."

केएन गोविंदाचार्य

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ट्रेन से एक लंबे सफ़र में उनकी मुलाक़ात जेसी जॉर्ज से हुई और 1987 में दोनों ने शादी कर ली. ये एक शादी अंतरधार्मिक शादी थी. आशीर्वाद देने के लिए अटल बिहारी वाजपेयी, नानाजी देशमुख और कर्पूरी ठाकुर भी शरीक हुए थे.

गोविंदाचार्य बताते हैं कि शादी बहुत साधारण ढंग से पटना के राजेन्द्र नगर स्थित शाखा मैदान में हुई थी. बाद में सुशील मोदी ने उसी परंपरा को निभाते हुए अपने बेटे उत्कर्ष तथागत की शादी भी बहुत सादगी से की. इस शादी में बाकायदा विवाह स्थल पर देहदान के लिए कांउटर खोला गया था.

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1990 में पहुंचे विधानसभा

6 अप्रैल, 1980 को भारतीय जनता पार्टी का गठन हुआ. बिहार में अब तक बीजेपी एक ऐसी पार्टी थी जिसका नेतृत्व अगड़ी जाति के पास था लेकिन उसका आधार वोट शहरी मतदाता, अगड़ी जाति और वैश्य, तीनों ही थे.

वरिष्ठ पत्रकार अरुण पांडेय बताते हैं, "80 के दशक के अंतिम वर्षों में संघ के गोविंदाचार्य ने बिहार में सोशल इंजीनियरिंग शुरू की. जिसके चलते अगड़ों के साथ पिछड़ी जातियां भी नेतृत्व में आईं. सुशील कुमार मोदी और नंद किशोर यादव जैसे नेता को गोविंदाचार्य ने प्रमोट किया, जिसके चलते बीजेपी का व्यापक आधार बना."

सुशील मोदी

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1990 में सुशील कुमार मोदी ने पटना केन्द्रीय विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा और विधानसभा पहुंचे. 1995 और 2000 का भी चुनाव वो इसी सीट से जीते. साल 2004 में वे भागलपुर लोकसभा क्षेत्र से चुनाव जीते.

साल 2005 में उन्होंने संसद सदस्यता से इस्तीफ़ा दिया और विधान परिषद के लिए निर्वाचित होकर उपमुख्यमंत्री बने. इस दौरान वो पार्टी में भी अलग-अलग दायित्व संभालते रहे.

तकनीक से दोस्ती

सुशील कुमार मोदी के हाथ में टैबलेट उस वक्त देखी गई, जब राज्य के बहुत सारे नेताओं के लिए ये किसी अजूबे जैसा था. किताब, अख़बार और किसी भी विषय के तथ्य से उनका संबंध बहुत घनिष्ठ रहा. इसकी झलक 1990 में उनके पहली बार विधायक बनने के बाद से ही मिलती है.

सुशील मोदी

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उस वक्त के पत्रकार बताते हैं कि सुशील मोदी के सहयोगी किशुनजीत बर्मा बाकायदा उनकी प्रेस रिलीज रेमिंग्टन टाइपराइटर से टाइप करके और उससे जुड़े दस्तावेज साथ में नत्थी करके अख़बार के दफ़्तरों में देते थे.

बीते 40 साल से उनके संपर्क में रहे वरिष्ठ पत्रकार और फिलहाल उनके मीडिया का काम देख रहे राकेश प्रवीर बताते हैं, "1995 में भी जब हम लोग उनके दफ़्तर में जाते थे तो उनके पास ताइवान का एक इलेक्ट्रॉनिक गैजेट था. वो कुछ फ़ोन जैसा था जिसके साथ एक पेन्सिलनुमा चीज़ रहती थी. मोदी जी अपने रोज़ाना के काम को उसमें दर्ज करते थे. उनके फ़ोन में तब भी ऑटो रिकॉर्डर-ऑटो आंसर लगा था जो बड़ी बात थी."

आज भी सुशील मोदी देश-विदेश के अख़बार रोज़ाना पढ़ते हैं. अख़बार पढ़ते वक्त उनके हाथ में कलम रहती है. जिन ख़बरों पर वो निशान लगाते हैं उसकी कतरनों की एक फ़ाइल श्रेणीबद्ध तरीक़े से बाक़ायदा तैयार होती है.

सुशील मोदी

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राकेश प्रवीर बताते है कि सुशील कुमार मोदी ने लिखना पढ़ना और व्यवस्थित दिनचर्या का पालन करना के एन गोविंदाचार्य से सीखा लेकिन गोविंदाचार्य इसमें राजस्थान के मुख्यमंत्री रहे भैरों सिंह शेखावत का भी नाम जोड़ते हैं.

वे बताते हैं, "शेखावत जी की पर्सनल लाइब्रेरी से सुशील मोदी प्रभावित थे. उनकी पूरी लाइब्रेरी राजस्थान से जुड़े मुद्दों के बारे में व्यापक समझ विकसित करती थी."

चारा घोटाला में दायर की थी याचिका

बिहार की राजनीति को सुशील कुमार मोदी 'त्रिभुज' कहते हैं जिसमें बीजेपी, आरजेडी और जेडीयू तीन भुजाएं हैं. सुशील कुमार मोदी ने नीतीश कुमार से नज़दीकी रखते हुए त्रिभुज की तीसरी भुजा यानी आरजेडी पर ही निशाना साधा.

सुशील कुमार मोदी साल 1996 में चारा घोटाले में पटना हाईकोर्ट में सीबीआई जांच की मांग को लेकर याचिका दायर करने वालों में से एक थे.

गोविंदाचार्य बताते हैं, "उस वक्त पार्टी के स्थापित नेता इस मामले को लेकर बहुत उत्साहित नहीं थे लेकिन सुशील मोदी ने इस मामले को उठाया, और इस मामले ने उनको राज्य की राजनीति में और ज़्यादा मज़बूती से स्थापित कर दिया."

सुशील मोदी

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साल 2015 में जेडीयू आरजेडी की सरकार बनने के बाद, सुशील मोदी के निशाने पर फिर से लालू परिवार आया.

उन्होंने 4 अप्रैल 2017 से लालू परिवार की बेनामी संपत्ति को लेकर लगातार 44 प्रेस कॉन्फ्रेंस की.

नतीजा ये हुआ कि 26 जुलाई 2017 को सरकार गिर गई. नई सरकार 27 जुलाई को बनी जिसमें सुशील कुमार मोदी उपमुख्यमंत्री बने.

विवादों से भी नाता रहा

68 वर्षीय सुशील कुमार मोदी के साथ कोई बड़ा विवाद कभी नहीं जुड़ा. ये ज़रूर हुआ कि उनके परिवार के लोगों की वजह से वे ज़्यादा चर्चा में रहे.

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साल 2011 राष्ट्रकवि दिनकर के पटना स्थित घर के एक हिस्से पर जबरन कब्जा करने को लेकर उनके भाई महेश मोदी का नाम आया. तो साल 2017 में सामने आए सृजन घोटाला में उनकी चचेरी बहन रेखा मोदी का नाम सामने आया.

सुशील मोदी इस मामले में ये कह चुके हैं कि रेखा मोदी के साथ उनका कोई व्यापारिक या वित्तीय संबंध नहीं है. लेकिन सृजन घोटाला सुशील मोदी के वित्त मंत्री रहते ही हुआ था.

बीजेपी में नापसंदगी भी है, लेकिन अनिवार्य भी हैं मोदी

अपनी ही जेनरेशन के दूसरे बीजेपी नेताओं से सुशील मोदी को जो चीज अलग कतार में खड़ा करती है, वो है उनका मजबूत 'पेपर वर्क'.

बिहार बीजेपी जिस पर अगड़ी जाति के चन्द्रमोहन राय, ताराकांत झा, सीपी ठाकुर जैसे नेताओं का कब्जा रहा, वहां सुशील मोदी अपने इसी मज़बूत पेपर वर्क के जरिए जगह बनाने में कामयाब रहे.

सुशील मोदी

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हालांकि नीतीश कुमार के साथ सुशील मोदी की नज़दीकी और संगठन से आने के बावजूद, अपने ही लोगों के साथ बढ़ती संवादहीनता के चलते उनसे नाराज़गी भी है.

वरिष्ठ पत्रकार अरुण पांडेय कहते हैं, "सुशील मोदी के कद को आज भी कम करने की कोशिश पार्टी के भीतर चलती रहती है. लेकिन बीजेपी के साथ परेशानी ये है कि उनके जैसा कोई दूसरा नेता तैयार नहीं हो पाया. यही वजह है कि नापसंदगी के बावजूद सुशील मोदी बीजेपी के लिए अनिवार्य भी हैं."

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