बिहार चुनाव: महिला मतदाता दूसरों के प्रभाव में आकर वोट देती हैं?

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- Author, टीम बीबीसी
- पदनाम, नई दिल्ली
"हम अपना बेटा से पुछब, हमरा बेटा जेकेरा में कही ओकरा में हम वोट देब. अब हम अपना मन से का बोलीं… ना हम पढ़ल बानीं ना लिख्खल बानीं. हमार बेटा जेकेरा के कही ओकरा के हम देब. बात कीलियर बा. हम झूठ ना बोलेलीं."
कटिहार के बाज़ार में साग-सब्ज़ी बेचने वाली प्रभावती का बेटा बीए की पढ़ाई करता है.
पचास साल की प्रभावती घर-बाहर का सारा काम ख़ुद संभालती हैं लेकिन जब वोट डालने की बात आती है तो वो सच्चाई से बिना लाग-लपेट के कहती हैं कि वो उसे ही वोट देंगी जिसे उनका बेटा कहेगा.
वो कहती हैं, "बेटा पढ़ता है इसलिए वो सही ही बताएगा."
बिहार में महिला वोटर्स की बड़ी अहम भूमिका रही है. बिहार में कोई भी पार्टी बिना इस आधी-आबादी के सहयोग के सत्ता हासिल नहीं कर सकती.
इस बात से एनडीए से लेकर महागठबंधन तक वाकिफ़ हैं. यही वजह रही कि अपनी हर रैली में एक ओर जहां नीतीश कुमार शराबबंदी और पंचायत में महिलाओं के लिए आरक्षण को कामयाबी बताने से नहीं चूकते थे, वहीं तेजस्वी यादव हर रैली में आशा बहनों, आंगनबाड़ी सहायिकाओं और अन्य महिला संगठन की कर्मचारियों की नौकरी पक्का करने का वादा करते रहे.
बिहार में महिला वोटर्स की भूमिका का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि ज़्यादातर लोगों का मानना है कि पिछली बार नीतीश को मुख्यमंत्री बनाने में महिलाओं की ही भूमिका रही थी.
एक तरह से कहा जाए तो सत्ता की चाबी इन्हीं महिला वोटर्स के पास है.

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कितना बड़ा वोट बैंक हैं महिलाएं?
बिहार में महिला वोटर्स की संख्या 3 करोड़ 39 लाख 7 हज़ार 979 है.
चुनाव आयोग ने मतदाता सूची का जो अंतिम प्रारूप प्रकाशित किया है, उसके मुताबिक़, बिहार के गोपालगंज में महिला वोटरों का अनुपात सबसे अधिक है. गोपालगंज में प्रति हज़ार पुरुष मतदाताओं पर महिला मतदाताओं की संख्या लगभग 992 है.
वहीं सबसे कम पुरुष-महिला अनुपात मुंगेर में है. यहां प्रति हज़ार पुरुषों पर 848 महिलाएं ही हैं.
लेकिन बिहार चुनाव के लिहाज़ से सबसे अहम और ख़ास बात यह भी है कि यहां मतदान करने में महिलाओं का प्रतिशत पुरुषों की तुलना में हमेशा बेहतर रहा है.
साल 2010 में बिहार में कुल 52.67 प्रतिशत मतदान हुआ था. इस मतदान में 54.49 महिलाओं ने मतदान किया था.वहीं पुरुषों का मत प्रतिशत 51.12 फ़ीसद ही रहा था.
साल 2015 के चुनावों में 56.66 फ़ीसदी मतदान हुआ और इसमें महिलाओं का वोट प्रतिशत जहां 60.48 फ़ीसदी रहा वहीं पुरुष का वोट प्रतिशत 53.32 फ़ीसदी था.
आंकड़ों के आधार पर यह स्पष्ट है कि महिला वोटर जिसे चाहें उसे सत्ता की चाबी सौंप सकती हैं.
लेकिन महिला वोटरों को लेकर एक सवाल जो हमेशा से उठता रहा है कि क्या उनका वोट स्वतंत्र होता है? एक आम धारणा है कि महिलाओं का वोट स्वतंत्र नहीं होता. उन पर उनके पति, पिता, बेटे, भाई की पसंद का ख़ासा असर होता है.

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कटिहार की प्रभावती के लिए जैसे उनके बेटे का पढ़ा-लिखा होना इस बात की तस्दीक़ करता है कि उसकी पसंद के उम्मीदवार को वोट देना ही सही फ़ैसला होगा, वहीं रौतेरा बाज़ार में ही सब्ज़ी बेचने वाली सावित्री को इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है कि किसने क्या किया और कौन क्या वादा कर रहा है.
उनका मानना है कि वोट देना एक प्रक्रिया है और अगर उन्होंने वोट नहीं दिया तो सरकार नाराज़ हो जाएगी.
वो कहती हैं, "हम सरकार के अंदर हैं. सरकार को वोट नहीं देंगे तो वो हमको राशन कार्ड और बाकी कुछ नहीं देगी."
वहीं गोपालगंज की प्रतिमा (बदला हुआ नाम) बताती हैं, "हमारे भइया जिस पार्टी के लिए कैंपेन कर रहे हैं उसी को वोट देंगे. किसी और को देंगे तो उनका मेहनत ख़राब होगा. जब घर के ही लोग साथ नहीं देंगे तो कैसे होगा."
सुनीता वोट तो दे आई हैं लेकिन वोट डालने से पहले उन्होंने इस बारे में कोई मालूमात नहीं की कि उनके क्षेत्र का कौन-सा प्रत्याशी कैसा है और वो किस पार्टी से है.
वो कहती हैं, "राजनीति आदमी लोगों का चीज़ है. वो लोग अख़बार पढ़ता है, रेडियो सुनता है, बैठक करता है. तो उन लोगों को ठीक पता होगा कि कौन-सा निशान पर देना है. हम तो सालों से ऐसे ही वोट देते हैं. जिस पर घर का आदमी कहता है."
अधिकतर राज्यों में महिलाओं की यही स्थिति
बिहार की एक स्थानीय पत्रकार स्नेहा ने हमसे बातचीत में कहा कि महिला वोटरों को लेकर यह स्थिति सिर्फ़ बिहार में नहीं है. देश के ज़्यादातर हिस्सों में महिलाएं घर के पुरुषों के प्रभाव में आकर वोट करती हैं.
वो कहती हैं, "सालों से ऐसा होता आ रहा है. इस बात से तो इनकार नहीं कर सकते हैं कि बिहार अब भी पिछड़ा है. महिलाएं साक्षर हो रही हैं लेकिन साक्षर होने से काम नहीं चलेगा. वो जब तक घर के बाहर की दुनिया को नहीं समझेंगी, स्वतंत्र वोट नहीं कर सकेंगी."
उनका मानना है कि बड़े घरों और उच्च-मध्यम वर्गीय परिवारों की तुलना में निम्न और कम आय वाले परिवारों की महिलाएं ज़्यादा स्वतंत्र होकर मतदान करती हैं.
अपनी बात के पक्ष में तर्क देते हुए वो कहती हैं, "बड़े घरों की महिलाएं हर रैली में नहीं जातीं. संभवत: जाती भी हैं तो उन रैलियों में जिनमें उनके परिवार या ख़ानदान के लोग हों या फिर उनका कोई अपना ही प्रत्याशी हो."
"ऐसे में उनके पास विकल्प ही नहीं. लेकिन निम्न आय वर्ग के लोगों के साथ, ख़ासतौर पर महिलाओं के साथ ऐसा नहीं है. वे भीड़ हैं. जिनकी ज़रूरत रैलियों में, सभाओं में होती है और हर पार्टी को होती है. तो ऐसे में वो लगभग हर रैली, सभा में जाती हैं."
"बेशक इसमें लालच का एंगल होता है लेकिन वो यहां मुद्दा नहीं है. वो रैलियों में जाती हैं. अलग-अलग नेताओं को सुनती हैं और उनका कोई चहेता नहीं है, जिसकी बात उन्हें रास आयी वो अमूमन उसे ही वोट करती हैं."
लेकिन अगर बात सिर्फ़ बिहार की करें तो आख़िर क्या वजह है कि यहां महिला वोटर आज़ाद नहीं?
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महिलाओं में राजनीतिक चेतना
पटना यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर रहीं भारती एस. कुमार कहती हैं कि चुनाव और उसमें भी वोट करने जाना महिलाओं के लिए पर्व-सा होता है.
भारती साल दर साल महिलाओं के बढ़ते वोट प्रतिशत पर कहती हैं कि पंचायतों में आरक्षण मिलने के बाद से महिलाओं में राजनीतिक चेतना बढ़ी है. और वो बढ़े हुए वोटिंग परसेंट में भी दिखता है.
वो मानती हैं कि मुखिया या सरपंच बनने के बाद उनमें राजनीतिक नेतृत्व को लेकर जागरुकता तो आई है लेकिन पुरुष वर्चस्व की बात को नकारा नहीं जा सकता. अभी भी मुखिया महिला चुनी जाती है और कमान पति या पिता के हाथ में होती है.
भारती मानती हैं कि यही स्थिति वोट देने में भी है.
वो कहती हैं, "बिहार की बात करें या फिर किसी भी मिडिल क्लास परिवार की, वोट करना परिवार का फ़ैसला होता है. चाहे वो जाति के आधार पर हो या किसी भी आधार पर. यह एक सामूहिक फ़ैसला होता है. ऐसे में महिलाएं उसी को वोट करती हैं जिसके लिए परिवार में निर्णय लिया जाता है."
वो इसके पीछे एक अन्य वजह भी बताती हैं.
वो कहती हैं, "महिलाओं में शिक्षा की कमी होना एक बड़ा कारण है कि वो प्रभाव में आकर मतदान करती हैं. बिहार की बात की जाए तो यहां शिक्षा का स्तर महिलाओं के लिए अच्छा नहीं है ऐसे में महिलाएं सोच नहीं बना पाती हैं कि उन्हें किसे और किस आधार पर वोट करना है."
"उनकी सोच या तो टीवी से बनती है या फिर उन्हें जिन्हें वो सुनती हैं. अख़बार, राजनीतिक विवेचना आदि से वो उस तरह जुड़ी नहीं होतीं. हां अगर कोई महिला किसी संगठन से जुड़ी है और चर्चा-विमर्श में भाग लेती है तो निश्चित तौर पर वो राजनीतिक तौर पर सोच रखने वाली होगी और वो आगे बढ़कर अपने अधिकारों की रक्षा के लिए बात कर सकेगी."
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भारती एस. कुमार मानती हैं कि वोट दिलवाने में जाति, रिश्तेदारी जैसे फ़ैक्टर भी काम करते हैं और कई बार महिला वोट इनसे प्रभावित हो जाता है.
हालांकि बिहार की हर महिला किसी प्रभाव के तहत ही वोट करती हैं, ऐसा कहना पूरी तरह से ग़लत होगा.
समाज-विज्ञानी डीएम दिवाकर का मानना है कि महिलाएं प्रभाव में आकर वोट करती हैं, ये पुरानी बात हो चुकी है.
वो कहते हैं, "महिलाएं प्रभाव में आकर वोट करती हैं, ऐसा साल 2005 और 2010 के बीच होता था. पंचायत में जब महिलाओं को पचास फ़ीसद आरक्षण दिया गया तब भी था. लेकिन जब शराबबंदी हुई तो उस समय महिलाएं चाहती थीं कि नीतीश कुमार आएं जबकि पुरुष नहीं चाहते थे. लेकिन महिलाओं ने नीतीश को ही वोट दिया. और उस समय से एक स्वतंत्र वोट देने का दौर शुरू हुआ."
"पंचायत में लीडरशिप का रोल मिलने के बाद से जब महिलाएं घर से बाहर निकलने लगीं तो स्वतंत्र वोट देना और बढ़ा. वहीं जो लड़कियां घर से बाहर निकलीं और जो अब पहली वोटर हैं वो भी स्वतंत्र वोट करती हैं, ना कि किसी के प्रभाव में आकर."
हालांकि डीएम दिवाकर ये ज़रूर कहते हैं कि इन चुनावों में लॉकडाउन के दौरान पैदा हुई परिस्थितियां निश्चित तौर पर महिला वोटरों को प्रभावित करेंगी.
वो कहते हैं, "जब महिलाएं देख रही हैं कि उनके बच्चे और उनके पति की नौकरी छूट गई है, बच्चों का स्कूल छूट गया है तो उन पर, उनके घरवालों पर जो गुज़री, उसका असर होगा और संभव है कि हुआ भी हो."
डीएम दिवाकर कहते हैं, "वो दौर था जब महिलाओं को लोग वोट कराने ले जाया करते थे. या फिर महिलाएं जाती ही नहीं थीं. उनके नाम पर बूथ पर धांधली होती थी. मारपीट हो जाया करती थी लेकिन अब ऐसी घटनाएं कम हुई हैं क्योंकि महिलाएं अपना वोट ख़ुद डालने जाती हैं."

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युवा पीढ़ी की महिलाओं की स्थिति
दिल्ली में पढ़ाई करने वाली मीनाक्षी विधानसभा चुनाव में अपने मताधिकार का प्रयोग करने के लिए बिहार गई हुई हैं. वो बिहार में संभावनाओं से इनकार नहीं करती हैं.
मीनाक्षी कहती हैं, "ऐसा नहीं है कि बिहार में लोग राजनीति को लेकर जागरूक नहीं हैं. यहां तो घरों में भी चर्चा का विषय राजनीति ही होता है लेकिन महिलाएं उससे उस तरह नहीं जुड़ सकी हैं जैसे पुरुष."
"लेकिन इसमें ग़लती किसी की नहीं है. सामाजिक व्यवस्था ही ऐसी रही है कि घर के भीतर घर-गृहस्थी से जुड़े फ़ैसले महिलाएं करती हैं और बाहर के पुरुष. लेकिन अब समय बदल रहा है. लड़कियाँ सिर्फ़ पढ़ ही नहीं रही हैं, बाहर भी निकल रही हैं. अब वो अपनी सोच को ज़ाहिर करना सीख रही हैं."
मीनाक्षी कहती हैं, "मेरे पिता और भाई ने जिस पार्टी को वोट दिया है, मैंने उसे नहीं दिया है. मेरी मां ने भी नहीं. यही बात अगर कुछ साल पहले होती तो इसे अच्छा नहीं माना जाता लेकिन अब हमारे पास अपने तर्क हैं तो पिताजी भी ज़बरदस्ती नहीं कर सकते."
मीनाक्षी का मानना है कि पंचायतों में आरक्षण मिलने से भी महिलाएं राजनीतिक तौर पर सक्रिय हुई हैं लेकिन अभी सबकुछ शुरुआती दौर में है.
मीनाक्षी की ही तरह पूजा भी यूनिवर्सिटी में पढ़ती हैं. उनका मानना है कि अगर महिलाओं को बतौर वोटर सशक्त करना है तो इसके लिए महिला उम्मीदवारों को भी सामने लाने की ज़रूरत है. पर वैसी महिला उम्मीदवार को बिल्कुल नहीं जो सिर्फ़ चेहरा हों.
पूजा कहती हैं, "जब तक आप उदाहरण पेश नहीं करेंगे, बदलाव की उम्मीद भी नहीं कर सकते. महिलाओं को ये समझाना, ये दिखाना होगा कि राजनीति उनकी भी उतनी ही है जितनी पुरुषों की. उन्हें सिर्फ़ वोट करने तक सीमित न रखकर,उन्हें नेतृत्व भी देना होगा."
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