बिहार चुनाव: लालू प्रसाद यादव, राम विलास पासवान और शरद यादव की कमी कितनी खली?

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    • Author, प्रदीप कुमार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, बिहार से

बिहार की राजनीति में एक कहावत की चर्चा लोग अक्सर किया करते हैं- 'एक कटोरी, तीन गिलास, शरद, लालू, रामविलास.'

1974 के जेपी आंदोलन के बाद से बिहार में सामाजिक न्याय की लड़ाई में वैसे तो कई नेताओं का योगदान रहा, पर इन तीनों के योगदान की अक्सर चर्चा होती है.

लेकिन इस बार के बिहार चुनाव में ये तीनों नेता मौजूद नहीं थे. 1990 के बाद बिहार की राजनीति में यह पहला मौक़ा था, जब लालू प्रसाद यादव, राम विलास पासवान और शरद यादव के बिना ना केवल चुनावी सभाएँ हुईं, बल्कि चुनाव भी हुए.

दिलचस्प यह भी रहा कि इन तीनों नेताओं की ज़िम्मेदारियों को काफ़ी हद तक इनके बच्चों ने सँभाल लिया.

सबसे पहले बात लालू प्रसाद यादव की. लालू प्रसाद यादव इन दिनों झारखंड के राँची में चारा घोटाले के मामलों में जेल में हैं.

साल 2015 के चुनाव के दौरान भी उन्हें सज़ा मिल चुकी थी, लेकिन तब वो ज़मानत पर थे और उन्होंने महागठबंधन को बनाने में अहम भूमिका अदा की थी, लेकिन इस बार उन्हें ज़मानत नहीं मिली और पूरे चुनाव के दौरान उनकी भूमिका जेल में रहकर चुनाव देखने वाले दर्शक की ज़्यादा रही.

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तेजस्वी यादव का कितना तेज फैला?

वहीं दूसरी ओर उनके बेटे तेजस्वी यादव ने पिता की ग़ैर-मौजूदगी में पूरा चुनाव प्रचार अभियान ख़ुद पर फ़ोकस किया.

उन्होंने रणनीतिक तौर पर राष्ट्रीय जनता दल के पोस्टरों से लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी की तस्वीरों की जगह नहीं दी और केवल ख़ुद को रखा.

इस बारे में राज्य के वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर बताते हैं, "देखिए बिहार में काफ़ी ऐसे लोग हैं जो लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी के प्रति बैर भाव रखते हैं. तेजस्वी ने एक झटके में यह मुद्दा ही ख़त्म कर दिया. इसका उन्हें काफ़ी लाभ मिला."

हालाँकि, दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी और जनता दल (यूनाइटेड) की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, नीतीश कुमार और सुशील कुमार मोदी लगातार अपने चुनावी अभियान के दौरान लालू-राबड़ी के 15 साल के दौर की याद दिलाते रहे.

नरेंद्र मोदी ने तेजस्वी यादव को 'जंगलराज का युवराज' कहा, तो नीतीश कुमार ने कहीं ज़्यादा व्यक्तिगत हमले करते हुए कह दिया, "अपने बाप से पूछो और जो लोग आठ-आठ, नौ-नौ बच्चे पैदा करते रहे, वे विकास की बात कर रहे हैं." सुशील मोदी ने भी लालू प्रसाद यादव के दौर को भ्रष्टाचार से जोड़ते हुए हर दिन मुद्दा बनाया.

जदयू ने पहले चरण के मतदान के बाद फुलवरिया टू होटवार, करके एक वेबसाइट ही बना दी. इस वेबसाइट पर लालू-राबड़ी शासन के दौरान हुए अपराध और भ्रष्टाचारों की जानकारी के साथ-साथ उस दौर के अख़बारों की क्लिपिंग भी लगाई गई.

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लेकिन तेजस्वी यादव ने बिहार के आम चुनावों में इसे बड़ा मुद्दा नहीं बनने दिया. महज़ 31 साल की उम्र में वे राजनीतिक तौर पर इतने सध चुके हैं कि जंगलराज की याद दिलाने पर वे डिफ़ेंसिव हुए बिना कहते हैं, "इस सरकार ने अपने 15 साल में क्या-क्या किया है, जनता ये पूछना चाहती है."

इसके बाद वे इस मुद्दे को उपमुख्यमंत्री के तौर पर अपने 18 महीने के कार्यकाल की याद दिलाते हुए कहते हैं, "नए वाले महात्मा गांधी सेतु से लेकर छह-छह पीपा पुल बनाने का काम मैंने किया, उसमें क्या भ्रष्टाचार किया, ये बताइए."

इसके बाद तेजस्वी यादव, एनसीआरबी के आँकड़ों के हवाले से बताते हैं कि 'नीतीश कुमार के 15 साल के शासन में अपराध का ग्राफ़ बढ़ा है, लेकिन इस पर चर्चा नहीं होती है.'

राष्ट्रीय जनता दल की ओर से राज्य सभा सांसद मनोज झा कहते हैं, "मुज़फ़्फ़रपुर में बालिका गृह काण्ड में जो हुआ उसकी कल्पना क्या उस दौर में की जा सकती थी जिसे कथित तौर पर जंगलराज कहा जाता था, आप लालू जी के दौर को जंगलराज कहते हैं तो नीतीश कुमार के 15 साल को महा-जंगलराज कहना होगा."

तेजस्वी यादव ने अपने चुनावी अभियान में भले ही लालू प्रसाद यादव को लेकर इस बार कोई इमोशनल अपील नहीं की, लेकिन उनकी सभाओं में मौजूद भीड़ में लालू प्रसाद यादव को लेकर एक भावनात्मक जुड़ाव नज़र आ रहा था.

लालू प्रसाद यादव के समर्थकों का मानना है कि उन्हें चारा घोटाले में फँसाया गया है, तेजस्वी की सोनपुर में हुई सभा में एक युवा ने कहा, "बताइए चारा घोटाला क्या लालू के राज में शुरू हुआ था, लालू जी ने उस घोटाले को पकड़ा था, लेकिन जगन्नाथ मिश्र को बरी कर दिया गया और लालू को जेल क्यों भेजा गया."

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लालू प्रसाद यादव की कमी कितनी खली?

मिथलांचल के सुपौल ज़िले में एक शख़्स ने कहा कि "लालू जी ने हमको वह दिया जिसके चलते हम आपसे बात कर रहे हैं, हमारी मछली की दुकान है और सरकार किसी की भी हो हमें तो कुछ मिलना नहीं है. लेकिन लालू जी ने जो दिया वो आपको बता रहे हैं, वरना 30-35 साल पहले हम लोग बात तक नहीं कर पाते थे."

बिहार चुनाव से पहले लालू प्रसाद यादव पर एक क़िताब भी आयी- 'द किंग मेकर, लालू प्रसाद यादव की अनकही दास्तान'. इस पुस्तक में लालू के कई सभाओं के भाषणों का विश्लेषण भी शामिल किया गया है, जिसे पढ़ते हुए लगता है कि 2020 के चुनाव के दौरान लालू प्रसाद यादव की कमाल की वाकपटुता का अभाव देखने को मिला.

2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में अपनी तमाम लोकप्रियता और संसाधनों के बावजूद नरेंद्र मोदी लालू प्रसाद यादव से पार नहीं पा सके थे. इस चुनाव के दौरान एक चुनावी सभा में लालू ने मोदी की नकल उतारकर अपने समर्थकों को ख़ूब हंसाया था.

अपनी एक रैली में तो उन्होंने ये भी कहा था, "मोदी जी, इस अंदाज़ में मत बोलिए वरना गर्दन की नस खींच जाएगी." ये अंदाज़ इस बार के चुनाव में मिसिंग रहा.

इस किताब के लेखक और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के सेंटर फ़ॉर मीडिया स्टडीज़ में पीएचडी कर रहे जयंत जिज्ञासु खगड़िया के अलौली विधानसभा के हैं.

जयंत अपने पिता हलधर प्रसाद के हवाले से बताते हैं, "इस बार तेजस्वी यादव की सभा जो मेरे इलाक़े में हुई तो उसमें जुटी भीड़ को मेरे पिता ने 1995 के चुनाव में लालू जी के लिए जुटी भीड़ से भी ज़्यादा पाया. जबकि लालू प्रसाद एक तरह से क्राउड पुलर नेता के तौर पर जाने जाते थे. जबकि तेजस्वी जी की वैसी पहचान नहीं थी. इस बार उन्होंने यह साबित किया है कि वे भी भीड़ जुटाने वाले नेता हैं."

लेकिन ऐसा भी नहीं है कि लोगों को लालू जी की कमी नहीं खली हो. लालू यादव के पैतृक गाँव फुलवरिया में एक युवा ने कहा, "लालू जी की बराबरी कोई नहीं कर सकता, उन्हें इस इलाक़े के हर घर की ख़बर रहती थी, तेजस्वी वैसा ही कनेक्ट रखेंगे, इसकी उम्मीद है क्योंकि वे हमारे लालू जी के बेटे हैं, हमारे भाई हैं."

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हाजीपुर के एक कारोबारी युवा ने कहा, "देखिए हम लोग नीतीश जी को वोट देते आये हैं, लेकिन इनके राज में ब्यूरोक्रेसी इतना निरंकुश हो चुका है कि किसी की सुनवाई नहीं है. लालू जी होते तो यह सब लगाम में होता, फिर भी इस बार बदलाव की उम्मीद है."

वहीं दरभंगा में एक युवा मतदाता ने कहा कि "लालू जी के चुनावी भाषण का कोई मुक़ाबला नहीं. वे होते तो मोदी और नीतीश कुमार को अपने राजनीतिक तंज़ में पहले हराते, फिर चुनाव में हराते."

जनता दल (यूनाइटेड) के प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह लालू प्रसाद यादव के ज़माने में हुए भ्रष्टाचार की चर्चा करते हुए यह कहते हैं कि "इस चुनाव में भले लालू जी नहीं हैं, लेकिन तेजस्वी उनके बनाये नियमों और उनकी बातों के तहत ही पार्टी चला रहे हैं."

वैसे तेजस्वी यादव ने एक तरह से लालू प्रसाद की ग़ैर-मौजूदगी में अकेले दम पर महागठबंधन का नेतृत्व शानदार ढंग से सँभाला है और अपने पिता की उम्र वाले नेताओं के साथ युवाओं को भी साथ लेकर चले. लालू प्रसाद यादव के जेल में होने के चलते भी तेजस्वी को भावनात्मक स्तर पर लोगों का सपोर्ट मिला.

लालू प्रसाद यादव की तरह ही बिहार की राजनीति में सामाजिक न्याय के स्तंभ नेता रहे राम विलास पासवान इस बार बिहार चुनाव से नदारद रहे.

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राम विलास पासवान के चिराग

दरअसल लंबी बीमारी के बाद आठ अक्टूबर को रामविलास पासवान का निधन हो गया था, ऐसे में बीते 50 साल से बिहार की राजनीति की पहचान रहे राम विलास की विरासत को उनके बेटे चिराग पासवान ने बख़ूबी सँभाला.

राम विलास पासवान खगड़िया के अलौली विधानसभा से बाहर निकले, बिहार लोक सेवा आयोग की परीक्षा से बिहार पुलिस सेवा में पहुँचे और राजनीति में ऐसे रमे कि भारतीय दलित राजनीति में उनका नाम हमेशा के लिए दर्ज हो गया.

लेकिन इस बार उनके बेटे चिराग पासवान ने उनके उस सपने को पूरा करने का बेड़ा उठाया, जो राम विलास पासवान जीते जी कभी पूरा नहीं कर सके.

मण्डल कमीशन को लागू कराने वाले नेताओं में शामिल रहे राम विलास पासवान केंद्र की राजनीति में हमेशा प्रासंगिक रहे, लेकिन कभी बिहार की राजनीति में वे ताक़त के तौर पर स्थापित नहीं हुए.

उनकी पार्टी को हमेशा पाँच छह प्रतिशत वोट बैंक वाली पार्टी के तौर पर देखा गया.

लेकिन चिराग पासवान इस बार बिहार की राजनीति में एक फ़ैक्टर के तौर पर उभरे.

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उन्होंने 'बिहार फ़र्स्ट, बिहारी फ़र्स्ट' की नींव के ज़रिए बिहार की राजनीति में एक हलचल पैदा की.

वे तेजस्वी यादव की तुलना में कहीं ज़्यादा मुखरता से नीतीश कुमार की आलोचना करते रहे और नीतीश कुमार को हराने के इरादे से अपने उम्मीदवारों का चयन किया.

इस कोशिश में चिराग पासवान ने अपने पार्टी के उम्मीदवारों को 143 सीटों से खड़ा कर दिया.

'वोट कटवा पार्टी' का तमगा

एक झटके में उन्होंने इन सीटों पर अपनी पार्टी के आधारभूत ढाँचे और संगठन को खड़ा कर लिया. चिराग पासवान के मुताबिक़, उनके उम्मीदवार कम से कम 50 सीटों पर ऐसी स्थिति में हैं जहाँ से जनता दल यूनाइटेड को हराएँगे.

चिराग पासवान अपनी रणनीति को साफ़ करते हुए कहते हैं कि 'बिहार विधानसभा में महज़ दो विधायक हैं हमारे, अब हमारे विधायकों की संख्या कहीं ज़्यादा होगी, लेकिन उससे भी अहम बात यह होगी कि बिहार की राजनीति में लोक जनशक्ति पार्टी एक विकल्प के तौर पर उभरी है और हमारा वोट प्रतिशत दोगुने से भी ज़्यादा होने जा रहा है.'

चिराग पासवान इस पूरे चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के साथ होने का दावा करते रहे, हालाँकि भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने उन्हें 'वोट कटवा पार्टी' तक कहा.

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इस चुनाव के दौरान एक सभा में उनके सामने कैसे-कैसे अनुभव हुए, उसका अंदाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि एक सभा में एक युवक ने आकर उनसे कहा कि "भइया अब तो बीजेपी ने वोट कटवा पार्टी कह दिया है, ऐसे में कैसे चलेगा, तो चिराग ने उस युवक को समझाया कि अभी नीतीश कुमार पर ही फ़ोकस करो."

चिराग समर्थकों के मुताबिक़, अगर बीजेपी ने लोजपा के साथ चुनाव लड़ा होता तो बीजेपी और एलजेपी की सरकार बनती.

दिलचस्प यह है कि पूरे चुनाव प्रचार के दौरान ना तो तेजस्वी यादव ने और ना ही चिराग पासवान ने एक-दूसरे के ख़िलाफ़ आरोप-प्रत्यारोप लगाए.

इससे दोनों के बीच आपसी सहमति को लेकर भी लोगों में कयास दिखा. बरबीघा से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ने वाले गजानंद शाही कहते हैं कि 'चिराग पासवान ने इस पूरे चुनाव अभियान में जो स्टैंड लिया है, वह उनकी अपनी राजनीति के लिए अच्छा होगा, उन्होंने अपना स्पेस मज़बूत किया है.'

हालाँकि, राम विलास पासवान के पुराने समर्थकों में एक बुर्ज़ुग ने कहा कि 'चिराग पासवान का भविष्य बहुत अच्छा है, लेकिन इस बार वे बीजेपी का साथ दे रहे हैं, वे पूँजीपतियों का साथ दे रहे हैं, जबकि उनके पिता ने हमेशा दलितों का साथ दिया.'

इस चुनाव में चिराग पासवान आक्रामकता के साथ अगर अपनी राह नहीं चुनते तो पासवान वोटों के भी छिटक कर बीजेपी में जाने का ख़तरा उत्पन्न हो सकता था. अब चिराग के सामने पासवान वोट बैंक के साथ अपने दायरे को बढ़ाने और उसे साथ रखने की चुनौती होगी.

लालू प्रसाद यादव और राम विलास पासवान के अलावा इस चुनाव में शरद यादव भी हिस्सा नहीं ले पाए.

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राजनीति के मैदान में नई एंट्री

सामाजिक न्याय की राजनीति का अहम चेहरा रहे शरद यादव वैसे तो जबलपुर के हैं, लेकिन वे बिहार के मधेपुरा से चार बार लोकसभा का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं.

मगर इस बार बीमार होने के चलते शरद यादव बिहार चुनाव के सीन से ग़ायब रहे. पर उनकी विरासत को आगे बढ़ाने की ज़िम्मेदारी उनकी बेटी सुभाषिनी ने बख़ूबी सँभाली.

मधेपुरा के बिहारीगंज से सुभाषिनी इस बार कांग्रेस के टिकट पर चुनाव मैदान में उतरीं.

राजद के बदले कांग्रेस को चुनने के अपने फ़ैसले पर सुभाषिनी ने बताया कि कांग्रेस से जो ऑफ़र था, वह उससे इनकार नहीं कर सकीं और महागठबंधन के साथ ही वह एनडीए सरकार के ख़िलाफ़ चुनाव मैदान में हैं.

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सुभाषिनी यह भी बताती हैं कि उनके पिता ने मधेपुरा के लिए जितना कुछ किया है, वो शायद ही यहाँ किसी और नेता ने किया होगा, लेकिन अब वह बिहारीगंज में लोगों के विकास के लिए काम करेंगी.

हालाँकि अपने पिता की राह पर अभी सुभाषिनी को लंबा संघर्ष करना है, पर वह इसके लिए पूरी तरह तैयार दिखती हैं.

उनकी शादी हरियाणा में हुई है, पर सुभाषिनी यह बताती हैं कि मधेपुरा ही उनका घर है और वह वहाँ की मतदाता भी हैं, बचपन से लोगों को देखती आयी हैं, लिहाज़ा उन्हें लोगों की मुश्किलों का अंदाज़ा है.

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