तेजस्वी को कमान सौंपने के नीतीश के बयान का निहितार्थ और समीकरण क्या है

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- Author, विष्णु नारायण
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, पटना से
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मंगलवार को एक बार फिर दोहराया कि उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव 2025 के विधानसभा चुनाव में महागठबंधन का नेतृत्व करेंगे.
वे बोले, "हम तो शुरू से ही बोल रहे हैं. ये तो नेतृत्व करबे करेंगे. एकदम करेगा. समझ गए न?"
तेजस्वी यादव को अक्सर बिहार के भविष्य का नेता बताने वाले नीतीश कुमार ने सोमवार को नालंदा में ये कहा था कि "तेजस्वी के नेतृत्व में महागठबंधन 2025 का चुनाव लड़ेगा."
सोमवार को नीतीश ने कहा था, "हम लोग इतना तो कर ही दिए हैं. बाकी जो होगा वो तेजस्वी जी करते रहेंगे, करवाते रहेंगे. कोई दिक़्क़त वगैरह नहीं होगी. कोई आपस में झंझट कराना चाहे तो उलझना नहीं है. आपस में एकजुटता रखना है."
अपने डिप्टी तेजस्वी के लिए महज़ 24 घंटे के अंतराल पर नीतीश कुमार के दिए इन बयानों को लेकर राज्य की राजनीति गरम हो गई है.
वैसे तो नीतीश कुमार, तेजस्वी को आगे बढ़ाने की बात गाहे-बगाहे करते ही रहे हैं, लेकिन महागठबंधन के विधायक दल की बैठक के तुरंत बाद ही मीडिया से 'तेजस्वी के नेतृत्व की बागडोर संभालने की बात' के कई मायने निकाले जा रहे हैं.
जहां इसे नेतृत्व परिवर्तन और विरासत सौंपने से लेकर नीतीश कुमार की पीएम पद की उम्मीद और मंशा से जोड़कर देखा जा रहा है. वहीं ये सवाल भी उठ रहे हैं कि क्या यह परिवर्तन इतनी आसानी से हो जाएगा? और क्या नीतीश कुमार के ये कहने भर से लालू-नीतीश का वोट बैंक साथ आ जाएगा? और अगर 2024 में नीतीश कुमार पीएम प्रत्याशी हुए तो कांग्रेस का स्टैंड क्या होगा?

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प्रतिकूल रहे उपचुनाव के नतीजे
नेतृत्व परिवर्तन और विरासत सौंपने की बात बड़ी तेज़ी से इसलिए भी उठ रही है क्योंकि भाजपा का साथ छोड़ने और महागठबंधन का दामन थामने के बाद राज्य में तीन सीटों गोपालगंज, मोकामा और कुढ़नी पर उपचुनाव हुए.
इनमें से दो पर महागठबंधन को हार का सामना करना पड़ा था, जबकि इस सीट के प्रत्याशी के लिए नीतीश कुमार और तेजस्वी ने साझा रैली की थी.
यहां तेजस्वी ने लालू प्रसाद यादव की तबीयत का हवाला देते हुए इमोशनल कार्ड तक खेला, लेकिन परिणाम बीजेपी के पक्ष में गया.
कुढ़नी के परिणाम पर नीतीश कुमार चुप रहे तो पीएम नरेंद्र मोदी ने कहा, "बिहार के उपचुनाव में भाजपा का प्रदर्शन आने वाले दिनों का स्पष्ट संकेत कर रहा है."
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नीतीश का पीएम बनने का सपना
नीतीश कुमार भी राजनीति के कोई कच्चे खिलाड़ी नहीं हैं. कभी उनका ये कहना कि जो 19 में आए हैं (नरेन्द्र मोदी) वो 24 में आएंगे या नहीं? तो आरजेडी के नेताओं की ओर से उन्हें बार-बार पीएम मैटेरियल कहा जाना.
कभी लालू प्रसाद के साथ सोनिया गांधी से मुलाक़ात करने चले जाना, तो कभी तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव का बिहार आकर 'भाजपा मुक्त भारत' का नारा बुलंद करना. तो कभी वे जनता पार्टी के दिनों में सहयोगी रहे देवीलाल की जयंती में शामिल होने हरियाणा तक चले जा रहे हैं.
कहने का तात्पर्य ये कि बिहार से लेकर देश के सियासी गलियारों में जारी क़वायदें अनायास ही नहीं हैं. ग़ौर से देखने पर इनमें आने वाले दिनों की आहट सुनाई देती है.
अगर इसे तेजस्वी यादव की उस बात से जोड़ कर देखा जाए जो उन्होंने नीतीश कुमार की पॉलिटिक्स पर कही थी तो ये काफ़ी अर्थपूर्ण हो जाता है.
उन्होंने कहा था कि 'वे तो समाजवादी हैं उनके पुरखों की विरासत कोई और ले जाएगा क्या? ये तो उनके पास ही रहेगा.'
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तेजस्वी क्या बोले?
नीतीश कुमार के तेजस्वी को लेकर दिए बयान के बाद जब मीडियाकर्मियों ने उप-मुख्यमंत्री से सवाल किए तो उन्होंने कहा कि वो भविष्य पर टिप्पणी नहीं कर सकते. साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि नीतीश कुमार हमारे अभिभावक हैं और हम उनके नेतृत्व में काम कर रहे हैं.
तेजस्वी ने नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही साल 2024 के आम चुनाव में उतरने की बात दोहराई.

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आरजेडी ने बढ़ाया नीतीश का नाम
राजद के प्रदेश अध्यक्ष और सीएम नीतीश कुमार के आलोचक कहे जाने वाले जगदानंद सिंह के इस बयान के भी निहितार्थ तलाशे जा रहे हैं कि बिहार के लोग नीतीश को पीएम देखना चाहते हैं.
बिहार की राजनीति में आरजेडी आज सबसे बड़ा दल है. आरजेडी का फ़ोकस फ़िलहाल राष्ट्रीय राजनीति की जगह राज्य की राजनीति पर है, लेकिन मुख्यमंत्री का पद उनके पास नहीं है.
ऐसे में नीतीश कुमार के राष्ट्रीय राजनीति में जाने का आरजेडी को सीधा फ़ायदा मिलेगा.
बीबीसी से बातचीत में जगदानंद सिंह कहते हैं, "मैं बार-बार कह रहा हूँ कि बिहार के लोग बिहारी पीएम देखना चाहते हैं और आज बिहार की तरफ़ से नीतीश उम्मीदवार हैं. आज़ादी से आज तक बिहार सत्ता परिवर्तन की लड़ाई लड़ता रहा है, लेकिन नेतृत्व का प्रयास नहीं किया. आज बिहार पहली बार परिवर्तन और बिहारी पीएम की इच्छा के साथ आगे बढ़ रहा है."

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बीजेपी का क्या है कहना?
पूर्व उप-मुख्यमंत्री और राज्यसभा सांसद सुशील कुमार मोदी ने मीडिया से रूबरू होते हुए कहा, "लालू प्रसाद और नीतीश कुमार के बीच तो यह पहले से ही क़रार हो चुका था. लालू अपने जीते जी तेजस्वी को सीएम बनाना चाहते हैं. जगदानंद सिंह तो पहले ही आरजेडी और जेडीयू के विलय की बात कह चुके हैं. ऐसे में पार्टी बचाना नीतीश की मजबूरी है."
साथ ही वे आगाह करते हैं, "लेकिन महागठबंधन के लोग एक बात समझ लें कि सीएम के ट्रांसफ़र से वोटों का ट्रांसफ़र नहीं होता. अतिपिछड़ा वोट अब भाजपा के साथ है. भाजपा के ख़िलाफ़ विपक्षी एकता मरे हुए घोड़े की तरह है. 2024 में तो नीतीश के लिए कोई संभावना नहीं, वे चाहें तो 2029 की तैयारी कर सकते हैं."

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जेडीयू और आरजेडी वाले इसे कैसे देख रहे हैं?
बिहार में जहां एक ओर सीएम नीतीश की ओर से तेजस्वी को नेतृत्व सौंपने की बात चल रही है, वहीं आरजेडी और जेडीयू के विलय की बात भी बहुत ज़ोर-शोर से जारी है.
बीबीसी से बातचीत में जेडीयू के संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष और विधान पार्षद उपेन्द्र कुशवाहा कहते हैं, "आरजेडी और जेडीयू के विलय की बात में कहीं कोई सच्चाई नहीं. पार्टी में इसे लेकर कहीं कोई चर्चा नहीं हुई, लेकिन यदि कहीं कोने में भी ये बात है तो ये विलय एक आत्मघाती क़दम साबित होगा. जनता दल यूनाइटेड के लिए विलय मौत सरीखा होगा."
वहीं आरजेडी प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी बीबीसी से कहते हैं, "अभी इस तरह की बातों का कोई औचित्य नहीं है. अभी तो मुख्य लड़ाई 2024 की है. तेजस्वी जी भी लगातार इसी लड़ाई की बात कह रहे हैं. पढ़ाई-लिखाई और कार्रवाई के साथ ही रोज़गार की बात कह रहे हैं. मुद्दे से विमुख नहीं हो रहे हैं. हमारा फ़ोकस 2024 पर है. कहीं कोई कन्फ़्यूज़न नहीं है."
'कहीं मकर संक्रांति आते-आते ही दही का टीका न लग जाए'
बिहार में नेतृत्व परिवर्तन और नीतीश कुमार को पीएम पद का प्रत्याशी बनाए जाने के सवाल पर पत्रकार कन्हैया भेलारी कहते हैं, "नीतीश कुमार ने तो तेजस्वी के लिए यह स्पष्ट कह ही दिया है कि वे 2025 में मुख्यमंत्री पद के चेहरे होंगे, लेकिन मुझे लगता है कि यह पहले ही हो जाएगा.
कहीं मकर संक्रांति आते-आते ही दही का टीका न लग जाए. राष्ट्रीय राजनीति के लिहाज़ से नीतीश कुमार को देश भर में घूमना होगा. यही बात तो जगदानंद सिंह भी कहते रहे हैं कि 2024 में नीतीश और 2025 में तेजस्वी."
उपचुनावों के परिणाम और दोनों पार्टियों के मतदाताओं के वोट ट्रांसफ़र के सवाल पर कन्हैया भेलारी कहते हैं, "राजनीति में एक ही तीर से कई निशाने तो साधे ही जाते हैं. तेजस्वी को अभी से सीएम फ़ेस बनाकर ये कोर वोटर (राजद) को अपने साथ करने की कोशिश है और बिहार से उत्तर प्रदेश तक यह संदेश देना है कि नीतीश ने तेजस्वी के लिए मैदान खाली कर दिया है."
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प्रशांत किशोर क्या बोले?
इस बीच चुनावी रणनीतिकार के तौर पर चर्चित प्रशांत किशोर ने नीतीश-तेजस्वी की जोड़ी पर हमला बोला है.
उन्होंने कहा, "चाचा-भतीजे की सरकार की हैसियत ही क्या है? तीन जगहों में हुए उपचुनाव में ये हारे हैं. जहां जीते वहां बाहुबल का मामला है. अगर साल 2015 में मैंने मदद न की होती तो क्या महागठबंधन जीत जाता?"
तेजस्वी के बारे में प्रशांत किशोर बोले, "2015 के चुनाव में तेजस्वी कहीं थे भी क्या? लालू प्रसाद के बेटे से इतर उनकी पहचान ही क्या है? लालू प्रसाद के बेटे हैं इसलिए दल के नेता हैं, लेकिन क्या इससे बिहार के नेता बन जाएंगे? रही बात नीतीश कुमार की तो डर के मारे प्रेस वार्ता करते ही नहीं."

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बिहार और केंद्र की राजनीति के लिए मायने
बिहार के भीतर नेतृत्व परिवर्तन और तेजस्वी को बागडोर सौंपने के सवाल पर राजनीतिक विश्लेषक महेन्द्र सुमन कहते हैं, "यह तो नीतीश कुमार के महागठबंधन के साथ आते ही स्पष्ट हो गया था कि वे तेजस्वी को बागडोर सौंपेंगे. आख़िर वे कब तक मुख्यमंत्री रहेंगे? इसमें नया ये है कि अब नीतीश ख़ुद ही स्पष्ट तौर पर ये कहने लगे हैं."
वे कहते हैं, "दूसरी बात ये है कि नीतीश कुमार को पीएम मटीरियल कहने की बातें जेडीयू से अधिक आरजेडी की ओर से आ रही हैं. आरजेडी वालों को लगता है कि नीतीश जी के राष्ट्रीय राजनीति में जाने से उनकी जगह बन जाएगी."
महेंद्र सुमन कहते हैं, "नीतीश जी की ओर से अभी से 2025 की बात कही जा रही है, ऐसा क्यों? जबकि राजनीति में उतनी दूर की बात नहीं की जाती. ख़ासतौर पर जब नीतीश कुमार इतने अप्रत्याशित हों. गठबंधन की असल परीक्षा तो 2024 में होगी.''
वे कहते हैं, "किसी योजना को बनाने और लागू करने में काफ़ी फ़र्क़ आ जाता है. नीतीश जी के बयान में अभी बहुत दम नहीं है. जैसे वे पहले भी कहते रहे हैं कि मुख्यमंत्री नहीं बनना चाहते, लेकिन भाजपा वालों ने उन्हें ज़बर्दस्ती बनवा दिया.

यदि बागडोर सौंपना ही है तो अभी ही क्यों नहीं सौंप देते? राष्ट्रीय राजनीति में जाने से आपको कौन रोक रहा है? पूरे देश का भ्रमण कीजिए. आम सहमति बनाइए."
वाम दल और कांग्रेस का क्या है कहना?
वाम दलों में से सबसे बड़े दल भाकपा (माले) के राज्य सचिव कुणाल बीबीसी से बातचीत में कहते हैं, "सूबे में नेतृत्व परिवर्तन जब होगा तब देखा जाएगा. हमारी कोशिश है कि राज्य के भीतर चल रही सरकार यह संदेश दे कि सूबे की वर्तमान सरकार ग़रीबों के पक्ष में है या नहीं.
शहरी और ग्रामीण ग़रीबों को जहां-तहां से उजाड़ा जा रहा है. अरवा और उसना (चावल के प्रकार) की बहस के बीच अभी तक सिर्फ़ 10 फ़ीसद धान ख़रीद हुई है. एपीएमसी ऐक्ट लागू नहीं है."
वे कहते हैं, "रही बात नीतीश कुमार के पीएम पद की उम्मीदवारी की तो वो योग्य उम्मीदवार तो हैं ही, लेकिन ये सारी चीज़ें तो बहुत बाद में तय होती हैं."
दूसरी ओर नीतीश कुमार की पीएम पद की दावेदारी पर कांग्रेस नेता शकील अहमद ख़ान बीबीसी से कहते हैं, "कांग्रेस का स्टैंड इस मामले को लेकर बहुत साफ़ है कि नीतीश जी ने बिहार में सातों दलों को साथ लाने का जो प्रयास किया है यदि वही प्रयास राष्ट्रीय स्तर पर हो तो भाजपा के ख़िलाफ़ लड़ रहे तमाम दलों को बिना समय गंवाए साथ आना चाहिए.

चाहे वो ममता-अखिलेश हों या फिर टीआरएस. जब सभी साथ आएंगे तो साल 2024 का कैंपेन डिज़ाइन होगा. प्रधानमंत्री पद की लड़ाई नंबर गेम के अलावा पॉपुलर फ़ेस पर भी लड़ी जाती है."
वहीं तेजस्वी के चेहरे पर महागठबंधन और कांग्रेस के विधानसभा चुनाव लड़ने के सवाल पर उन्होंने कहा, "यह बात तो फ़ैक्ट है कि बिहार के भीतर आज सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर आरजेडी उभरी है.
आज की स्थिति में उनका चेहरा ही सबसे मज़बूत है, लेकिन अभी पहले लोकसभा का चुनाव होना है. कांग्रेस पार्टी दीवार पर लिखी तहरीर को पढ़ती और समझती है, लेकिन वक़्त से पहले फ़ैसले नहीं करती."
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