जयशंकर का पाकिस्तान दौरा कोई उम्मीद लेकर आया था या इससे कुछ होने वाला नहीं

जयशंकर

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इमेज कैप्शन, इस्लामाबाद में हो रहे एससीओ के शिखर सम्मेलन में शामिल होने भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर पहुंचे हैं.
    • Author, ज़ुबैर अहमद
    • पदनाम, लंदन से बीबीसी हिंदी के लिए

एक औपचारिक नमस्ते, आधे अधूरे मन से जवाब और फिर अलग खड़े हो जाना, ऐसा लग रहा था, जैसे दोनों राजनयिकों को कुछ अनचाहा करना पड़ रहा था.

यह दृश्य था जब पिछले साल गोवा में एससीओ (शंघाई सहयोग संगठन) शिखर सम्मेलन के दौरान मेज़बान भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर और मेहमान पाकिस्तान के बिलावल भुट्टो ज़रदारी मिले थे.

यह मिलन मुश्किल से एक मिनट से ज़्यादा का नहीं रहा होगा, लेकिन आधिकारिक फ़ोटो सेशन ने परमाणु अधिकार संपन्न दो पड़ोसियों के बीच के ठंडे रिश्ते को संक्षेप में परिभाषित कर दिया.

लेकिन ऐसी कोई तस्वीर इस्लामाबाद की एससीओ समिट के दौरान सामने नहीं आई.

जयशंकर ने अपने संबोधन में कहा कि एससीओ को इस वक़्त दुनिया में चल रही तमाम उथल-पुथल के बीच आने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए सक्षम होना चाहिए.

उन्होंने कहा, ''एससीओ का पहला लक्ष्य आतंकवाद,अलगाववाद और उग्रवाद का मुक़ाबला करना है और मौजूदा परिस्थितियों में यह और भी ज़्यादा अहम हो जाता है.''

भारतीय विदेश मंत्री ने कहा, ''हमें ईमानदार बातचीत और एससीओ चार्टर को लेकर प्रतिबद्ध होने की ज़रूरत है. वैश्वीकरण और संतुलन बनाने की भी अपनी समस्याएं हैं लेकिन एससीओ देशों को इससे आगे सोचने की ज़रूरत है.”

उन्होंने कहा, ''देशों के बीच सहयोग आपसी सम्मान, संप्रभुता और समानता पर आधारित होना चाहिए, ना कि एकतरफ़ा एजेंडे पर.''

जयशंकर ने कहा, ''एससीओ के उद्देश्यों को हासिल करने के लिए हम आपसी हितों को ध्यान में रखें और चार्टर के नियमों का पालन करें. एससीओ बदलाव से गुज़र रहे देशों का प्रतिनिधित्व करता है, जिसपर ज़्यादातर दुनिया का भरोसा टिका हुआ है. हमें उस ज़िम्मेदारी को निभाना है.''

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इस दौरान लोगों को पिछले साल का वाक़या भी याद आता होगा जब बिलावल भुट्टो ने इस मंच का इस्तेमाल जम्मू कश्मीर के विशेष दर्जे को ख़त्म करने के भारत के फ़ैसले की निंदा करने के लिए किया था.

उन्होंने नई दिल्ली पर संवाद की सारी उम्मीद पर पानी फेरने का आरोप लगाया था. जयशंकर ने इसका जवाब दिया और भुट्टो को “टेररिज़्म इंडस्ट्री का प्रवक्ता” बताया था.

एससीओ सम्मेलन में भारत और पाकिस्तान को सावधानीपूर्वक तैयार किया गया था ताकि इससे सिर्फ़ एक दूसरे को ही नहीं बल्कि उनके घरेलू और अंतरराष्ट्रीय श्रोताओं के लिए भी एक संदेश हो.

बोस्टन यूनिवर्सिटी में दक्षिण एशिया के मामलों के विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर आदिल नजाम कहते हैं, “मुझे लगता है कि दोनों ही देशों पर मीडिया का दबाव है, जो अपने आप में एक राजनीतिक धुरी बन चुका है. वे एक मिनट का हिसाब देते हैं और लाइव कमेंट्री करते हैं, यह नेताओं पर बड़ा दबाव बना देता है. यह चिंता का विषय है.”

एक साल में पासा तेज़ी से बदला है और यह अब पलट चुका है.

चमत्कार भी होते हैं

जयशंकर

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इमेज कैप्शन, पिछले साल जब गोवा में एससीओ की बैठक में बिलावल भुट्टो पहुंचे तो एस जयशंकर के साथ उनकी मुलाक़ात औपचारिकता से ज़्यादा नहीं थी.
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इस सम्मेलन को लेकर भारतीय मीडिया में भारत और पाकिस्तान के बीच संभावित द्विपक्षीय सम्मेलन की अटकलें लगाई जा रही थीं.

हालांकि दोनों देशों ने पहले ही इस तरह की किसी मीटिंग की संभावना को ख़ारिज कर दिया था, लेकिन इससे मीडिया में चर्चाओं का दौर थमने वाला नहीं.

लंदन में मौजूद पाकिस्तान मामलों की एक्सपर्ट डॉ. आयशा सिद्दीक़ा समेत अधिकांश राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि द्विपक्षीय मीटिंग की संभावना बहुत कम थी.

डॉ. सिद्दीक़ा ने कहा कि राजनयिक प्रोटोकाल के अनुसार, किसी भी द्विपक्षीय मीटिंग के लिए मेहमान देश को अनुरोध करना होता है और भारत ने ऐसा कोई अनुरोध नहीं किया था.

हालांकि पाकिस्तान में भारत के पूर्व उच्चायुक्त शरत सभरवाल कहते हैं कि द्विपक्षीय मुलाक़ात होने का सही माहौल नहीं था.

वो कहते हैं, “भारत-पाकिस्तान रिश्ते की प्रकृति ऐसी है कि बहुत सारी अटकलें लगाई जाने लगती हैं और जब भी मंत्री स्तर का दौरा होता है, मीडिया की रुचि भी बढ़ जाती है.”

वो कहते हैं, “हाल ही में भारत और पाकिस्तान के बीच संयुक्त राष्ट्र आम सभा (यूएनजीए) में बहुत तीखे आरोप प्रत्यारोप लगे, जहां शाहबाज़ शरीफ़ ने बहुत कड़ा बयान दिया. हमारे मंत्री ने भी जवाब दिया. इन सबको देखते हुए ऐसा लगता था कि मुलाक़ात असंभव है.”

इस्लामाबाद

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इमेज कैप्शन, इस्लामाबाद की सड़कों पर चीन के प्रधानमंत्री ली कियांग की तस्वीरों वाले जगह जगह होर्डिंग लगे हुए हैं.

पाकिस्तान पर कई किताबें लिख चुकीं डॉ. सिद्दीक़ा ने जयशंकर के पाकिस्तान दौरे का स्वागत किया है, लेकिन वो कहती हैं कि न तो भारत और ना ही पाकिस्तान द्विपक्षीय वार्ता बहाल करने के इच्छुक हैं.

उनके अनुसार, “दोनों के लिए यह राजनीतिक रूप से बहुत सही समय नहीं है. इसले अलावा महाराष्ट्र जैसे राज्य में विधानसभा चुनाव भी हैं.”

वो ये भी मानती है कि संयुक्त राष्ट्र में दोनों दशों के बीच हालिया विवाद, जब दोनों देशों ने एक दूसरे पर बहुत गंभीर आरोप लगाए, इसके बाद तो “पाकिस्तान द्विपक्षीय वार्ता के मूड में नहीं है. भारत भी नहीं है. समय ठीक नहीं है.”

क्या हमें जयशंकर की यात्रा के और अर्थ निकालने चाहिए? कई विश्लेषकों का मानना है कि यह यात्रा ही अपने आप में इस बात का संकेत है कि चुप्पी तोड़ने का मौक़ा है.

प्रोफ़ेसर आदिल नजाम कहते हैं कि डॉ. जयशंर का दौरा इस चुप्पी को तोड़ सकता था क्योंकि उन्हें आम तौर पर पाकिस्तान में बहुत मान सम्मान दिया जाता है.

इसकी शुरुआत के लिए डॉ. सिद्दीक़ा कहती हैं कि भारत को पाकिस्तान के साथ किसी तरह बातचीत की पहल करनी चाहिए.

वो कहती हैं, “देश अलग अलग रणनीति अपना सकते हैं. वे आपके ग्रुप के साथ नहीं हो सकते लेकिन किसी भी देश को अप्रासंगिक बनाना अभी भी मुश्किल है. अगर आप किसी देश को मित्र नहीं मानते हैं तब भी उससे संवाद रखना ज़रूरी है.”

ली कियांग का दौरा, जयशंकर से अधिक महत्वपूर्ण?

चीन के प्रधानमंत्री ली कियांग

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इमेज कैप्शन, चीन के प्रधानमंत्री ली कियांग 11 सालों में पाकिस्तान आने वाले पहले चीनी प्रधानमंत्री हैं.

चीन के प्रधानमंत्री ली कियांग भी पाकिस्तान में थे.

पिछले 11 सालों में किसी चीनी प्रधानमंत्री का यह पहला दौरा था. उनका दौरा इस सम्मेलन में अहम है.

चार दिन के अपने दौरे में प्रधानमंत्री ली कियांग न केवल एससीओ वार्ताओं में हिस्सा लेंगे बल्कि पाकिस्तान में चीन की परियोजनाओं और कर्मचारियों की सुरक्षा को सुनिश्चित किए जाने के बारे में अहम वार्ता करेंगे.

चीन और पाकिस्तान के बीच बढ़ते आर्थिक और रणनीतिक संबधों को देखते हुए यह दौरा अहम है.

प्रोफ़ेसर आदिल नजाम का कहना है कि यह दौरा जयशंकर के दौरे से ज़्यादा अहम था, “पाकिस्तान के लिए जयशंकर का दौरा कोई मुद्दा नहीं है, एससीओ अपने आप में मुद्दा है. पाकिस्तान के लिए असल मुद्दा है चीनी प्रधानमंत्री का आगमन.”

पाकिस्तान के लिए इस सम्मेलन की बड़ी अहमियत

इमरान ख़ान

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इमेज कैप्शन, पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की पार्टी पिछले आम चुनाव को वैध नहीं मानती.

सुरक्षा चिंताओं और राजनीतिक उथल पुथल के कारण पाकिस्तान में एक वैश्विक सम्मेलन बहुत दुर्लभ बात थी.

इसके अलावा, हालिया चुनावों पर भी कुछ सवाल हैं, जिनके बारे में इमरान ख़ान के समर्थक धांधली का आरोप लगाते हैं.

वे शाहबाज़ शरीफ़ सरकार को वैध नहीं मानते. इस पृष्ठभूमि में देश के लिए और मौजूदा सरकार के लिए यह सम्मेलन एक बड़ी बात थी.

प्रोफ़ेसर आदिल नजाम कहते हैं, “पाकिस्तान में सुरक्षा चिंताएं और राजनीतिक उथलपुथल वास्तविकता है. मुझे लगता है कि पाकिस्तान अलग थलग महसूस करता है. पाकिस्तान के लिए इस तरह के सम्मेलन आयोजित करना बहुत अहम है. क्योंकि ऐसी बैठकें बहुत कम होती हैं. ये भी धारणा है कि पाकिस्तान को हाशिए पर धकेला जा रहा है और भारत भी ऐसा ही कर रहा है. देश के लिए इस तरह के सम्मेलन बहुत हाई प्रोफ़ाइल और सरकार के लिए बहुत अहम था.”

मुर्तजा सोलांगी मानते हैं कि एक सफल सम्मेलन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की छवि को सुधारेगा.

वो कहते हैं, “चुनाव के कुछ महीनों बाद ही एक बड़े बहुपक्षीय फ़ोरम की मेज़बानी करना पाकिस्तान के लिए वाक़ई एक सममान का विषय है. आर्थिक संकेत बेहतर हो रहे हैं और यह आयोजन वाकई मौजूदा सरकार की मदद करेगा.”

क्या भारत और पाकिस्तान एक दूसरे के अहम नहीं रह गए हैं?

मोदी और शहबाज़ शरीफ़

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इमेज कैप्शन, लंबे समय से दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय वार्ता को आगे बढ़ाने पर कोई सहमति नहीं बनी है.

पाकिस्तान के कुछ हलकों में ये महसूस किया जा रहा है कि पाकिस्तान भारत पर हावी हो गया है. अब यह पाकिस्तान की राजनीतिक के लिए अहम नहीं रह गया है. लेकिन राजदूत शरद सभरवाल इन दावों को ख़ारिज़ करते हैं.

पाकिस्तान आगे बढ़ गया है, इस दावे पर वो कहते हैं, “आगे बढ़ना, ये सही आकलन नहीं है. कभी कभी भारत में भी पाकिस्तान अप्रासंगिक हो जाता है लेकिन दोनों पड़ोसी हैं और हम एक दूसरे को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते. यह संभव नहीं है. निश्चित तौर पर पाकिस्तान के लिए यह सच नहीं होना चाहिए क्योंकि भारत की अर्थव्यवस्था 10 गुनी बड़ी है और इसकी विकास दर तेज़ है. हम एक दूसरे के लिए हमेशा प्रासंगिक बने रहेंगे.”

1947 में भारत की आज़ादी और पाकिस्तान के निर्माण के समय से ही दोनों देशों के बीच कूटनीतिक शत्रुता का इतिहास रहा है.

ताज़ा तनाव तब और चरम पर पहुंच गया जब भारत ने 2019 में अनुच्छेद 370 को ख़त्म करने का फ़ैसला किया, इसके बाद दोनों देशों ने अपने उच्चायुक्तों को वापस बुला लिया और विरोध प्रदर्शनों का दौर शुरू हो गया.

दोनों ओर से राजनीतिक विश्लेषक इस बात से सहमत है कि कश्मीर और सीमापार चरमपंथ के बुनियादी मुद्दे को हल किए बिना कोई अर्थपूर्ण कूटनीति की उम्मीद दूर की कौड़ी है.

एससीओ जैसे बहुपक्षीय फ़ोरमों पर उनके बीच का संवाद, वास्तविक वार्ता की बजाय बढ़ चढ़ कर दोषारोपण वाला होता है.

हालांकि, बहुत से लोग अपील करते हैं कि दोनों देश विश्वास बहाली शुरू करने का कोई रास्ता तलाशें.

और एससीओ शिखर सम्मेलन में सौहार्दपूर्ण आदान प्रदान भी रिश्तों में नरमी लाने की दिशा में छोटा ही सही कदम हो सकता है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

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