एससीओ की बैठक से पहले सेना के हवाले इस्लामाबाद की हिफ़ाज़त, क्या भारत पाकिस्तान के बीच पिघलेगी बर्फ़?

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- Author, फ़रहत जावेद
- पदनाम, बीबीसी उर्दू डॉट कॉम, इस्लामाबाद
पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में पिछले कुछ दिनों से अहम सड़कें और इमारतें चमक-दमक रही हैं.
ग्रीन बेल्ट पर पेड़ों की कंटाई, छंटाई और हरी रौशनियों का इंतज़ाम किया गया है. साथ ही फूलों के नीचे रंग बिरंगी चित्रकारी बनाई गई है.
रेड ज़ोन में स्थित संसद के सामने फूल ही फूल नज़र आते हैं और उन्हीं के बीच फूलों से ही बना एक मोर भी है.
यह साज-सज्जा किसी राष्ट्रीय पर्व के लिए नहीं बल्कि एक अंतरराष्ट्रीय बैठक की तैयारी के लिए है. इस हफ़्ते इस्लामाबाद में शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइज़ेशन (एससीओ) की काउंसिल ऑफ़ हेड्स आफ गवर्नमेंट्स का 23वां समिट होने जा रहा है जिसकी अध्यक्षता पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ करेंगे.

इस बैठक में चीन, रूस, बेलारूस, कज़ाकिस्तान, किर्गिस्तान और ताजिकिस्तान के प्रधानमंत्री शामिल होंगे. ईरान के उपराष्ट्रपति और भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर भी समिट में शामिल होने आएंगे.
इसमें मंगोलिया के प्रधानमंत्री बतौर पर्यवेक्षक और तुर्कमेनिस्तान के विदेश मंत्री बतौर विशिष्ट अतिथि शामिल होंगे.
दो दिनों की इस बैठक के लिए इस्लामाबाद में सुरक्षा के सख़्त इंतज़ाम किए गए हैं और 17 अक्टूबर तक शहर की हिफ़ाज़त पाकिस्तानी सेना के हवाले कर दी गई है.
इस्लामाबाद और जुड़वां शहर रावलपिंडी में तीन दिन के लिए आम छुट्टी का एलान किया गया है जबकि शहर के कारोबारी केंद्र और अदालतें बंद रहेंगी.
शंघाई सहयोग संगठन क्या है और इसमें कौन से देश शामिल हैं?

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शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइज़ेशन या शंघाई सहयोग संगठन की स्थापना 2001 में चीन और रूस ने की थी जिसके सदस्यों में अब कज़ाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, उज़्बेकिस्तान, पाकिस्तान भारत और ईरान भी शामिल हैं.
चूंकि आबादी के हिसाब से दो बड़े देश भारत और चीन इस संगठन के सदस्य हैं. इस कारण यह संगठन दुनिया की कुल आबादी के 40 फ़ीसदी हिस्से का एक फ़ोरम है.
पाकिस्तान 2005 से 2017 तक इस संगठन का ऑब्ज़र्वर देश रहा और फिर जुलाई 2017 में इसे औपचारिक तौर पर एससीओ में शामिल कर लिया गया.
इस संगठन की शुरुआत एक यूरेशियाई सुरक्षा संगठन के तौर पर हुई जिसका मक़सद रूस, चीन और मध्य एशियाई देशों के बीच सुरक्षा और स्थिरता को बढ़ावा देना था.
2017 में भारत और पाकिस्तान को पूर्ण सदस्यता देने और अफ़ग़ानिस्तान को ऑब्ज़र्वर की हैसियत से शामिल करने के बाद संगठन ने अपने दायरे को बढ़ाया है.
पिछले साल ईरान को भी संगठन की औपचारिक सदस्यता दी गई. अब एससीओ का ध्यान आतंकवाद, चरमपंथ और ड्रग्स की स्मगलिंग जैसी साझा समस्याओं पर है.
एससीओ की स्थापना और बाद में विस्तार के समय इसे एक ऐसे संगठन के तौर पर देखा गया है जो पश्चिमी सहयोगी गठबंधन जैसे कि नेटो को ‘काउंटर बैलेंस’ करने के लिए उसके विकल्प के तौर पर बनाया गया है.
लेकिन क्या शंघाई सहयोग संगठन सच में नेटो जैसा मज़बूत बन पाया है?
नेटो बनाम एससीओ

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शंघाई सहयोग संगठन चीन, रूस, पाकिस्तान और भारत जैसे देशों की वजह से आबादी के हिसाब से बड़ा संगठन है जबकि यह दुनिया के 40 फ़ीसदी रक़बे को भी कवर करता है.
विश्लेषक आमिर ज़िया कहते हैं कि हालांकि इसका ढांचा नेटो से अलग है और इसकी सैनिक क्षमता सीमित है लेकिन इस संगठन की स्थापना अपने आप में एक सकारात्मक क़दम है.
उनके अनुसार, “शंघाई सहयोग संगठन का मक़सद यह नहीं कि यह पश्चिमी देशों के गठबंधन से टक्कर ले, बल्कि यह एक संतुलित संगठन का मौक़ा देता है जिससे क्षेत्र में तनाव कम हो सकता है.”
ध्यान रहे कि दुनिया में इस समय कई ऐसे संगठन हैं जो अर्थव्यवस्था या सुरक्षा ज़रूरतों के लिए बनाए गए हैं. इनमें बड़े संगठन जैसे कि जी-7, जी-20, क्वॉड, नेटो और एससीओ हैं.
जी-7 और जी-20 तो आर्थिक मामलों पर बने गठबंधन हैं जिनका ध्यान सदस्य देशों में आर्थिक स्थिरता, विकास और राजनीतिक सामंजस्य को बढ़ावा देने पर रहता है.
हालांकि नेटो 32 देशों का सैनिक गठबंधन है जिसका मक़सद संयुक्त रक्षा और सदस्य देशों की सुरक्षा है. इस गठबंधन में एक देश पर हमला सभी सदस्य देशों पर हमला माना जाता है.
ईरान से संबंध रखने वाली अंतरराष्ट्रीय मामलों की विशेषज्ञ ज़हरा ज़ैदी जैसी आलोचक इस गठबंधन को केवल पश्चिमी हितों का ध्यान रखने वाला गठबंधन और पश्चिमी प्रभाव को बनाए रखने का एक हथियार समझती हैं.
दूसरी ओर एससीओ गठबंधन का ध्यान मूल रूप से क्षेत्रीय सुरक्षा और स्थिरता, आर्थिक सहयोग, व आतंकवाद के ख़िलाफ़ उपाय पर है.
लेकिन सीमित सैनिक क्षमता और सदस्य देशों के बीच आंतरिक विवाद इस गठबंधन की बड़ी कमज़ोरियां समझी जाती हैं. तो क्या शंघाई सहयोग संगठन अपने मक़सद को पानी में नाकाम रहा है?
मुलाक़ात का मौका

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यह गठबंधन अपने मक़सद और लक्ष्य हासिल कर पाया या नहीं, इस पर बहस हो सकती है. मगर विश्लेषक आमिर ज़िया समझते हैं कि ऐसे एक गठबंधन या संगठन का मौजूद होना भी एक सकारात्मक बात है.
ईरान से बीबीसी से बात करते हुए विश्लेषक ज़हरा ज़ैदी कहती हैं कि शुरू में “कमज़ोर नज़र आने वाला यह संगठन अब मज़बूत हो रहा है.”
उनके अनुसार सोवियत यूनियन से जो देश बने वह बहुत से क्षेत्र में कमज़ोर थे.
वे कहती हैं, “उन्हें भी सहारे की ज़रूरत थी. जब यह संगठन बना तो उन देशों को एहसास हुआ कि अगर सहयोग जारी रहा तो वह बेहतर हो सकते हैं और इससे विदेशी प्रभाव भी ख़त्म होगा.”
उनकी राय है कि शुरू में पश्चिमी देशों की तुलना में पूर्वी देशों का यह गठबंधन ताक़त के हिसाब से कमज़ोर नज़र आता था लेकिन अब इसकी ताक़त में कुछ इज़ाफ़ा हुआ है. ईरान के शामिल होने से यह संगठन और मज़बूत हुआ है.
बीबीसी से इस बारे में बात करते हुए वरिष्ठ भारतीय पत्रकार सुहासिनी हैदर कहती हैं कि एससीओ बहुत सी समस्याओं पर बातचीत के लिए एक अहम प्लेटफ़ॉर्म बन गया है.
वह कहती हैं, “यह एक महत्वपूर्ण क्षेत्रीय संगठन है जो यूरोशिया में सुरक्षा और सहयोग को बढ़ावा देता है. यह अपने बहुत से मक़सद हासिल नहीं कर पाया और इसकी वजह केवल यही है कि समय के साथ-साथ मक़सद और लक्ष्य में बदलाव आते रहते हैं.”
“हालांकि यह द्विपक्षीय विवादों को हल करने का फ़ोरम नहीं है, लेकिन यह नेताओं के लिए मुलाक़ात और साझा समस्याओं पर बातचीत का मौक़ा दिलाता है. मेरे ख़्याल में इस्लामाबाद में होने वाला समिट भी मुलाक़ातों का एक मौक़ा है, इसके अलावा कुछ नहीं.”
ध्यान रहे कि पाकिस्तान विदेश मंत्रालय के अनुसार शिखर सम्मेलन के औपचारिक कार्यक्रमों से हटकर प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ मेहमान शिष्टमंडल के प्रमुखों से महत्वपूर्ण द्विपक्षीय बातचीत भी करेंगे.
हालांकि भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने इससे पहले ही यह बयान दे दिया है कि उनका दौरा केवल एससीओ शिखर सम्मेलन में शामिल होने तक सीमित होगा और वह पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय संबंधों पर बातचीत नहीं करेंगे.
आमिर ज़िया कहते हैं कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बनने वाले गठबंधन बहुत धीरे-धीरे काम करते हैं.
आमिर ज़िया कहते हैं, “इस वक़्त दुनिया में बहुत से गठबंधन मौजूद हैं और ज़रूरी नहीं कि एक देश एक ही गठबंधन का हिस्सा हो. वह एक साथ कई, और कई बार विपरीत एजेंडे वाले गठबंधन का हिस्सा हो सकता है. उदाहरण के लिए भारत एससीओ का सदस्य है और इसके विरोधी देशों के गठबंधन क्वॉड का भी सदस्य है.’
वह इस तरफ़ भी इशारा करते हैं कि सदस्य देशों के आपसी विवाद भी हो सकते हैं मगर ऐसे गठबंधन का मक़सद ही यह होता है कि सदस्य देश अपने विवादों को एक तरफ़ रखें और जिन मामलों पर बातचीत और सहयोग संभव है उन पर विचार करें.
सहयोग की नई राह

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एससीओ का ये सम्मेलन एक ऐसे समय पर हो रहा है जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई देश विवादों में घिरे हुए हैं. इनमें से कुछ बड़े देश इस संगठन का हिस्सा भी हैं जो सीधे या किसी और रूप में इन अंतरराष्ट्रीय विवादों में शामिल हैं, जैसे कि रूस और ईरान.
एससीओ के समिट की ‘टाइमिंग’ की वजह से इसे बहुत अहम समझा जा रहा है और इसे एक ‘बड़े स्टेज’ के तौर पर देखा जा रहा है.
लेकिन क्या सचमुच इस शिखर सम्मेलन के दौरान पाकिस्तान और भारत के द्विपक्षीय संबंधों में कोई प्रगति होगी? या ईरान की इच्छा पर इस प्लेटफ़ॉर्म से इसराइल के ख़िलाफ़ कोई कठोर प्रस्ताव सामने आएगा? या रूस और यूक्रेन विवाद पर एससीओ के सदस्य देश रूस के पूर्ण समर्थन की घोषणा करेंगे?
सुहासिनी हैदर कहती हैं कि एक बड़ा या सख़्त बयान सामने आना मुश्किल है.
उनका कहना था, “मेरी राय में उनकी पिछली मुलाक़ातों और समिट के दौरान जारी बयानों से उनके स्टैंड का अंदाज़ा लगाया जा सकता है. उदाहरण के तौर पर रूस और यूक्रेन विवाद पर उन्होंने प्रतिबंधों की कड़ी निंदा की. इसी तरह एससीओ के शिखर सम्मेलन से हमने फ़लस्तीन और इसराइल के युद्ध पर भी बयान देखे हैं.”
“लेकिन यह फ़ोरम जिसकी बैठक पाकिस्तान में हो रही है, संगठन का सर्वोच्च स्तर नहीं है. इसलिए मैं नहीं समझती की कोई सख़्त या बड़ा बयान नज़र आएगा.”
लेकिन विश्लेषक ज़हरा ज़ैदी समझती हैं कि एससीओ का सदस्य देश ईरान यह उम्मीद रखेगा कि इस प्लेटफ़ॉर्म से क्षेत्र की वर्तमान स्थिति पर एक स्पष्ट संदेश जारी हो.
ध्यान रहे कि ईरान पिछले साल ही इस संगठन का औपचारिक सदस्य बना है.
ज़हरा ज़ैदी के अनुसार ईरान इस बैठक में प्रभावी साबित हो सकता है और विशेष तौर पर एक ऐसे समय में जब रूस भी ईरान के साथ खड़ा होगा.
वह कहती हैं, “मेरे ख़्याल में इस बैठक में इसराइल की जंग और ईरान के साथ तनाव के मामले पर मज़बूत बयान नज़र आना चाहिए, कम से कम ईरान को यह उम्मीद ज़रूर होगी.”
“गठबंधन में शामिल सभी देश चाहते हैं कि उन्हें विदेशी शक्तियों के हाथों मुश्किल आर्थिक स्थिति का सामना न करना पड़े. आर्थिक और सैनिक लिहाज़ से मज़बूत होना तो ज़रूरी है ही. यह भी एक अहम बात होगी कि संगठन अपने किसी सदस्य देश को अकेला न छोड़े दे. ईरान यह उम्मीद रखेगा.”
विशेषज्ञों के अनुसार मध्य पूर्व की बिगड़ती स्थिति और ईरान और इसराइल के बीच हाल के तनाव की वजह से ईरान की इच्छा होगी कि इस प्लेटफ़ॉर्म को इस्तेमाल किया जाए. लेकिन विश्लेषक आमिर ज़िया समझते हैं कि इस बैठक से ‘आक्रामक बयान’ आना मुश्किल है.
दुनिया में जारी जंग एक तरफ़, लेकिन क्या यह बैठक भारत और पाकिस्तान के बीच जमी बर्फ़ पिघला सकता है?
एक कमरे में भारत-पाकिस्तान
पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के अनुसार प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ बैठक के मुख्य कार्यक्रम से अलग होकर सदस्य देशों के शिष्टमंडल के प्रमुखों से ‘महत्वपूर्ण द्विपक्षीय मुलाक़ातें’ करेंगे. मगर भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने पहले ही कह दिया है कि वह द्विपक्षीय मामलों पर बातचीत करने नहीं जा रहे.
हालांकि दोतरफ़ा मामलों पर बातचीत शंघाई सहयोग संगठन के चार्टर में शामिल नहीं लेकिन विश्लेषक समझते हैं कि सदस्य देशों के पास यह मौक़ा ज़रूर होता है कि वह एक दूसरे से मुलाक़ातें करें और बातचीत का दरवाज़ा खोलें.
सुहासिनी हैदर कहती हैं, “एक समय था जब भारत और पाकिस्तानी नेताओं की मुलाक़ातें भी इस फ़ोरम पर होती रही हैं. और फिर द्विपक्षीय बातचीत का मौक़ा मिलता रहा. लेकिन अब ऐसा लगता है कि हाल के वर्षों में यह फ़ोरम भारत और पाकिस्तान के बीच एक दूसरे की आलोचना करने का प्लेटफ़ॉर्म बन गया है.”
आमिर ज़िया के अनुसार पाकिस्तान और भारत के संबंधों की वजह से इस बैठक के माहौल में “हल्का सा तनाव रह सकता है.”
“जब आतंकवाद की बात होगी तो भारत पाकिस्तान पर आरोप लगाएगा और पाकिस्तान बलूचिस्तान के बारे में भारत पर आरोप लगाएगा. और मुझे फ़िलहाल इन दोनों देशों में व्यापार और दूसरे क्षेत्रों में भी सहयोग होता दिखाई नहीं दे रहा. जब कमरे में भारत और पाकिस्तान होंगे तो माहौल में हल्का सा तनाव तो होगा.”
वह कहते हैं कि विशेष तौर पर पाकिस्तान के लिए इस समय संबंधों में सुधार एक ‘रिस्क’ हो सकता है.
आमिर ज़िया कहते हैं, “हो सकता है कि यहां सत्ता के गलियारों में दोनों देशों के बीच संबंधों में सुधार की इच्छा हो मगर कश्मीर के मामले में 2019 के बाद ऐसे किसी भी समझौते का पाकिस्तान को नुक़सान होगा और इसका नतीजा पाकिस्तान की राजनीति और सेना के लिए बहुत अहम होगा.”
उनके अनुसार भारत के साथ संबंधों में सुधार के बारे में सोचने से पहले पाकिस्तान को अपनी आर्थिक और राजनीतिक स्थिति को बेहतर बनाना होगा.
हालांकि शंघाई सहयोग संगठन अपनी कई नाकामियों और अंदरूनी कमज़ोरी के बावजूद क्षेत्र में व्यापार, ऊर्जा, आतंकवाद के ख़िलाफ़ युद्ध और सैनिक सहयोग का एक प्लेटफ़ॉर्म उपलब्ध कराता है लेकिन विश्लेषकों की यह राय भी है कि सदस्य देशों के आपसी विवादों और सीमित सैनिक सहयोग जैसे मामले इसे एक मज़बूत अंतरराष्ट्रीय फ़ोरम बनने से रोकते हैं.
आमिर ज़िया जैसे विश्लेषक आशावान हैं और कहते हैं कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति टी 20 मैच नहीं और यह संगठन धीरे-धीरे काम करते हैं. मगर ईरान की विश्लेषक ज़हरा ज़ैदी अब ‘व्यावहारिक उपाय’ को ज़रूरी समझती हैं.
वह कहती हैं. “अगर खुलकर सहयोग नहीं करेंगे और एक दूसरे के साथ नहीं खड़े होंगे तो यह भी दूसरे संगठनों की तरह केवल एक नाम का संगठन रह जाएगा.”
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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