बीजेपी को बहुमत नहीं मिलने पर पाकिस्तान के मीडिया में कैसी चर्चा

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हाल में संपन्न हुए भारत के लोकसभा चुनावों पर अमेरिका और यूरोप के अलावा भारत के पड़ोसियों की नज़र टिकी थीं.
भारत के साथ 2300 किलोमीटर से अधिक लंबी सीमा साझा करने वाले पाकिस्तान भी चुनावों को गौर से देख रहा था.
पाकिस्तान से छपने वाले अख़बारों और वहां के टेलीविज़न न्यूज़ चैनलों ने चुनावों के नतीज़ों के साथ-साथ मोदी के फिर से पीएम बनने को लेकर ख़बरें की हैं.
बीते कुछ सालों से पाकिस्तान के भारत के साथ रिश्ते तनावपूर्ण रहे हैं, वहीं भारत के अल्पसंख्यकों ख़ासकर मुसलमानों को लेकर पाकिस्तान का रुख़ अलग रहा है.
वहां के कई अख़बारों के लेखों में बीजेपी की हार को पार्टी के मुस्लिम विरोधी बयानों से जोड़कर देखा जा रहा है.

'जहां बाबरी मस्जिद की जगह राम मंदिर बनाया, वहां बीजेपी हारी'
जियो न्यूज़ ने कहा कि बीजेपी अकेले दम पर सरकार नहीं बना सकेगी. 240 सीटें जीतने वाली बीजेपी को सरकार बनाने के लिए 272 सीटें चाहिए थीं.
जियो टीवी ने अपनी रिपोर्ट में कहा, "मोदी की अतिवाद वाली राजनीति दम तोड़ने लगी. लोकसभा में 400 प्लस का नारा हक़ीक़त नहीं बन पाया. सरकार चलाने के लिए दूसरी पार्टियों की ज़रूरत उसके लिए मजबूरी बन गई है."
"बीजेपी को अपने गढ़ उत्तर प्रदेश में शिकस्त का सामना करना पड़ा है. बाबरी मस्जिद की जगह राम मंदिर बनाने वाली बीजेपी ने अयोध्या में अपनी हार मान ली. तमिलनाडु से वो पूरी तरह साफ हो गई. महाराष्ट्र में भी राहुल गांधी का गठबंधन मोदी के गठबंधन से आगे निकल गया, वहीं बंगाल में ममता बनर्जी का जादू चला."
जियो टीवी ने एक विश्लेषण में लिखा, "मोदी के अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी में भी कांग्रेस उम्मीदवार अजय राय ने बीजेपी के वोट बैंक को नुकसान पहुंचाया. यहां से 2019 में नरेंद्र मोदी की जीत का अंतर लगभग 5 लाख वोटों का था, जो हाल के चुनावों में घटकर 1.5 लाख रह गया."
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जंग ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीति को अतिवादी कहा है. अख़बार ने लिखा, "अपने चुनावी अभियान में मुसलमान विरोधी बयान देने वाले मोदी को अब मुसलमानों के प्रति सहानुभूति रखने वाले नरम रुख़ वाली पार्टियों के साथ मिलकर चलना होगा."
अख़बार लिखता है कि बीजेपी को जनता दल यूनाइटेड (जदयू) और तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी) के साथ की ज़रूरत है.
अख़बार लिखता है, "टीडीपी के चंद्रबाबू नायडू ख़ुद मोदी की आलोचना करते रहे हैं और उन्होंने अल्पसंख्यकों से कहा था कि वो मोदी के लिए वोट न करें. ज़ाहिर सी बात है कि मोदी की सरकार बन जाएगी तो भी वो पहले की तरह सरकार चला नहीं पाएंगे."
एक अन्य लेख में जंग ने लिखा 2009 की तुलना में कांग्रेस सीटों का अपना आंकड़ा दोगुना कर सकी है. बीजेपी के मज़बूत गढ़ उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी को 37 सीटें मिलीं और अयोध्या जहां बीजेपी ने बाबरी मस्जिद की जगह पर राम मंदिर बनाया था, वहां उसे हार मिली है.
वहीं समा टीवी ने लिखा है कि चुनावों के नतीजे आने के बाद विपक्षी पार्टियों ने एग्ज़िट पोल्स की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं.
टीवी ने अपने लेख में कांग्रेस नेता राहुल गांधी, समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव, तृणमूल कांग्रेस नेता ममता बनर्जी और आम आदमी पार्टी नेता अरविंद केजरीवाल के बयानों को जगह दी है.
अख़बार लिखता है कि राहुल गांधी ने कहा कि एग्ज़िट पोल्स में जो दिखा वो बीजेपी के मीडिया सेल ने तोड़ मरोड़कर पेश किया था. वहीं अखिलेश यादव ने कहा कि बीजेपी की रैलियों में लोग नदारद थे लेकिन पोल्स में बीजेपी को बढ़त दिखाई गई जो उनकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करती है.
ममता बनर्जी ने इन्हें फर्जी और बेतुका बताया. वहीं शिव सेना (यूबीटी) के संजय राऊत ने इन्हें 'कॉर्पोरेट खेल और धोखा' बताया. वहीं केजरीवाल ने इन्हें झूठा बताया और कहा कि ये विपक्ष का मनोबल कम करने के लिए है.
अख़बार ने एमनेस्टी इंटरनेशनल के प्रमुख आकार पटेल का बयान भी छापा जिसमें उन्होंने सरकार के उठाए कदमों को मानवाधिकारों का उल्लंघन बताया.
'मोदी के सामने अब चुनौतियां होंगी'

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इंटरनेशनल द न्यूज़ ने एएफ़पी के लेख को छापा है जिसमें कहा गया है कि मोदी के लिए अगला कार्यकाल चुनौतियों भरा होगा.
एक अन्य लेख में अख़बार ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी के उस बयान को छापा है, जिसमें वो कहते हैं कि "देश ने एक स्वर में कह दिया है कि हमें नहीं चाहिए कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह देश चलाएं, हमें देश चलाने का उनका तरीका पसंद नहीं है."
उन्होंने कहा बीजेपी पर राज्यों में जनता की चुनी सरकारों को गिराने और मुख्यमंत्रियों में जेल भेजने का आरोप लगाते हुए कहा, "लोगों ने मिलकर बीजेपी को सज़ा दी है. मुझे भरोसा था कि इस देश के लोग सही जवाब देंगे."
एआरवायई ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि भारत में मोदी के विवादित नारों और बयानों को लोगों का समर्थन नहीं मिला, अब की बार 400 पार का उनका नारा बुरी तरह फ्लॉप रहा.
एआरवाई कहता है आठ जून को मोदी नई सरकार बना सकते हैं लेकिन इस बार सरकार बनाने के लिए बीजेपी को अब गठबंधन के साथियों पर निर्भर रहना होगा.
इस पर एआरवाई में एक बहस भी हुई जिसमें राजनीतिक विश्लेषक हैदर नक़वी कहते हैं "पाकिस्तान और भारत दोनों जगहों की जनता का ये मिजाज़ नहीं है कि वो किसी शासक को लंबे वक्त तक बर्दाश्त कर सकें. मोदी 10 साल से पीएम हैं."
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'उम्मीद है भारत सरकार अपनी विदेश नीति पर विचार करेगी'
डॉन ने अपने एक लेख में कहा है कि 2019 में कांग्रेस एक तरह से ख़त्म हो गई थी और देखा जाए तो बीते एक दशक में बीजेपी हिंदुत्व का कार्ड खेल रही थी और भारत की ये ग्रैंड ओल्ड पार्टी मुश्किलों से गुज़र रही थी. लेकिन चुनाव के नतीजे बताते हैं कि चीज़ें अब बदल रही हैं.
अख़बार ने लिखा है, "बीजेपी के लिए मुसलमान विरोधी और सांप्रदायिक बयानबाज़ियों का असर उल्टा पड़ गया, यहां तक कि हिंदी पट्टी कहे जाने वाले उसके राजनीतिक गढ़ में भी ये कमाल नहीं दिखा पाया. भारत के वोटरों के सामने हिंदू राष्ट्र का गुणगान करने से अधिक बेरोज़गारी और महंगाई जैसे मुद्दे थे."
अख़बार ने उम्मीद जताई कि बीते एक दशक से मुसलमानों के ख़िलाफ़ भड़काने वाले बयान और घातक सांप्रदायिता को बढ़ावा दिया जा रहा था, अब इन नतीजों के बाद ये कम होगा.
अख़बार ने पाकिस्तान के साथ भारत के रिश्तों का ज़िक्र किया और लिखा, "उम्मीद है कि आने वाले वक्त में बीजेपी दिल्ली में नई सरकार बनाएगी और नरेंद्र मोदी अपनी विदेश नीति के बारे में फिर से विचार करेंगे. हमें उम्मीद है कि भारत पाकिस्तान के साथ बातचीत की पहल करेगा और पाकिस्तान भी सकारात्मक जवाब देगा."
द एक्सप्रेस ट्रिब्यून ने लिखा मोदी तीसरी बार भारत के प्रधानमंत्री बनने वाले हैं और एक आकलन के अनुसार पाकिस्तामन को उम्मीद नहीं कि उसे लेकर भारत की नीति बदलेगी.
अख़बार ने लिखा कि चुनावों में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर तो उभरी है लेकिन वो सरकार बनाने के लिए ज़रूरी सीटों से कुछ कदम दूर है. पहली बार एक दशक बाद बीजेपी को सरकार बनाने के लिए प्रांतीय पार्टियों पर निर्भर होना पड़ेगा.
अख़बार लिखता है, "मोदी की गारंटी का दावा करने वाले मोदी का कद बीजेपी और आरएसएस से बड़ा हो रहा था और अब गठबंधन सरकार का वक्त आ गया है, जिसे बीजेपी ने सालों तक नज़रअंदाज़ किया."
हालांकि अख़बार लिखता है कि जीत का कम मार्जिन एक दोधारी तलवार भी हो सकता है. मोदी या तो अपने तरीकों में बदलाव करेंगे या फिर और आक्रामक रुख़ अख़्तियार करेंगे. हो सकता है कि अधिक मज़बूत विपक्ष उन्हें और आक्रामक तरीके से हिदुत्व के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित करे.
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