लोकसभा चुनाव 2024: गठबंधन में कितनी बंध जाएगी मोदी सरकार
- Author, दिव्या आर्य
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता

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नरेंद्र मोदी लगातार तीसरी बार भारत के प्रधानमंत्री बनकर इतिहास रचने जा रहे हैं.
उनसे पहले ऐसा सिर्फ एक बार हुआ है, जब ब्रितानी शासन से आज़ादी हासिल करने के बाद जवाहरलाल नेहरू 16 साल तक आज़ाद भारत के प्रधानमंत्री रहे थे.
लेकिन मोदी की जीत में उनकी पार्टी की 63 सीटों पर हुई हार भी शामिल है. अपने बल पर सरकार ना बना पाने की सूरत में वो अपने सहयोगी दलों पर पूरी तरह आश्रित हैं.
अपने लंबे राजनीतिक करियर में नरेंद्र मोदी ने कभी गठबंधन सरकार का नेतृत्व नहीं किया है - ना बतौर मुख्यमंत्री गुजरात में, और ना ही पिछले दो कार्यकाल में केंद्र में. दूसरी तरफ़, कांग्रेस के नेतृत्व वाले इंडिया गठबंधन को उम्मीद से ज़्यादा सीटें मिली हैं.
मज़बूत विपक्ष के सामने बीजेपी की कमज़ोर स्थिति के मद्देनज़र मोदी के लिए पार्टी के अंदर और सरकार चलाने में स्थायित्व बनाए रखना एक चुनौती होगा. विपक्षी नेता राहुल गांधी ने चुनावी नतीजों को प्रधानमंत्री की नैतिक हार बताया और पत्रकारों से बातचीत में कहा, "देश ने मोदी जी को कहा है कि हमें आप नहीं चाहिए."


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साल 2014 और 2019 के आम चुनावों की ही तरह भारतीय जनता पार्टी ने 2024 का चुनाव भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर ही लड़ा. इलाके के प्रत्याशी का ज़िक्र चाहे हो या ना हो, मोदी का चेहरा हर पोस्टर पर था.
चुनाव प्रचार के दौरान हर रैली में उन्होंने 'मोदी की गारंटी' का नारा दोहराया. वादा किया कि वो खुद सुनिश्चित करेंगे कि पिछले दशक के दौरान उनकी सरकार की ओर से लाई गई नीतियां लागू हों.
इसलिए ये नतीजे उनकी राजनीतिक प्रतिष्ठा को कम करनेवाले माने जा रहे हैं.
न्यूज़ वेबसाइट द वायर की संपादक सीमा चिश्ती ने बीबीसी से कहा, "प्रधानमंत्री मोदी की छवि को धक्का तो लगा है. अब तक लोगों का बहुमत वोट मिलने की वजह से बीजेपी के हिंदुत्व प्रोजेक्ट को एक वैधता मिल रही थी. इसलिए अब जब पार्टी अपने दम पर सरकार नहीं बना पा रही ये एक बहुत बड़ा बदलाव है."
बीजेपी के पांच साल के कार्यकाल में मीडिया को दबाने और विपक्ष को निशाना बनाने के लिए केंद्रीय जांच एजंसियों का गलत इस्तेमाल करने के आरोप लगे.
मोदी सरकार पर मुसलमान-विरोधी माने जाने वाले नागरिकता कानून सीएए-एनआरसी के ख़िलाफ़ व्यापक प्रदर्शन हुए और किसानों के आंदोलन के बाद सरकार को कृषि कानून तक वापस लेने पड़े.
एक टीवी चैनल से बातचीत के दौरान राजनीतिक विश्लेशक योगेंद्र यादव ने चुनावी नतीजों को 'तंत्र पर लोक की जीत' करार दिया.
अजेय नहीं हैं मोदी

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इस सबके बावजूद जब नरेंद्र मोदी पार्टी के कार्यकर्ताओं को संबोधित करने बीजेपी दफ्तर पहुंचे तो उनका ज़ोर शोर से स्वागत किया गया.
फूलों की बरसात हुई और 'जय श्री राम' के नारे गूंजे. अगर उनके मन में अपने आने वाले कार्यकाल को लेकर कोई चिंता है तो वो ज़ाहिर तो नहीं हुई.
उन्होंने इसे दुनिया की सबसे बड़ी जीत करार दिया और कहा, "ये मुझे और मेहनत करने के लिए प्रेरित करता है."
आनेवाला समय नरेंद्र मोदी के लिए नया और मुश्किल हो सकता है और पहली बार गठबंधन सरकार चलाने में ज़्यादा मेहनत की ज़रूरत से इनकार नहीं किया जा सकता.
इस चुनाव से पहले बीजेपी ने अपनी सबसे पुरानी सहयोगी पार्टी अकाली दल को खो दिया और दूसरे पुराने सहयोगी शिवसेना को तोड़कर दो भाग कर दिया.
इससे पार्टी के अपने से छोटे सहयोगी दलों के प्रति रवैये की बुरी मिसाल ही कायम हुई.
अंग्रेज़ी अख़बार द हिन्दू बिज़नेस लाइन की राजनीतिक संपादक पूर्णिमा जोशी ने बीबीसी से कहा, "नरेंद्र मोदी की राजनीतिक साख़ बहुत कम हुई है और अब वो पिछले दो कार्यकालों की तरह एक तरफ़ा तरीक़े से नीतियां बनाने और फ़ैसले लेने की स्थिति में नहीं होंगे."
जोशी के मुताबिक गठबंधन के दौर में बीजेपी के मुसलमान समुदाय के ख़िलाफ़ खुले तौर पर नफ़रत फैलाने वाले बयान देने के पिछले दस साल के चलन पर भी अंकुश लग सकता है.
अल्पसंख्यक मुसलमान
साल 2024 के चुनाव प्रचार में प्रधानमंद्री मोदी कई बार मुसलमान समुदाय के ख़िलाफ़ बोले और उन्हें 'घुसपैठिए' तक कह डाला.
एक रैली में लोगों से कहा कि अब उन्हें 'वोट जिहाद' और 'राम राज्य' के बीच में चुनना होगा.
एक मुसलमान औरत ने बीबीसी से कहा, "अब कुछ दबा-छिपा नहीं है, सब सामने बिना लाग-लपेट कहा जा रहा है."
लेकिन हिंदी पट्टी कहे जाने वाले उत्तर भारत के इलाकों, मंदिर अभियान के केंद्र अयोध्या-फैज़ाबाद में बीजेपी की हार हुई.
पार्टी के धार्मिक ध्रुवीकरण वाले प्रचार ने विपक्ष के समर्थकों को जोड़ने का काम किया, और लोगों ने उनकी धर्मनिरपेक्ष भारत के लिए संविधान को बचाने की अपील के लिए वोट किया.
सीमा चिश्ती को उम्मीद है, "2014 का चुनाव इन्होंने अच्छे दिन के वायदे पर लड़ा, 2019 का बालाकोट हमले के ज़रिए पाकिस्तान को पहुंचाई चोट पर, और 2024 का मंगलसूत्र, मटन के नाम पर मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाकर. लोगों का उसको नकारना बहुत बड़ी बात है."
राम मंदिर और अनुच्छेद 370 के बाद बीजेपी का तीसरा अहम मुद्दा सभी धर्म के लोगों के लिए समान नागरिक संहिता या यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) लाने का है.
लैंगिक समानता के वायदे वाले यूसीसी के बारे में अल्पसंख्यक समुदायों में काफी संशय है कि ये उनके रीति-रिवाज़ों और जीवन जीने के तौर तरीक़ों को पूरी तरह से बदल देगा.
इस तीसरे कार्यकाल में यूसीसी समेत कोई भी नीति लाने से पहले प्रधानमंत्री मोदी को अपने सहयोगियों के सामाजिक-आर्थिक एजेंडा को ध्यान में रखते हुए सहमति बनानी होगी.
खास तौर पर जनता दल यूनाइटेड की समाजवादी विचारधारा के चलते बड़े उद्योगपतियों को बढ़ावा देनेवाली नीतियों को चलाना मोदी सरकार के लिए अब मुश्किल हो सकता है.
भारत में इस वक्त लोगों की आय में असमानता अपने चरम पर है और देश की ज़्यादातर संपत्ति कुछ लोगों के पास सिमट गई है.
राजनीतिक स्थिरता

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गठबंधन के सहयोगियों को ही नहीं, नरेंद्र मोदी को अपनी पार्टी के भीतर से उठती आवाज़ों को भी सुनना पड़ सकता है.
पूर्णिमा जोशी कहती हैं, "इससे पहले मोदी ने चुनावों में मिले मज़बूत समर्थन के बल पर एक तरफ़ा फ़ैसले लिए, पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को हटाया और पार्टी को उनके पीछे ऐसे चलना पड़ा मानो किसी सेना के जेनरल के पीछे चलती फौज हो. लेकिन अब वो अनुशासन नहीं रहेगा."
अगले साल मोदी 75 साल के हो जाएंगे, जिसे उन्होंने खुद ही बीजेपी में रिटायरमेंट की उम्र घोषित किया था.
हालांकि वो अब इस बात से पलट चुके हैं और हाल की चुनावी रैलियों में कह चुके हैं कि उन्हें 'परमात्मा ने भेजा' है, लेकिन इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि पार्टी में उनके शीर्ष पद पर बने रहने पर सवाल उठाए जाएं.
आज़ादी

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चुनावी नतीजों में प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस पिछले आम चुनाव की 53 सीटों की जीत को लगभग दोगुना करने में कामयाब हुई है.
नतीजे आने के बाद किए गए संवाददाता सम्मेलन में राहुल गांधी ने संविधान की प्रति हाथ में लेकर कहा कि उसे बचाने के लिए देश के सबसे ग़रीब और पिछड़े नागरिकों ने विपक्ष को वोट दिया है.
इंडिया अलायंस के सबसे बड़े दल के तौर पर कांग्रेस और बाक़ी विपक्षी पार्टियों की आवाज़ अब संसद में और बुलंद होने की संभावना है.
इससे पहले विपक्षी पार्टियों ने बीजेपी पर राज्यों में उनकी सरकारों की वित्तीय मदद रोकने का आरोप लगाया है.
चुनावी नतीजों में मज़बूत स्थिति में आने के बाद उन्हें अब देश के संघीय ढांचे के और मज़बूत होने की उम्मीद है.
बीजेपी पर चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं को कमज़ोर करने, मीडिया पर दबाव बनाने और पैसे के लोभ और जांच के डर से राजनेताओं को अपनी पार्टी में शामिल करने का आरोप लगाया गया है.
सीमा चिश्ती कहती हैं, "इस सबके बावजूद अगर विपक्ष इतना कर पाया है तो मैं उम्मीद करती हूं कि ये छिन्न-भिन्न हुए भारतीय समाज को साथ लाने का माहौल बनाएगा."
अपने तीसरे कार्यकाल की तैयारी में हो सकता है बीजेपी उस कानून को लाने का फिर प्रयास करे जिसके तहत टीवी और डिजिटल मीडिया पर सरकारी नियंत्रण बढ़ाया जा सकेगा.
मुख्यधारा के मीडिया पर बड़ी कंपनियों द्वारा खरीदे जाने के बाद सरकार के सामने घुटने टेकने या उनके दबाव में काम करने के आरोप लगते रहे हैं.
योगेंद्र यादव को उम्मीद है कि बीजेपी के तीसरे कार्यकाल में इन दबावों में कमी आएगी, "मुझे उम्मीद है कि मीडिया अब जागेगा और अपनी आवाज़ फिर से उठाएगा."



















