पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई के चीफ़ रिटायर होने के बाद भी चर्चाओं में क्यों रहते हैं?

इमेज स्रोत, Getty Images
- Author, आज़म ख़ान
- पदनाम, बीबीसी उर्दू
पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी इंटर सर्विसेज़ इंटेलिजेंस (आईएसआई) के प्रमुख की नियुक्ति न सिर्फ़ चर्चा का विषय बनती है, बल्कि उनके कार्यकाल और रिटायरमेंट के बाद भी विवादों का सिलसिला थमने का नाम नहीं लेता है.
अतीत में, कुछ पूर्व आईएसआई प्रमुखों को अपने कार्यकाल के दौरान लिए गए फ़ैसलों पर सफ़ाई देनी पड़ी, तो कुछ के ख़िलाफ़ पाकिस्तानी सेना को अनुशासनात्मक कार्रवाई करनी पड़ी.
ऐसा भी हुआ है कि एक रिटायर्ड 'स्पाई मास्टर' को आम अदालतों में पेश होना पड़ा.
इसका ताज़ा उदाहरण लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) फ़ैज़ हमीद हैं, जिनके ख़िलाफ़ पाकिस्तानी सेना अधिनियम के 'उल्लंघन' के लिए कोर्ट-मार्शल की प्रक्रिया शुरू की गई है.

फ़ैज़ हमीद 2019 से 2021 तक पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के कार्यकाल के दौरान आईएसआई प्रमुख थे और उनके पूर्ववर्ती जनरल आसिम मुनीर थे, जो अब सेना प्रमुख हैं. फ़ैज़ हमीद ने दिसंबर 2022 के दौरान समय से पहले रिटायरमेंट ले ली थी.
लेकिन अब राजनीतिक और रक्षा मामलों के विशेषज्ञ फ़ैज़ हमीद की गिरफ़्तारी को सेना के हालिया इतिहास में एक असामान्य घटना बता रहे हैं.
उनके मुताबिक़ इसका सेना और देश की राजनीति पर गहरा असर पड़ेगा.
पहले भी आईएसआई चीफ़ क्यों विवादों में रहे?
आईएसआई पाकिस्तान की एक ऐसी ख़ुफ़िया एजेंसी है जिसका मुखिया का चयन प्रधानमंत्री की संस्तुति पर होता है.
प्रधानमंत्री अपनी पसंद के किसी भी व्यक्ति को इस पद पर नियुक्त कर सकता है. लेकिन यह और बात है कि इस पद पर ज़्यादातर समय सेना के सेवारत वरिष्ठ अधिकारी, जो लेफ्टिनेंट जनरल का पद रखते हैं, उनको नियुक्त किया जाता है.
पाकिस्तान के हालिया इतिहास में, कई आईएसआई प्रमुखों को सेवा के दौरान या सेवा के बाद जांच का सामना करना पड़ा है.
शुजा नवाज़ ने अपनी किताब 'क्रॉस्ड स्वॉर्ड्स' में लिखा है कि जब बेनज़ीर भुट्टो पहली बार प्रधानमंत्री बनीं तो उन्होंने सेना प्रमुख से बात की और हमीद गुल को इस पद से हटाकर कोर कमांडर मुल्तान नियुक्त कर दिया.
शुजा नवाज़ लिखते हैं कि उसके बाद पहली बार जब एक रिटायर्ड जनरल शम्सुर रहमान कल्लू को एजेंसी का प्रमुख नियुक्त किया गया, तो तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल मिर्ज़ा असलम बेग ने 'एमआई' यानी मिलिट्री इंटेलिजेंस पर निर्भरता बढ़ा दी. और इस तरह से आईएसआई प्रधानमंत्री को जल्द कोई जानकारी देने में भी असमर्थ रही.
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक़, सेना में अब यह परंपरा मज़बूत हो गई है कि इस पद पर केवल उन्हीं को नियुक्त किया जाएगा जो सेवा में हैं. इस तरह से आईएसआई का वास्तविक नियंत्रण प्रधानमंत्री कार्यालय के बजाय सेना के पास रहता है.
शुजा नवाज़ के मुताबिक़, बेनज़ीर के पिता ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो ने आईएसआई के भीतर एक राजनीतिक सेल की स्थापना की, जिससे राजनीतिक मामलों में इस संगठन का हस्तक्षेप बढ़ गया और फिर जब बेनज़ीर प्रधानमंत्री बनीं, तो आईएसआई के भीतर ये सेल उनके सामने एक चुनौती के तौर पर सामने आया.
जब असद दुर्रानी पर लगा 'देशद्रोह' का आरोप

पूर्व आईएसआई प्रमुख असद दुर्रानी पहली बार 1990 के चुनाव में धांधली के मामले में असग़र ख़ान केस में सुप्रीम कोर्ट की पेशियां भुगतते रहे और फिर वो अदालत के सामने मेहरान बैंक स्कैंडल में अपनी संलिप्तता स्वीकार करते हुए वहां से बाहर निकले.
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में संघीय जांच एजेंसी को मामले में आगे की जांच करने का आदेश देकर मामले का निपटारा कर दिया था.
लेखक शुजा नवाज़ के मुताबिक़, सैन्य तानाशाह ज़िया-उल-हक की मौत के बाद पंजाब में बेनज़ीर भुट्टो को ‘हराने के लिए’ डीजी आईएसआई हमीद गुल ने उस वक़्त के राष्ट्रपति ग़ुलाम इसहाक़ ख़ान और आर्मी चीफ़ जनरल मिर्ज़ा असलम बेग के साथ मिलकर विपक्षी पार्टियों का एक गठबंधन ‘आईजेआई’ बनाया था.
जब असद दुर्रानी डीजी आईएसआई बने तो उनके ज़रिए गठबंधन में शामिल पार्टियों को 'पैसे बांटे गए' जिसका हलफ़नामा असद दुर्रानी ने सुप्रीम कोर्ट में दिया था.
असद दुर्रानी ने बाद में अदालत को बताया कि उन्होंने जो कुछ भी किया वह अपने बॉस, तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल असलम बेग के आदेश पर किया था.
उन्होंने भारत की ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ के पूर्व प्रमुख के साथ एक किताब भी लिखी. जिसकी वजह से असद दुर्रानी को उस वक़्त जीएचक्यू के चक्कर लगाने पड़े और सख़्त अनुशासनात्मक कार्रवाई का सामना करना पड़ा.
रक्षा मंत्रालय ने उन पर 'देश-विरोधी गतिविधियों' में शामिल होने के आरोप लगाए, जिससे असद दुर्रानी ने इनकार किया. असद दुर्रानी के मुताबिक़, राजनीतिक मामलों में सेना का हस्तक्षेप "एक हक़ीक़त और देश के लिए नुक़सानदेह है."
असद दुर्रानी ने अपनी किताब 'पाकिस्तान ए ड्रिफ्ट' में लिखा है कि नागरिक शासक भी सेना के मूड से परिचित नहीं होते हैं और वे 'अपना बंदा' तलाश करने की ग़लती कर बैठते हैं जबकि 'सेना का बंदा फ़ौज के नेतृत्व के प्रति ही जवाबदेह होता है.'
जो पीएम के हुक्म के बावजूद आईएसआई चीफ़ से आर्मी चीफ़ न बन सके

इमेज स्रोत, Getty Images
12 अक्टूबर 1999 को, पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ की सरकार के ख़िलाफ़ एक सैन्य तख्तापलट हुआ और डीजी आईएसआई लेफ्टिनेंट जनरल ज़ियाउद्दीन बट को गिरफ़्तार किया गया जिन्हें नवाज़ शरीफ़ ने आर्मी चीफ़ तैनात किया था.
सैन्य तख्तापलट से पहले, लेफ्टिनेंट जनरल (रियाटर्ड) ज़ियाउद्दीन बट एक साल तक डीजी आईएसआई के तौर पर काम कर रहे थे.
रक्षा विश्लेषक उमर फ़ारूक़ ने 12 अक्टूबर, 2021 को बीबीसी के लिए एक लेख में लिखा था कि 'डीजी आईएसआई के रूप में नियुक्त होने के बाद, लेफ्टिनेंट जनरल ज़ियाउद्दीन सैन्य हलकों में एक ऐसे जनरल के तौर पर मशहूर हो गए थे जिनका नवाज़ शरीफ़ से ख़ून का रिश्ता है.’
उमर फ़ारूक़ के लेख के मुताबिक़, 'सत्ता पर क़ब्ज़ा करने के बाद परवेज़ मुशर्रफ़ अपने दोस्तों से मज़ाक़ करते थे कि 1998 में सेनाध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने सोचा था कि वह जनरल ज़ियाउद्दीन को चीफ़ ऑफ़ जनरल स्टाफ़ और लेफ्टिनेंट जनरल डीजी आईएसआई नियुक्त करेंगे. अगर उनकी योजना के मुताबिक़ (ये नियुक्तियां हो जातीं) और नवाज़ शरीफ़ मुझे हटाने की कोशिश करते तो ये कोशिश कामयाब हो जाती.’
“जनरल मुशर्रफ़ बतौर डीजी आईएसआई के रूप में जनरल ज़ियाउद्दीन पर भरोसा नहीं करते थे, पहले दिन से ही उन्होंने आईएसआई से प्रमुख फ़ाइलें और योजनाएं वापस ले लीं और कश्मीर और अफ़ग़ानिस्तान से संबंधित ज़िम्मेदारी तत्कालीन चीफ़ ऑफ़ जनरल स्टाफ़ लेफ्टिनेंट जनरल अज़ीज़ ख़ान को सौंप दी गईं. जिन्होंने पहले आईएसआई में अपनी सेवा के दौरान कश्मीर और अफ़ग़ानिस्तान से संबंधित मामलों को संभाला था.”
हालाँकि, नवाज़ शरीफ़ ने ज़ियाउद्दीन को डीजी आईएसआई बना दिया, जिसके परिणामस्वरूप मुशर्रफ़ को अपने पूर्व आईएसआई के क़रीबी सहयोगी लेफ्टिनेंट जनरल अज़ीज़ ख़ान को जनरल स्टाफ़ के प्रमुख के रूप में नियुक्त करने के लिए मजबूर होना पड़ा, जो मुशर्रफ के अनुसार एक महत्वपूर्ण पद था जिसके आधार पर 12 अक्टूबर 1999 की शाम को प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ द्वारा उन्हें सेनाध्यक्ष पद से हटाने का प्रयास विफल हो गया.
परवेज़ मुशर्रफ की किताब 'ऑन द लाइन ऑफ़ फ़ायर' के मुताबिक़, जनरल ज़ियाउद्दीन ने प्रधानमंत्री आवास की दहलीज़ पर स्वीकार किया कि वो नए सेनाध्यक्ष हैं और उनकी कमान के तहत ट्रिपल वन ब्रिगेड के सैनिकों को उनके आदेशों का पालन करना होगा.
हालाँकि, कर्नल शाहिद अली ने उनकी बात मानने से इनकार कर दिया. बाद में उनकी सुरक्षा कर रहे एसएसजी (स्पेशल सर्विसेज़ ग्रुप) कमांडो ने हथियार डाल दिए, जिसके बाद उन्हें 'सरेंडर' करने के लिए मजबूर होना पड़ा.
ज़हीर-उल-इस्लाम जो 2014 के धरनों के कारण विवादित रहे

इमेज स्रोत, AFP
हाल के इतिहास में, पूर्व आईएसआई प्रमुख ज़हीरुल इस्लाम 2014 में इमरान ख़ान की तहरीक-ए-इंसाफ़ और ताहिर-उल-क़ादरी के संगठन के धरने के कारण निशाने पर आए थे. फिर उनके रिटायरमेंट से दो महीने पहले उनके उत्तराधिकारी के नाम की घोषणा कर दी गई.
कैबिनेट के एक अहम सदस्य और पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के क़रीबी सहयोगी ने अगस्त 2015 में बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में दावा किया था कि इस्लामाबाद में तहरीक-ए-इंसाफ़ और अवामी तहरीक के धरने के दौरान तत्कालीन आईएसआई प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल ज़हीर-उल -इस्लाम अब्बासी ने सैन्य और नागरिक नेतृत्व को हटाकर देश पर कब्ज़ा करने की 'साज़िश रची' थी.
कुछ महीने पहले नवाज़ शरीफ़ ने भी एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में ज़हीरुल इस्लाम पर यही आरोप दोहराए थे और कहा था कि उन्हें इस्तीफ़ा देने या लंबी छुट्टी पर जाने का संदेश दिया गया था. ज़हीरुल इस्लाम ने इस आरोप से इनकार किया है.
जून 2022 के दौरान, ज़हीरुल इस्लाम की एक बार फिर आलोचना की गई जब उन्हें अपने रिटायरमेंट के कई साल बाद पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ की एक राजनीतिक सभा को संबोधित करते देखा गया.
इस कार्यक्रम के वीडियो में जनरल (रिटायर्ड) ज़हीरुल इस्लाम को यह कहते हुए सुना गया कि “मैं बताना चाहता हूं कि मैं कोई राजनेता नहीं हूं, मैं 'वास्तव में तटस्थ' हूं. मैं आपसे पूरी तरह से अराजनीतिक बात कर रहा हूं,” जिसके बाद दर्शकों की तालियां गूंज उठीं.
जनरल (रिटायर्ड) ज़हीरुल इस्लाम ने कहा कि 'हमने यह नहीं देखा कि उम्मीदवार कौन हैं, हमें यह देखना है कि हमें किस प्रणाली को वोट देना है और हम पीटीआई में उस प्रणाली को देखते हैं.'
जब मैंने एक बार ज़हीरुल इस्लाम से इस बारे में पूछा तो उन्होंने जवाब दिया कि वह अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद रिटायर हो गए हैं और उनके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की गई है.
साल 2023 के दौरान, पाकिस्तान सेना अधिनियम में एक संशोधन पारित किया गया जिसके तहत एक सेना अधिकारी जो सेवा के दौरान संवेदनशील पद पर रहा है जो सेना अधिनियम के अंतर्गत आता है वो रिटायरमेंट के पांच साल बाद तक राजनीतिक गतिविधियों में भाग नहीं ले सकता है.
रिटायरमेंट के बाद भी विवाद आईएसआई चीफ़ का पीछा क्यों नहीं छोड़ते?

इमेज स्रोत, ISPR
रिटायरमेंट के बाद भी आईएसआई प्रमुखों को विवादों का सामना क्यों करना पड़ता है, इस सवाल पर लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) तलत मसूद का मानना है कि ऐसा राजनीति में सेना के हस्तक्षेप के कारण है.
तलत मसूद का कहना है कि यह सिर्फ़ आईएसआई प्रमुख की बात नहीं है, बल्कि पाकिस्तान बनने के बाद से ही सेना किसी न किसी तरह से राजनीति में शामिल रही है और इसमें पूरे संगठन का हस्तक्षेप है. जहां भी सेना किसी मुद्दे से दूर रहती है, वहां नागरिक शासक अपने मतलब के लिए उन्हें राजनीति में घसीट लेते हैं.
उनकी राय है कि राजनीति में सेना का हस्तक्षेप "देश की पूरी व्यवस्था की कमज़ोरी को भी दर्शाता है."
ग़ौरतलब है कि पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने मई 2022 में प्रसारित एक बातचीत के दौरान कहा था कि आईएसआई प्रमुख की नियुक्ति के मुद्दे पर उनकी तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल क़मर जावेद बाजवा से असहमति थी क्योंकि 'मैं चाहता था कि फ़ैज़ हमीद कुछ समय और रहें क्योंकि हमें ख़बरें मिल रही थीं कि पीएमएल-एन वाले कोई योजना बना रहे हैं.’
इमरान ख़ान ने इसका दूसरा कारण अफ़ग़ानिस्तान के हालात भी बताए थे.
हालांकि, इमरान ख़ान के बयान से पता चलता है कि पाकिस्तान में आईएसआई प्रमुख का पद किस तरह प्रधानमंत्री और सेना प्रमुख के बीच परेशानी का कारण बन जाता है.
आईएसआई का इतिहास लिखने वाले इतिहासकार डॉ. हेन जी केसलिंग ने अपनी पुस्तक 'द आईएसआई ऑफ पाकिस्तान: फेथ यूनिटी एंड डिसिप्लिन' में लिखा है कि कैसे अतीत में सैन्य नेतृत्व ने आईएसआई में प्रधानमंत्री के लोगों की उपेक्षा की और उन्हें अस्वीकार कर दिया.
इस विषय पर उनके शोध से पता चलता है कि नागरिक शासन को अपने लोगों को आईएसआई मुख्यालय में लाने के प्रयासों के दौरान निराशा और नाराज़गी का सामना करना पड़ा.
ऐसे में क्या आईएसआई चीफ़ का पद सिर्फ़ राजनीतिक हस्तक्षेप की वजह से विवादास्पद है या कोई और वजह है?
विश्लेषक ज़ाहिद हुसैन ने बीबीसी को बताया कि आईएसआई प्रमुख जो कुछ भी कर रहे होते हैं वह "नेतृत्व की ओर से मिलने वाले आदेश पर ही ऐसा करते हैं."
उनके अनुसार, आईएसआई प्रमुख मीडिया में ज़्यादा चर्चित हो जाते हैं, मगर उन्होंने जो कुछ अपनी कमांड के कहने पर किया होता है, उस पर "उन्हें जवाबदेह नहीं ठहराया जाता है."
उनकी राय में कभी-कभी ये मुखिया 'ग्रे एरिया' में भी चले जाते हैं यानी उनकी गतिविधियों को लेकर अस्पष्टता पैदा हो जाती है.
रक्षा मामलों की विश्लेषक आएशा सिद्दीक़ा का कहना है, "अफ़ग़ान जिहाद के बाद आईएसआई के नेतृत्व ने असाधारण महत्व हासिल कर लिया है, जिसके कारण आईएसआई के प्रमुखों पर अधिक उंगलियां उठ रही हैं."
उनके मुताबिक़, चाहे वह अमेरिकी कॉन्ट्रैक्टर रेमंड डेविस के अमेरिकी प्रत्यर्पण का मामला हो या राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी के ख़िलाफ़ मेमो गेट का मामला हो, ‘ये सब तत्कालीन आईएसआई प्रमुख शुजा पाशा ने ख़ुद नहीं किया था, बल्कि वह उस समय देश और संस्था की नीति पर चल रहे थे.’
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

















