पाकिस्तान में टीवी सीरियल बरज़ख़ को यूट्यूब से क्यूं हटाना पड़ा, क्या है विवाद?

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- Author, शुमाइला ख़ान
- पदनाम, पत्रकार
फ़वाद ख़ान और सनम सईद दस बरस बाद एक बार फिर एक साथ!
पाकिस्तान में टीवी ड्रामे के दर्शकों के लिए ‘बरज़ख़’ का इंतज़ार करने के लिए यह सुर्ख़ी काफ़ी थी लेकिन पाकिस्तान और भारत के संयुक्त प्रोडक्शन में बनने वाली यह सिरीज़ रिलीज़ के बाद ऐसे विवादों में घिरी कि उसे प्रसारित करने वाले भारतीय चैनल ज़ी ज़िंदगी ने इसे पाकिस्तान में यूट्यूब से ही हटा देने की घोषणा कर दी है.
छह कड़ियों वाली इस सिरीज़ की आख़िरी कड़ी 6 अगस्त को यूट्यूब पर जारी की गई लेकिन उसी दिन ज़ी ज़िंदगी ने एक बयान में कहा कि 9 अगस्त के बाद पाकिस्तान में यूट्यूब पर इस ड्रामे को नहीं देखा जा सकेगा.
चैनल के सोशल मीडिया अकाउंट पर जारी बयान में कहा गया कि पाकिस्तान में “वर्तमान जन भावना की रोशनी में हमने यूट्यूब पाकिस्तान से बरज़ख़ को स्वैच्छिक तौर पर हटाने का फ़ैसला किया है.”

“कहानियां कभी मरती नहीं”
ध्यान रहे कि इस ड्रामा सिरीज़ की पहली क़िस्त प्रसारित होने के बाद से ही पाकिस्तानी दर्शकों की ओर से इस पर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली जिन्होंने इस सिरीज़ के विषय को अश्लील, उत्तेजक और इस्लामी मूल्यों के ख़िलाफ़ बताया था.
बरज़ख़ अरबी भाषा का शब्द है जिसका मतलब रुकावट है जबकि धार्मिक दृष्टि से इसका मतलब किसी व्यक्ति की मौत के बाद क़यामत के दिन तक की अवधि है. ड्रामा सिरीज़ बरज़ख़ की कहानी आसिम अब्बासी की लिखी है जो इस सिरीज़ के निर्देशक भी हैं.
आसिम अब्बासी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर ज़ी ज़िंदगी की ओर से पाकिस्तान में यूट्यूब से बरज़ख़ को हटाने के फ़ैसले को बेहतरीन बताते हुए लिखा, “मेरी कोई भी कहानी उन सभी ख़ूबसूरत और क्षमतावान कलाकारों की सुरक्षा से अधिक क़ीमती नहीं जो उसे बनाने के लिए जमा हुए थे.”
“यह फ़ैसला वाक़ई बेहतरीन है, उन सभी लोगों के लिए जिन्होंने हम पर मोहब्बत की बारिश की. मुझे उम्मीद है कि आप आख़िरी कड़ी का आनंद लेंगे और याद रखें कहानियां कभी मरती नहीं हैं.”
इस बयान के बाद बीबीसी ने आसिम अब्बासी समेत सिरीज़ में शामिल अदाकारों से संपर्क किया लेकिन उन्होंने इस सिरीज़ या इसे यूट्यूब से हटाए जाने पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया.
बरज़ख़ की कहानी क्या है?

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इस वेब सिरीज़ में कई किरदारों के बीच पेचीदा संबंधों और सामाजिक समस्याओं को पेश किया गया है. बरज़ख़ की कहानी एक 76 साल के शख़्स जाफ़र के गिर्द घूमती है जो आलम-ए-बरज़ख़ में मौजूद अपनी पहली मोहब्बत से शादी के लिए अपने बेटों को दावत देता है.
एक तरफ़ जाफ़र अपनी शादी के लिए आलम-ए-बरज़ख़ को जाने की तैयारी में है जबकि दूसरी तरफ़ इस बस्ती के लोग दो दुनियाओं के लोगों के इस मिलन से दुनिया के फ़ना होने के ख़ौफ़ में हैं.
इस कहानी में साहित्य की आधुनिक तकनीक मैजिकल रियलिज़्म या जादुई यथार्थवाद से काम लिया गया है जिसमें अतीत और वर्तमान की दुनिया आपस में जुड़ी हुई है और कहानी के केंद्र में वह लोग हैं जो अपनी पहचान और भावनाओं के बारे में कश्मकश का शिकार हैं.
सिरीज़ में मौत के बाद जीवन, मानसिक स्वास्थ्य, प्रसव के बाद डिप्रेशन और ज़बर्दस्ती की शादी जैसे विषयों के अलावा मनोवैज्ञानिक रोगियों की देखभाल करने वाले लोगों की समस्याओं पर भी रोशनी डाली गई है लेकिन अधिकतर पाकिस्तानी दर्शकों को सिरीज़ के कुछ दृश्य और विषय पर गंभीर आपत्ति रही है और उनका दावा है के इससे व्यभिचार, समलैंगिकता और जादू टोने को बढ़ावा मिलता है.
बरज़ख़ की पहली क़िस्त के पहले दृश्य पर ही दर्शकों की ओर से अश्लीलता फैलाने का आरोप लगा तो तीसरी क़िस्त में समलैंगिकता को बढ़ावा देने का आरोप उस समय सामने आया जब इस क़िस्त के एक दृश्य में दो मर्द किरदार एक दूसरे को चूमने के क़रीब दिखाई दिए हैं.
“अपना नेटफ़्लिक्स डिलीट कर दें, आंखों पर पट्टी बांध लें”

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इस सिरीज़ के रिलीज़ होने के बाद पत्रकार हों या यूट्यूबर्स, पाकिस्तान में सोशल मीडिया पर सभी ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया दी और इस दौरान यह भी देखा गया कि बहुत सी ऐसी जानकारी दी गई जिससे इस ड्रामे के विरोध को और हवा मिली.
मंगलवार को बरज़ख़ की आख़िरी क़िस्त प्रसारित होने के बाद भी सिरीज़ का नाम सोशल मीडिया पर ट्रेंड करता रहा और पाकिस्तान में यूट्यूब से इस सिरीज़ को हटाए जाने की घोषणा के बाद बरज़ख़ के विरोध में मुहिम चलाने वाले लोग इसे अपनी कामयाबी बताते रहे.
बरज़ख़ प्रसारित होने से पहले दर्शक ड्रामा सीरियल ‘ज़िंदगी गुलज़ार है’ की लोकप्रिय जोड़ी फ़वाद ख़ान और सनम सईद को दस साल बाद एक साथ स्क्रीन पर देखने के लिए बेताब थे लेकिन अब यही अदाकार सबसे अधिक आलोचना का शिकार हो रहे हैं और सोशल मीडिया पर यूज़र्स इन दोनों अदाकारों पर पाबंदी की मांग भी कर रहे हैं.
एक सोशल मीडिया यूज़र बिलाल ने ‘एक्स’ पर लिखा, “इस ड्रामे के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि भारत ने पाकिस्तानी अदाकारों को काफी रक़म दी तो वह उनके लिए पोर्नोग्राफ़ी भी रिकॉर्ड करा लेंगे.”
नौशीन इरफ़ान ख़ान ने लिखा, “एलजीबीटी, शिर्क (एक अल्लाह को छोड़ किसी और की इबादत), पीडोफ़ीलिया, नैक्रोफ़ीलिया, ब्लैक मैजिक, होमोसेक्सुअलिटी- सब एक जगह पर. आपको मालूम है कि कहां है? यह पाकिस्तानी डायरेक्टर और अदाकारों के ड्रामा सीरियल में है जिसे ज़ी 5 ने रिलीज़ किया बरज़ख़ के नाम से.”
लेकिन जहां आलोचना करने वालों की कमी नहीं थी वहीं भारतीय और पाकिस्तान यूज़र्स दोनों की ओर से बरज़ख़ की टीम को सराहा भी गया और पाखंडपूर्ण रवैए पर भी बात की गई.
पत्रकार अबसा कोमल ने एक्स पर अपनी टिप्पणी में पाकिस्तान में नेटफ़्लिक्स पर ट्रेंड करने वाले एडल्ट सामग्री की ओर इशारा किया और स्थानीय दर्शकों के दोहरे मापदंड की आलोचना करते हुए कहा, “अपना नेटफ़्लिक्स भी डिलीट कर दें, आंखों पर पट्टी बांध लें, कहीं आपकी भावनाएं न आहत हो जाएं.”
एक और यूज़र कोमल बुख़ारी ने लिखा, “हमें हर उस चीज़ से समस्या क्यों है जो कुछ प्रगति और विकास लाती है? हम कब तक उन लोगों के हाथों अज़ाब झेलते रहेंगे जो यौनिकता की सच्चाई से बिल्कुल अनभिज्ञ हैं.”
ध्यान रहे कि पहली क़िस्त प्रसारित होने के बाद सिरीज़ के निर्देशक आसिम अब्बासी ने एक यूज़र की आलोचना के जवाब में एक्स पर ही लिखा था, “अगर आपको अपारंपरिक कहानियां नापसंद हों तो कृपया मेरी सामग्री ना देखें.”
उन्होंने कहा था कि वह हमेशा मानवाधिकारों का समर्थन करते रहेंगे और ऐसी कहानी सुनाएंगे जिन पर वह विश्वास रखते हैं.
“रेत में सिर छिपाने से वह चीज़ ख़त्म नहीं हो जाएगी”

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सोशल मीडिया पर इस ड्रामा सिरीज़ और इसमें काम करने वाले अदाकारों की तीखी आलोचना और ट्रोलिंग पर पाकिस्तान की ड्रामा इंडस्ट्री के कर्ताधर्ता लोगों और अधिकतर कलाकारों की ओर से भी चुप्पी साध ली गई बल्कि कुछ मशहूर लोग तो इस मुहिम का हिस्सा भी बने.
फ़ैशन डिज़ाइनर मारिया बी ने बरज़ख़ के ख़िलाफ़ एक वीडियो जारी की जिसमें उनका कहना था, “ऐसा लगता है कि इस डायरेक्टर ने क़ुरान में से जो सबसे बड़े गुनाह हैं उनकी एक लिस्ट बनाई और उन पर एक ड्रामा बना दिया.”
पाकिस्तानी गायिका आयमा बेग ने बरज़ख़ को पाकिस्तान में यूट्यूब से हटाए जाने की ख़बर के बाद इंस्टाग्राम पर लिखा, “माफ़ी के साथ यह उस तरह की फ़िल्म नहीं थी जो हमारी नस्ल देखना चाहती थी. शायद यह ध्यान खींचने का सबसे बड़ा तरीक़ा था.”
इस स्थिति में कुछ कलाकार ऐसे भी थे जिन्होंने इस सिरीज़ और उसके विषयों पर बात करते हुए आलोचकों को अपने गिरेबान में झांकने की सलाह दी.
सीनियर अदाकारा रूबीना अशरफ़ एक मॉर्निंग शो में बरज़ख़ के विषयों का बचाव करते दिखाई दीं और उन्होंने जनता को सोशल मीडिया की ताक़त को सकारात्मक ढंग से इस्तेमाल करने की राय दी.
उनका कहना था कि अगर लोगों को समाज में समलैंगिकता पर आपत्ति है तो उन्हें चाहिए कि “समाज में जहां-जहां इस तरह का काम हो रहा है उसके बारे में बात करें. उन्हें बेनक़ाब करें. एक ड्रामे ने तो समाज का आईना दिखाया है और आपके रेत में सिर दबाने से वह चीज़ ख़त्म नहीं हो जाएगी.”
अदाकारा और टीवी होस्ट नादिया ख़ान ने एक निजी चैनल के शो में बरज़ख़ की कास्ट में फ़वाद ख़ान और सनम सईद की जोड़ी समेत हुंज़ा की वादियों में फ़िल्माई गई इस सिरीज़ को सराहा और उसे ऐसे लोगों के लिए एक बड़ा रिलीफ़ बताया था जो शादी, तलाक़, सास बहू और फ़ैमिली ड्रामे से तंग आ चुके हैं.
“लेखक का काम समाज को आईना दिखाना है”

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बरज़ख़ की आलोचना करने वालों की दलील है कि समलैंगिकता जैसे मामले को स्क्रीन पर पेश करके नॉर्मलाइज़ नहीं किया जाना चाहिए.
‘डर सी जाती है सिला’, ‘रक़ीब से’ और ‘वर्किंग वीमन’ जैसी कामयाब और साहसिक कहानियां की रचयिता और नाटककार बी गुल का कहना है कि सही और ईमानदार कला अपने समाज का आईना होती है.
बीबीसी उर्दू से बात करते हुए उनका कहना था, “बरज़ख़ में एक समलैंगिक व्यक्ति का पूरा सफ़र है. उसके बचपन के ख़ालीपन और उसके संबंधों की पेचीदगियों को बहुत संवेदनशील ढंग से दिखाया गया है. जो कुछ भी बरज़ख़ में दिखाया गया वह यहां नहीं होता. ऐसी सामग्री पर पाबंदी का मतलब है कि आप कबूतर की तरह आंखें बंद कर लें और झूठी पवित्रता की गुटरगूँ करें.”
उन्होंने कहा, “लेखक अगर अपने दर्शकों को ख़ुश करने के चक्कर में लिखेगा तो झूठ ही लिखेगा. लेखक का काम समाज को आईना दिखाना है, किसी मिंबर (मस्जिद की ख़ास जगह) पर चढ़कर सुधार की दावत देना नहीं है. अगर हम अपनी समस्याओं से मुंह चुराएंगे तो उनके दूर होने का ख़्याल भी दिल से निकाल देना चाहिए.”
नाटककार आमना मुफ़्ती हालांकि बरज़ख़ के मामले पर अपनी राय देने से बचती रहीं लेकिन उनका कहना था कि किसी भी सामग्री पर पाबंदी नहीं लगनी चाहिए.
विषयों और किरदारों की रचना पर उनकी राय थी, “हम मनोरंजन उपलब्ध कराने के लिए किरदार बनाते हैं और जब हम कमर्शियल लेखक के तौर पर काम कर रहे होते हैं और अगर हमारी टारगेट ऑडियंस 15 से 45 साल की घरेलू महिलाएं हैं, जिनकी नैतिकता का हमें अंदाज़ा होता है, तो हमारी कोशिश होती है कि उन्हें एक कल्चरल शॉक ना दिया जाए.”
डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म फ़ेमिनिस्तान से विभिन्न विषयों पर बात करने वाली लेखिका सबाहत ज़करिया ने ‘एक्स’ पर लिख कि वह बरज़ख़ को उसकी योग्यता पर जांचना चाहती थीं लेकिन पाकिस्तान में सेंसरशिप ने उसे नामुमकिन बना दिया.
उन्होंने लिखा, “लिबरल बंदे को पागल हुजूम के ख़िलाफ़ खड़ा होना पड़ता है, बाक़ी बातें तो पीछे रह जाती हैं. पहले जॉयलैंड के साथ यह हुआ, अब बरज़ख़.”
ध्यान रहे कि हाल के वर्षों में पाकिस्तानी फ़िल्में ‘जॉयलैंड’ और ‘ज़िंदगी तमाशा’ भी अपने अलग विषय की वजह से सामाजिक प्रतिक्रिया और प्रतिबंध का शिकार रही हैं.















