'ये अपनी ही बोलता है, इसे उठा लो...' - वुसत का ब्लॉग

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    • Author, वुसतुल्लाह ख़ान
    • पदनाम, पाकिस्तान से बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

आज हमारा सियासत वियासत पर बतियाने का बिलकुल भी मन नहीं है.

लिहाज़ा हम आपको ज़बरदस्ती तीन नज़्मे सुनाएंगे.

पहली नज़्म अहमद फ़रहाद की है.

दूसरी अक़ील अब्बास जाफ़री की है.

और तीसरी नज़्म हबीब जालिब मरहूम की है.

और इन तीनों नज़्मों को हम दक्षिण एशियाई लोग ही अच्छे से समझ कर इसका मज़ा ले सकते हैं.

अहमद फ़राद की पहली नज़्म सुनिए-

ये अपनी मर्ज़ी से सोचता है इसे उठा लो

उठाने वालों से कुछ जुदा है इसे उठा लो

वो बेअदब इससे पहले जिन्हें उठा लिया था

ये उनके बारे में पूछता है इसे उठा लो

इसे बताया भी था कि क्या बोलना है, क्या नहीं बोलना

मगर ये अपनी ही बोलता है, इसे उठा लो

जिन्हें उठाने पे हमने बख़्शे मकामों खिलत

ये उन सयानों पे हंस रहा है, इसे उठा लो

ये पूछता है कि ये अमन ये आमा का मसला क्यूं

ये अमन ऐ आमां का मसला है, इसे उठा लो

इसे कहा था जो हम दिखाएं बस उतना देखो

मगर ये मर्ज़ी से देखता है, इसे उठा लो

सवाल करता है ये दीवाना हमारी हद पे

ये अपनी हद से गुज़र गया है इसे उठा लो

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अब्बास जाफ़री की दूसरी नज़्म

पहले शहर को आग लगाएं नामालूम अफ़राद (लोग)

और फिर अमन के नगमें गाएं नामालू अफ़राद

लगता है इंसान नहीं है कोई छलावा हैं

सब देखें और नज़र ना आएं नामालूम अफ़राद

हम सब ऐसे शहर ए नापुर्सा के वासी है

जिसका नज़्मों नष्ट चलाएं नामालूम अफ़राद

लगता है कि शहर का कोई वाली ना वारिस

हर जानिब बस धूम मचाएं नामालूम अफ़राद

पहले मेरे घर के अंदर मुझ को क़त्ल करें

और फिर मेरा शोग मनाएं नामालूम अफ़राद

इनका कोई नाम ना मसलक और ना कोई नस्ल

काम से बस पहचाने जाएं नामालूम अफ़राद

शहर में जिस जानिब भी जाएँ एक ही मंज़र हैं

आगे पीछे, दायें-बायें, नामालूम अफ़राद

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हबीब जालिब की तीसरी नज़्म

मैंने उससे ये कहा

ये जो दस करोड़ हैं

जेहल का निचोड़ हैं

इनकी फ़िक्र सो गई

हर उम्मीद की किस

ज़ुल्मतों में खो गई

ये खबर दुरुस्त है

इनकी मौत हो गई

बे शऊर लोग हैं

ज़िन्दगी का रोग हैं

और तेरे पास है

इनके दर्द की दवा

मैंने उससे ये कहा

तू ख़ुदा का नूर है

अक्ल है शऊर है

क़ौम तेरे साथ है

तेरे ही वज़ूद से

मुल्क की नजात है

तू है मेहरे सुबहे नौ

तेरे बाद रात है

बोलते जो चंद हैं

सब ये शर पसंद हैं

इनकी खींच ले ज़बाँ

इनका घोंट दे गला

मैंने उससे ये कहा

जिनको था ज़बाँ पे नाज़

चुप हैं वो ज़बाँ-दराज़

चैन है समाज में

वे मिसाल फ़र्क है

कल में और आज में

अपने खर्च पर हैं क़ैद

लोग तेरे राज में

आदमी है वो बड़ा

दर पे जो रहे पड़ा

जो पनाह माँग ले

उसकी बख़्श दे ख़ता

मैंने उससे ये कहा

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