वुसतुल्लाह ख़ान का ब्लॉग: उधार में सांप भी मिल जाए तो हम इनकार नहीं करते

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- Author, वुसतुल्लाह खान
- पदनाम, पाकिस्तान से बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
मुझे वाक़ई समझ में नहीं आ रहा है कि आपके यहां बुलेट ट्रेन को लेकर इतना बवाल क्यों मचा हुआ है.
भई, कोई चीज़ आ ही रही है, जा तो नहीं रही. रही बात कि इसके बदले भविष्य में जापान को बोटी का बकरा कौन देगा तो इसके लिए अगली पीढ़ियां हैं न!
क्या आप चाहते हैं कि वो बिल्कुल निखट्टू रहें और पिछला कर्ज़ तक न चुका सकें.
वैसे हम उपमहाद्वीप में रहने वालों की आदत है कि उधार में सांप भी मिल जाए तो हम इनकार नहीं करते हैं और ये तो फिर बुलेट ट्रेन है और जिसके बारे में कहा जा रहा है कि यही वो ट्रेन है जिसमें बैठकर भारत इक्कीसवीं सदी में फ़र्राटे भरेगा.
यहां हमें ये समझाया जा रहा है कि एक बार चीन और पाकिस्तान का इकनॉमिक कॉरिडोर बन जाए तो हम सब शहद पियेंगे और दूध की नहरों में नहाएंगे.

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वापसी की चिंता नहीं
जब कोई कहता है कि कॉरिडोर के नाम पर कर्ज़े की जो माला गले में पड़ने वाली है, उसे कौन उतारेगा. तो जवाब मिलता है कि क्या आपको अपनी सलाहियत, ऊपर वाले के करम और देश के सुनहरे भविष्य पर बिल्कुल भी भरोसा नहीं है.
वैसे हमने अपने बचपन से लेकर अबतक कर्ज़ा आते तो देखा है पर जाते नहीं देखा. उल्टा ये बताया जाता है कि देखो हम कितने अहम देशों में शामिल हैं कि लोग खुद आते हैं हमें कर्ज़ देने के लिए.
नहीं क्षमता होगी तो नहीं वापस करेंगे और कर्ज़ लेना ही हो तो कोई बड़ा वाला लो ताकि देने वाला ये सोच सोच कर हलकान होता रहे कि पता नहीं वापस भी मिलेगा या नहीं.
ब्राज़ील के ऊपर 80 के दशक में 120 अरब और मैक्सिको पर 80 अरब डॉलर का कर्ज़ था. एक दिन उन्होंने कह दिया कि भई हम वापस नहीं कर सकते.
तो क्या अब मैक्सिको और ब्राज़ील अब दुनिया के नक्शे पर नहीं रहे या उनकी कोई इज़्ज़त घट गई.
बल्कि कर्ज़ देने वालों ने उन्हें और कर्ज़ दे दिया ताकि वे पिछले कर्ज़ का ब्याज चुका सकें.
अच्छे कर्ज़ देने वालों को इस बात में कोई दिलचस्पी नहीं होती कि उन्हें कब वापस मिलेगा.

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कर्ज़ नहीं, आमदनी कहें
उन्हें तो रक़म से ज़्यादा सूद प्यारा होता है. भला कौन सूदखोर होगा जो एकदम से किसी का सारा खून चूस कर उसे मार डाले और अपनी पूरी रक़म डूबो दे.
बस हर साल हाल ब्याज़ के इंजेक्शन से जनता के जिस्म से थोड़ा-सा खून खींचा और बाजू सहला दिया.
इससे ज़्यादा खून तो आपसी सिर फुटौव्वल में ही ज़ाया हो जाता है.
मैं तो आर्थिक कॉरिडोर के विरोधियों को भी समझता हूं कि ये वक़्त शोर मचाने का नहीं, चुप रहने का है.
एक बार कॉरिडोर बन गया और हम उसके पैसे वापिस नहीं कर सके तो फिर कोई सड़क उखाड़ के थोड़े ही ले जाएगा.
आख़िर ईस्ट इंडिया कंपनी भी तो दफ़ा हुई कि नहीं?
वैसे भी हम जैसों के लिए कर्ज़ कर्ज़ थोड़े ही होता है, ये तो आमदनी है. चाहो तो जनता के काम के लिए लगा दो, वरना हलवाई की दुकान समझ कर दादाजी का फ़ातेहा करवा लो.

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यही मशवरा बुलेट ट्रेन के विरोधियों के लिए भी है.
अव्वल तो कोई देश, इतने बड़े देश से कर्ज़ वापस मांग कर उसे नाराज़ नहीं करेगा और फिर भी बाज़ न आए तो ऐसे ढीठ को फ़ैज़ साहब की ये नज़्म सुना देना, तो वापस मुड़ के भी नहीं देखेगा-
हम ख़्स्तातनों से मुहतसिबो, क्या माल मनाल का पूछते हो
जो उम्र से हमने भर पाया, सब लाकर दिखाए देते हैं.
दामन में है मुश्ते ख़ाक़े ज़िगर, सागर में है ख़ूने हसरते मैं
लो हमने दामन झाड़ दिया, लो जाम उल्टाए देते हैं
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