तमिलनाडु: विजय की पार्टी टीवीके को लेकर कौन से सवाल उठाए जा रहे हैं?

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- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए
- पढ़ने का समय: 6 मिनट
एक्टर विजय की नई बनी पार्टी तमिलगा वेत्री कड़गम (टीवीके) 234 सदस्यीय विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है.
यह पहली बार नहीं है जब तमिलनाडु की जनता ने ऐसा जनादेश दिया हो, जिसमें सबसे बड़ी पार्टी अपने दम पर बहुमत हासिल नहीं कर सकी हो.
दरअसल, ठीक 20 साल पहले द्रविड़ मुनेत्र कणगम (डीएमके) को टीवीके से भी कम सीटें मिली थीं.
तब डीएमके ने केवल 96 सीटें जीती थीं, जबकि इस बार टीवीके को उससे कहीं ज़्यादा सीटें मिली हैं.
लेकिन तब डीएमके को 34 सदस्यीय कांग्रेस के बाहरी समर्थन के साथ-साथ दो कम्युनिस्ट पार्टियों, नौ सदस्यों वाली सीपीएम और छह सदस्यों वाली सीपीआई और 18 सदस्यीय पीएमके का भी समर्थन हासिल था.
दूसरी ओर, टीवीके ने 108 सीटें जीती हैं. हालांकि यह संख्या बाद में 107 हो जाएगी, क्योंकि टीवीके प्रमुख जोसेफ़ विजय दो सीटों से चुने गए हैं और उन्हें एक सीट छोड़नी पड़ेगी.
टीवीके को पांच सदस्यीय कांग्रेस का समर्थन मिला है. इस तरह इसकी कुल संख्या 112 तक पहुंचती है.
टीवीके पर सवाल क्यों?

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234 सदस्यीय सदन में साधारण बहुमत के लिए 118 विधायकों का समर्थन ज़रूरी है. राजनीतिक रूप से आंकड़ों के आधार पर पलड़ा टीवीके के पक्ष में झुका लगता है. लेकिन अभी का राजनीतिक माहौल ज़्यादा अस्थिर दिखाई पड़ता है.
इसकी वजह यह है कि 2006 में मुख्यमंत्री पद पर एम करुणानिधि के पास लंबा राजनीतिक अनुभव था, जबकि विजय राजनीति में अपेक्षाकृत नए हैं. यह भी उल्लेखनीय है कि उस समय विपक्ष में एआईएडीएमके की नेता जे जयललिता थीं.
राजनीतिक विश्लेषक डॉक्टर सुमंत सी रमन ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "यह स्थिर सरकार नहीं होगी. मैं इसे सिर्फ़ सेमीफ़ाइनल मानता हूं. यह कितने समय तक चलेगी, कहना मुश्किल है. शायद दो साल, उसके बाद नई सरकार आ सकती है."
टीवीके के सामने दो बड़ी बाधाएं हैं. पहली, छोटी पार्टियां- जैसे वीसीके (दो विधायक), सीपीएम (दो विधायक), सीपीआई (दो विधायक), एएमएमके (एक विधायक) और पीएमके (चार विधायक), अभी तक औपचारिक तौर पर अपना रुख़ साफ़ नहीं किया है और उनमें से कुछ को वैचारिक मतभेद भी सुलझाने हैं.
पीएमके, एआईएडीएमके के नेतृत्व वाले एनडीए का हिस्सा रही है, जबकि वीसीके और दोनों कम्युनिस्ट पार्टियां डीएमके के नेतृत्व वाले गठबंधन में शामिल हैं.
इन पार्टियों का औपचारिक फ़ैसला इसलिए भी अहम है क्योंकि राज्यपाल राजेंद्र अर्लेकर के रुख़ से लग रहा है कि सत्तारूढ़ दल और राजभवन के बीच भविष्य में दिक़्क़तें पेश आ सकती हैं.
राज्यपाल के फ़ैसले की चर्चा

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एक असामान्य क़दम उठाते हुए राज्यपाल अर्लेकर ने उन पार्टियों से लिखित समर्थन पत्र मांगा है, जिन्होंने विजय के समर्थन मांगने पर टीवीके नेतृत्व से बातचीत की थी. उनका यह रुख़ सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ के एसआर बोम्मई केस के फ़ैसले के विपरीत माना जा रहा है.
उस फ़ैसले में कहा गया था कि सरकार के बहुमत की जांच केवल विधानसभा के पटल पर हो सकती है, राजभवन में नहीं.
इस ऐतिहासिक फ़ैसले के बाद से राज्यपाल आम तौर पर सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करते रहे हैं और सदन में विश्वास मत के लिए तारीख तय करते हैं.
एसआर बोम्मई केस के मुताबिक़ सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करने का सबसे शुरुआती इस्तेमाल साल 1996 और 1998 में हुआ था, जब अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी.
राजनीतिक टिप्पणीकार आज़ली सेंथिलनाथ ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "राज्यपाल को सबसे बड़ी पार्टी को विधानसभा में बहुमत साबित करने का मौका देना चाहिए था, खासकर तब जब न डीएमके और न ही एआईएडीएमके ने सरकार बनाने का दावा पेश किया है."
हालांकि सेंथिलनाथ को भरोसा है कि छोटी पार्टियां अपनी आंतरिक प्रक्रियाएं-जैसे कार्यकारिणी और राज्य समितियों से सलाह करने के बाद अपना रुख़ साफ़ करेंगी.
उन्होंने कहा, "कम्युनिस्ट पार्टियां सरकार में शामिल न हों, लेकिन बीजेपी को इस स्थिति का फ़ायदा उठाने से रोकने के लिए वे किसी न किसी रूप में टीवीके का समर्थन करेंगी. यह सही है कि उनकी डीएमके नेता एमके स्टालिन से बैठक हुई थी. अगले दो दिनों में स्थिति साफ हो जाएगी."
डीएमके क्यों हारी?

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डीएमके की हार के कारणों का विश्लेषण करते हुए सेंथिलनाथ एक दिलचस्प तथ्य बताते हैं.
डीएमके ने शासन के पांच साल पूरे करने के बाद अगले चुनाव में भी जीत हासिल की हो, ऐसा दो बार ही हुआ है. पहली बार 1967 में, जब सीएन अन्नादुरई मुख्यमंत्री बने थे. दूसरी बार 1971 में, जब करुणानिधि मुख्यमंत्री बने.
इसके अलावा डीएमके ने 2021 का विधानसभा चुनाव जीता था और 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव में शानदार प्रदर्शन किया था.
सेंथिलनाथ ने कहा, "पिछले दो साल में ऐसा क्या हुआ? ज्यादा कुछ नहीं, सिवाय इसके कि बीजेपी के साथ गठबंधन के कारण एआईएडीएमके और कमज़ोर हो गई, जिसे तमिलनाडु के लोग पसंद नहीं करते. ऐसे में सामाजिक स्तर पर एक तरह का पुनर्संतुलन होता है."
उन्होंने आगे कहा, "सामान्यतः एआईएडीएमके डीएमके की जगह लेती है. लेकिन इस बार एआईएडीएमके की कमज़ोरी के कारण टीवीके उभरकर सामने आई. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि डीएमके अपनी हार से उतनी ही हैरान है, जितनी टीवीके अपनी जीत से. विजय ने सत्ता में आने के लिए सभी ज़रूरी पहलुओं पर सही काम किया."
संक्षेप में कहें तो लोगों ने टीवीके जैसी नई पार्टी को जनादेश तो दिया, लेकिन इतनी मज़बूती से नहीं कि वह आराम से सत्ता में आ सके. और यहीं पर उसकी परीक्षा होगी कि वो शासन को चलाने के साथ-साथ राजनीति करने में कैसे संतुलन बनाती है.
एक वरिष्ठ पत्रकार ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, "ऐसी परिस्थितियों से निपटना किसी नई पार्टी के लिए आसान नहीं होता. इसके लिए राजनीतिक कौशल चाहिए. इसमें कोई संदेह नहीं कि विजय और उनकी टीम में फ़िलहाल वह कौशल नजर नहीं आता."
"कम-से-कम अब तक जो दिखा है उससे तो यही लगता है. सोशल मीडिया के ज़रिए युवाओं और बुजुर्गों से असाधारण जुड़ाव बनाकर चुनाव जीतना एक बात है, लेकिन सत्ता के खेल का सामना करना और उसे खेलना बिल्कुल दूसरी बात है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.



































