मोहम्मद अली जिन्ना पर 14 अगस्त 1947 को क्या हमले की साज़िश थी

मोहम्मद अली जिन्ना

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    • Author, रेहान फ़ज़ल
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी

पाकिस्तान की आज़ादी से सात दिन पहले मोहम्मद अली जिन्ना ने अपनी बहन फ़ातिमा के साथ केडी सी-3 डकोटा विमान में दिल्ली से कराची के लिए उड़ान भरी थी.

उस समय उन्होंने ऐसा लिबास पहन रखा था जो उन्होंने कानून की पढ़ाई के लिए लंदन रवाना होने से पहले कभी नहीं पहना था, घुटनों तक लंबी चुस्त शेरवानी, कसा हुआ चूड़ीदार पायजामा और बिना फ़ीतों का लोफ़र जूता.

विमान की सीढ़ियों के ऊपर पहुंच कर जिन्ना ने दिल्ली के धूल भरे आसमान को अंतिम बार देखा और धीमे से बुदबुदाए, ‘मैं शायद दिल्ली को आख़िरी बार देख रहा हूँ.’

कराची उड़ने से पहले उन्होंने अपना 10 औरंगज़ेब रोड वाला घर हिंदू उद्योगपति सेठ रामकृष्ण डालमिया को तीन लाख रुपए में बेच दिया था.

कुछ घंटों बाद जिस जगह बरसों से मुस्लिम लीग का हरा और सफ़ेद झंडा फहराया जाता था, वहीं गोरक्षाा संघ का झंडा फहराया जाने वाला था.

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डोमिनीक लापिएर और लैरी कॉलिन्स अपनी किताब ‘फ़्रीडम एट मिडनाइट’ में लिखते हैं, "जिन्ना केे एडीसी सैयद अहसन ने हमें बताया था कि विमान की कुछ सीढ़ियाँ चढ़ने में जिन्ना पर इतना ज़ोर पड़ा कि वो हाँफते हुए अपनी सीट पर लगभग गिर पड़े."

"अंग्रेज़ पायलट ने विमान का इंजन चालू किया और जिन्ना शून्य में ताकते रहे. बिना किसी को संबोधित करते हुए वो फुसफुसाते हुए बड़बड़ाए, ‘कहानी ख़त्म हो गई.’

'फ़्रीडम एट मिडनाइट' किताब

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मोहम्मद अली जिन्ना ने 17 अगस्त 1947 को पाकिस्तान के गवर्नर जनरल की शपथ ली.

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कराची में जिन्ना का अभूतपूर्व स्वागत

जब विमान कराची के ऊपर पहुंचा तो जिन्ना के एडीसी सैयद अहसन ने खिड़की से नीचे झाँक कर देखा. नीचे विशाल रेगिस्तान था जिसके बीच बीच में रेत की छोटे-छोटे टीले उभरे हुए थे. धीरे-धीरे अपार जन समूह एक सफ़ेद समुद्र का रूप धारण करता जा रहा था.

जिन्ना की बहन ने भावावेश में जिन्ना का हाथ पकड़ कर कहा, ‘वो देखो.’ जब विमान नीचे उतर कर रुका तब तक जिन्ना थककर इतने चूर हो चुके थे कि बड़ी मुश्किल से अपनी सीट से उठ पाए.

उनके एडीसी ने उन्हें सहारा देने की कोशिश की लेकिन जिन्ना ने उनकी मदद लेने से मना कर दिया. वो किसी दूसरे आदमी के हाथ का सहारा लेकर अपने बनाए नए मुल्क की ज़मीन पर क़दम रखने के लिए तैयार नहीं थे.

हवाई अड्डे पर उनके हज़ारों प्रशंसक उनका इंतज़ार कर रहे थे. उस समय हालत ये थी कि भारत से आए शरणार्थियों के कारण कराची की आबादी कुछ ही महीनों में दोगुनी हो गई थी.

जिन्ना ऑफ़ पाकिस्तान

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स्टेनली वोलपर्ट अपनी किताब ‘जिन्ना ऑफ़ पाकिस्तान’ में लिखते हैं, ‘हवाई अड्डे से सरकारी आवास की तरफ़ जाते हुए सड़क के दोनों तरफ़ हज़ारों लोगों ने जिन्ना के स्वागत में नारे लगाए. पहले इस सरकारी घर में सिंध के गवर्नर रहते थे और अब वो जिन्ना का आख़िरी बंगला बनने जा रहा था."

विक्टोरियन स्टाइल में बनी इस सफ़ेद इमारत की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए जिन्ना ने अपने एडीसी से कहा, ''तुम्हें पता नहीं होगा कि मैंने इस ज़िंदगी में पाकिस्तान बनते देखने की उम्मीद नहीं की थी. इस मंज़िल पर पहुंचने के लिए हमें ख़ुदा का बहुत-बहुत शुक्रगुज़ार होना चाहिए.’’

पाकिस्तान के पहले गवर्नर जनरल बनने के बाद मोहम्मद अली जिन्ना ने भाषण दिया.

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अल्पसंख्यकों को दिलाया भरोसा

11 अगस्त को पाकिस्तान की संविधान सभा पहली बार बैठी और उसने सर्वसम्मति से उनको अपना अध्यक्ष चुना.

उन्होंने अपना भाषण देना शुरू किया. बोलते बोलते अचानक ऐसा लगा कि जैसे किसी स्वप्नलोक में चले गए हों. लगता था कि रातों-रात हिंदू मुस्लिम एकता के दूत बन गए, जैसा कि सरोजिनी नायडू उन्हें कहती थीं.

जिन्ना बिना पढ़े बोलते चले जा रहे थे, “आप लोग अपने मंदिरों में जाने के लिए आज़ाद हैं. आप लोग अपनी मस्जिदों में या पाकिस्तान के किसी भी दूसरे पूजा स्थल पर जाने के लिए आज़ाद हैं... आप किसी भी धर्म, जाति या मज़हब के हों, उसका हुकूमत चलाने से कोई ताल्लुक नहीं है."

"हम उस दौर की शुरुआत कर रहे हैं जहाँ न कोई भेदभाव होगा और न ही दो समुदायों के प्रति कोई फ़र्क किया जाएगा. हमारी शुरुआत इस बुनियादी उसूल से की जा रही है कि हम एक राज्य के समान नागरिक हैं.”

कराची के गवर्नमेंट हाउस के लॉान में मोहम्मद अली जिन्ना ने अपनी बहन फ़ातिमा की यह तस्वीर उनके 72वें जन्मदिन पर ली गई थी.

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इमेज कैप्शन, कराची के गवर्नमेंट हाउस के लॉन में मोहम्मद अली जिन्ना अपनी बहन फ़ातिमा के साथ.

पाकिस्तान में इस भाषण को पसंद नहीं किया गया

उनका ये भाषण सुनकर मुस्लिम लीग के हल्कों में सन्नाटा छा गया.

ख़ालिद अहमद ने अपनी किताब ‘पाकिस्तान बिहाइंड द आइडिलॉजिकल मास्क’ में लिखा, “आने वाले दिनों में इस भाषण को किसी भी सरकारी प्रकाशन में जगह नहीं दी गई. बाद में पाकिस्तान के राष्ट्रपति बने जनरल ज़िया-उल-हक़ ने कुछ इतिहासकारों को इस मुहिम में लगाया कि वो कहें कि जब जिन्ना ने ये भाषण दिया था तो वो अपने होशोहवास में नहीं थे.”

इसी भाषण की तारीफ़ करने की बड़ी राजनीतिक कीमत भारतीय जनता पार्टी के नेता लाल कृष्ण आडवाणी को चुकानी पड़ी थी.

ख़ालिद अहमद आगे लिखते हैं, “जिन्ना की बेटी दीना वाडिया उस समय न्यूयॉर्क में रह रही थीं, उनसे संपर्क कर जिन्ना के खान-पान की आदतों पर स्पष्टीकरण देने के लिए कहा गया था."

"मसलन ये कि वो शराब नहीं पीते थे और उन्होंने कभी सूअर का माँस नहीं खाया था, लेकिन जिन्ना की बेटी ने ऐसा करने से इनकार कर दिया था.”

लॉर्ड माउंटबेटन के साथ जिन्ना

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माउंटबेटन दंपत्ति के सम्मान में भोज

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मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.

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समाप्त

जब 13 अगस्त, 1947 को माउंटबेटन जिन्ना को गवर्नर जनरल पद की शपथ दिलाने कराची पहुंचे तो जिन्ना उन्हें लेने हवाई-अड्डे पर मौजूद नहीं थे. उन्होंने ये ज़िम्मेदारी सिंध के गवर्नर सर ग़ुलाम हुसैन हिदायतउल्लाह और अपने एडीसी सैयद अहसन को सौंप दी थी.

जिन्ना ने दिल्ली से आए मेहमानों का इंतज़ार अपने सरकारी आवास के प्रवेश द्वार से जुड़े हॉल में किया. रात में जिन्ना ने माउंटबेटन दंपत्ति के सम्मान में भोज दिया.

इस भोज में जिन्ना अजीब तरीके से ‘कटे-कटे’ से रहे. भोज के दौरान माउंटबेटन फ़ातिमा जिन्ना और बेगम लियाकत अली के बीच बैठे हुए थे.

माउंटबेटन लिखते हैं, “वो दोनों अगले दिन दिल्ली में आधी रात को होने वाले समारोह के बारे में यह कहकर मेरी खिंचाई कर रही थीं कि किसी ज़िम्मेदार सरकार का ज्योतिषियों के निकाले मुहूर्त पर चलना कितना अजीब है."

"मैं उन्हें ये जवाब देते-देते रह गया कि कराची होने में होने वाले भोज का समय भी तो इसीलिए बदला गया है कि जिन्ना को याद ही नहीं था कि आजकल रमज़ान चल रहा है, वरना वो तो दोपहर का भोज देना चाहते थे जिसे उन्होंने आख़िरी समय पर रात्रि भोज में बदल दिया था.”

जिन्ना

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जिन्ना की कुर्सी ऊँची रखने पर विवाद

शपथ ग्रहण समारोह में जिन्ना ने ज़ोर दिया कि उनकी कुर्सी माउंटबेटन की कुर्सी से ऊँची होनी चाहिए क्योंकि वो पाकिस्तान के गवर्नर जनरल और पाकिस्तान की संविधान सभा के अध्यक्ष थे.

ख़ान अब्दुल वली ख़ाँ अपनी किताब ‘फ़ैक्ट्स आर फ़ैक्ट्स’ में लिखते हैं, “जिन्ना की इस फ़रमाइश से अंग्रेज़ों को काफ़ी हैरानी हुई और उन्हें ये स्पष्ट करना पड़ा कि जिन्ना गवर्नर जनरल का पद तभी सँभालेंगे जब माउंटबेटन उन्हें इस पद की शपथ दिलाएंगे."

"जब तक ये नहीं होता और सारी ताकत उन्हें हस्तांतरित नहीं होती, जिन्ना का कोई आधिकारिक पद नहीं है. जिन्ना ने बहुत मुश्किल से अंग्रेज़ों का ये तर्क माना था.

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जिन्ना के शपथ ग्रहण समारोह में बड़ी संख्या में लोग जुटे थे.

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जिन्ना की हत्या के प्रयास की ख़ुफ़िया रिपोर्ट

इस बीच सीआईडी की ख़बर आई कि शपथ ग्रहण समारोह में जाते या आते समय कुछ लोग जिन्ना पर बम फेंककर उनकी हत्या करने की कोशिश करेंगे.

सीआईडी अधिकारी ने माउंटबेटन को बताया, जिन्ना खुली कार में जाने के लिए ज़ोर दे रहे हैं. आप बहुत धीमी गति से आगे बढ़ेंगे. हमारे पास आपको बचाने के साधन बहुत सीमित हैं. आप जिन्ना से जुलूस में जाने का विचार त्यागने का अनुरोध करिए. लेकिन जिन्ना ने माउंटबेटन की बात नहीं मानी.

उनका कहना था कि कराची की सड़कों पर बंद कार में जाना कायरता की निशानी माना जाएगा. वो इस तरह का काम कर नए राष्ट्र के उदय को नीचा नहीं दिखाएंगे. जिन्ना को संविधान सभा के हॉल तक एक ऐसे रास्ते से ले जाया गया जिस पर काफ़ी पहरा था.

शपथ ग्रहण समारोह में नौसेना की सफ़ेद वर्दी पहने माउंटबेटन की बग़ल में जिन्ना बैठे. माउंटबेटन ने अपने भाषण में ब्रिटेन के राजा की तरफ़ से नए राष्ट्र को बधाई दी.

जिन्ना ने कहा, ‘पाकिस्तान की संविधान सभा और अपनी तरफ़ से हिज़ मेजेस्टी का शुक्रिया अदा करता हूँ. हम दोस्तों की तरह विदा ले रहे हैं.’

कैंपबेल जॉन्सन अपनी किताब ‘माउंटबेटन’ में लिखते हैं, “जैसे ही जिन्ना अपना संबोधन पूरा करके बैठे एडविना ने फ़ातिमा जिन्ना का हाथ स्नेह से दबाया. जिन्ना की शख़्सियत में एक ठंडापन और दूरी ज़रूर थी, पर उसमें एक आकर्षण भी था.“

3 जून 1947 को विभाजन को लेकर बुलाई गई बैठक में माउंटबेटन के साथ जिन्ना (दाएं) और जवाहर लाल नेहरू.

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माउंटबेटन और जिन्ना के बीच तनाव

जब जिन्ना और माउंटबेटन साथ-साथ चलते हुए एसेंबली हॉल के बाहर आए तो एक काले रंग की रॉल्स रॉयस उनका इंतज़ार कर रही थी.

माउंटबेटन का मानना था कि अगर जिन्ना को मारने की कोशिश हुई तो वो उस समय ही होगी जब वो खुली गाड़ी में सरकारी आवास पर लौट रहे होंगे.

माउंटबेटन ने लिखा, “मुझे लगा कि जिन्ना को बचाने का सबसे अच्छा तरीका यही हो सकता था कि मैं एक ही गाड़ी में उनके साथ जाने का आग्रह करूँ. मुझे पता था कि भीड़ में कोई शख़्स मुझ पर गोली चलाने या बम फेंकने की हिम्मत नहीं करेगा.”

डोमिनीक लापिएर और लैरी कॉलिंस लिखते हैं, “कार रेंगती हुई चल रही थी. सड़क के दोनों ओर छतों पर खड़े लोग पाकिस्तान, जिन्ना और माउंटबेटन ज़िंदाबाद के नारे लगा रहे थे. माउंटबेटन को याद आया कि एक बार बंगाल के गवर्नर के सैनिक सचिव ने उन पर फेंके गए बम को कैच कर वापस हत्यारे के ऊपर फेंक दिया था. लेकिन फिर उन्हें ये भी ख़्याल आया कि उन्हें तो क्रिकेट की गेंद कैच करनी भी नहीं आती.”

जिन्ना और माउंटबेटन

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माउंटबेटन और जिन्ना में नोकझोंक

कार में बैठे जिन्ना और माउंटबेटन अपनी परेशानी को मुस्कराहट से छिपाने की कोशिश कर रहे थे. वो इतने तनाव में थे कि इस पूरी ड्राइव के दौरान उन्होंने एक दूसरे से एक शब्द भी नहीं कहा था.

डोमीनिक लापिएर और लैरी कॉलिंस आगे लिखते हैं, “जैसे ही कार अपने गंतव्य पर रुकी जिन्ना पहली बार सहज नज़र आए. आदत के विपरीत पहली बार उनके चेहरे पर एक मुस्कान आई. उन्होंने माउंटबेटन के घुटनों को थपथपाते हुए कहा, ‘ख़ुदा का शुक्र मैं आपको ज़िंदा बचा ले आया.”

माउंटबेटन का जवाब था, “जाने भी दीजिए, आप नहीं मैं आपको यहाँ ज़िंदा ले कर आया हूँ.’’

जिन्ना अंतिम साँस तक ये मानते रहे कि पाकिस्तान उनके बिना नहीं बन सकता था. एक बार बाद में पाकिस्तान के राष्ट्रपति बने इसकंदर मिर्ज़ा ने उनसे कहा था, ‘हमें मुस्लिम लीग का ख़्याल रखना चाहिए, आख़िर उन्होंने हमें पाकिस्तान दिया.’

जिन्ना ने उत्तेजित होकर जवाब दिया था, ‘आपको किसने बताया कि मुस्लिम लीग ने हमें पाकिस्तान दिया? मैं पाकिस्तान को अस्तित्व में लाया- अपने स्टेनोग्राफ़र की मदद से.’

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