क्रिकेटर जो भारत और पाक दोनों ओर से खेला

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- Author, कनिष्क थरूर और मरियम मारूफ़
- पदनाम, म्यूज़ियम ऑफ़ लॉस्ट ऑब्जेक्ट्स, बीबीसी
भारत में क्रिकेट एक धर्म है. पड़ोसी देश पाकिस्तान में भी क्रिकेट को लेकर ज़बरदस्त जुनून है. दोनों देशों की टीमें जब भी मैदान में एक-दूसरे से मुक़ाबिल होती हैं, तो माहौल में ज़बरदस्त गर्मी आ जाती है. राष्ट्रवाद उफ़ान मारता है. मैच में जीत और हार मानो दो देशों के बीच जीत और हार हो जाती है.
सोचिए, अब से 75 साल पहले कैसा रहा होगा?
75 साल पहले इसलिए क्योंकि तब पाकिस्तान नहीं था. जो इलाक़े आज पाकिस्तान बनाते हैं, वो भारत का हिस्सा थे. तब सिर्फ़ एक क्रिकेट टीम हुआ करती थी. भारत की.
भारत ने 1932 में ही टेस्ट क्रिकेट खेलना शुरू कर दिया था. तीस के दशक में भारतीय क्रिकेट टीम ने इंग्लैंड से उसके मैदान पर और घरेलू मैदानों पर कई टेस्ट सीरीज़ खेली थीं. हालांकि भारत कोई मैच जीत नहीं सका था.
हालात तब बदले जब देश का बंटवारा हो गया. जो टीम कभी एक हुआ करती थी, वो दो हिस्सों में बंट गई. भारतीय टीम के कई खिलाड़ी पाकिस्तान चले गए. जो खिलाड़ी कभी साथ खेला करते थे वो एक दूसरे के प्रतिद्वंदी बन गए.
ऐसे ही एक खिलाड़ी थे अमीर इलाही. वो बड़ौदा की टीम की तरफ़ से खेला करते थे. उस दौर में बड़ौदा की टीम ही कमोबेश भारत की क्रिकेट टीम थी.
बंटवारे के बाद पाकिस्तान चले गए इलाही

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मगर जब देश का बंटवारा हुआ, तो आमिर इलाही ने पाकिस्तान जाने का फ़ैसला किया. वो अपने परिवार के साथ पाकिस्तान चले गए.
अब आमिर तो अपने नए देश चले गए थे. मगर उनकी पुरानी टीम उनसे जुदा हो गई. बाद में भारत और पाकिस्तान ने अपनी-अपनी अलग टीमें बनाईं.
अमीर इलाही के पोते मनन अहमद इन दिनों अमरीका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी में पढ़ाते हैं. उनसे बीबीसी के लिए कनिष्क थरूर ने बात की.
मनन ने बताया कि उनके दादा आमिर इलाही बहुत बड़े क्रिकेटर नहीं थे. न ही उन्होंने खेल के मैदान में कामयाबी के बड़े झंडे गाड़े थे. वो औसत खिलाड़ी थे. जो थोड़ी बहुत गेंदबाज़ी कर लेते थे और मौक़ा लगने पर बल्लेबाज़ी भी कर लेते थे. कुल मिलाकर वो टीम के एक खिलाड़ी भर थे.
लेकिन मनन के मुताबिक़ आमिर इलाही पाकिस्तान के कट्टर समर्थक थे. इसीलिए जब देश का विभाजन हुआ तो वो अपनी टीम को छोड़कर पाकिस्तान चले गए. बाद में वो पाकिस्तान की टीम में भी चुने गए.
अमीर इलाही का प्रदर्शन
1953 में पाकिस्तान की टीम पहली बार पाकिस्तान के दौरे पर आई थी. अमीर इलाही भी इस दौरे पर आए थे. यहां उन्हें उनकी टीम के पुराने साथी मिले. तमाम यादें ताज़ा हो गईं. मगर पाकिस्तान की टीम के इस पहले भारतीय दौरे मे भी अपने-अपने देश के लिए जीत का जज़्बा ज़बरदस्त था.
मनन अहमद बताते हैं कि अमीर इलाही भी चाहते थे कि पहले दौरे में पाकिस्तान की टीम भारत की क्रिकेट टीम को मात दे. हालांकि ऐसा हो न सका. वो दौरा भारत के नाम रहा. ख़ुद अमीर इलाही का प्रदर्शन भी कोई ख़ास नहीं रहा था.

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बाद के दिनों में भी अमीर इलाही की कोशिश थी कि वो अपने देश में क्रिकेट के लिए कुछ कर सकें.
मनन अपने बचपन के दिनों को याद करके बताते हैं कि जब उन्होंने क्रिकेट खेलना शुरू किया, तो उनकी दादी ने दादा की किट उन्हें खेलने के लिए दी. हालांकि मनन ने उसे इस्तेमाल नहीं किया.
हां, मनन अहमद ने अपने दादा अमीर इलाही का स्वेटर ज़रूर पहना था. वो उस दिन को याद करके बताते हैं कि दादा का स्वेटर पहनकर उन्हें बहुत अच्छा एहसास हुआ था. उन्हें यूं लगा था कि टीम के सबसे अच्छे खिलाड़ी वही हैं.
ना म्यूज़ियम बना और ना सामान मिला
अमीर इलाही ने अपने क्रिकेट खेलने का सामान बहुत सहेजकर रखा हुआ था. मनन बताते हैं कि एक बार एक आदमी उनके पास आया. उसने बताया कि वो लाहौर में क्रिकेट का म्यूज़ियम खोलने वाला है. ये बात सुनकर अमीर इलाही ने भी अपना बहुत सारा सामान उसे दे दिया. हालांकि वो शख़्स सारा सामान लेकर लापता हो गया. न म्यूज़ियम बना और न ही वो शख़्स फिर कभी नज़र आया.

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मनन कहते हैं कि शायद वो सामान ब्लैक मार्केट में बेच दिया गया होगा.
आजकल मनन अहमद अमरीका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी में पढ़ाते हैं. उनके ज़ेहन में अपने दादा की यादें आज भी ताज़ा हैं.
भारत और पाकिस्तान में बंटवारे के बाद क्रिकेट ने लंबा सफ़र तय कर लिया है. दोनों ही देशों ने क्रिकेट का वर्ल्ड कप जीता है. आपसी मुक़ाबले में भी कभी एक टीम भारी पड़ी तो कभी दूसरी.
मगर, ये सोचना आज भी दिलचस्प लगता है कि आज एक-दूसरे के दुश्मन माने जाने वाले खिलाड़ियों से पहले कभी दोनों देशो के खिलाड़ी एक ही देश और एक ही टीम के लिए खेला करते थे.
(इस कहानी को आप म्यूजियम ऑफ़ लॉस्ट म्यूजियम्स पर यहां क्लिक करके भी सुन सकते हैं.)
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