वो दिन जब 'पंडित माउंटबेटन' ने फहराया तिरंगा

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- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
14 अगस्त की शाम जैसे ही सूरज डूबा, दो संन्यासी एक कार में जवाहर लाल नेहरू के 17 यॉर्क रोड स्थित घर के सामने रुके. उनके हाथ में सफ़ेद सिल्क का पीतांबरम, तंजौर नदी का पवित्र पानी, भभूत और मद्रास के नटराज मंदिर में सुबह चढ़ाए गए उबले हुए चावल थे.
जैसे ही नेहरू को उनके बारे में पता चला, वो बाहर आए. उन्होंने नेहरू को पीतांबरम पहनाया, उन पर पवित्र पानी का छिड़काव किया और उनके माथे पर पवित्र भभूत लगाई. इस तरह की सारी रस्मों का नेहरू अपने पूरे जीवन विरोध करते आए थे लेकिन उस दिन उन्होंने मुस्कराते हुए संन्यासियों के हर अनुरोध को स्वीकार किया.
थोड़ी देर बाद अपने माथे पर लगी भभूत धो कर नेहरू, इंदिरा गांदी और पद्मजा नायडू के साथ खाने की मेज़ पर बैठे ही थे कि बगल के कमरे मे फ़ोन की घंटी बजी. लाइन इतनी ख़राब थी कि नेहरू ने फ़ोन कर रहे शख़्स से कहा कि उसने जो कुछ कहा उसे वो फिर से दोहराए.
लाहौर जल रहा था...
जब नेहरू ने फ़ोन रखा तो उनका चेहरा सफ़ेद हो चुका था. उनके मुँह से कुछ नहीं निकला और उन्होंने अपना चेहरा अपने हाथों से ढँक लिया. जब उन्होंने अपना हाथ चेहरे से हटाया तो उनकी आँखें आँसुओं से भरी हुई थीं.
उन्होंने इंदिरा को बताया कि वो फ़ोन लाहौर से आया था. वहाँ के नए प्रशासन ने हिंदू और सिख इलाकों की पानी की आपूर्ति काट दी थी. लोग प्यास से पागल हो रहे थे. जो औरतें और बच्चे पानी की तलाश में बाहर निकल रहे थे, उन्हें चुन चुन कर मारा जा रहा था.
फ़ोन करने वाले ने नेहरू को बताया कि लाहौर की गलियों में आग लगी हुई थी. नेहरू ने लगभग फुसफुसाते हुए कहा, "मैं आज कैसे देश को संबोधित कर पाऊंगा? मैं कैसे जता पाऊंगा कि मैं देश की आज़ादी पर ख़ुश हूँ, जबकि मुझे पता है कि मेरा लाहौर, मेरा ख़ूबसूरत लाहौर जल रहा है."
'ट्रिस्ट विद डेस्टिनी'
इंदिरा गाँधी ने अपने पिता को दिलासा देने की कोशिश की. उन्होंने कहा आप अपने भाषण पर ध्यान दीजिए जो आपको आज रात देश के सामने देना है. लेकिन नेहरू का मूड उखड़ चुका था.
नेहरू के सचिव रहे एम. ओ. मथाई अपनी किताब 'रेमिनिसेंसेज ऑफ़ नेहरू एज' में लिखते हैं कि नेहरू कई दिनों से अपने भाषण की तैयारी कर रहे थे. जब उनके पीए ने वो भाषण टाइप करके मथाई को दिया तो उन्होंने देखा कि नेहरू ने एक जगह 'डेट विद डेस्टिनी' मुहावरे का इस्तेमाल किया था.
मथाई ने रॉजेट का इंटरनेशनल शब्दकोश देखने के बाद उनसे कहा कि 'डेट' शब्द इस मौके के लिए सही शब्द नहीं है क्योंकि अमरीका में इसका आशय महिलाओं या लड़कियों के साथ घूमने के लिए किया जाता है.

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संसद का सेंट्रल हॉल
मथाई ने उन्हें सुझाव दिया कि वो डेट की जगह रान्डेवू (rendezvous ) या ट्रिस्ट (tryst) शब्द का इस्तेमाल करें. लेकिन उन्होंने उन्हें ये भी बताया कि रूज़वेल्ट ने युद्ध के दौरान दिए गए अपने भाषण में रान्डेवू शब्द का इस्तेमाल किया है.
नेहरू ने एक क्षण के लिए सोचा और अपने हाथ से टाइप किया हुआ डेट शब्द काट कर ट्रिस्ट लिखा. नेहरू के भाषण का वो आलेख अभी भी नेहरू म्यूज़ियम लाइब्रेरी में सुरक्षित है.
संसद के सेंट्रल हॉल में ठीक 11 बजकर 55 मिनट पर नेहरू की आवाज़ गूंजी, "बहुत सालों पहले हमने नियति से एक वादा किया था. अब वो समय आ पहुंचा है कि हम उस वादे को निभाएं... शायद पूरी तरह तो नहीं लेकिन बहुत हद तक ज़रूर. आधी रात के समय जब पूरी दुनिया सो रही है, भारत आज़ादी की सांस ले रहा है."

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संसद भवन के बाहर
जैसे ही घड़ी ने रात के बारह बजाए शंख बजने लगे. वहाँ मौजूद लोगों की आँखों से आंसू बह निकले और महात्मा गाँधी की जय के नारों से सेंट्रल हॉल गूंज गया.
सुचेता कृपलानी ने, जो साठ के दशक में उत्तर प्रदेश की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं, पहले अल्लामा इक़बाल का गीत 'सारे जहाँ से अच्छा हिंदोसताँ हमारा' गाया और फिर रबींद्रनाथ टैगोर का 'जनगण मन' और बंकिम चंद्र चैटर्जी का लिखा 'बंदे मातरम' गाया, जो बाद में भारत का राष्ट्रगीत बना.
संसद भवन के बाहर मूसलाधार बारिश में हज़ारों भारतीय इस बेला का इंतज़ार कर रहे थे. जैसे ही नेहरू संसद भवन से बाहर निकले मानो हर कोई उन्हें घेर लेना चाहता था.
डोमिनीक लापिएरे और लेरी कोलिंस अपनी किताब 'फ़्रीडम एट मिडनाइट' में लिखते हैं कि उसी समय नेहरू ने अपनी बगल में खड़े एक शख्स से कहा था, "दस साल पहले मेरी वॉयसराय लिथलिनगो से लंदन में कहासुनी हो गई थी. मैं इतना ग़ुस्से में था कि मैंने चिल्ला कर कहा था कि अगर अगले दस सालों में भारत को आज़ादी नहीं मिलती तो मैं बरबाद हो जाऊँ. इस पर लिथलिनगो का जवाब था, मिस्टर नेहरू, आपको आज़ादी नहीं मिलेगी. भारत मेरे जीवनकाल में तो आज़ाद होने से रहा. वो आपके जीवन काल में भी आज़ाद नहीं होगा."
लॉर्ड माउंटबेटन
साढ़े आठ बजे सुबह लार्ड माउंटबेटन को भारतीय मुख्य न्यायाधीश हरी लाल जयकिसुन दास केनिया ने गवर्नर जनरल की शपथ दिलाई. माउंटबेटन जब बाहर निकले तो लोगों का इतना अताह समुद्र था कि वहाँ मौजूद उनके 400 अंगरक्षक भी उनके लिए बाहर खड़ी बग्घी तक पहुंचने का रास्ता नहीं बना पाए.
आखिरकार नेहरू को संसद भवन की छत पर खड़े हो कर माउंटबेटन के लिए रास्ता छोड़ने की अपील करनी पड़ी. नेहरू का ये कहना भर था कि भीड़ ने माउंटेटन के लिए रास्ता बना दिया.
आधी रात के थोड़ी देर बाद जवाहरलाल नेहरू और राजेंद्र प्रसाद लॉर्ड माउंटबेटन को औपचारिक रूप से भारत के पहले गवर्नर जनरल बनने का न्योता देने आए. माउंटबेटन ने उनका अनुरोध स्वीकार कर लिया.

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भारत का तिरंगा
उन्होंने पोर्टवाइन की एक बोतल निकाली और अपने हाथों से अपने मेहमानों के गिलास भरे. फिर अपना गिलास भर कर उन्होंने अपना हाथ ऊँचा किया, 'टु इंडिया.'
एक घूंट लेने के बाद नेहरू ने माउंटबेटन की तरफ अपना गिलास कर कहा 'किंग जॉर्ज षष्टम के लिए.' नेहरू ने उन्हें एक लिफ़ाफ़ा दिया और कहा कि इसमें उन मंत्रियों के नाम हैं जिन्हें कल शपथ दिलाई जाएगी.
नेहरू और राजेंद्र प्रसाद के जाने के बाद जब माउंटबेटन ने लिफ़ाफ़ा खोला तो उनकी हंसी निकल गई क्योंकि वो खाली था. जल्दबाज़ी में नेहरू उसमें मंत्रियों के नाम वाला कागज़ रखना भूल गए थे.
अगले दिन दिल्ली की सड़कों पर लोगों का सैलाब उमड़ा पड़ा था. शाम पाँच बजे इंडिया गेट के पास प्रिंसेज़ पार्क में माउंटबेटन को भारत का तिरंगा झंडा फहराना था. उनके सलाहकारों का मानना था कि वहाँ करीब तीस हज़ार लोग आएंगे लेकिन वहाँ छह लाख लोग इकट्ठा थे.

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ऐतिहासिक मौका
भारत के इतिहास में तब तक कुंभ मेले को छोड़ कर एक जगह पर इतने लोग कभी नहीं एकत्रित हुए थे. माउंटबेटन की बग्घी के चारों ओर लोगों का इतना हुजूम था कि वो उससे नीचे उतरने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे.
उनकी 17 वर्षीय बेटी पामेला भी दो लोगों के साथ उस समारोह को देखने पहुंचीं थी. नेहरू ने पामेला को देखा और चिल्ला कर कहा कि वो लोगों के सिर पर चढ़ कर मंच पर पहुंचे.
पामेला भी चिल्लाई, "मैं ऐसा कैसे कर सकती हूँ. मैंने ऊंची एड़ी की सैंडल पहनी हुई है." नेहरू ने कहा सैंडल को हाथ में ले लो. पामेला इतने ऐतिहासिक मौके पर ये सब करने के बारे में सपने में भी नहीं सोच सकती थीं.

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भारत के अंतिम वॉयसराय
अपनी किताब 'इंडिया रिमेंबर्ड' में वो लिखती हैं, "मैंने अपने हाथ खड़े कर दिए. मैं सैंडल नहीं उतार सकती थी. नेहरू ने मेरा हाथ पकड़ा और कहा तुम सैंडल पहने-पहने ही लोगों के सिर के ऊपर पैर रखते हुए आगे बढ़ो. वो विल्कुल भी बुरा नहीं मानेंगे. मैंने कहा मेरी हील उन्हें चुभेगी. नेहरू फिर बोले बेवकूफ़ लड़की सैंडल को हाथ में लो और आगे बढ़ो."
पहले नेहरू लोगों के सिरों पर पैर रखते हुए मंच पर पहुंचे और फिर उनकी देखा देखी भारत के अंतिम वॉयसराय की लड़की ने भी अपने सैंडल को उतार कर हाथों में लिया और इंसानों के सिरों की कालीन पर पैर रखते हुए मंच तक पहुंच गईं. उधर अपनी बग्घी में कैद माउंटबेटन उससे नीचे ही नहीं उतर पा रहे थे.
उन्होंने वहीं से चिल्ला कर नेहरू से कहा, 'लेट्स होएस्ट द फ़्लैग.' वहाँ पर मौजूद बैंड के चारों तरफ़ इतने लोग जमा थे कि वो अपने हाथों तक को नहीं हिला पाए.

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नेहरू का इशारा
मंच पर मौजूद लोगों ने सौभाग्य से माउंटबेटन की आवाज़ सुन ली. नेहरू के इशारा करते ही तिंरंगा झंडा फ़्लैग पोस्ट के ऊपर गया. तोपों से गोले छूटने लगे और लाखों लोगों से घिरे माउंटबेटन ने 25 गज़ की दूरी से अपनी बग्घी पर ही खड़े-खड़े उसे सेल्यूट किया.
लोगों के मुंह से बेसाख़्ता आवाज़ निकली, 'माउंटबेटन की जय..... पंडित माउंटबेटन की जय !'
भारत के इतिहास में किसी दूसरे अंग्रेज़ को ये सौभाग्य नहीं प्राप्त हुआ था कि वो लोगों को इतनी शिद्दत के साथ ये नारा लगाते हुए सुने. यह माउंटबेटन की कामयाबी को भारत की जनता का समर्थन था. जैसे ही झंडा ऊपर गया उसके ठीक पीछे एक इंद्रधनुष उभर आया, मानो प्रकृति भी भारत की आज़ादी के दिन का स्वागत कर रही हो.

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गवर्नमेंट हाउस
अगले दिन माउंटबेटन के बेहद करीबी एलन कैंपबेल जॉन्सन ने उनके प्रेस अटाशे से हाथ मिलाते हुए कहा, 'आखिरकार दो सौ सालों के बाद ब्रिटेन ने भारत को जीत ही लिया !'
उस दिन पूरी दिल्ली में रोशनी की गई थी. कनॉट प्लेस और लाल किला हरे केसरिया और सफ़ेद रोशनी से नहाये हुए थे. रात को माउंटबेटन ने तब के गवर्नमेंट हाउस और आज के राष्ट्रपति भवन ने 2500 लोगों के लिए भोज दिया.
कनॉट प्लेस के सेंटर पार्क में बाद में हिंदी के जाने माने साहित्यकार बने करतार सिंह दुग्गल ने आज़ादी का बहाना ले कर अपनी माशूका आएशा अली का चुंबन लिया. करतार सिंह दुग्गल सिख थे और आएशा मुसलमान.
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