नेहरू खानदान कभी किसी के सामने नहीं रोता...

बीके नेहरू

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इमेज कैप्शन, जवाहरलाल नेहरू के चचेरे भाई बीके नेहरू और उनकी पत्नी फ़ोरी
    • Author, रेहान फ़ज़ल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

फ़ोरी नेहरू, नेहरू परिवार की सबसे बुज़ुर्ग जीवित महिला थीं. कसौली में 25 अप्रैल को जब उनका निधन हुआ तो उनकी उम्र थी 108 साल. फ़ोरी का जन्म पांच दिसंबर, 1908 को हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट में हुआ था.

इंग्लैंड में पढ़ाई के दौरान उनकी मुलाकात जवाहरलाल नेहरू के चचेरे भाई बीके नेहरू से हुई और दोनों ने विवाह सूत्र में बंध जाने का फ़ैसला किया.

1935 में वो बीके नेहरू से शादी करने भारत आईं तो उन्हें परिवार के मुखिया जवाहरलाल नेहरू से मिलने कोलकाता ले जाया गया जहाँ वो अलीगंज जेल में बंद थे.

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उस छोटी सी मुलाकात में फ़ोरी ने पाया कि जवाहरलाल उनकी उम्मीद से कहीं ज़्यादा शरीफ़, विनम्र, स्नेही और मनमोहक शख्स हैं और अंग्रेज़ों से भी ज़्यादा बड़े अंग्रेज़ हैं. जब मुलाकात का समय समाप्त हुआ और जेल का दरवाज़ा बंद किया जाने लगा, तो फ़ोरी अपने आँसू नहीं रोक पाईं.

जवाहरलाल की नज़र से ये छिपा नहीं रह सका. अगले ही दिन उन्होंने फ़ोरी को पत्र लिख कर कहा, 'अब जब तुम नेहरू परिवार का सदस्य बनने जा रही हो, तुम्हें परिवार के कायदे और क़ानून भी सीख लेने चाहिए.''

उन्होंने लिखा था, 'सबसे पहली चीज़ जिस पर तुम्हें ध्यान देना चाहिए वो ये है कि चाहे जितना बड़ा दुख हो, नेहरू कभी भी किसी के सामने नहीं रोते.'

फ़ोरी का असली नाम मेगडोलना फ़्रीडमान था. उनका परिवार यहूदी धर्म को मानता था और उनका बच्चों के खिलौने बेचने का व्यवसाय था.

जवाहरलाल नेहरू

बीके नेहरू से शादी करने के बाद उनकी महात्मा गांधी से मुलाकात हुई. जब उनकी सास एक बार उनको गांधी से मिलवाने ले गईं तो गांधी ने उनसे कहा कि अपनी बहू के ख़र्चों पर नज़र रखो. क्योंकि ये विदेशी महिलाएं बहुत ख़र्चीली होती है.

बीके नेहरू अपनी आत्मकथा 'नाइस गाइज़ फ़िनिश सेकेंड' में लिखते हैं, 'गाँधी ने मेरी होने वाली पत्नी से कहा कि शुरू से ही अपने पति की तन्ख़्वाह का एक हिस्सा धर्मार्थ कामों के लिए रखो.'

उन्होंने लिखा है, 'शादी के बाद वो बार-बार मेरी माँ से पूछते कि तुम्हारी बहू बहुत ज़्यादा ख़र्च तो नहीं करती और वो दान के लिए पैसे दे रही है या नही. दोनों ही विषयों में फ़ोरी ने उन्हे निराश नहीं किया.'

नेहरू

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आज़ादी के बाद फ़ोरी ने कई ज़िम्मेदारियाँ निभाईं. जिस दिन गाँधीजी का अंतिम संस्कार किया गया नेहरू ने फ़ोरी को ज़िम्मेदारी दी कि वो विदेशी मेहमानों को उस स्थान पर ले जाएं जहाँ गाँधी का पार्थिव शरीर रखा हुआ था.

उनको विभाजन के समय होने वाली हिंसा के शिकार लोगों के लिए बनाई गई इमरजेंसी कमेटी का सदस्य बनाया गया. उनका काम था उत्तरी भारत से पाकिस्तान जा रहे मुसलमानों के लिए ट्रेनो की व्यवस्था करना.

जवाहरलाल नेहरू

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एक दिन ख़बर आई कि जो ट्रेन उन्होंने रवाना की थी, उसके सभी यात्री मारे गए. इसका उनपर इतना असर हुआ कि अगले सात दिनों तक उन्होंने कोई ट्रेन पाकिस्तान नहीं भेजी.

विभाजन के बाद पश्चिमी पाकिस्तान से बहुत सी महिलाए शर्णार्थी दिल्ली आईं थीं जो बुनाई और कढ़ाई में निपुण थीं. नेहरू ने सोचा कि उनको रचनात्मक कामों में लगाया जाए.

फ़ोरी और कमलादेवी चटोपाध्याय ने मिल कर शरणार्थी महिला कल्याण संगठन की स्थापना की और उसके बाद अखिल भारतीय हेंडीक्राफ़्ट बोर्ड का जन्म हुआ.

इंदिरा गांधी

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60 के दशक में जब बीके नेहरू अमरीका में भारत के राजदूत थे तो प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी वहाँ के सरकारी दौरे पर गईं. उनके सम्मान में बीके और फ़ोरी द्वारा दिए गए रात के भोज से पहले अचानक अमरीकी राष्ट्रपति लिंडन जॉनसेन उनके निवास पर पहुंच गए.

भोज का समय नज़दीक आता गया लेकिन जॉनसेन ने हटने का नाम ही नहीं लिया. फ़ोरी के सामने प्रोटोकॉल की समस्या पैदा हो गई क्योंकि राष्ट्रपति जॉनसेन उस भोज में आमंत्रित ही नहीं थे.

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आख़िरकार फ़ोरी जॉनसेन के पास जा कर बोली, 'मिस्टर प्रेसिडेंट आप भोज के लिए क्यों नहीं रूकते? जॉनसन का जवाब था, ' मैं आपके साथ ज़रूर खाना खाउंगा.' अब फ़ोरी के सामने दिक्क़त पैदा हो गई कि राष्ट्पति जॉनसेन को डाइनिंग टेबिल पर बैठाया कहाँ जाए?

सभी आमंत्रित मेहमान पहुंच चुके थे और जानिंग टेबिल पर एक अतिरिक्त कुर्सी लगाने की गुंजाइश नहीं थी. ऐसे में इंदिरा गांधी के सचिव परमेश्वर नारायण हक्सर ने पेशकश की कि वो खाने की मेज़ पर नहीं बैठेंगे और कहीं और बैठकर खाना खा लेंगे.

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बाद में अमरीका के विदेश मंत्री डीन रस्क ने बीके नेहरू और फ़ोरी को उलाहना दिया कि आपने मेरे लिए सिर दर्द पैदा कर दिया. अब वॉशिंगटन में तैनात हर राजदूत अपेक्षा करेगा कि अमरीका के राष्ट्पति उनके यहाँ खाने पर आंए.

इंदिरा गांधी से फ़ोरी की बहुत नज़दीकी थी. उनके कई जीवनीकारों ने लिखा है कि आपातकाल के दौरान जब किसी की हिम्मत नहीं पड़ती थी कि इंदिरा गांधी के सामने आपातकाल की परेशानियों का ज़िक्र करे, फ़ोरी ने ही उनके सामने सबसे पहले जबरन नसबंदी और अन्य ज़्यादतियों के बारे में दो टूक बात की थी.

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