राहुल गांधी के नेता प्रतिपक्ष बनने के मायने क्या हैं?

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कांग्रेस ने मंगलवार को एलान किया था कि राहुल गांधी लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष होंगे.
राहुल 2004 में चुनावी राजनीति में आए और तब से कोई भी पद लेने से बचते रहे थे. यहाँ तक कि पार्टी प्रमुख के पद से भी इस्तीफ़ा दे दिया था. लेकिन अब राहुल अनिच्छुक नेता की छवि तोड़ते दिख रहे हैं.
राहुल ने नेता प्रतिपक्ष का पद ले लिया है और बुधवार को उन्होंने लोकसभा में अपनी बात भी रखी.
कांग्रेस ने नेता प्रतिपक्ष की घोषणा मंगलवार को इंडिया गठबंधन के सभी नेताओं की कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के आवास पर हुई बैठक के बाद की थी.
इसके साथ ही 10 साल बाद लोकसभा को नेता प्रतिपक्ष मिला है.
बुधवार को लोकसभा में बतौर नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पहली बार बोले.
उन्होंने ओम बिरला के फिर से लोकसभा स्पीकर बनने पर बधाई देते हुए कहा, ''ज़ाहिर है कि सरकार के पास राजनीतिक शक्ति है लेकिन विपक्ष भी भारत के लोगों की आवाज़ का प्रतिनिधित्व कर रहा है. इस बार विपक्ष भारत के लोगों की आवाज़ का प्रतिनिधित्व ज़्यादा दमदार तरीक़े से कर रहा है."
"विपक्ष आपको संसद चलाने में मदद करेगा. यह बहुत महत्वपूर्ण है कि सहयोग भरोसे के साथ होना चाहिए. विपक्ष की आवाज़ संसद में सुनाई दे यह बहुत ज़रूरी है. हमें पूरी उम्मीद है कि विपक्ष की आवाज़ संसद में दबाई नहीं जाएगी. सवाल यह नहीं है कि संसद कितनी शांति से चल रही है. सवाल यह है कि भारत के लोगों की आवाज़ उठाने के लिए कितनी अनुमति मिलती है. आप विपक्ष की आवाज़ दबाकर संसद शांति से चला सकते हैं लेकिन यह आइडिया अलोकतांत्रिक है. स्पीकर की यह ज़िम्मेदारी होती है कि संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करे.''
10 साल बाद संसद को मिला विपक्ष का नेता

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बीते दो चुनावों में कांग्रेस के पास संसद का 10 फ़ीसदी सीट शेयर (54 सीट) भी नहीं रहा था.
ऐसे में कांग्रेस सदन में विपक्ष के नेता के तौर पर अपनी दावेदारी पेश ही नहीं कर पाई थी. 2014 में कांग्रेस के पास 44 सीटें थीं और 2019 में 52 सीटें थीं. इस बार कांग्रेस के पास 99 सीटें हैं.
राहुल गांधी का विपक्ष का नेता बनना ऐसी बात है, जिसकी अंदाज़ा पहले से था.
जब चार जून को चुनाव के नतीजे आए तो उस वक़्त ही कांग्रेस मुख्यालय- 24 अकबर रोड पर कांग्रेस के समर्थक भी कहने लगे थे- ‘इस बार संसद में राहुल गांधी पूरे विपक्ष की आवाज़ बनेंगे.’
पहली बार राहुल गांधी ने संसद में संवैधानिक पद लिया है. ये भी पहली बार है, जब उनके साथ लोकसभा में उनकी माँ सोनिया गांधी नहीं होंगी. सोनिया गांधी राज्यसभा सांसद बन गई हैं और उन्हीं की सीट रायबरेली से राहुल गांधी चुने गए हैं.
इस बार उनके साथ प्रियंका गांधी के लोकसभा में उनके साथ होने की संभवना हैं क्योंकि वानयाड सीट पर होने वाले उपचुनाव लड़ रही हैं. राहुल गांधी केरल के वायनाड से भी चुनाव जीते थे लेकिन उन्होंने रायबरेली से सांसद रहना चुना.
साल 2019 में जब कांग्रेस लोकसभा चुनाव में हारी तो राहुल गांधी ने इस हार की ज़िम्मेदारी लेते हुए कांग्रेस अध्यक्ष पद छोड़ दिया था.
इसके बाद कुछ सालों तक सोनिया गांधी अंतरिम अध्यक्ष रहीं. इस दौरान कई ऐसे मौक़े आए जब राहुल गांधी से अध्यक्ष पद वापस लेने को कहा गया लेकिन वो इस बात पर अड़े रहे कि वो अपनी पार्टी में कोई पद नहीं लेंगे.
इसके बाद साल 2022 में पार्टी के भीतर हाईवोल्टेज ड्रामे के बाद मल्लिकार्जुन खड़गे पार्टी के अध्यक्ष बने.
पांच सालों तक इस बात पर अड़े रहने के बाद अब इतने सालों में पहली बार राहुल गांधी कोई अहम पद लेने को तैयार हुए हैं.
कुछ दिन पहले कांग्रेस की राजनीति पर क़रीब से नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार और लेखक रशीद किदवई ने बीबीसी से कहा था कि नेता प्रतिपक्ष का पद राहुल गांधी की ज़िम्मेदारी लेने वाली छवि को उजागर करेगा.
किदवई ने कहा था, “नेता प्रतिपक्ष शैडो प्रधानमंत्री होता है. पूरे विपक्ष का ना सिर्फ़ वो नेतृत्व करता है बल्कि कई ज़रूरी नियुक्तियों में पीएम के साथ बैठता है. जिस तरह का चुनाव कैंपेन हमने पीएम मोदी और राहुल गांधी के बीच देखा है, इसमें कोई दो राय नहीं है कि दोनों एक दूसरे पर तीखी बयानबाज़ी करते हैं. ऐसे में पीएम के साथ बैठ कर फ़ैसले ले पाना और कामचलाऊ रिश्ते कायम कर पाना राहुल गांधी के लिए चुनौती होगी लेकिन अगर वो ख़ुद को एक परिपक्व नेता के तौर पर और मज़बूत करना चाहते हैं तो उन्हें ये करना होगा.”
राहुल गांधी की विपक्ष के नेता के तौर पर ज़िम्मेदारी क्या होगी?

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संसद में विपक्ष के नेता का भूमिका काफ़ी अहम होती है. वो संसद में सभी विपक्षी दलों की आवाज़ तो बनते ही हैं साथ ही उनके पास अपनी शक्ति और विशेषाधिकार होते हैं.
विपक्ष का नेता कई प्रमुख समितियों जैसे पब्लिक अकाउंट, पब्लिक अंडरटेकिंग और एस्टिमेट पर बनाई गई कमिटी का हिस्सा होता है.
विपक्ष के नेता की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका संयुक्त संसदीय समितियों और चयन समितियों में होती है.
ये चयन समितियां प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई), केंद्रीय सतर्कता आयोग, केंद्रीय सूचना आयोग, लोकपाल, साथ ही चुनाव आयुक्तों और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) के अध्यक्ष जैसे काफ़ी महत्वपूर्ण पदों की नियुक्तियां करती हैं.
विपक्ष का नेता एक कैबिनेट रैंक का पद है, जिसके अपने भत्ते हैं. इस पद पर जो भी व्यक्ति होता है, उसे संसद सदस्यों के वेतन, भत्ते और पेंशन अधिनियम 1954 की धारा तीन में दर्ज वेतन और हर दिन के भत्ते दिए जाते हैं.
राहुल गांधी जब पद लेने से करते रहे इनकार

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राहुल गांधी ने 2004 में ही पहली बार चुनावी राजनीति में दस्तक दी थी.
राहुल गांधी ने 2004 में उत्तर प्रदेश की अमेठी लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा था और जीत मिली थी.
अमेठी से ही राहुल के पिता राजीव गांधी चुनाव लड़ते थे. राहुल गांधी जब संसद पहुँचे तब अटल बिहारी वाजपेयी सांसद रहते हुए भी ख़राब सेहत के कारण संसद नहीं आ पाते थे.
आडवाणी नेता प्रतिपक्ष बन गए थे और मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री. राहुल ने सांसद रहते हुए संसद में कभी वाजपेयी को मोर्चा संभालते नहीं देखा.
राहुल गांधी 10 साल तक अपनी सरकार में लोकसभा सांसद रहे और पिछले 10 सालों से विपक्षी सांसद हैं.
कांग्रेस जब 2004 से 2014 तक सत्ता में रही तो राहुल मंत्री नहीं बने और कांग्रेस जब सत्ता से बाहर हुई तो नेता प्रतिपक्ष बनाने लायक भी जीत नहीं हासिल कर पाई.
राहुल मंत्री अपनी इच्छा से नहीं बने थे और नेता प्रतिपक्ष बनने भर उनके पास सांसद नहीं थे. वाजपेयी का सीधा सामना सोनिया गांधी ने किया था और अब राहुल गांधी नरेंद्र मोदी का सीधा सामना कर रहे हैं.
कहा जा रहा है कि कांग्रेस अभी अपने इतिहास के सबसे मुश्किल दौर से गुज़र रही थी और इसी मुश्किल से निकालने के लिए राहुल ने सात सितंबर 2022 से कन्याकुमारी से कश्मीर तक 'भारत जोड़ो यात्रा' की शुरुआत की.
इसके बाद राहुल ने मणिपुर से मुंबई तक यात्रा की और 2024 के चुनाव में कांग्रेस को 99 सीटों पर जीत मिली.
राहुल गांधी जब राजनीति में आए तो उनकी छवि अनिच्छुक नेता के तौर पर मीडिया में बनी थी लेकिन अब वह सीधे टकराते दिख रहे हैं.
राहुल के लिए सत्ता

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पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह ने अपनी आत्मकथा 'वन लाइफ़ इज़ नॉट एनफ़' में दावा किया था कि राहुल गांधी ने ही सोनिया गांधी को 2004 में प्रधानमंत्री बनने से रोका था.
नटवर सिंह के मुताबिक़, राहुल गांधी को डर था कि उनकी माँ की भी हत्या हो सकती है.
जनवरी, 2013 में ऑल इंडिया कांग्रेस कमिटी की बैठक उदयपुर में हुई थी. इसी बैठक में राहुल गांधी को कांग्रेस का उपाध्यक्ष बनाया गया था.
उपाध्यक्ष बनने के बाद राहुल गांधी ने एआईसीसी की बैठक को संबोधित करते हुए कहा था, ''बीती रात आप सबने मुझे बधाई दी. लेकिन मेरी माँ मेरे कमरे में आईं और पास बैठकर रोने लगीं. वह मानती हैं कि जिस सत्ता को पाने के लिए लोग बेताब हैं, वह दरअसल, ज़हर है.”
“मेरी दादी को उनके सुरक्षाकर्मियों ने ही मार दिया, जिन्हें दोस्त समझकर मैं बैडमिंटन खेला करता था. मेरे पिता के साथ भी यही हुआ, जिन्होंने लोगों के जीवन में उम्मीद जगाई थी. हमें सत्ता के पीछे नहीं भागना है बल्कि लोगों के बीच सत्ता को ले जाना है.''
राहुल गांधी 55 साल के हो गए हैं. पार्टी की कमान छोड़ चुके हैं. पार्टी की कमान लंबे समय बाद ग़ैर गांधी-नेहरू परिवार के व्यक्ति के पास है.
'भारत जोड़ो यात्रा' के दौरान मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा था, ''मैंने राहुल गांधी को बहुत पीछे छोड़ दिया है. अब मैं वो राहुल गांधी नहीं हूँ.''
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