प्रियंका गांधी को कांग्रेस ने रायबरेली के बदले दक्षिण भारत क्यों भेजा

प्रियंका गांधी

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इमेज कैप्शन, प्रियंका गांधी पहली बार चुनावी मैदान में उतरने जा रही हैं
    • Author, जुगल पुरोहित
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

प्रियंका गांधी चुनावी राजनीति में क़दम कब रखेंगी, इसका इंतज़ार दशकों से था. सोमवार को कांग्रेस पार्टी ने घोषणा कर दी कि प्रियंका गांधी केरल के वायनाड लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ेंगी.

इस घोषणा के साथ ही दशकों के इंतज़ार पर विराम लग गया.

चार जून को कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी जब यूपी की रायबरेली और केरल की वायनाड सीट से विजेता घोषित किए गए तभी तय हो गया था कि उन्हें एक सीट छोड़नी होगी.

सोमवार की शाम कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि राहुल रायबरेली सीट से सांसद रहेंगे और वायनाड छोड़ेंगे. उन्होंने यह भी घोषणा कर दी कि वायनाड सीट से प्रियंका गांधी उम्मीदवार होंगी.

प्रियंका गांधी ने पार्टी के फ़ैसले को स्वीकार करते हुए कहा, ''मैं वायनाड के लोगों को अपने भाई की अनुपस्थिति का अहसास नहीं होने दूंगी.'' प्रियंका गांधी ने कुछ ऐसी ही बात रायबरेली के लिए कही थी.

प्रियंका गांधी के वायनाड से चुनाव लड़ाने के कांग्रेस के फ़ैसले को राष्ट्रीय राजनीति पर नज़र रखने वाले विश्लेषक कैसे देखते हैं?

कांग्रेस पार्टी पर दशकों से गहरी नज़र रखने वाले पत्रकार जावेद अंसारी कहते हैं कि प्रियंका गांधी का चुनाव लड़ना हैरान नहीं करता है.

अंसारी कहते हैं, ''मुझे लगता है कि सवाल ये था कि कब चुनाव लड़ेंगी न कि इसमें अगर का सवाल था. अगर दोनों भाई-बहन अमेठी और रायबरेली से चुनाव लड़ते तो बड़ी बात होती, जैसा कि कहा जा रहा था. लेकिन चुनाव में प्रियंका ने राहुल गांधी के लिए रायबरेली में मोर्चा संभाल रखा और राहुल पूरे देश में फ्री होकर कैंपेन कर सके.''

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प्रियंका रायबरेली से क्यों नहीं?

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लेकिन प्रियंका गांधी अमेठी और रायबरेली दोनों को ठीक से समझती हैं, ऐसे में राहुल ने वायनाड को ही अपने पास क्यों नहीं रखा और प्रियंका रायबरेली से क्यों नहीं मैदान में उतरीं?

जावेद अंसारी कहते हैं, ''रायबरेली में प्रियंका के अनुभव को देखते हुए एक बार ऐसा सोचा जा सकता था कि उन्हें यहाँ की सीट देनी चाहिए और राहुल गांधी के पास वायनाड रहने देना चाहिए. मुझे लगता है कि पार्टी ने स्पष्ट संदेश दिया है कि राहुल गांधी ही पार्टी का चेहरा हैं और इसीलिए वह उत्तर प्रदेश से दूर नहीं जा सकते हैं. ख़ासकर तब जब कांग्रेस पार्टी ने लोकसभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन किया है.''

राजनीतिक विश्लेषक और लेखिका नीरजा चौधरी भी जावेद अंसारी की बातों से सहमत दिखती हैं.

नीरजा चौधरी कहती हैं, ''मुझे लगता है कि कांग्रेस पार्टी का यह सुनियोजित फ़ैसला किया है. उत्तर प्रदेश में कांग्रेस ने जिस तरह का प्रदर्शन किया और बीजेपी को जिस तरह से नुक़सान हुआ, उसे देखते हुए पार्टी संदेश देना चाहती है कि वह उत्तर प्रदेश को कितना महत्व देती है.''

''इसके अलावा अखिलेश यादव और राहुल गांधी के बीच का जो स्पष्ट समीकरण है, उसकी अहमियत को भी कम करके नहीं देखना चाहिए. दोनों की आपसी समझ और समीकरण से दोनों पार्टियों को फ़ायदा हुआ है. हाँ, पहले ऐसा लगता था कि राहुल अपने पास वायनाड ही रखेंगे. ख़ासकर तब जब प्रियंका गांधी रायबरेली में ज़्यादा सक्रिय थीं.''

इस बार के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच गठबंधन था और कांग्रेस को छह सीटों पर जीत मिली. वहीं 2019 में यूपी से कांग्रेस को केवल रायबरेली से सोनिया गांधी को जीत मिली थी. 2014 में यूपी में कांग्रेस दो सीटें अमेठी और रायबरेली जीत पाई थी.

इस बार राहुल गांधी को रायबरेली में तीन लाख 90 हज़ार से ज़्यादा मतों से जीत मिली और वायनाड में तीन लाख 64 हज़ार से ज़्यादा मतों से. वायनाड में प्रियंका की उम्मीदवारी के मायने क्या हैं? क्या वायनाड में चुनाव प्रिंयका के लिए जीत बहुत आसान है?

प्रियंका की नेतृत्व क्षमता?

2020 में प्रियंका गांधी को कांग्रेस ने पूरे उत्तर प्रदेश की कमान सौंपी. ताकि वो पार्टी को 2022 के विधानसभा चुनाव के लिए तैयार कर सकें.

उन्होंने 'लड़की हूं, लड़ सकती हूं' कैंपेन के तहत महिलाओं को ध्यान में रखते हुए अपने मिशन की शुरुआत की. कई लोगों ने इसके लिए उनकी तारीफ़ भी की लेकिन कांग्रेस को चुनाव में इसका ख़ास फ़ायदा नहीं हुआ.

2022 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को महज़ 2.3 फ़ीसदी ही वोट मिले और वो सिर्फ़ दो सीटें ही जीत पाई.

इसके अलावा पंजाब कांग्रेस में मचे घमासान को प्रियंका ने जिस तरह से हैंडल किया उसकी भी कई राजनीतिक जानकारों ने आलोचना की.

अमरिंदर सिंह को मुख्यमंत्री पद से हटाकर चरणजीत सिंह चन्नी को सीएम बनाने के फ़ैसले के पीछे जानकारों ने प्रियंका गांधी को ज़िम्मेदार बताया और उनकी राय में ये फ़ैसला कांग्रेस के लिए बिलकुल ग़लत साबित हुआ.

राजनीतिक विश्लेषक ये भी मानते हैं कि राजस्थान में भी प्रियंका गांधी ने कुछ ऐसा ही किया था. वहां जब सचिन पायलट बग़ावती तेवर दिखा रहे थे तब भी उन पर कोई कार्रवाई न होने का नुकसान पार्टी को झेलना पड़ा.

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वायनाड के लोग प्रियंका का साथ देंगे?

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नीरजा चौधरी कहती हैं, ''यह अभी देखना बाक़ी है कि वायनाड के लोग प्रियंका के मामले में किस तरह से सामने आते हैं. वायनाड में मतदान के बहुत दिनों बाद तक भी राहुल ने रायबरेली से चुनाव लड़ने की बात नहीं बताई थी. ऐसे में यह देखना होगा कि वायनाड के लोग राहुल के फ़ैसले को धोखे के रूप में लेते हैं या नाराज़गी ज़ाहिर करते हैं. हालांकि मुझे लगता है कि प्रियंका ऐसा नहीं होने देंगी और चुनावी नतीजे को अपने पक्ष में करने में कामयाब होंगी."

प्रियंका गांधी के व्यक्तित्व पर नीरजा चौधरी कहती हैं, ''मुझे लगता है कि प्रियंका गांधी ज़्यादा व्यावहारिक हैं. राहुल गांधी की तुलना में प्रियंका गांधी की भाषा ज़्यादा सहज है. लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह राहुल का पाँचवां लोकसभा चुनाव है और प्रियंका गांधी के लिए पहला.''

''राहुल गांधी ही भविष्य के नेता हैं, इसे लेकर कांग्रेस बिल्कुल स्पष्ट है. अगर प्रियंका 18वीं लोकसभा में दस्तक देती हैं तो यह उनके लिए बहुत ही दिलचस्प होगा. ख़ासकर तब जब उनकी माँ सोनिया गांधी राज्यसभा में हैं. संसद में प्रियंका गांधी पर लोग बहुत क़रीबी से नज़र रखेंगे. यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या वह संसद में अपने भाई की परछाई में रहेंगी?''

अंग्रेज़ी अख़बार हिन्दुस्तान टाइम्स के राजनीतिक संपादक विनोद शर्मा कहते हैं, ''यह तय था कि राहुल गांधी रायबरेली ही सीट अपने पास ही रखेंगे.''

शर्मा राहुल के रायबरेली में बने रहने को उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को फिर ज़िंदा करने से जोड़कर देखते हैं.

राहुल गांधी का ट्वीट

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अब प्रियंका गांधी की चुनावी मैदान में एंट्री पर भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता शहज़ाद पूनावाला ने कहा कि ये क़दम दिखाता है कि कांग्रेस में कितना गहरा परिवारवाद है.

वो कहते हैं, "मां राज्य सभा में है. बेटा लोकसभा में और अब पार्टी का ये फ़ैसला. ये दिखाता है कि कांग्रेस एक पार्टी नहीं बल्कि एक परिवार द्वारा संचालित कंपनी है."

हलांकि विनोद शर्मा इस बात से सहमत नहीं हैं.

रायबरेली से गांधी-नेहरू परिवार की जड़ों का ज़िक्र करते हुए विनोद शर्मा कहते हैं, ''रायबरेली का गांधी परिवार से संबंध फ़िरोज़ गांधी से लेकर राहुल गांधी तक है. ऐसे में यह तय था कि राहुल रायबरेली से ही सांसद रहेंगे. मुझे पता है कि कुछ लोग वंशवादी होने का सवाल उठाएंगे लेकिन यह लोकतांत्रिक वंशवादी है. यहां जनादेश की ज़रूरत पड़ती है और इस तरह की आलोचना को बहुत बल नहीं मिलता है.''

दिलचस्प है कि एक समय में गांधी परिवार ने दक्षिण भारत की सीट के लिए रायबरेली सीट छोड़ दी थी. नीरजा चौधरी कहती हैं, ''इंदिरा गांधी 1980 में रायबरेली से जीती थीं और उन्होंने आंध्र प्रदेश की मेडक सीट के लिए यहाँ से इस्तीफ़ा देने का फ़ैसला किया था. इसके बाद रायबरेली सोनिया गांधी आईं और अब राहुल गांधी.''

अब यह देखना बाक़ी है कि वायनाड में कब उपचुनाव होता है और वहाँ के मतदाता किसे अपना सांसद चुनते हैं.

राहुल-अखिलेश की जोड़ी

राहुल और अखिलेश

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विनोद शर्मा कहते हैं, '' 2014 के बाद से बीजेपी ने यूपी में जो चाहा वो किया क्योंकि उसे खुली छूट मिली हुई थी. अब यूपी में यह स्थिति बदल गई है और कांग्रेस ने यहाँ ठोस शुरुआत की है. पहले कांग्रेस यूपी में राज करने वाली एक पार्टी थी और उसकी सवर्णों, दलितों के साथ अल्पसंख्यकों में अच्छी पैठ थी.''

''लेकिन धीरे-धीरे कांग्रेस की मज़बूती समाजवादी पार्टी, बीएसपी और बीजेपी में बँटती गई. आख़िरकार कांग्रेस की मौजूदगी यूपी में ना के बराबर रही. हालांकि लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद यूपी में कांग्रेस की डूबती नैया को सहारा मिलता दिख रहा है.''

''कांग्रेस को अब किनारा बनाने की ज़रूरत है. इसके लिए कांग्रेस को यूपी में एक सामाजिक समीकरण तैयार करना होगा. कांग्रेस इसी के दम पर सभी ज़िलों और फिर प्रदेश के बाद देश में जगह बना पाएगी. कांग्रेस की उम्मीदें एक बार फिर से ज़िंदा हुई हैं और उसके पास फिर से मज़बूती हासिल करने का मौक़ा है.''

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''कांग्रेस की यह मज़बूती समाजवादी पार्टी के साथ भरोसेमंद और ठोस साझेदारी की गारंटी दे सकती है. समाजवादी पार्टी और कांग्रेस में अच्छी समझ न केवल शीर्ष नेतृ्त्व के स्तर पर है बल्कि मतदाताओं ने भी स्वीकार किया है और दोनों पार्टी एक दूसरे की तारीफ़ कर रहे हैं.''

तो ऐसे समय में जब प्रियंका गांधी अपनी चुनावी पारी शुरू करने जा रही हैं, ऐसे में एक बार फिर गांधी परिवार के राजनीतिक रोल को लेकर बातें शुरू हो गई हैं.

11 जून को मंत्रिमंडल गठन पर टिप्पणी करते हुए राहुल गांधी ने भारतीय जनता पार्टी के 'परिवारवाद' पर निशाना साथा. उन्होंने एक्स (पहले ट्विटर) पर लिखा, "पीढ़ियों के संघर्ष, सेवा और बलिदान की परंपरा को परिवारवाद कहने वाले अपने ‘सरकारी परिवार’ को सत्ता की वसीयत बांट रहे. कथनी और करनी के इसी फर्क को नरेंद्र मोदी कहते हैं."

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