लोकसभा स्पीकर आज़ादी के बाद से अब तक कौन और कैसे चुने गए

ओम बिड़ला

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    • Author, अनिल जैन
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए

18वीं लोकसभा के गठन के बाद अब सबकी नज़रें लोकसभा स्पीकर के चुनाव पर टिकी हैं.

बुधवार को सत्ता पक्ष के उम्मीदवार ओम बिरला लगातार दूसरी बार अध्यक्ष बन गए हैं.

आमतौर पर स्पीकर सत्तारूढ़ दल का ही होता है और उपाध्यक्ष यानी डिप्टी स्पीकर विपक्ष का.

इस बार भी स्पीकर का चुनाव सर्वसम्मति से हो सकता था लेकिन सत्तापक्ष ने विपक्ष की यह मांग ठुकरा दी कि परंपरा के मुताबिक़ डिप्टी स्पीकर का पद उसे दिया जाए.

संख्या बल के लिहाज से नवनिर्वाचित लोकसभा में चूंकि सत्तारूढ़ गठबंधन के पास पर्याप्त बहुमत है, इसलिए उनके उम्मीदवार की जीत तय थी.

परंपरा के मुताबिक़ पहली लोकसभा यानी 1952 से लेकर 1991 में दसवीं लोकसभा तक तो सत्तारूढ़ दल का सदस्य ही इस पद के लिए निर्वाचित होता रहा.

लेकिन हाल के दशकों में जब से गठबंधन सरकारों का दौर शुरू हुआ, यह परंपरा टूटी और कई मौक़े ऐसे आए, जब इस पद पर सत्तारूढ़ दल के बजाय उसके सहयोगी अथवा उसकी सरकार को बाहर से समर्थन देने वाले दल के सदस्य को इस पद के लिए चुना गया.

लोकसभा अध्यक्ष चाहे जिस भी दल का सदस्य चुना जाए, लेकिन माना जाता है कि चुने जाने के बाद उसकी दलीय संबद्धता औपचारिक तौर पर ख़त्म हो जाती है और वह दलीय गतिविधियों से अपने को दूर कर लेता है.

उससे अपेक्षा की जाती है कि वह दलीय हितों और भावनाओं से ऊपर उठकर सदन की कार्यवाही का संचालन करते हुए विपक्षी सदस्यों के अधिकारों का भी पूरा संरक्षण करेगा.

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कब-कब हुए स्पीकर पद के लिए चुनाव

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इसी मान्यता के चलते आदर्श स्थिति यही मानी गई कि लोकसभा अध्यक्ष का निर्वाचन सर्वसम्मति से होना चाहिए. लेकिन 1952 में गठित पहली लोकसभा स्पीकर के लिए चुनाव की स्थिति आ गई. कांग्रेस के गणेश वासुदेव मावलंकर के सामने शंकर शांताराम मोरे ने चुनाव लड़ा.

मोरे, पीजेंट्स एंड वर्कर पार्टी ऑफ़ इंडिया के नेता थे लेकिन उन्हें सभी वामपंथी दलों का साथ मिला. मावलंकर को 394 वोट मिले जबकि 55 सांसदों ने मोरे को वोट दिया था.

1956 में उनके आकस्मिक निधन के बाद बचे कार्यकाल के लिए उनकी जगह पर कांग्रेस के ही अनंतशयनम अयंगार का चुनाव भी निर्विरोध हुआ. इससे पहले तक अयंगार लोकसभा उपाध्यक्ष थे.

1957 में दूसरी लोकसभा के अध्यक्ष भी अयंगार ही चुने गए. इस बार भी उनका निर्वाचन निर्विरोध ही हुआ.

1962 में तीसरी लोकसभा में सरदार हुकुम सिंह और चौथी लोकसभा में नीलम संजीव रेड्डी भी स्पीकर पद पर निर्विरोध निर्वाचित हुए.

इन सभी लोकसभा अध्यक्षों का सदन की कार्यवाही के दौरान सरकार की ओर झुकाव होते हुए भी उनकी भूमिका को कमोबेश निर्विवादित ही माना गया.

हालांकि तीसरी लोकसभा तक तो संख्या बल के मामले में विपक्ष की स्थिति सत्ता पक्ष के मुक़ाबले बेहद कमज़ोर थी, लेकिन कम संख्या में होते हुए भी विपक्ष में प्रतिभाओं का अभाव नहीं था.

उस दौर में एके गोपालन, श्रीपाद अमृत डांगे, प्रो. हीरेन मुखर्जी, डॉ. राम मनोहर लोहिया, मधु लिमये, किशन पटनायक, महावीर त्यागी, अटल बिहारी वाजपेयी, नाथ पई, मीनू मसानी, हरिविष्णु कामत जैसे नेता विपक्ष में थे, जिनका अध्ययन के साथ ही सड़क यानी जनता से भी गहरा नाता था.

ये सभी दिग्गज पूरी तैयारी के साथ सदन में आते थे, इसलिए स्पीकर भी न तो एक सीमा से अधिक सत्तापक्ष का बचाव कर पाते थे और न ही सदन की कार्यवाही के नियमों की व्याख्या कर विपक्षी सदस्यों को मुद्दे उठाने से रोक पाते थे.

विपक्षी सदस्य भी नियमों को लेकर इतने सचेत रहते कि कई मौक़ों पर वे स्पीकर की व्यवस्था को चुनौती भी देते थे और स्पीकर को भी मजबूर होकर उनकी दलील स्वीकार करनी पड़ती थी.

इस सिलसिले में तीसरी लोकसभा का एक वाक़या बेहद दिलचस्प है. छत्तीसगढ़ में बस्तर की आदिवासी रियासत के पूर्व महाराजा प्रवीरचंद्र भंजदेव आदिवासियों के बीच ख़ासा लोकप्रिय थे.

1966 में आदिवासियों के एक आंदोलन का नेतृत्व करते हुए पुलिस द्वारा की गई गोलीबारी में उनकी मौत हो गई थी.

इस मामले को डॉ. लोहिया ने लोकसभा मे उठाया. तत्कालीन स्पीकर सरदार हुकुम सिंह ने कहा कि यह मामला क़ानून व्यवस्था से संबंधित है और राज्य सरकार के तहत आता है, इसलिए इसे यहां नहीं उठाया जा सकता.

अध्यक्ष की इस व्यवस्था पर मधु लिमये ने कहा था कि क़ानून व्यवस्था का मामला ज़रूर राज्य के अंतर्गत आता है लेकिन आदिवासी कल्याण का मामला केंद्र सरकार से संबंधित है...बस्तर में आदिवासियों पर जुल्म हुआ है, आंदोलन और शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने के उनके मौलिक अधिकार का हनन हुआ है, इसलिए यह मामला यहां उठाया जा सकता है.

लिमये की दलील का विपक्ष के अन्य सदस्यों ने भी समर्थन किया. अंतत: अध्यक्ष को अपनी व्यवस्था वापस लेते हुए भंजदेव की हत्या से संबंधित मामले पर बहस की अनुमति देना पड़ी.

10 साल तक पद पर बने रहने वाले स्पीकर

चौथी लोकसभा यानी 1967 में कांग्रेस के नीलम संजीव रेड्डी स्पीकर चुने गए.

उस लोकसभा में संख्या बल के लिहाज से विपक्ष भी काफ़ी मज़बूत स्थिति में था और इसलिए चुनाव हुआ.

कांग्रेस के नीलम संजीव रेड्डी के सामने निर्दलीय टी. विश्वनाथम थे. लेकिन उन्हें विपक्ष के सभी दलों का समर्थन हासिल था.

रेड्डी को 278 मत मिले जबकि विश्वनाथम को 207 मत. मतों के लिहाज से ये सबसे क़रीबी चुनाव रहा है.

वे महज दो साल ही इस पद पर रहे क्योंकि 1969 में राष्ट्रपति पद के लिए अपनी उम्मीदवारी घोषित होने पर उन्होंने स्पीकर पद से इस्तीफ़ा दे दिया था.

इस पद पर उनका भी कार्यकाल कमोबेश निर्विवाद ही रहा. उनकी जगह कांग्रेस के ही गुरुदयाल सिंह ढिल्लों स्पीकर चुने गए. वे चौथी लोकसभा के शेष कार्यकाल तक अध्यक्ष रहे और उसके बाद पांचवीं लोकसभा में भी स्पीकर चुने गए.

वे पांचवीं लोकसभा में इस पद पर रहे और दिसंबर 1975 में इस्तीफ़ा देकर केंद्रीय मंत्रिमंडल मे शामिल हो गए.

उनके स्थान पर बलिराम भगत स्पीकर निर्वाचित हुए और छठी लोकसभा का गठन होने तक इस पद पर रहे. बलिराम भगत के सामने विपक्ष ने जनसंघ के जगन्नाथ राव जोशी को खड़ा किया. भगत को 344 वोट मिले जबकि जोशी को 58.

इसके बाद 1977 में छठी लोकसभा अस्तित्व में आई. इस लोकसभा का चेहरा बिल्कुल बदला हुआ था. पहली बार कांग्रेस विपक्ष में थी और पांच दलों के विलय से बनी जनता पार्टी सत्ता में.

शुरुआत में जनता पार्टी की ओर नीलम संजीव रेड्डी का नाम स्पीकर के लिए प्रस्तावित हुआ और वे निर्विरोध चुन लिए गए लेकिन इस बार वे महज चार महीने ही इस पद पर रहे.

 बलराम जाखड़

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जुलाई 1977 में वे राष्ट्रपति निर्वाचित हो गए और उनकी जगह सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश रहे केएस हेगड़े लोकसभा स्पीकर चुने गए.

हेगड़े का कार्यकाल चुनौती भरा रहा लेकिन उनकी भूमिका निर्विवाद रही.

चूंकि छठी लोकसभा अपना निर्धारित कार्यकाल पूरा किए बगैर ही भंग हो गई थी लिहाजा 1980 में मध्यावधि चुनाव हुए और सातवीं लोकसभा अस्तित्व में आई.

इस लोकसभा के अध्यक्ष बलराम जाखड़ चुने गए. वे पूरे कार्यकाल तक इस पद पर रहे और आठवीं लोकसभा में भी उन्होंने यही दायित्व संभाला. इस तरह वे लगातार 10 वर्षों तक इस पद पर रहने वाले पहले स्पीकर हुए.

1989 में नौवीं लोकसभा अस्तित्व में आई. इसी लोकसभा से देश में गठबंधन की राजनीति का दौर शुरू हुआ और केंद्र में पहली बार गठबंधन सरकार बनी.

समाजवादी नेता रवि राय सत्तारूढ़ जनता दल की ओर से निर्विरोध स्पीकर चुने गए. उनका कार्यकाल छोटा और चुनौतीपूर्ण रहा, लेकिन कोई विवाद उनके साथ नत्थी नहीं हो सका.

1991 में देश ने फिर मध्यावधि चुनाव का सामना किया और दसवीं लोकसभा वजूद में आई.

इस लोकसभा में सत्तारूढ़ कांग्रेस की ओर से शिवराज पाटिल स्पीकर चुने गए. उनका भी चुनाव निर्विरोध हुआ लेकिन इस पद पर उनकी भूमिका औसत दर्जे की ही मानी गई.

1996 में ग्यारहवीं लोकसभा का चुनाव हुआ. केंद्र में एक फिर गठबंधन सरकार बनी. इस सरकार को कांग्रेस ने बाहर से समर्थन दिया था.

इस लोकसभा में स्पीकर के निर्वाचन में एक नया प्रयोग हुआ. सत्तारूढ़ दल या गठबंधन ने यह पद अपने पास न रखते हुए सरकार को समर्थन दे रही कांग्रेस को दिया.

कांग्रेस की ओर से पूर्वोत्तर के आदिवासी नेता पीए संगमा ग्यारहवीं लोकसभा के स्पीकर निर्वाचित हुए. हालांकि वे महज दो वर्ष ही इस पद पर रहे और लोकसभा भंग हो गई लेकिन वे पहले ऐसे स्पीकर रहे जिनसे सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों को कभी कोई शिकायत नहीं रही.

उन्होंने बहुत ही कुशलतापूर्वक सदन की कार्यवाही का संचालन किया और एक तटस्थ अध्यक्ष के रूप में अपनी छाप छोड़ी.

संगमा की एक विशेषता यह भी रही कि हिंदी भाषी न होते हुए भी सदन की कार्यवाही का संचालन करते वक़्त उन्होंने ज्यादातर समय हिंदी में ही बात किया. उनके मुंह से हिंदी सुनना सदस्यों और सदन की कार्यवाही देखने वाले अन्य लोगों को भी बड़ा रुचिकर लगता था.

1998 में हुए मध्यावधि चुनाव से 12वीं लोकसभा अस्तित्व में आई. केंद्र में इस बार भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई में गठबंधन सरकार बनी.

इस सरकार ने भी पिछली संयुक्त मोर्चा सरकार द्वारा शुरू की गई परंपरा को जारी रखते हुए स्पीकर का पद अपने पास नहीं रखते हुए अपनी सरकार को बाहर से समर्थन दे रही दल तेलुगू देशम पार्टी को दिया.

जीएम बालयोगी निर्विरोध स्पीकर चुने गए. उनके रूप में देश की सबसे बड़ी पंचायत को पहली बार दलित समुदाय का अध्यक्ष मिला.

बारहवीं लोकसभा का कार्यकाल भी महज़ एक साल का ही रहा. अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार अविश्वास प्रस्ताव पर महज़ एक वोट से गिर गई.

स्पीकर बालयोगी चाहते तो उस समय कांग्रेस के सदस्य गिरिधर गोमांग, जो कि उस समय ओडिशा के मुख्यमंत्री बन चुके थे, को मतदान में शामिल होने से रोक कर या स्पीकर के रूप में अपने निर्णायक वोट का इस्तेमाल कर सरकार को गिरने से बचा सकते थे. लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया और स्पीकर के रूप में नैतिकता और निष्पक्षता का एक नया मानदंड स्थापित किया.

असमय सरकार गिरने की वजह से देश को 1999 में फिर मध्यावधि चुनाव का सामना करना पड़ा. तेरहवीं लोकसभा अस्तित्व में आई.

वाजपेयी की अगुवाई में फिर गठबंधन सरकार बनी और बालयोगी ही लोकसभा स्पीकर चुने गए. लेकिन इस बार भी वे अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके और मार्च 2002 में एक विमान दुर्घटना मे उनकी मृत्यु हो गई.

उनके स्थान पर सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल शिव सेना के मनोहर जोशी लोकसभा स्पीकर चुने गए.

उनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि को देखते हुए लोकसभा अध्यक्ष की उनकी भूमिका को लेकर कई तरह की आशंका जताई गई थीं लेकिन उन्होंने पीए संगमा और जीएमसी बालयोगी की परंपरा का निर्वाह करते हुए बेहद कुशलता और तटस्थता के साथ अपने दायित्व का निर्वाह किया और सारी आशंकाओं को निर्मूल साबित किया.

सोमनाथ चटर्जी

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जब कांग्रेस ने लेफ़्ट को दिया स्पीकर पद

13वीं लोकसभा ने अपना पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा किया और 2004 में चौदहवीं लोकसभा के के लिए चुनाव हुए.

इस लोकसभा में भी स्पीकर को लेकर पुराने प्रयोग का दोहराव जारी रहा. यानी सत्तारूढ़ कांग्रेस ने स्पीकर का पद अपने पास न रखते हुए सरकार को बाहर से समर्थन दे रही भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) को दिया. सोमनाथ चटर्जी लोकसभा के अध्यक्ष बने.

देश के संसदीय इतिहास में यह पहला अवसर था, जब कोई खांटी वामपंथी नेता इस पद पर बैठा. लंबा संसदीय अनुभव रखने वाले चटर्जी का राजनीतिक कद चूंकि काफ़ी ऊंचा था, लिहाजा कई बार हंगामे को नियंत्रित करने के लिए वे हेडमास्टर जैसी भूमिका में भी आ जाते थे.

सोमनाथ चटर्जी पूरे पांच साल तक स्पीकर रहे. 2009 में पंद्रहवीं लोकसभा का गठन हुआ तो सत्तारूढ़ गठबंधन की अगुवाई कर रही कांग्रेस ने इस बार यह पद अपने पास ही रखा और मीरा कुमार के रूप में लोकसभा को पहली महिला अध्यक्ष मिलीं.

उनका कार्यकाल भी बेहद चुनौती भरा रहा. लोकसभा का कोई सत्र ऐसा नहीं रहा जब विपक्ष ने हंगामा और वॉकआउट न किया हो. इसके बावजूद मृदुभाषी मीरा कुमार पूरे संयम के साथ अपना दायित्व निभाती रहीं. हालांकि विपक्ष ने पक्षपात के आरोपों से उन्हें भी बरी नहीं किया.

सुमित्रा महाजन

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साल 2014 और डिप्टी स्पीकर का पद

पांच साल बाद यानी 2014 में 16वीं लोकसभा को भी सुमित्रा महाजन के रूप में लगातार दूसरी बार महिला स्पीकर मिलीं. हर लोकसभा स्पीकर की निष्पक्षता का पलड़ा थोड़ा-बहुत सरकार की ओर ही झुका रहता है. महाजन भी अपवाद नहीं रहीं.

सदन में कई बार मंत्रियों को सवालों से घिरता देख ख़ुद उनके बचाव में सामने आईं और प्रश्न, प्रतिप्रश्न तथा पूरकप्रश्न पूछने वाले विपक्षी सदस्यों को नियमों की व्याख्या करते हुए डांटा तक.

महाजन पर ये भी आरोप लगे कि पार्टी के अंदरूनी समीकरणों और पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की भाव-भंगिमा को समझते हुए उन्होंने कई सार्वजनिक अवसरों पर लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे वरिष्ठ नेताओं की उपस्थिति को भी उपेक्षापूर्वक नज़रअंदाज किया.

पांच साल बाद 17वीं लोकसभा अस्तित्व में आई. भाजपा ने लगातार दूसरी बार सरकार बनाई. इस बार उसकी ओर से स्पीकर के लिए ओम बिड़ला का नाम आगे किया गया.

इस लोकसभा में विपक्ष संख्या बल के लिहाज से पूरी तरह निस्तेज था, लिहाजा ओम बिरला निर्विरोध स्पीकर चुन लिए गए.

वे इससे पहले महज एक बार ही लोकसभा के सदस्य रहे थे लिहाजा उनके पास संसदीय अनुभव की कमी थी, जो पूरे पांच साल सदन के संचालन के दौरान उनके व्यवहार में झलकती रही.

उन्होंने विपक्षी सदस्यों के सदन से निलंबन के मामले में इतिहास रचते हुए पूरे कार्यकाल में क़रीब 140 सदस्यों को अलग-अलग समय पर सदन से निलंबित किया.

अब 18वीं लोकसभा में एक बार फिर ओम बिरला स्पीकर बन गए हैं. यानी बलराम जाखड़ और जीएचसी बालयोगी के बाद वे दूसरे ऐसे स्पीकर हैं जो लगातार तीसरे बार इस पद पर बैठे.

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